नीट पेपर लीक मामले में छात्र आंदोलन के दबाव में आकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा. प्रदर्शनकारी छात्र इसे अपनी जीत मान रहे हैं. कहा जा रहा है कि – झुकती है सरकार, झुकाने वाला चाहिए. ये सच है कि अब तक किसी दबाव में ना आने वाली सरकार को भी प्रदर्शनकारी छात्रों के सामने झुकना पड़ा है. किसान आंदोलन के दौरान भी इसी सरकार ने किसानों से बात की थी. बाद में तीनों कृषि कानून वापस ले लिया था. लेकिन ये कदम तब उठाया गया जब आंदोलन अपनी धार खो रहा था. उस वक्त कहा गया कि कृषि कानून वापस लेने का फैसला एक पॉलिटिकल स्टेप है, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश के चुनावों में इससे नुकसान की आशंका थी. ऐसे में ये कहना उचित नहीं है कि सरकार पहले कभी नहीं झुकी. कृषि कानून पर सरकार ने रोलबैक किया था. धर्मेंद्र प्रधान से पहले भी दबाव में इसी सरकार के मंत्री ने इस्तीफा भी दिया है. याद कीजिए अक्टूबर, 2018 में मीटू अभियान के बाद एमजे अकबर को इस्तीफा देना पड़ा था. हालांकि ये सच है कि अगर विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा से पहले इस्तीफा हो जाता तो रायता इतना ना फैलता. धर्मेंद्र प्रधान ने खुद कहा है कि जंतर मंतर पर पैदा हुए हालात का राष्ट्रविरोधी ताकतें फायदा ना उठा लें, इसलिए उन्होंने त्यागपत्र दे दिया. लेकिन जानकार मानते हैं कि छात्र आंदोलन लगातार सरकार की इमेज को नुकसान पहुंचा रहा था. अगर आंदोलन और लंबा चलता तो इसका असर आगामी चुनावों में पड़ना तय था.

हालांकि मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी के लिए राहत की बात ये है कि छात्र आंदोलन को लेकर भारतीय मतदाता एकमत नहीं है. एक तबका अभी भी मानता है कि छात्र आंदोलन को विदेशी और राष्ट्रविरोधी फंडिंग मिल रही थी. खुद छात्रों का एक तबका आंदोलन में यह कहता सुना गया कि आंदोलन में छात्रों की मांग को लेकर कम हिंदू विरोधी और राष्ट्रविरोधी बातें ज्यादा हो रही हैं. छात्र आंदोलन को अभिभावकों का नैतिक समर्थन तो था, लेकिन याद रखिए अभिभावक प्रदर्शन में शामिल नहीं हुए. इसलिए अभी यह कहना ज्यादा मुश्किल होगा कि आगामी चुनावों में इस आंदोलन का क्या असर होगा. क्योंकि किसान आंदोलन, एसआईआर के तमाम विरोध के बाद भी चुनाव नतीजों में बहुत ज्यादा नुकसान भारतीय जनता पार्टी को नहीं हुआ था.
सरकार के लिए सबक
छात्र आंदोलन से सरकार के लिए सबक ये है कि छात्र शक्ति को कभी भी किसी सरकार को कमजोर नहीं समझना चाहिए. ऐसे में जब अपने पड़ोसी देश नेपाल में जेन जी ने सरकार बदल दी हो तब तो सरकार को फौरन उनके साथ बातचीत शुरू कर देनी चाहिए थी. जो बाद में सरकार ने किया भी. अगर सरकार को ये आशंका है कि इस आंदोलन के पीछे राष्ट्रविरोधी ताकतें हैं तो सरकार को उसे बेनकाब करना चाहिए. सरकार के पास अपनी एजेंसी हैं, अगर ऐसा कुछ है तो निश्चित रूप से उसे बेनकाब करके सरकार डैमेज कंट्रोल कर सकती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र द्वारा छात्रों को दिया जाने वाला आश्वासन देर से दिया गया. सरकार को समय रहते आश्वासन और कार्रवाई करके इस मुसीबत को टाल सकती थी.
क्रेडिट लेने की होड़ में जुटा विपक्ष?
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा का क्रेडिट लेने की होड़ मची हुई है. एक तरफ कॉकरोच जनता पार्टी अपनी सफलता पर उत्साहित है, लेकिन विपक्ष के नेता क्रेडिट लेने की होड़ में जुट गए हैं. किसी भी विपक्षी नेता ने कॉकरोच जनता पार्टी और उनके नेताओं का नाम नहीं लिया है. विपक्ष जानता है कि आज नहीं तो कल कॉकरोच जनता पार्टी चुनाव मैदान में उतर सकती है और इससे भारतीय जनता पार्टी की तो कम मुख्य विपक्षी दलों की समस्या ही ज्यादा बढ़ेगी. यही वजह है कि विपक्षी दल अपने खेमे में जीत का क्रेडिट लेते हुए लड्डू बांट रहे हैं.

क्या इस्तीफे के बाद रुक जाएगा पेपरलीक?
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या इस इस्तीफे के बाद पेपरलीक रुक जाएगा. क्या इसके बाद अब कोई पेपरलीक नहीं होगा. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या महज़ एक चेहरे के बदल जाने से पेपर लीक का यह राष्ट्रव्यापी नासूर खत्म हो जाएगा? क्या एक मंत्री के पद छोड़ देने भर से देश की पूरी परीक्षा व्यवस्था रातों-रात पारदर्शी और अभेद्य बन जाएगी? क्या इसके बाद किसी होनहार युवा का सपना कागज़ के टुकड़ों की कालाबाजारी की भेंट नहीं चढ़ेगा?
इन सवालों के जवाब आज भी मौन खड़े हैं. सच तो यह है कि पेपर लीक किसी एक की नाकामी भर नहीं, बल्कि हमारी समूची प्रशासनिक और शैक्षणिक प्रणाली का सिस्टमिक फेलियर है. जब तक उस सिंडिकेट को ध्वस्त नहीं किया जाता जो कोचिंग संस्थानों, प्रशासनिक अफसरों और प्रिंटिंग प्रेसों के बीच एक संगठित गिरोह की तरह काम कर रहा है, तब तक केवल इस्तीफों से व्यवस्था का कायाकल्प होना असंभव है.
इस्तीफा एक राजनीतिक कदम तो हो सकता है, लेकिन यह उस गहराई से जड़ जमा चुकी बीमारी का इलाज नहीं है, जो सालों से करोड़ों छात्रों की मेहनत और भविष्य को दीमक की तरह चाट रही है. सवाल चेहरा बदलने का नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की जवाबदेही तय करने का है जो हर बार लीक के बाद लीपापोती करके आगे बढ़ जाती है.
