जहां भगवान खुद भक्तों के बीच बिना किसी भेदभाव के दर्शन देने आते हैं. ऐसा अदभुत उत्सव जहां भगवान खुद भक्तों के दुख दर्द जानने सड़क पर उतर जाते हैं. ऐसा भव्य उत्सव जहां भगवान जगन्नाथ का रथ खींचने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ता है. आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली इस अलौकिक और भव्य यात्रा में शामिल होने के लिए पूरे विश्व से भक्त यहां आते हैं और आस्था के इस महासागर में डुबकी लगाते हैं. इस यात्रा में सिर्फ सनातन धर्म के ही नहीं, अन्य धर्मों के लोग भी पूरे शामिल होते हैं. आइए जानते हैं इस पवित्र यात्रा का पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व.
हर साल क्यों निकाली जाती है रथ यात्रा?
भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ गर्भगृह से निकलकर अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर जाते हैं. इस बीच वो मंदिर से निकलकर अलग-अलग रथों में सवार होकर नगर का भ्रमण करते हैं और भक्तों के बीच जाते हैं. इस दौरान लोग रथ को रस्सियों के सहारे खींचते हैं. करीब 3 किलोमीटर की दूरी तय करके तीनों लोग अपनी मौसी के घर पहुंचते हैं. यहां वो सात दिन तक प्रवास करते हैं. मौसी के घर में खास पकवान खिलाकर उनका स्वागत किया जाता है. नौ दिन बाद तीनों विग्रह वापस मंदिर आ जाते हैं. दरअसल द्वारका जाने के बाद श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को वचन दिया था कि वो साल में एक बार उनसे मुलाकात करने जरूर आएंगे.
रथ की रस्सी खींचने का महत्व
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा खींचने का अपना महत्व है. ऐसी मान्यता है कि जो भी रथ की रस्सी खींचता है, उसके सारे पापों का नाश हो जाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस यात्रा में सारे भेद मिट जाते हैं, ऊंच नीच खत्म हो जाती है और सारे लोग मिलकर भगवान के सारथी बनते हैं. इस रस्सी के स्पर्श मात्र से अंहकार दूर होता है और प्रभु की कृपा प्राप्त होती है. यही वजह है जय जगन्नाथ का उद्घोष जबरदस्त उत्साह पैदा करता है. रथ यात्रा की शुरुआत में पुरी के राजा यानी शाही परिवार के वंशज रथ और रास्ते की सफाई खुद अपने हाथ से करते हैं. यह परंपरा इस बात का संदेश देती है कि भगवान के दरबार में ना कोई राजा है और ना कोई रंक, सभी उसकी नजर में बराबर हैं.
रथ यात्रा और मंदिर से जुड़े चमत्कार
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा और मंदिर से कई ऐसे चमत्कार और रहस्य जुड़े हैं, जो आज भी हम सभी के लिए एक पहेली बने हुए हैं. जैसे- मंदिर के शिखर पर लहराता लाल ध्वज हमेशा हवा के विपरित लहराता है. इसकी कोई वजह आज तक आम लोगों को समझ में नहीं आई. मंदिर के मुख्य द्वार यानी सिंह द्वार से बाहर समुद्र की लहरें सुनाई देती हैं, लेकिन द्वार से प्रवेश के बाद लहरों की आवाज एकदम नहीं सुनाई पड़ती. मंदिर के गुंबद पर कोई पक्षी नहीं बैठता और मंदिर के ऊपर से कोई विमान भी नहीं गुजरता. मंदिर की रसोई में बनने वाला प्रसाद कभी भी कम नहीं पड़ता भले ही भक्तों या दर्शनार्थियों की संख्या कितनी भी बढ़ जाए. यही नहीं कभी भी प्रसाद बर्बाद भी नहीं होता.

रथ की भव्यता
भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा तीनों लोग अलग-अलग भव्य रथ से मौसी के घर जाने के लिए निकलते हैं. इन रथों के निर्माण में कील, लोहा या किसी प्रकार धातु इस्तेमाल नहीं किया जाता है. रथ पूरी तरह से पारंपरिक तरीके से ही बनाया जाता है. जिसमें नीम की पवित्र लकड़ी (दारू) और रस्सियों की मदद से बनाया जाता है. भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम नंदी घोष है जो लाल और पीले रंग का होता है. जिसकी ऊंचाई 45 फीट होती है और इसमें 16 बड़े पहिए होते हैं. भाई बलभद्र के रथ का नाम है तालध्वज, जो लाल और हरे रंग का होता है. इसकी ऊंचाई 44 फीट होती है और इसमें 14 पहिए लगे होते हैं. वहीं बहन सुभद्रा के रथ का नाम है दर्पदलन जो लाल और काले रंग का होता है, जिसकी ऊंचाई 43 फीट होती है और इसमें 12 पहिए होते हैं.
पुरी कैसे पहुंचा भगवान कृष्ण का हृदय?
भगवान कृष्ण के हृदय का पुरी तक पहुंचने की कथा भी दिलचस्प है. पुराणों और लोककथाओं के मुताबिक भगवान कृष्ण जब सोमनाथ के पास प्रभाष में पेड़ के नीचे शो रहे थे. उस वक्त एक बहेलिया ने उनके अंगूठे को हिरण की आंख समझ कर जहरीले तीर चलाने से श्रीकृष्ण की जीवन लीला समाप्त हो गई. पांडवों ने उनका अंतिम संस्कार किया. लेकिन श्रीकृष्ण का शरीर तो पंचतत्व में विलीन हो गया. लेकिन उनका हृदय नहीं जला. इसके बाद पांडवों ने उसे समुद्र में प्रवाहित कर दिया. जो लकड़ी के रूप में बहते हुए ओडिशा में पुरी पहुंचा. यहां ये आदिवासी कबीले के मुखिया विश्रावसु को प्राप्त हुआ तो वो उन्हें मंदिर में रखकर पूजने लगे.
इसके बाद मालवा के राजा इंद्रद्घुम्न जो भगवान विष्णु के भक्त थे, उन्हें भगवान ने सपने में दर्शन दिया और उसी लकड़ी से मूर्ति बनाने का आदेश दिया. लेकिन कोई भी मूर्तिकार उस लकड़ी का तराश नहीं पा रहा था. मान्यता है कि शिल्पी भगवान विश्वकर्मा एक ब्राह्मण के रूप में आए और शर्त रखी कि मैं मूर्ति बना दूंगा, लेकिन बंद कमरे में मूर्ति बनाने के दौरान कोई दरवाजा ना खोले. राजा उनकी यह शर्त मान गए, कुछ दिन बाद जब कमरे से आवाज आना बंद हो गई तो राजा और रानी को लगा कि कहीं ब्राह्मण भूख प्यास से मर ना गए हों, इसलिए उन्होंने दरवाजा खुलवा दिया. जैसे ही दरवाजा खुला वो ब्राह्मण वहां से अंतर्ध्यान हो गए. राजा ने देखा कि मूर्तियां तो बनी थीं. लेकिन भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के हाथ पैर अधूरे थे. राजा को अपनी गलती पर बहुत अफसोस हुआ. इसके बाद भगवान जगन्नाथ के निर्देश पर श्रीकृष्ण के हृदय को उनकी मूर्ति में स्थापित किया गया. पुरी में श्रीकृष्ण के हृदय को ब्रह्म पदार्थ कहा जाता है.

आज भी धड़कता है श्रीकृष्ण के हृदय
ऐसी मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में श्रीकृष्ण का हृदय आज भी धड़कता है. आज भी हर 12 साल बाद ब्रह्म पदार्थ (श्रीकृष्ण के हृदय) को नई मूर्ति में स्थापित किया जाता है. जब मंदिर के मुख्य पुजारी ब्रह्म पदार्थ को पुरानी मूर्ति से निकाल कर नई मुर्ती में स्थापित करते हैं. इस दौरान पुजारी की आंखों में पट्टी बंधी होती है. जिससे कि वो ब्रह्म पदार्थ को देख ना सकें. इस दौरान पूरे शहर की लाइट काट दी जाती है. मंदिर के बाहर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की जाती है. पुजारियों का कहना है कि जब ब्रह्म पदार्थ को नई मूर्ति में रखा जाता है तो रखने वाले पुजारी को ब्रह्म पदार्थ में जीवित या धड़कती चीज का एहसास होता है.
