प्रयागराज : प्रसिद्ध चिकित्सक, लेखिका और प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) की संस्थापक सदस्य रशीद जहाँ पर केंद्रित विचार गोष्ठी ‘रशीद जहाँ: एक इंक़लाबी आवाज़’ का आयोजन प्रयागराज में किया गया। गोष्ठी में वक्ताओं ने रशीद जहाँ को केवल लेखिका ही नहीं, बल्कि स्त्री-मुक्ति, चिकित्सा, पत्रकारिता और सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन की बहुआयामी हस्ती बताते हुए उनकी विरासत के पुनर्पाठ को आज के समय में बेहद प्रासंगिक बताया।
अप्रकाशित सामग्री और क्रांतिकारी पारिवारिक पृष्ठभूमि
गोष्ठी के मुख्य वक्ता एवं सीएमपी डिग्री कॉलेज के प्राध्यापक नफ़ीस अब्दुल हक़ीम ने कहा कि रशीद जहाँ पर जितनी बात होनी चाहिए थी, उतनी नहीं हुई। उन पर हुए शोध संख्या और स्तर दोनों में अपर्याप्त हैं। रशीद जहाँ पर काम करते हुए उन्हें ऐसी अनेक सामग्री मिली जो अब तक अप्रकाशित थी। उनके पारिवारिक परिवेश की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि उनके पिता कश्मीरी ब्राह्मण थे और माता-पिता ने महिला शिक्षा के लिए ऐतिहासिक आंदोलन चलाया। उनकी माँ ने 1904 में ‘ख़ातून’ नाम से रिसाला निकाला और लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूल की व्यवस्था की, जो आगे चलकर प्रसिद्ध अब्दुल्ला कॉलेज के रूप में सामने आया।

समाज की चिकित्सक, ‘अंगारे’ का दौर और फ़ैज़-इस्मत पर प्रभाव
नफ़ीस अब्दुल हक़ीम ने आगे कहा कि जिस संकीर्ण दौर में लड़कियों की पढ़ाई भी सहज स्वीकार्य नहीं थी, उस समय रशीद जहाँ को लखनऊ पढ़ने भेजना अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम था। चर्चित कहानी संग्रह ‘अंगारे’ में उनकी कहानियाँ प्रकाशित होने के बाद उनके विरुद्ध फ़तवे जारी हुए, लेकिन वे इन विरोधों से बेपरवाह अपने काम में डटी रहीं। रशीद जहाँ केवल एक मरीज़ की चिकित्सक नहीं, बल्कि पूरे समाज की चिकित्सक थीं। देहरादून से उन्होंने ‘चिंगारी’ नाम से रिसाला निकाला। साथ ही, प्रगतिशील आंदोलन से फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और इस्मत चुगताई जैसे रचनाकारों को जोड़ने में उनकी ऐतिहासिक भूमिका रही, जिससे फ़ैज़ की शायरी की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव आया।
बहुआयामी व्यक्तित्व और 1936 के ऐतिहासिक अधिवेशन में भूमिका
प्रसिद्ध उर्दू आलोचक प्रो. अली अहमद फ़ातमी ने रशीद जहाँ को अपने समय की बेहद चर्चित और बहुआयामी शख्सियत बताया। उन्होंने कहा कि जिस दौर में मुस्लिम संभ्रांत वर्ग लड़कियों की शिक्षा के खिलाफ था, उस समय उन्होंने न केवल खुद शिक्षा हासिल की, बल्कि अपना पूरा जीवन बालिकाओं की शिक्षा के लिए समर्पित कर दिया। वे चिकित्सक, पत्रकार, कम्युनिस्ट लीडर और लेखिका जैसी कई भूमिकाओं में एक साथ सक्रिय थीं, इसलिए उन्हें लेखन के लिए अपेक्षाकृत कम समय मिला। 1936 में लखनऊ में हुए प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही और बहुत कम उम्र में उन्होंने अपने असाधारण कामों से सबका सम्मान हासिल किया।

भूली बिसरी विरासत, ‘हमारी आज़ादी’ और जन-स्वास्थ्य की चिंता
‘वर्तमान साहित्य’ के संपादक एवं प्रगतिशील लेखक संघ के प्रदेश महासचिव संजय श्रीवास्तव ने चिंता जताते हुए कहा कि रशीद जहाँ जैसी महान शख्सियत को लगभग बिसरा दिया गया है। वे प्रलेस की संस्थापक हस्तियों में शामिल थीं और सिविल सर्जन रहते हुए भी संगठन के कार्यों में निरंतर सक्रिय रहीं। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा के साथ-साथ उनके स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी। संजय श्रीवास्तव ने रशीद जहाँ के चर्चित पर्चे ‘हमारी आज़ादी’ का विशेष उल्लेख करते हुए उनके सामाजिक अवदान को रेखांकित किया।
मुस्लिम महिलाओं के सवाल और कहानियों में प्रगतिशील विचार
प्रलेस अध्यक्ष और साहित्यकार सुरेन्द्र राही ने कहा कि रशीद जहाँ का सबसे बड़ा योगदान पिछड़े समाज और कठिन समय में मुस्लिम औरतों के शैक्षणिक व सांस्कृतिक सवालों को उठाना था। उनकी यह पहल ऐतिहासिक महत्व रखती है। उन्होंने रशीद जहाँ के प्रसिद्ध आलेख ‘अदब और अवाम’ तथा कहानी ‘ग़रीबों का भगवान कौन’ का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी रचनाओं में सामाजिक उद्देश्य और मक़सदियत से कभी कोई समझौता नहीं किया गया।
स्त्री-विमर्श की बुनियाद और “आज हमें कई रशीद जहाँ की ज़रूरत”
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं प्रो. अनीता गोपेश ने कहा कि रशीद जहाँ का जीवन-वृत्त उनके अपने जीवन से काफी मिलता-जुलता लगता है। शकील सिद्दीक़ी के उन पर किए गए काम की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जिस दौर में रशीद जहाँ लिख रही थीं, वह लेखन अपने आप में एक साहसी हस्तक्षेप था। उनकी कहानियाँ आज के स्त्री-विमर्श के मानकों पर भले हर स्तर पर पूरी न उतरती हों, लेकिन वे भारत में स्त्री-विमर्श की बुनियादी कहानियाँ हैं। उनके नाटक ‘पर्दे के पीछे’ और कहानी ‘सलमा’ का विशेष उल्लेख करते हुए प्रो. गोपेश ने कहा कि आज के दौर में रशीद जहाँ जैसी साहसी और इंक़लाबी हस्तियों की सख्त ज़रूरत है।

साहित्यप्रेमियों की उपस्थिति और गरिमामयी संचालन
गोष्ठी में वक्ताओं ने एक स्वर में रशीद जहाँ के विचारों, संघर्षों और रचनात्मक अवदान को आज के समय में पुनः पढ़ने और समझने पर जोर दिया। अतिथियों का स्वागत संध्या नवोदिता ने किया, कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. अमरजीत राम ने किया तथा आभार ज्ञापन प्रकर्ष मालवीय विपुल ने किया। इस विचार गोष्ठी में आनंद मालवीय, अजामिल, प्रियदर्शन मालवीय, वंदना मालवीय, शैलेन्द्र जय, सुशांत सफीर, सुनील कुमार, सुनील दानिश, मयंक खरे, ऋतम्भरा मालवीय, स्वाति गुप्ता, अभिषेक राय, शांभवी श्रीवास्तव, फहीम खान, सिम्पी श्रीवास्तव और प्रख्यात सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी व सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता मौजूद रहे।
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