राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित फिल्म समीक्षक संजीव श्रीवास्तव से खास बातचीत; बोले-फिल्म समीक्षा एक एजुकेशनल विधा है, समीक्षक को गुण-दोष दोनों बताने चाहिए
नई दिल्ली। सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि हमारे समाज, संस्कृति और संवेदनाओं का एक ऐसा आईना है जो इतिहास के पन्नों से लेकर वर्तमान की सच्चाइयों तक को अपने भीतर समेटे रहता है। इस जादुई दुनिया को अपनी पैनी नजर, निष्पक्ष विश्लेषण और सार्थक शब्दों के जरिए पाठकों तक पहुंचाने का काम एक गंभीर फिल्म समीक्षक करता है।
हाल ही में केवड़िया (गुजरात) में 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार वितरण का आयोजन हुआ. तमाम दिग्गज कलाकारों के साथ वरिष्ठ पत्रकार और लेखक संजीव श्रीवास्तव को महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों सर्वश्रेष्ठ फिल्म समीक्षक का नेशनल अवॉर्ड (स्वर्ण कमल) प्रदान किया गया।
हिंदी सिनेमा के विभिन्न पक्षों पर जुनूनी तरीके लिए बेबाकी के साथ लिखने वाले संजीव श्रीवास्तव किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। पिछले करीब ढाई दशक से पत्रकारिता, लेखन और मीडिया जगत में सक्रिय हैं। उन्होंने दिल्ली से लेकर मुंबई तक सक्रिय पत्रकारिता की है।
राष्ट्रपति के हाथों मिले इस राष्ट्रीय सम्मान के बाद हमने संजीव श्रीवास्तव से खास बातचीत की। इस इंटरव्यू में उन्होंने सिनेमा के बदलते मिजाज, आज के दौर में गंभीर समीक्षाओं की चुनौती, ओटीटी की संस्कृति और अपने लंबे पत्रकारकीय अनुभवों के कई अनछुए पहलुओं पर खुलकर बात की। पेश हैं इस लंबी बातचीत के प्रमुख अंश…
सवाल – राष्ट्रीय पुरस्कार जैसे सम्मान की घोषणा का वह क्षण आपके लिए कैसा रहा? जब आपको इस उपलब्धि की सूचना मिली, तब आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी और परिवार का कैसा रिएक्शन रहा?
संजीव श्रीवास्तव – अवॉर्ड्स की घोषणाओं में अपना नाम सुनते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए. मैं एकदम अचंभित था कि मुझे भी यह अवॉर्ड मिल सकता है. क्योंकि दूर-दूर तक इसकी कोई संभावना नहीं थी. पुरस्कार की घोषणा होने से लेकर पुरस्कार मिलने तक जो धड़कन और बेताबी थी, वो बिल्कुल अनकही दास्तान है. उन भावुक क्षणों को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। जाहिर है कि परिवार के लोग खुश हैं. मेरी धर्मपत्नी को मेरे सिनेमा प्रेम से शिकायतें रही हैं यहां तक निजी प्रोफेशनल फील्ड में भी मेरे सिनेमा लेखन को बहुत से साथी गंभीर काम नहीं मानते थे। लेकिन अब राष्ट्रपति के हाथों गोल्डन लोटस मिलने के बाद सबका नजरिया बदल गया है। सबका आभार।

सवाल– इस सम्मान की प्राप्ति ने आपके व्यक्तिगत और प्रोफेशनल लाइफ के फलक पर किस प्रकार के नए आयाम जोड़े हैं? क्या इस प्रतिष्ठा के बाद सिनेमा के प्रति आपकी दृष्टि में कोई गुणात्मक परिवर्तन आया है?
संजीव श्रीवास्तव – मैं सिनेमा का दीवाना रहा हूं, मैं पिछले ढ़ाई-तीन दशक से जुनून के साथ सिनेमा पर लिखता रहा रहा हूं. समाज में सिनेमा की प्रतिष्ठा जुनूनी लेखकों, समीक्षकों और संग्रहकर्ताओं से है। लेखन में नेशनल अवॉर्ड मुझसे पहले तमाम दिग्गजों को मिला है। वे सभी बहुत विद्वान हैं। मैं उनसे सीखता हूं। जब मुझे भी यह अवॉर्ड मिला तो मेरी जिम्मेदारी भी पहले से बढ़ गई लगती है. इस तरह से मुझे उपलब्धि के साथ-साथ नई जिम्मेदारी भी मिली है. इसके बाद मेरा नजरिया भी बदला है. पुरस्कार मिलने से पहले तक खुद मेरे अपने घर में मुझे अपने फिल्मों के प्रति प्रेम को लेकर बातें सुननी पड़ती थी. लेकिन अब ऐसा नहीं है. मुझे कई बार लगता है कि फिल्मों पर लेखन को अब भी वो प्रतिष्ठा नहीं है जो दूसरे विषयों को मिली है। इस नजरिए को बदलने के लिए सभी को अभी और संघर्ष करने की जरूरत है।
सवाल – आज के डिजिटल और त्वरित (Instant) प्रतिक्रियाओं वाले दौर में एक प्रामाणिक फिल्म समीक्षक के लिए मूल्यांकन के वाजिब पैरामीटर क्या होने चाहिए? फिल्म के अपने अंतर्निहित सौंदर्यशास्त्र और दर्शक की अपेक्षाओं के बीच संतुलन साधने की क्या कसौटी होनी चाहिए?
संजीव श्रीवास्तव – मेरा मानना है कि किसी फिल्म की समीक्षा लिखने में सबसे बड़ा पैमाना ये होता है कि आप गुण-दोष दोनों लिखें. दुर्भाग्य से सोशल मीडिया के इस दौर में ऐसा नहीं हो रहा है. आज हर कोई फिल्म क्रिटिक बन गया है. आज कल हमें ज्यादतर जजमेंटल टिप्पणी पढ़ने को मिलती हैं. एक फिल्म समीक्षक को समझना होगा कि वो जज नहीं है. आप कितना ही किसी फिल्म की तारीफ कर दें. दो दिन में पब्लिक अपना फैसला सुना देती है. जबकि होना ये चाहिए कि एक फिल्म समीक्षक को अमुक फिल्म की कहानी, उसकी पृष्टभूमि के दायरे में रहकर ही उसकी समीक्षा करनी चाहिए. अपनी अपेक्षा को उस समीक्षा में पिरोने की कोशिश ना करें. समीक्षा में ये बातें ना हों कि हम क्या चाहते हैं, बल्कि समीक्षा में ये होना चाहिए कि फिल्ममेकर ने हमें क्या परोसा है. समीक्षा में अभिनय, कहानी, उसका गीत-संगीत और डॉयलॉग कैसा है, ये बताना चाहिए. साथ ही साथ दर्शकों को भी समीक्षा पढ़कर नहीं, बल्कि फिल्म देखकर कोई ठोस राय बनानी चाहिए. दर्शकों को खुद भी जागरूक होने की जरूरत है। समीक्षक किसी फिल्म की विवेचना करके दर्शकों के सामने रख देता है- अब फैसला दर्शकों का है।
सवाल– आज के दौर में सोशल मीडिया पर रील, शॉर्ट रिव्यू और त्वरित रेटिंग्स का चलन बढ़ गया है। ऐसे में एक गंभीर फिल्म समीक्षक के रूप में सार्थक और विश्लेषणात्मक लेखन को बचाए रखना और पाठकों तक पहुंचाना कितना चुनौतीपूर्ण हो गया है?
संजीव श्रीवास्तव – आज सोशल मीडिया पर हर कोई फिल्म की समीक्षा कर रहा है. ऐसे में एक फिल्म समीक्षक को अपनी विशेषज्ञता के साथ समीक्षा करनी होगी. यहां मैं ये बात बहुत जोर देकर कहना चाहता हूं कि आज अगर कोई अच्छी फिल्म नहीं चलती है तो इसकी एक बड़ी वजह फिल्म समीक्षा है. क्योंकि अच्छी फिल्म की अच्छी समीक्षा नहीं लिखे जाने की वजह से दर्शक उस फिल्म को देखने नहीं पहुंचते हैं. मैं हमेशा कहता हूं कि फिल्म समीक्षा एक एजुकेशनल विधा है, एक फिल्म क्रिटिक को उसका पालन करना चाहिए. आज कई बार ये देखने को मिलता है कि सोशल मीडिया पर ऐसी फिल्म समीक्षा पढ़ने को मिल जाती है. जिन मुद्दे पर बड़े प्लेटफॉर्म या बड़े लेखक खामोशी ओढ़ लेते हैं.
सवाल– पिछले कुछ दशकों के क्लासिक सिनेमा और आधुनिक सिनेमा में क्या मौलिक और गुणात्मक अंतर आप देखते हैं?
संजीव श्रीवास्तव – पुराने दौर की फिल्मों में लार्जर दैन लाइफ का फिल्मांकन होता है, लेकिन आज लारजेस्ट का ट्रेंड है. पहले आधी फिल्म के बाद हिंसा होती थी. आज हिंसा से ही फिल्में शुरू होती हैं.

सवाल- आपके करियर के ढाई-तीन दशकों का यह सफर कई पड़ावों और चुनौतियों से होकर गुजरा है। इस लंबी यात्रा में, यदि आप पीछे मुड़कर देखें, तो वे कौन सी परिस्थितियां या विचार बिंदु थे जिन्होंने आपको विशेष रूप से फिल्म समीक्षा की ओर प्रवृत्त किया? सिनेमाई आलोचना के इस क्षेत्र को अपनी कर्मभूमि चुनने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?
संजीव श्रीवास्तव – मेरा जन्म बिहार में हुआ है, बचपन से ही मुझे फिल्मों से प्रेम था. मैं फिल्म के पोस्टर के सामने खड़ा हो कर काफी देर तक देखा करता था. अपने पॉकेट मनी से पैसे बचा कर फिल्में देखता था. बड़ा हुआ तो मैं प्रोफेसर बनना चाहता था. लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में काम मिलने पर इसी दिशा में चला आया. इसी दौर में फिल्मों पर लेखन भी शुरू हो चुका था. महेश भट्ट की फिल्म सड़क पर मैंने अपनी पहली टिप्पणी लिखी थी. जिसमें मैंने लिखा कि था कि कैसे एक नायक, बदनाम कोठे में रहने वाली एक लड़की को एक दिन के लिए साथ लेकर जाता है. लेकिन सबसे पहले वो उसे मंदिर लेकर जाता है.
भोपाल में पत्रकारिता की शिक्षा पाने के बाद वहां के एक अखबार से जुड़ा। फिर दिल्ली आ गया. यहां आकर काफी समय तक अखबारों में फ्रीलांस किया. साल 2000 में टीवी मीडिया से जुड़ा. इस दौर में मैंने थिएटर और पुस्तक समीक्षाओं के साथ-साथ फिल्म समीक्षाएं भी की। मेरा रुझान और बढ़ा. रंगमंच और पुस्तक समीक्षा की वजह से फिल्मों पर मेरे लेखन में प्रचलित गॉसिप नहीं होती थी। गहराई से समझने की कोशिश होती थी। मैं विश्लेषण अधिक करता था। तब से अब तक पत्रकारिता, उपन्यास लेखन और फिल्म लेखन के क्षेत्र से जुड़ा हुआ हूं.
बाद में मैंने एक फिल्मी पत्रिका ‘पिक्चर प्लस’ का संपादन और प्रकाशन भी किया था. कई दिग्गज लेखकों ने उसमें अपना रचनात्मक योगदान दिया. फिल्म लेखन के क्षेत्र में इसे काफी सराहना भी मिली. अब पिक्चर प्लस यूट्यूब चैनल भी है. मैं इस पर और काम करना चाहता हूं. साथ ही साथ मैं ये भी चाहता हूं कि मेरे उपान्यास पर भी फिल्म बने.
सवाल – एक प्रबुद्ध फिल्म समीक्षक और सिनेमा की गहरी समझ रखते हुए, आप आज के फिल्मकारों को क्या रचनात्मक सलाह देना चाहेंगे?
संजीव श्रीवास्तव– मुझे लगता है कि फिल्ममेकर्स भारतीय साहित्य के पन्ने पलटें तो उन्हें बहुत ही अच्छी-अच्छी कहानियां मिलेंगी. हालांकि एक स्तर पर कुछ फिल्ममेकर ऐसा कर भी रहे हैं. सिर्फ हॉलीवुड से प्रेरणा लेकर फिल्में बनाना ठीक नहीं है. इस लिहाज से ओटीटी पर अच्छा काम हो रहा है. वहां अच्छी कहानियां देखने को मिल रही हैं.

सवाल- नेशनल फिल्म पुरस्कार के आयोजन स्थल यानी केवड़िया (गुजरात) के चयन को आप कैसे देखते हैं.
संजीव श्रीवास्तव– देखिए, सरकार साफ कर चुकी है कि अब से नेशनल फिल्म पुरस्कार वितरण का आयोजन देश के विभिन्न स्थलों से होगा. इसका मकसद ये है कि इससे उस प्रदेश का पर्यटन और सांस्कृतिक धरोहर इस समारोह के जरिए प्रमोट होगा. साथ ही साथ फिल्मों के लिए नए लोकेशन का प्रमोशन होगा. इस कदम से फिल्मी सितारों को आम लोगों के बीच जाने का मौका मिलेगा. मुझे ये भी लगता है कि केवड़िया (गुजरात) में इस आयोजन की एक वजह ये रही होगी कि इस बार एक फिल्म पुरस्कृत हुई, जिसका नाम- स्टैचू ऑफ यूनिटी- एकता का प्रतीक है. ये जुड़ाव हो सकता है. जिस तरह से सरदार पटेल ने देश को एकजुट करने का काम किया, वैसे ही सिनेमा भी समाज तो जोड़ने का काम करता है. थिएटर के अंदर एक मिनी सिनेमा बैठा होता है. अब ये देखना दिलचस्प होगा कि अगला आयोजन किस स्टेट में किस जगह पर होता है.
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