प्रयागराज। उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार) द्वारा आयोजित संवाद श्रृंखला ‘विमर्श’ में वरिष्ठ नृत्यागंना बीना सिंह ने ‘ढेड़िया’ के इतिहास, सांस्कृतिक महत्व और संरक्षण पर विस्तार से चर्चा किया। उन्होंने कहा कि ढेड़िया केवल एक लोकनृत्य नहीं, बल्कि भारतीय लोकजीवन में नारी के धैर्य, आस्था और समर्पण का प्रतीक है। बीना सिंह ने बताया कि लोकमान्यताओं के अनुसार त्रेता युग में जब भगवान श्रीराम वनवास के लिए अयोध्या से प्रस्थान कर रहे थे, तब उनकी ‘ढेड़िया उतारी गई’ थी। इसी घटना को इस लोक परंपरा की शुरुआत माना जाता है। उन्होंने कहा कि यह अनुष्ठान भगवान श्रीराम की मंगलकामना, सुरक्षित यात्रा और सकुशल वापसी की प्रार्थना के रूप में किया गया था। समय के साथ यह परंपरा लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा बन गई।
नृत्यागंना बीना सिंह ने बताया कि ‘ढेड़िया’ का अर्थ ‘धैर्य रखने वाली बहू’ माना जाता है। यह नारी के धैर्य, त्याग और विपरीत परिस्थितियों में भी परिवार तथा समाज के प्रति उसके समर्पण का प्रतीक है। बीना सिंह ने कहा कि ढेड़िया नृत्य की सबसे विशिष्ट पहचान इसकी प्रस्तुति शैली है। इसमें महिलाएं अपने सिर पर एक पात्र में जलता हुआ दीपक रखकर संतुलन के साथ नृत्य करती हैं। यह केवल कलात्मक प्रदर्शन नहीं, बल्कि धैर्य, आत्मसंयम, श्रद्धा और साधना का प्रतीक माना जाता है।

वरिष्ठ नृत्यागंना बीना सिंह ने बताया कि प्राचीन समय में इस अनुष्ठान के दौरान पात्र में धान की भूसी और कड़वा तेल रखा जाता था। जलते हुए दीप के साथ इस पात्र को गांव के चौरा (देवस्थल) तक ले जाकर देवी-देवताओं की आराधना की जाती थी। यह अनुष्ठान परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छी फसल और समाज के कल्याण की कामना के साथ संपन्न होता था। उन्होंने उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र द्वारा लोककलाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए किए जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे मंच विलुप्तप्राय लोक विधाओं को नई पहचान देने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। कार्यक्रम का संचालन आकाश अग्रवाल ने किया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य वक्ता के साथ उपनिदेशक डॉ. मुकेश उपाध्याय, कार्यक्रम प्रभारी कृष्ण मोहन द्विवेदी ने दीप जलाकर किया।
