जिस जमीन पर मोहम्मद बिन कासिम ने अपनी नफरत से भरी खूनी तलवार के जरिए इस्लाम का परचम लहराया था. उस जमीन बने पाकिस्तानी उसे पहला पाकिस्तानी बताते हैं और मोहम्मद बिन कासिम के सिंध में कदम रखने से पहले के इतिहास को खारिज करते हैं. क्योंकि 712 ईसवी में मोहम्मद बिन कासिम के आने के बाद सिंध में इस्लाम फैला. इससे पहले सिंध में रहने वाले लोग हिंदू थे और सनातन धर्म को मानने वाले थे. इसलिए इससे पहले के इतिहास को पाकिस्तान ने कभी अपना इतिहास नहीं माना. यही नहीं मोहम्मद बिन कासिम के आने से पहले के इतिहास यानी सिंधु घाटी सभ्यता के इतिहास का जिक्र करना भी उसे गंवारा नहीं था. क्योंकि इस इतिहास को अपना इतिहास मानने का मतलब ये स्वीकार कर लेना था कि हम पाकिस्तानी कभी न कभी हिंदू आ सनातनी थे.
पाकिस्तान ने अपनी आने वाली पीढ़ियों को ना वो इतिहास पढ़ाया और ना बताया. अब हिंदुओं को अलग नश्ल और अलग कौम मानने वाला पाकिस्तान भला ऐसा कैसे कर सकता था. उसे तो अपनी आने वाली नश्लों में भारत और सनातन संस्कृति के खिलाफ जहर भरना था. इस्लामिक कट्टरता के नाम पर पाकिस्तान ने ये काम बखूबी किया.
लेकिन पिछले दिनों हवा का रुख बदल गया लगता है. अब पाकिस्तान खुद को उस हजारों साल पुरानी सभ्यता का वारिस बताता फिर रहा है. दरअसल पाकिस्तान की अक्ल ठिकाने तब आई जब भारत ने पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद से सिंधु नदी समझौते को रद्द करते हुए पाकिस्तान की ओर जाने वाला सिंधु नदी का पानी रोकना शुरू कर दिया. इससे पाकिस्तान के कई इलाकों में सूखे का खतरा और अनाज संकट का खतरा मंडराने लगा है.
बंटवारे के बाद पाकिस्तान हमेशा से पहचान के संकट से जूझता रहा है. क्योंकि उसने द्विराष्ट्र सिद्धांत के आधार पर अलग राष्ट्र की मांग की थी. यही वजह थी कि उसने खुद को अरब और मध्य एशिया संस्कृति से जोड़ने की नाकाम कोशिशें की. आज जब पाकिस्तान सिंधु घाटी सभ्यता को अपनी सांस्कृतिक विरासत के रूप में प्रचारित कर रहा है तो यह उसकी छटपटाहट का नतीजा नहीं है बल्कि यह भी उसकी सोची समझी संस्कृतिक कूटनीति है.
