गणेश चतुर्थी का पावन पर्व विघ्नहर्ता श्री गणेश की आराधना, रिद्धि-सिद्धि के आगमन और जीवन में शुभता के संचार का प्रतीक है। इस दिन श्रद्धालु घर-घर में गणपति बप्पा की स्थापना करते हैं और विधि-विधान से उनकी पूजा-अर्चना में लीन रहते हैं। परंतु, इस अत्यंत पवित्र और आनंदमयी रात्रि को लेकर शास्त्रों में एक विशेष और सख्त सावधानी का उल्लेख भी मिलता है-वह है गणेश चतुर्थी की रात ‘चंद्र-दर्शन’ न करना। सनातन परंपरा और धार्मिक मान्यताओं में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के चंद्रमा को देखना वर्जित माना गया है, और लोक-व्यवहार में इस तिथि को ‘कलंक चतुर्थी’ के नाम से भी जाना जाता है।
गणेश चतुर्थी पर चंद्र-दर्शन न करनी वजह
शास्त्रों के अनुसार, यदि इस रात कोई भूल से भी आकाश में चमकते चंद्रमा के दर्शन कर लेता है, तो उस पर समाज में मिथ्या दोष, यानी किसी न किसी झूठे आरोप या चोरी का कलंक लगने का भय रहता है। यही कारण है कि सदियों से इस रात लोग चंद्र-दर्शन से बचने के लिए विशेष सतर्कता बरतते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अमृतमयी किरणों से शीतलता बरसाने वाले चंद्रमा को देखकर आखिर ऐसा कौन सा पाप या कलंक लग जाता है? इस निषेध के पीछे केवल एक परंपरा ही नहीं, बल्कि देवराज इंद्र, धनपति कुबेर और स्वयं चंद्रदेव से जुड़ी अहंकार और उसके भंजन की एक अत्यंत प्रभावकारी पौराणिक कथा निहित है। आइए जानते हैं गणेश चतुर्थी पर चंद्र-दर्शन न करने का पौराणिक कारण, इससे जुड़ा श्राप और इसके पीछे छिपा गहरा जीवन-दर्शन।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार भगवान श्री गणेश को देवलोक और भक्तों द्वारा अत्यधिक मोदक (लड्डू) भेंट में मिले थे। मोदकों का भोग लगाकर और पेट भरकर गणेश जी अपने वाहन मूषक (चूहे) पर सवार होकर कैलाश की ओर लौट रहे थे। रात्रि का समय था और गगन में पूर्णिमा का चंद्रमा अपनी शीतल और सुंदर किरणों से चमक रहा था। मार्ग में अचानक एक विषैला सर्प (साँप) मूषक के सामने आ गया। सर्प को देखकर मूषक भयभीत हो गया और डर के मारे उछल पड़ा। मूषक के इस तरह अचानक हिलने से गणेश जी का संतुलन बिगड़ गया और वे ज़मीन पर गिर पड़े। इस झटके से उनके पेट में रखे कई मोदक बाहर निकल आए। गणेश जी ने शांत भाव से स्वयं को संभाला, मोदकों को वापस एकत्र किया और उदर पर नाग को लपेटकर पुनः संभलकर बैठ गए। आकाश में उपस्थित चंद्रदेव इस पूरी घटना को देख रहे थे। अपने अति सुंदर रूप और आभा पर अभिमान करने वाले चंद्रमा से बाल गणेश का इस प्रकार गिरना देखा न गया और वे अहंकार में भरकर ज़मीन पर गिरे गणेश जी का उपहास उड़ाते हुए ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे।

चंद्रमा के इस घमंड और अनादर को देखकर श्री गणेश अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने चंद्रमा को अपने अहंकार का दंड देने के लिए तुरंत श्राप दे दिया: “हे चंद्र! तुम्हें अपने रूप और सुंदरता पर अत्यधिक अहंकार हो गया है। इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि तुम्हारी यह कांति और सुंदरता तुरंत समाप्त हो जाएगी। तुम पूरी तरह निष्प्रभ और काले हो जाओगे। जो भी तुम्हें देखेगा, उसे पाप लगेगा।” गणेश जी के श्राप के प्रभाव से चंद्रदेव की संपूर्ण चमक तुरंत लुप्त हो गई और वे अंधकार में डूब गए। अपनी भूल का अहसास होते ही चंद्रमा का सारा घमंड चूर-चूर हो गया। वे लज्जित होकर क्षमा माँगने लगे और समुद्र के जल में छिप गए। चंद्रमा के बिना संपूर्ण संसार में अंधकार छा गया और प्रकृति का संतुलन बिगड़ने लगा।
तब सभी देवता और ऋषि-मुनि चंद्रदेव को साथ लेकर गणेश जी की शरण में पहुँचे और उनसे चंद्रमा को क्षमा करने की प्रार्थना की। श्री गणेश दयालु हैं; भक्तों और देवों की स्तुति से उनका क्रोध शांत हुआ। गणेश जी ने कहा, “दिया गया श्राप पूरी तरह वापस तो नहीं लिया जा सकता, लेकिन मैं इसमें संशोधन करता हूँ। तुम अपनी खोई हुई कलाएँ (चमक) धीरे-धीरे पुनः प्राप्त करोगे। महीने के 15 दिन तुम्हारी कलाएँ घटेंगी (कृष्ण पक्ष) और अमवास्या को तुम पूरी तरह दिखाई नहीं दोगे। इसके बाद अगले 15 दिन तुम्हारी कलाएँ बढ़ेंगी (शुक्ल पक्ष) और पूर्णिमा को तुम पुनः पूर्ण रूप में चमकोगे।” इसके साथ ही गणेश जी ने एक विशेष चेतावनी देते हुए कहा, “भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी (गणेश चतुर्थी) के दिन जिस दिन मेरा यह अवतार दिवस मनाया जाएगा, उस दिन जो भी व्यक्ति तुम्हारे इस रूप का दर्शन करेगा, उस पर झूठा कलंक या चोरी का झूठा आरोप लगेगा।” इसी पौराणिक कथा के कारण ही गणेश चतुर्थी की रात को चंद्रमा के दर्शन करना वर्जित माना गया है।
क्या हुआ जब गणेश चतुर्थी पर श्रीकृष्ण ने कर लिए चंद्रमा के दर्शन?
माना जाता है कि द्वापर युग में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी गणेश चतुर्थी के दिन अनजाने में चंद्रमा के दर्शन कर लिए थे, जिसके कारण उन पर ‘स्यमंतक मणि’ चुराने का झूठा कलंक लगा था। बाद में श्रीकृष्ण ने गणेश चतुर्थी का व्रत रखकर विघ्नहर्ता गणेश जी की पूजा की, तब जाकर वे इस झूठे आरोप से मुक्त हुए थे। द्वापर युग में द्वारका नगरी में सत्राजित नाम का एक यादव सूर्यदेव का परम भक्त था। उसकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उसे ‘स्यमंतक मणि’ प्रदान की थी। यह मणि अत्यंत दिव्य थी—यह न केवल देखने में सूर्य के समान प्रज्वलित थी, बल्कि जहाँ भी रहती, वहाँ प्रतिदिन आठ भार (लगभग कई किलो) सोना प्रदान करती थी। इसके प्रभाव से उस क्षेत्र में कभी अकाल, महामारी या भुखमरी का भय नहीं रहता था। एक बार सत्राजित उस चमकती हुई मणि को गले में धारण करके द्वारका की राजसभा में आया। भगवान श्रीकृष्ण ने जनकल्याण के हित में सत्राजित से सुझाव दिया कि इस अद्भुत मणि को राजा उग्रसेन के पास जमा कर देना चाहिए ताकि इसका लाभ पूरी द्वारका प्रजा को मिल सके। परंतु सत्राजित ने धन के लोभ में आकर श्रीकृष्ण की बात अस्वीकार कर दी और मणि को अपने घर ले आया।
कुछ समय बाद, सत्राजित का भाई प्रसेनजित उस स्यमंतक मणि को पहनकर जंगल में शिकार खेलने गया। जंगल में एक सिंह ने प्रसेनजित पर हमला करके उसका वध कर दिया और मणि अपने मुँह में दबाकर ले गया। आगे चलकर ऋक्षराज (रीछों के राजा) जामवंत ने उस सिंह को मारकर मणि प्राप्त कर ली और उसे अपनी पुत्री जांबवती को खेलने के लिए दे दी। जब प्रसेनजित कई दिनों तक वापस नहीं लौटा, तो सत्राजित ने नगर में यह अफ़वाह फैला दी कि श्रीकृष्ण ने ही मणि के लोभ में उसके भाई का वध कर दिया है। यह झूठा कलंक सीधे श्रीकृष्ण के चरित्र पर लगा। दरअसल, भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (गणेश चतुर्थी) की रात अनजाने में श्रीकृष्ण ने आकाश में चंद्रमा के दर्शन कर लिए थे, जिसके कारण गणेश जी के श्राप के प्रभाव से उन पर यह मिथ्या आरोप लगा था।
अपने चरित्र पर लगे इस कलंक को धोने के लिए श्रीकृष्ण स्वयं प्रसेनजित की खोज में जंगल पहुँचे। वहाँ उन्होंने प्रसेनजित और सिंह के मृत शरीर देखे, जिससे पदचिह्नों का पीछा करते हुए वे जामवंत की गुफा तक जा पहुँचे। गुफा के भीतर उन्होंने देखा कि स्यमंतक मणि एक बच्चे के पालने के ऊपर टंगी हुई है। श्रीकृष्ण को देखकर जामवंत उन्हें साधारण मनुष्य समझकर युद्ध के लिए ललकारने लगे। दोनों के बीच लगातार 21 दिनों तक भयंकर द्वंद्वयुद्ध चला। अंततः 21वें दिन जब जामवंत अत्यंत थक गए, तब उन्हें बोध हुआ कि उनके सामने युद्ध करने वाले कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि स्वयं उनके प्रभु श्रीराम (श्रीकृष्ण) हैं।
जामवंत ने तुरंत युद्ध रोककर श्रीकृष्ण के चरणों में प्रणाम किया, अपनी भूल की क्षमा माँगी और स्यमंतक मणि श्रीकृष्ण को सौंप दी। इसके साथ ही उन्होंने अपनी पुत्री जांबवती का विवाह भी श्रीकृष्ण के साथ कर दिया। श्रीकृष्ण स्यमंतक मणि और जांबवती को लेकर द्वारका लौटे। उन्होंने राजसभा में सत्राजित को बुलाकर पूरी घटना बताई और स्यमंतक मणि उसे वापस लौटा दी। सच्चाई सामने आते ही सत्राजित को अपनी नीच सोच पर अत्यंत लज्जा आई। उसने अपने अपराध का प्रायश्चित करने के लिए मणि और अपनी पुत्री सत्यभामा का हाथ श्रीकृष्ण को सौंप दिया (हालांकि श्रीकृष्ण ने मणि लेने से इंकार कर दिया और उसे सत्राजित के पास ही रहने दिया)।
अगर गलती से चांद देख लिया तो क्या उपाय करें?
गणेश चतुर्थी की रात यदि अनजाने में या गलती से चंद्रमा के दर्शन हो जाएँ, तो शास्त्रों और पौराणिक मान्यताओं में मिथ्या कलंक या दोष से बचने के लिए निम्नलिखित अचूक उपाय बताए गए हैं:
1.स्यमंतक मणि की कथा का श्रवण या पाठ:
सबसे मुख्य और प्रामाणिक उपाय यह है कि जिस व्यक्ति से चंद्र-दर्शन हो गया हो, वह तुरंत भगवान श्रीकृष्ण और स्यमंतक मणि से जुड़ी पौराणिक कथा को सुने या स्वयं पढ़े। शास्त्रों के अनुसार, इस कथा का स्मरण करने से गणेश चतुर्थी के चंद्र-दर्शन से लगने वाला दोष और झूठा कलंक तुरंत निष्फल हो जाता है।
2.विशेष दोष-निवारण मंत्र का जाप:
सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥ इस मंत्र का 21, 54 या 108 बार श्रद्धापूर्वक जाप करें। यदि संभव हो, तो एक लोटे में शुद्ध जल लेकर उस पर इस मंत्र का जाप करें और फिर उस जल को पी लें। तुरंत हाथ जोड़कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। भगवान गणेश का ध्यान करते हुए अपनी इस भूल के लिए क्षमा माँगें। गणेश जी को दुर्वा (दूब घास), मोदक या मोदक का भोग अर्पित करें और उनके ‘एकदंत’ या ‘विघ्नहर्ता’ स्वरूप की आरती करें।
3.पवित्र नदियों में स्नान या शुद्ध जल का छिड़काव:
यदि संभव हो, तो अगली सुबह किसी पवित्र नदी में स्नान करें। यदि यह संभव न हो, तो नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करें और पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव करें।
4.गरीब या फिर ब्राह्मण को दान-पुण्य और भोज:
अगले दिन किसी जरूरतमंद, गरीब या ब्राह्मण को अपनी क्षमता अनुसार फल, अनाज, वस्त्र या दक्षिणा का दान करें। गाय को हरा चारा खिलाना भी इस दोष के प्रभाव को कम करता है।
ये भी पढ़ें:-
श्रीकृष्ण: लीला-पुरुषोत्तम से परमेश्वर तक की यात्रा, हमारे पूज्य और सर्वप्रिय कैसे बने श्रीकृष्ण?
श्री रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग : उत्तर और दक्षिण के सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संगम की पावन गाथा
“रामेश्वरम”, “मंदिर का इतिहास”, “यात्रा संबंधी आधिकारिक जानकारी” के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।
