किसी सार्वजनिक आयोजनों में आपको ऐसे तमाम आयोजक मिल जाएंगे, जो सभी से पूछते दिखेंगे- भैया, व्यवस्था में कोई कमी तो नहीं है. यह सवाल वे किसी फिक्र या आत्मीयता से नहीं, बल्कि एक खास संदेश देने के लिए करते हैं. वे चाहते हैं कि सामने वाले को यह महसूस हो कि पंडाल से लेकर लंगर तक की सारी व्यवस्था उन्हीं के दम पर खड़ी है. अपनी सियासत और रुतबे की चमक बढ़ाने के लिए यह उनका आजमाया हुआ नुस्खा है.
दरअसल, सियासत और सियासतदानों की तासीर ही ऐसी होती है—वे हर मंच को अपनी जनसभा और हर मुद्दे को अपनी चुनावी खाद बनाने का हुनर बखूबी जानते हैं। राजनीति की दुनिया में ‘क्रेडिट’ सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि सबसे बड़ी मुद्रा (Currency) है। यहाँ पसीना किसी का भी बहे, अगर उस पर अपनी मुहर न लगाई जाए, तो सियासी नुकसान माना जाता है। क्रेडिट की इस दौड़ में यह मायने नहीं रखता कि नींव का पत्थर किसने रखा या लड़ाई की शुरुआत में किसने लाठियाँ खाईं; मायने सिर्फ यह रखता है कि कैमरे के सामने आखिरी झंडा किसने लहराया।
आजादी की लड़ाई में लाखों लोगों ने बलिदान दिया, लेकिन कैमरे के सामने लाल किले पर कांग्रेस और कांग्रेस के सिपहसालारों ने झंडा फहराया. फिर प्रचारित किया गया कि आजादी कांग्रेस ने दिलाई. नेताजी सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, मंगल पांडेय समेत तमाम भारत माता के सपूत भुला दिए गए. अन्ना आंदोलन के साथ भी यही हुआ, अन्ना हजारे की लगाई चिंगारी पर अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी ने जमकर सियासी रोटियां सेकी.
नेताओं और सियासी संगठनों का पूरा अस्तित्व ही इस बात पर टिका होता है कि वे दूसरों के द्वारा जलाई गई चिंगारी को अपना दिया बताकर पेश कर सकें। जब भी कोई निस्वार्थ, निष्पक्ष और बेदाग जन-आंदोलन अपनी ताकत से व्यवस्था को हिलाने लगता है, तो सियासत के ये ‘क्रेडिट चोर’ गिद्ध की तरह मंडराने लगते हैं—ताकि आंदोलन की जमीन, संघर्ष और नौजवानों के गुस्से को भुनाकर अपनी ढहती हुई राजनीतिक साख को दोबारा चमकाया जा सके।
बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि इसी ‘क्रेडिट पॉलिटिक्स’ का शिकार हुआ छात्रों का यह निस्वार्थ आंदोलन। पहले सीजेपी (CJP) जैसी संस्थाओं ने पर्दे के पीछे से इस आंदोलन का रुख मोड़ने की कोशिश की, और फिर राहुल गांधी ने इसे अपनी सियासी जमीन मजबूत करने का जरिया बना लिया। सवाल पूछा जा रहा है कि राहुल गांधी छात्रों के समर्थन के लिए जंतर मंतर क्यों नहीं गए. वो सीधे प्रधानमंत्री आवास को घेरने के लिए क्यों चले गए. जैसे ही राहुल गांधी ने मोर्चा संभाला, छात्रों का आंदोलन छात्र बनाम सरकार की बजाए राहुल बनाम मोदी हो गया.
जमीनी मुद्दों पर भारी सियासी एजेंडा
‘क्रेडिट पॉलिटिक्स’ का नतीजा यह हुआ कि जिन छात्रों ने अपने हक और भविष्य की लड़ाई शुरू की थी, उनका मुद्दा पीछे छूट गया और पूरा मंच एक खास राजनीतिक एजेंडे का अखाड़ा बन गया। दरअसल, छात्र और युवाओं को आंदोलन के लिए बरगलाना आसान है. इसलिए सिविल सोसायटी संगठन पहले उन्हें समर्थन और कानूनी मदद के नाम पर उनके मंच पर सेंध लगाते हैं. जैसे ही वो वहां काबिज होते हैं, छात्रों के मुद्दे पीछे चले जाते हैं. फिर छात्रों के मुंह में व्यवस्था विरोधी बातें भरी जाने लगती हैं. तभी तो छात्रों के आंदोलन के मंच से हिंदू विरोधी बातें सुनाई पड़ने लगती हैं.
आंदोलन हाईजैक का नुकसान किसे?
कॉकरोच जनता पार्टी को मीडिया हाइप मिला, राहुल गांधी को सरकार को घेरने का मौका टीवी पर फुटेज मिली, लेकिन छात्रों को क्या मिला. छात्र जो मूल मुद्दे पर आंदोलन कर रहे थे, वो बंट गए. असल मुद्दे पीछे छूट गए. आंदोलन सियासत और क्रेडिट पॉलिटिक्स का शिकार हो गया. यही नहीं आंदोलन पर प्रायोजित होने का आरोप भी लगा. ये भी संभव है कि आने वाले कई साल तक छात्रों का आंदोलनों से विश्वास खत्म हो जाए. जैसा अन्ना आंदोलन के वक्त हुआ था.
सरकार सीधे छात्रों से बात करे
इस मामले में सरकार से सवाल किए गए कि उसे छात्रों से बात करने में क्या दिक्कत है. इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकार को छात्रों से बात करनी चाहिए. सरकार को भी कोई ठोस प्रयास करते दिखना चाहिए जिससे छात्रों का गुस्सा शांत हो. छात्रों की चिंताएं जायज हैं, पेपर लीक को हमारा सिस्टम क्यों नहीं रोक पा रहा. निश्चित रूप से लाखों छात्र छात्राओं के भविष्य के साथ किसी को खेलने की इजाजत नहीं होनी चाहिए. लेकिन इसे रोका कैसे जाए, इसका रास्ता तो हमारी सरकारों को ही तलाशना होगा.
