अंगूठे के निशान से हस्ताक्षर तक का सफर, बैरक के बरामदे बने क्लासरूम; निरक्षर बंदियों को पढ़ाने के लिए शिक्षित कैदियों को ही बनाया गया शिक्षक
लखनऊ/फतेहपुर। जेल की ऊंची दीवारों के भीतर आमतौर पर सजा, बंदिश और अपराध की कहानियां दिखाई देती हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के पूर्व जेल अधीक्षक मोहम्मद अकरम खान ने इन्हीं दीवारों के भीतर अक्षरों की ऐसी दुनिया खड़ी की, जहां एक कैदी दूसरे कैदी का शिक्षक बना। मकसद था—जिस व्यक्ति ने कभी अपना नाम लिखना नहीं सीखा, वह जेल से बाहर निकलते समय कम से कम अपने नाम पर हस्ताक्षर करना सीख चुका हो।
जेल का नाम सुनते ही आमतौर पर हमारे सामने ऊंची दीवारें, बंद दरवाजे, पहरा और सजा की तस्वीर उभरती है। लेकिन उत्तर प्रदेश की एक जेल में इन्हीं दीवारों के भीतर कुछ ऐसा हुआ, जिसने जेल को देखने का नजरिया ही बदल दिया।
यहां बैरक के बरामदे सिर्फ बंदियों के बैठने या आने-जाने की जगह नहीं रहे। वहां ब्लैकबोर्ड लगाए गए। कक्षाएं शुरू हुईं। किताबें आईं। परीक्षा हुई। प्रमाणपत्र बांटे गए। और इस पूरी कहानी की सबसे दिलचस्प बात यह थी कि शिक्षक बाहर से नहीं आए थे। जेल में बंद पढ़े-लिखे कैदियों को ही शिक्षक बना दिया गया।
एक कैदी दूसरे कैदी को अक्षर पहचानना सिखाने लगा। कोई अपना नाम लिखना सीख रहा था तो कोई अखबार पढ़ने की कोशिश कर रहा था। किसी ने पहली बार अपने हाथ से पत्र लिखा तो किसी ने धार्मिक ग्रंथ पढ़ने की शुरुआत की। यानी जिस जगह को समाज अक्सर सिर्फ सजा की जगह मानता है, वहां शिक्षा को सुधार का रास्ता बनाया गया।
जब जेल की बैरक बनी क्लासरूम
फतेहपुर जिला जेल में शुरू हुई इस पहल का मकसद उन बंदियों तक शिक्षा पहुंचाना था, जो पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे। 2021 में जेल प्रशासन ने करीब 325 निरक्षर बंदियों की पहचान की। इन्हें पढ़ाने के लिए 15 शिक्षित बंदियों को शिक्षक बनाया गया। इन कैदी-शिक्षकों को प्रतिदिन मानदेय भी दिया जाता था। बैरक के बरामदे को क्लासरूम में बदला गया और ब्लैकबोर्ड लगाकर नियमित कक्षाएं शुरू हुईं।
कक्षाएं दोपहर में चलती थीं। बंदियों को पढ़ने-लिखने की शुरुआती जानकारी दी जाती थी। धीरे-धीरे उन्हें अखबार और धार्मिक ग्रंथ पढ़ने लायक बनाया गया।
इस प्रयोग की खासियत सिर्फ यह नहीं थी कि कैदियों को पढ़ाया जा रहा था। खास बात यह थी कि जेल के भीतर मौजूद संसाधनों से ही एक शिक्षक और विद्यार्थी की पूरी व्यवस्था खड़ी कर दी गई थी।

शिक्षक भी कैदी, विद्यार्थी भी कैदी
जेल में पढ़ाने वाले कैदी खुद भी बंदी थे। लेकिन उन्हें उनकी शिक्षा और अनुशासन के आधार पर चुना गया। इससे एक साथ दो बदलाव आए।
पहला- जो कैदी पढ़ना नहीं जानते थे, उन्हें शिक्षा मिलने लगी।
दूसरा- जो कैदी पहले से शिक्षित थे, उन्हें जेल के भीतर एक जिम्मेदार और रचनात्मक भूमिका मिल गई।यह व्यवस्था धीरे-धीरे केवल साक्षरता कक्षा नहीं रही। कक्षाओं के साथ परीक्षा और प्रतियोगिताएं भी होने लगीं।
2024 की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस अभियान से जेल में बंद 1,457 पुरुष और महिला बंदियों के जीवन में बदलाव आया और कई बंदी सिर्फ अक्षर ज्ञान तक सीमित नहीं रहे, बल्कि पढ़ने-लिखने में सक्षम हुए।
अंगूठे से हस्ताक्षर तक
किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति के लिए अपना नाम लिखना शायद बहुत सामान्य बात है। लेकिन जिसने जीवन भर अंगूठे का निशान लगाया हो, उसके लिए पहली बार अपने नाम के अक्षर लिखना एक बड़ी उपलब्धि हो सकती है। फतेहपुर जेल में इसी बदलाव को आगे बढ़ाया गया।
2022 में 100 बंदियों ने कक्षा एक और दो की परीक्षा पास की। इनमें 58 बंदियों ने कक्षा एक और 42 ने कक्षा दो की परीक्षा पास की। उन्हें प्रमाणपत्र दिए गए और आगे की कक्षाओं में प्रवेश भी दर्ज किया गया।
करीब 150 निरक्षर बंदियों को साक्षरता किट भी दी गई। दूसरे बंदियों को साक्षर बनाने में योगदान देने वाले 15 बंदियों को प्रशंसा पत्र देकर सम्मानित किया गया। यानी यहां शिक्षा का लक्ष्य सिर्फ इतना नहीं था कि बंदी कुछ अक्षर पहचान ले।
लक्ष्य था- पढ़ना → लिखना → परीक्षा देना → प्रमाणपत्र हासिल करना → आगे की पढ़ाई जारी रखना।
साक्षरता से आगे बढ़कर NIOS तक पहुंची पहल
जेल की शिक्षा व्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए 2022 में फतेहपुर जिला जेल में राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान यानी NIOS का केंद्र भी शुरू किया गया।
इसका उद्देश्य बंदियों को आगे की पढ़ाई का अवसर देना था। NIOS के माध्यम से बंदी हाईस्कूल और इंटर की परीक्षा दे सकते थे और उनसे फीस नहीं लेने की व्यवस्था बताई गई थी। उस समय जेल अधीक्षक को NIOS केंद्र का कोऑर्डिनेटर बनाया गया था।
इससे जेल की शिक्षा व्यवस्था ने एक और महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाया। अब यह केवल ‘निरक्षर को साक्षर बनाने’ की कोशिश नहीं थी। यहां से रास्ता आगे की औपचारिक शिक्षा तक खुल रहा था।
आखिर कौन हैं मोहम्मद अकरम खान?
इस पूरी पहल के पीछे जिस व्यक्ति की सोच और नेतृत्व सबसे ज्यादा चर्चा में आया, वह हैं मोहम्मद अकरम खान।फतेहपुर जिला जेल में फरवरी 2021 में जेल अधीक्षक के रूप में कार्यभार संभालने के बाद उन्होंने बंदी सुधार और शिक्षा को विशेष प्राथमिकता दी। जुलाई 2024 में उनके तबादले के समय स्थानीय रिपोर्ट में भी उनके कार्यकाल को बंदी सुधार से लगातार जुड़े प्रयासों वाला बताया गया। लेकिन मोहम्मद अकरम खान की पहचान सिर्फ फतेहपुर जेल की इस पहल तक सीमित नहीं है।

2017 में उन्हें Tinka Tinka India Prison Reforms Award में जेल प्रशासन में असाधारण सेवा के लिए सम्मानित किया गया था। पुरस्कार की आधिकारिक सूची में मोहम्मद अकरम खान को उत्तर प्रदेश से चयनित जेल अधिकारियों में शामिल किया गया है।
इसके बाद 2021 में उन्हें President’s Correctional Service Medal for Distinguished Service से भी सम्मानित किया गया। गृह मंत्रालय और PIB की सूची में मोहम्मद अकरम खान का नाम उत्तर प्रदेश के जेल अधीक्षक के रूप में दर्ज है।
यानी फतेहपुर की अक्षर क्रांति किसी एक दिन का प्रयोग नहीं थी। इसके पीछे जेल सुधार को लेकर लंबे समय से काम कर रहे एक अधिकारी की सोच थी।
गांवों से जेल तक पहुंची शिक्षा की सोच
मोहम्मद अकरम खान के शुरुआती जीवन के बारे में उपलब्ध विवरण के मुताबिक उनका जन्म 1965 में बरेली जिले में हुआ और उन्होंने राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। 1988 में नेहरू युवा केंद्र के साथ राष्ट्रीय सेवा स्वयंसेवक के रूप में काम करते हुए उनका जुड़ाव ग्रामीण क्षेत्रों में वयस्क शिक्षा से हुआ।
गांवों में शिक्षा पहुंचाने के दौरान उन्होंने लोगों को अक्षर ज्ञान से जोड़ने के लिए पैदल और साइकिल से यात्राएं कीं। कठिन इलाकों तक पहुंचने और लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित करने का यह अनुभव आगे उनके प्रशासनिक जीवन में भी दिखाई दिया।
यही वजह है कि जेल में पहुंचने के बाद उन्होंने निरक्षरता को सिर्फ एक शैक्षणिक समस्या के तौर पर नहीं देखा। उनके लिए यह आत्मविश्वास और सम्मान से जुड़ा सवाल भी था।
शिक्षा के साथ जिम्मेदारी का मॉडल
मोहम्मद अकरम खान के मॉडल की एक खास बात यह रही कि उन्होंने बंदियों को सिर्फ शिक्षा का लाभार्थी नहीं बनाया।कुछ बंदियों को शिक्षक की भूमिका दी गई।इससे जेल के भीतर जिम्मेदारी का भाव पैदा हुआ। जो बंदी किसी दूसरे को पढ़ा रहा था, उसके लिए यह केवल समय बिताने का तरीका नहीं था। वह अपने साथी के भविष्य को बेहतर बनाने में भूमिका निभा रहा था।
और जो बंदी पढ़ रहा था, उसके लिए सामने खड़ा शिक्षक कोई बाहरी अधिकारी नहीं, बल्कि उसी परिस्थिति से गुजर रहा दूसरा व्यक्ति था। शायद यही कारण था कि यह प्रयोग जेल के भीतर स्वीकार्य और प्रभावी दोनों बन सका।

किताबों में दर्ज हुई बंदियों की आवाज
मोहम्मद अकरम खान की पहल का एक और पहलू बंदियों की अपनी कहानियों को सामने लाना था। आपके मूल विवरण के मुताबिक बंदियों की वास्तविक जीवन-कथाओं और उनके लेखन को ‘परिवर्तन’, ‘बदलती जिंदगी’ और ‘एक नजर’ जैसी पुस्तकों में संकलित किया गया।
इन किताबों का महत्व सिर्फ साहित्यिक नहीं है। इनमें उस बदलाव की झलक दिखाई देती है जिसमें एक व्यक्ति अपने अतीत को पीछे छोड़कर खुद को नए तरीके से देखने की कोशिश करता है। जिस हाथ ने कभी सिर्फ अंगूठे का निशान लगाया हो, उसी हाथ में कलम आना और फिर अपनी कहानी खुद लिखना-यह शिक्षा के प्रभाव का शायद सबसे मानवीय रूप है।
जेल में शिक्षा के साथ रचनात्मकता
मोहम्मद अकरम खान की सोच सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं रही। जेल में बंदियों को सांस्कृतिक और रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ने पर भी जोर दिया गया। पेंटिंग, प्रतियोगिताओं और अन्य गतिविधियों के जरिए बंदियों को सकारात्मक और रचनात्मक दिशा देने की कोशिश की गई।
इस सोच के पीछे मूल विचार यही था कि जेल में बिताया गया समय सिर्फ सजा काटने में न बीते, बल्कि व्यक्ति अपने भीतर कुछ नया विकसित करे। यही दृष्टिकोण जेल सुधार की उस अवधारणा से जुड़ता है जिसमें बंदी को केवल अपराध के आधार पर नहीं, बल्कि भविष्य में समाज में लौटने वाले व्यक्ति के रूप में भी देखा जाता है।
जब बंदी फिर से समाज का हिस्सा बनने की तैयारी करता है
जेल सुधार का असली सवाल यही है कि सजा पूरी होने के बाद व्यक्ति समाज में किस रूप में लौटता है। अगर कोई व्यक्ति जेल से बाहर निकलते समय पढ़ना-लिखना सीख चुका है, कोई परीक्षा पास कर चुका है, कोई कौशल हासिल कर चुका है या अपने जीवन को देखने का नजरिया बदल चुका है, तो उसके पास नई शुरुआत के लिए पहले से ज्यादा साधन होते हैं।
फतेहपुर का यह प्रयोग इसी विचार को सामने रखता है। 2021 में मोहम्मद अकरम खान ने भी शिक्षा को बंदियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने और जीवनयापन के अवसरों के लिए तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण बताया था।

एक जेल अधिकारी से आगे की कहानी
मोहम्मद अकरम खान की कहानी इसलिए अलग है क्योंकि इसमें केवल एक अधिकारी की उपलब्धियां नहीं हैं।यह कहानी उन कैदियों की भी है जिन्होंने पहली बार किताब हाथ में ली। उन कैदी-शिक्षकों की भी है जिन्होंने अपने साथी बंदियों को पढ़ाया। उन लोगों की भी है जिन्होंने पहली बार अपने नाम का हस्ताक्षर किया। और उन परिवारों की भी, जिनके किसी सदस्य के जेल से लौटने के बाद शायद वह पहले जैसा व्यक्ति नहीं रहेगा।
जेल की दीवारें किसी व्यक्ति को समाज से कुछ समय के लिए अलग कर सकती हैं, लेकिन शिक्षा उसके भीतर समाज में लौटने का रास्ता खोल सकती है। मोहम्मद अकरम खान का काम इसी विचार को जमीन पर उतारने की कोशिश है। और शायद इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है-
सुधार की शुरुआत हमेशा बड़े बदलाव से नहीं होती। कभी-कभी वह सिर्फ एक अक्षर से शुरू होती है।और किसी कैदी का पहला हस्ताक्षर सिर्फ कागज पर बनी कुछ रेखाएं नहीं होता- वह उसकी बदली हुई जिंदगी का पहला पन्ना भी हो सकता है।
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