पटना। बिहार विधान परिषद के मानसून सत्र में पत्रकारों के हित से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया गया। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के विधान पार्षद अशोक कुमार पांडेय द्वारा लाए गए गैर-सरकारी संकल्प को सदन ने स्वीकार कर लिया। इसके तहत पत्रकारों को रेलवे यात्रा में पहले की तरह 50 प्रतिशत किराया रियायत फिर से बहाल करने के लिए केंद्र सरकार को अनुशंसा भेजने का निर्णय लिया गया।
परिवहन मंत्री दामोदर रावत ने सदन में कहा कि राज्य सरकार इस प्रस्ताव का समर्थन करती है और पत्रकारों को पूर्व में मिल रही रेलवे रियायत बहाल करने के लिए केंद्र सरकार को औपचारिक अनुशंसा भेजी जाएगी।
बिहार विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह ने भी सर्वसम्मति से पारित इस गैर-सरकारी संकल्प पर मुहर लगाते हुए इसे केंद्र सरकार को अग्रसारित करने का निर्देश दिया।
45 वर्षों से मिल रही सुविधा 2020 में हुई थी बंद
संकल्प पेश करते हुए अशोक कुमार पांडेय ने कहा कि पत्रकारों को रेलवे किराए में रियायत की सुविधा लगभग 45 वर्ष पहले शुरू की गई थी।
उन्होंने बताया कि 2009-10 के रेल बजट में तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने पत्रकारों को मिलने वाली रियायत को बढ़ाकर मूल किराए का 50 प्रतिशत कर दिया था। बाद में 2016-17 में भारतीय रेलवे और आईआरसीटीसी ने पत्रकारों को रियायती पास पर ई-टिकट बुकिंग की सुविधा भी उपलब्ध करा दी।
हालांकि कोविड-19 महामारी के दौरान मार्च 2020 में यह सुविधा बंद कर दी गई, जिसे आज तक बहाल नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि पत्रकारों के कार्य की प्रकृति को देखते हुए इस सुविधा को पुनः शुरू किया जाना आवश्यक है।

प्रेस मेंस वेलफेयर एसोसिएशन ने जताया संतोष
इस मुद्दे को लंबे समय से उठा रही प्रेस मेंस वेलफेयर एसोसिएशन ने बिहार विधान परिषद के फैसले का स्वागत किया। एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय कुमार मिश्रा, सचिव दया शंकर तिवारी, संगठन सचिव बाल कृष्ण, इकबाल इमाम, राजकुमार सिंह और राम दुलार यादव ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि यह पत्रकारों की लड़ाई की पहली बड़ी सफलता है।
उन्होंने कहा कि संगठन तब तक अपना अभियान जारी रखेगा, जब तक केंद्र सरकार पत्रकारों के लिए रेलवे किराया रियायत बहाल करने का आधिकारिक आदेश जारी नहीं कर देती।
पत्रकारों के हित में महत्वपूर्ण पहल
सदन में पारित यह संकल्प कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन राज्य सरकार द्वारा केंद्र सरकार को अनुशंसा भेजने का निर्णय पत्रकारों के हित में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और संस्थागत पहल माना जा रहा है।
