आज की बदलती जीवनशैली में कम उम्र में हार्ट अटैक, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज जैसी बीमारियां गंभीर चिंता का विषय बन रही हैं। अनियमित दिनचर्या, खानपान, तनाव, नींद की कमी और शारीरिक गतिविधियों में कमी के बीच कई सवाल सामने आते हैं। हार्ट अटैक के शुरुआती संकेतों को कैसे पहचानें? BP और शुगर नियंत्रित होने पर क्या दवाएं बंद की जा सकती हैं? हर बुखार में एंटीबायोटिक लेना कितना सही है? और सोशल मीडिया पर स्वास्थ्य संबंधी जानकारी देखकर खुद दवा लेना कितना जोखिम भरा हो सकता है?
इन सवालों के साथ-साथ ब्रेन स्ट्रोक के लक्षण, प्रदूषण का स्वास्थ्य पर असर और स्वस्थ रहने के लिए जरूरी जीवनशैली पर FreelancerPost के संपादक योगेश चक्रवर्ती ने पटना एम्स के जनरल मेडिसिन विभाग के HOD प्रो. डॉ. ज्योति प्रकाश से विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत है इस खास बातचीत के प्रमुख अंश।
कम उम्र में बीमारियां क्यों बढ़ रही हैं?
सवाल 1: आज आम लोगों में कौन-कौन सी स्वास्थ्य समस्याएं सबसे ज्यादा देखने को मिल रही हैं?
जवाब: पहले ब्लड प्रेशर और डायबिटीज को अमूमन 50 साल के बाद होने वाली बीमारियां माना जाता था। लेकिन आजकल 30 साल के युवाओं में भी बीपी, शुगर और कोरोनरी हार्ट डिजीज जैसी बीमारियां देखने को मिल रही हैं। थायरॉइड डिसफंक्शन भी देखने को मिलता है। अभी बीमारियों का ट्रेंड बदल गया है। ये समस्याएं सिर्फ शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे देश में लोग इनकी चपेट में हैं। ग्रामीण परिवेश के लोग भी बीपी और शुगर की तकलीफ लेकर आते हैं। उन्हें भी हार्ट की समस्या और दूसरी बीमारियां हो रही हैं।
सवाल 2: क्या इनमें से कई बीमारियां ऐसी हैं, जिन्हें शुरुआत में रोका जा सकता है?
जवाब: इसको समझने के लिए पहले यह समझना होगा कि ये बीमारियां हो क्यों रही हैं। इसका प्रमुख कारण आज की जीवनशैली है। हम लोग मेहनत करना छोड़ दिए हैं। जो व्यक्ति नौकरी-पेशा में है, उनकी बात तो समझ में आती है। लेकिन जो दूर-दराज के गांवों में रहते हैं, वे पहले पैदल बाजार या सब्जी लाने जाते थे। आजकल वे मोटरसाइकिल से जाते हैं। कहीं भी जाना हो तो मोटरसाइकिल से जाते हैं। लोगों की फिजिकल एक्टिविटी बहुत कम हो गई है।
देहात में भी भोजन का प्रकार बदल गया है। वहां भी लोग पारंपरिक भोजन छोड़कर रिफाइंड फूड की तरफ आ गए हैं। शहरों में तो पिज्जा, बर्गर, पास्ता, मैगी और कोला ड्रिंक्स जैसी चीजें हैं ही। इन चीजों में नमक और सैचुरेटेड फैट की अधिकता रहती है। कालांतर में ये चीजें हार्ट अटैक जैसी तकलीफों का कारण बन सकती हैं। पहले तो इसे समझकर इसका निराकरण करना होगा।
इससे भी अहम है स्ट्रेस। पहले लोग सुनते भी नहीं थे कि स्ट्रेस क्या है। अभी युवा वर्ग सबसे अधिक तनाव में है। पहले एक उम्र के बाद स्ट्रेस होता था—फैमिली की जिम्मेदारी है, यह है, वह है। लेकिन अभी तो स्ट्रेस का स्तर बहुत बढ़ गया है।
विद्यार्थियों को पढ़ाई और स्कोरिंग का तनाव है। दूसरा तनाव उनके पैरेंट्स को है कि अगर बच्चों ने अच्छा नहीं किया तो क्या होगा। इस तरह सभी लोग तनाव की भावना में जी रहे हैं।
जो डॉक्टर हैं, वे भी बहुत अधिक तनाव में हैं। उन्हें काम करना है, रिसर्च करना है और बहुत सारे मरीज देखने हैं। शाम में उन्हें रिलैक्स होने का समय नहीं मिल पाता। डॉक्टर भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। वे भी बीपी और डायबिटीज की दवाएं खा रहे हैं।
हर प्रोफेशनल, जो किन्हीं कारणों से नियमित 7 से 8 घंटे की नींद नहीं ले पाता, जिसका आहार-विहार संतुलित नहीं है, वह प्रभावित हो सकता है। हम डॉक्टर आधा घंटा टहलने के लिए तो कहते हैं, लेकिन खुद कितने घंटे टहलते हैं, यह भगवान मालिक है। नियमित आधा घंटा टहलने का सोचा भी, लेकिन ड्यूटी के लिए देर हो रही है—भागो, भागो! इसी भागमभाग में सभी का बंटाधार हो रहा है। इससे बचना होगा।
वरना बहुत बड़ी आबादी प्रभावित होगी। भारत को दुनिया की डायबिटीज कैपिटल भी कहा जाता है, क्योंकि यहां डायबिटीज से प्रभावित लोगों की संख्या बहुत अधिक है। हम नंबर वन होने की तरफ बढ़ रहे हैं। इसका कारण हमारी जीवनशैली है—बैठकर काम करना। हमने ऑफिस कल्चर को ज्यादा बढ़ावा दे दिया है। हर आदमी को एक जगह, एक कुर्सी चाहिए। फिजिकल एक्टिविटी नहीं के बराबर है। इन सब चीजों को समझना होगा, तभी इनसे बचा जा सकता है।

सवाल 3: क्या अचानक हार्ट अटैक आने की वजह भी लाइफस्टाइल है?
जवाब: नहीं, इसके लिए एक शब्द होता है unaccustomed exercise। इसका मतलब है कि आप किसी तरह के व्यायाम के आदी नहीं थे। अचानक आपको डांस करना पड़ा या कोई ऐसा स्टेप करना पड़ा, जिसके कारण आपके हृदय पर अत्यधिक बोझ पड़ा और वह हार्ट फेल्योर की स्थिति में चला गया। हार्ट अटैक भी हो सकता है। इससे पहले आप दौड़ते नहीं थे और न ही इस तरह के काम करते थे। अचानक आपने ऐसा किया।
यही नहीं, इमोशनल स्ट्रेस भी एक कारण है। आपने बहुत खुशी की खबर सुनी कि आपकी बड़ी लॉटरी लग गई और आप अरबपति हो गए। आप रोडपति से करोड़पति हो गए। ऐसी खबर सुनकर भी कुछ लोगों को अटैक आ सकता है। या फिर अचानक किसी ने कहा कि आप दिवालिया हो गए। यह भी हार्ट अटैक का कारण बन सकता है। इमोशन, यानी भावनाओं का चरम स्तर, भी हार्ट अटैक का कारण बन सकता है।
Unaccustomed exercise का मतलब यही है कि आपने कभी तेजी से डांस नहीं किया, लेकिन अचानक बहुत तेजी से डांस कर लिया या जरूरत से ज्यादा वर्कआउट कर लिया। आजकल जिम जाने का चलन बढ़ गया है। जिम में आपने कभी अपनी क्षमता से दस गुना ज्यादा काम कर लिया तो परेशानी हो सकती है।
हार्ट तो हार्ट है। उसकी पंपिंग क्षमता की एक सीमा होती है। मांसपेशियां एक्सरसाइज करेंगी तो उन्हें ब्लड पहुंचाने का काम हृदय ही करेगा। हृदय को ज्यादा काम करना पड़ेगा। अगर वह जरूरत के मुताबिक ब्लड नहीं पहुंचा पाएगा तो हार्ट फेल्योर हो सकता है।
हमें यह समझना होगा। भगवान बुद्ध ने कहा था कि वीणा के तारों को इतना मत कसो कि वे टूट जाएं और इतना ढीला भी मत छोड़ो कि आवाज बेसुरी निकले। हमें मध्यम स्तर का व्यायाम करना चाहिए। बहुत तीव्र गति का एक्सरसाइज नहीं चाहिए। प्रतिदिन 30 मिनट मध्यम स्तर का व्यायाम करने की सलाह दी जाती है।
ऐसा भी नहीं कि हम चल रहे हैं और बातचीत या गॉसिप कर रहे हैं, तो उससे पर्याप्त लाभ मिल जाएगा। दूसरी तरफ इतना तेज भी नहीं चलना है कि सांस निकलने लगे। मध्यम स्तर का एरोबिक एक्सरसाइज करना चाहिए। सामान्य गति से चलना चाहिए, यानी न बहुत धीमा और न बहुत तेज।
अगर आपको योग या प्राणायाम नहीं आता, तो कम से कम टहलें। सुबह नहीं टहल पाए तो शाम में टहलें। लेकिन समय निकालिए। 24 घंटे समय सभी के पास है। उसी में से समय निकालना होता है।
सवाल 4: क्या ऊपर से पूरी तरह स्वस्थ दिखने वाला इंसान भी बीपी, डायबिटीज और हार्ट की समस्या से पीड़ित हो सकता है?
जवाब: बिल्कुल। सभी मोटे लोग बीमार नहीं होते हैं। यह एक मिथक है। कुछ मोटे लोग भी स्वस्थ और बिल्कुल फिट हो सकते हैं। उनका शरीर मजबूत दिख सकता है, लेकिन उनका बीपी सामान्य हो सकता है और उन्हें डायबिटीज नहीं हो सकती। उनकी आंखों की क्षमता भी सही हो सकती है।
दूसरी तरफ, दुबले-पतले व्यक्ति को भी बीपी हो सकता है। वह डायबिटिक हो सकता है और उसे हाइपरटेंशन हो सकता है। ऐसी कोई बात नहीं है कि केवल मोटे लोगों को ही ये बीमारियां होती हैं।
लेकिन अमूमन देखा गया है कि जो लोग मोटापे के शिकार होते हैं और जिनका BMI 25 से ज्यादा होता है, उन्हें कालांतर में मेटाबॉलिक सिंड्रोम के कारण हृदय रोग, शुगर और हार्ट से जुड़ी समस्याएं घेर सकती हैं। इसलिए वजन नियंत्रित करना बहुत आवश्यक है। आपका BMI नियंत्रित होना चाहिए।
कम उम्र में हार्ट अटैक के संकेत और इमरजेंसी में क्या करें?

सवाल 5: जो व्यक्ति ऊपर से देखने में स्वस्थ लगता है, उसे पता कैसे चलेगा कि उसे शुगर, बीपी या हार्ट की समस्या है?
जवाब: जब हृदय की समस्या शुरू होती है, तो अमूमन मरीज को कुछ लक्षण दिखाई देते हैं। जैसे, जब हम सीढ़ियां चढ़ते हैं तो हांफने लगते हैं। जब हम अपनी ही उम्र के किसी साथी के साथ चलते हैं, तो वह हमसे आगे निकल जाता है और हम हांफ जाते हैं। पहले हम आराम से सीढ़ियां चढ़ते थे, लेकिन अब चढ़ने में सांस फूलने लगती है।
यहीं सावधान हो जाना चाहिए। जनरल फिजिशियन के पास जाकर बताना चाहिए कि ऐसी तकलीफ हो रही है और हार्ट की जांच करानी चाहिए। डॉक्टर पहले ईसीजी करेंगे और बीपी देखेंगे। इससे शुरुआत में समस्या पकड़ में आ सकती है। अगर इसे नजरअंदाज किया तो बात बढ़ सकती है।
सवाल 6: अगर किसी व्यक्ति को हार्ट की समस्या है, तो उसका शरीर कौन-कौन से संकेत देना शुरू करता है?
जवाब: देखिए, डायबिटीज के मरीज में हार्ट अटैक साइलेंटली भी हो सकता है। सीने में दर्द भी नहीं होगा। शुगर के मरीजों में साइलेंट MI हो सकता है। बीपी कम हो गया, सांस फूलने लगी और ईसीजी कराया तो पता चला कि हार्ट अटैक हुआ है।
लेकिन जो डायबिटिक नहीं हैं, उनमें सीने के बीच वाले हिस्से में दर्द हो सकता है। इसे हम रेट्रोस्टर्नल पेन कहते हैं। सीने के बीच में असहनीय दर्द होगा और वह कंधे, पीठ, बाएं या दाएं हाथ की तरफ जा सकता है। दर्द जबड़े की तरफ भी जा सकता है। ये हार्ट अटैक के संकेत हो सकते हैं।
तेज दर्द के साथ पसीना आना भी एक संकेत है। अगर ऐसा हो रहा है तो समझिए कि हार्ट अटैक हो सकता है। मरीज को तुरंत नजदीकी अस्पताल ले जाकर भर्ती कराना चाहिए। देर नहीं करनी चाहिए। यह सोचकर कि गैस की बीमारी है, सिरप मंगा लिया और दे दिया-ऐसा नहीं करना चाहिए। ये गंभीर संकेत हो सकते हैं।
सवाल 7: क्या हर बार हार्ट अटैक आने पर दर्द हो ही, ऐसा जरूरी नहीं है?
जवाब : दो स्थितियों में ऐसा हो सकता है—अधिक उम्र वाले व्यक्तियों में और डायबिटीज के मरीजों में। इनमें अपवाद के तौर पर पेनलेस मायोकार्डियल इंफार्क्शन हो सकता है। उनमें दर्द वाला लक्षण नहीं होता और समस्या नजरअंदाज हो सकती है। लेकिन बाकी लोगों में सीने में दर्द हो सकता है।
सवाल 8: अगर किसी व्यक्ति की सांस फूल रही है, सीढ़ियां चढ़ने पर दम फूलने लगता है और उसे पसीना भी आ रहा है, तो ऐसे में क्या करना चाहिए?
जवाब: देखिए, सांस फूलना सिर्फ हृदय की बीमारी का संकेत नहीं है। यह फेफड़ों की बीमारी का भी संकेत हो सकता है। पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट से फेफड़ों की तकलीफ का पता लगाया जाता है।
कई व्यक्ति अस्थमा के मरीज हो जाते हैं। जो सिगरेट पीते हैं, उन्हें COPD यानी क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज हो सकती है। युवा भी सिगरेट पीते हैं। इसलिए सांस फूलना सिर्फ हृदय का संकेत नहीं है, बल्कि फेफड़ों की बीमारी का भी संकेत हो सकता है।
सीढ़ियां चढ़ने पर सांस फूलना किडनी की समस्या का संकेत भी हो सकता है। सिर्फ एक लक्षण को पकड़कर बीमारी तय नहीं की जा सकती। कई तरह की जांच होती हैं, जिनके आधार पर हम फिजिशियन पता करते हैं कि कौन-सी बीमारी है।
सवाल 9: अगर किसी परिवार में किसी व्यक्ति को हार्ट अटैक आ गया, तो उस घर के सदस्यों को मरीज को अस्पताल पहुंचाने से पहले क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए?
जवाब: देखिए, अगर मरीज पहले से हार्ट का मरीज है और इलाज करा रहा है, तो उसे दोबारा भी हार्ट अटैक हो सकता है। ऐसी स्थिति में कुछ मरीजों के पास एस्पिरिन की 75 मिलीग्राम वाली गोलियां होती हैं। उन्हें चार गोलियां चबाकर लेने और उसके बाद अस्पताल जाने की सलाह दी जाती है।
समय बहुत महत्वपूर्ण है। अगर नया मरीज है और उसे लग रहा है कि उसे हार्ट अटैक आया है, तो उसे अपनी स्थिति को समझना चाहिए। अगर उसे डायबिटीज है, ब्लड प्रेशर अनियंत्रित रहता है या वह मोटापे का शिकार है, तो हार्ट अटैक का खतरा हो सकता है। सीने के बीच में बहुत तेज दर्द हो रहा है, दर्द दूसरी जगह फैल रहा है और पसीना आ रहा है, तो हार्ट अटैक की आशंका हो सकती है।
ऐसी स्थिति में मरीज के केयरटेकर को तुरंत उसे अस्पताल पहुंचाना चाहिए। एस्पिरिन देने के संबंध में डॉक्टर की सलाह और मरीज की स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है। अस्पताल में ईसीजी और ब्लड टेस्ट हो सकते हैं।
अगर आपने गैस समझकर समय बर्बाद किया तो जान के लाले पड़ सकते हैं। कई लोग कहते हैं, “कुछ नहीं, गैस हुई है। सिरप लाओ या गैस की टैबलेट खा लो।” ऐसा नहीं करना चाहिए।
हर सीने के दर्द को तब तक संभावित कार्डियक पेन मानकर जांचना चाहिए, जब तक कोई दूसरा कारण साबित न हो जाए। डॉक्टरों को भी हर चेस्ट पेन को इसी नजरिये से देखना चाहिए। भले ही जांच की रिपोर्ट नकारात्मक आए, तो अच्छी बात है। लेकिन अगर समस्या पहचानने में चूक हो गई तो मरीज की जान जा सकती है। ईसीजी एक सामान्य जांच है। हमारे यहां तो यह मुफ्त हो रही है। कई जगह 50 से 100 रुपये में भी हो सकती है।
सवाल 10: कई लोग ऐसे मरीजों का घर में इलाज करने लगते हैं, पीठ सहलाने लगते हैं, पंप करने लगते हैं या दूसरे तरीके से उपचार करने लगते हैं। क्या यह ठीक है?
जवाब: नीम हकीम खतरे जान। जिस प्रक्रिया की आप बात कर रहे हैं, वह CPR कहलाती है। इसका पूरा नाम कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन है। इसे कब और कैसे करना है, यह जानना जरूरी है। भारत में इसकी ट्रेनिंग नगण्य है। विदेशों में प्रत्येक नागरिक को CPR की ट्रेनिंग दी जाती है।
CPR में, किसी कारण से अगर व्यक्ति का हृदय रुक गया है, तो दोनों हथेलियों की मदद से छाती पर उचित दबाव दिया जाता है। जरूरत के अनुसार रेस्पिरेशन भी दिया जाता है। इससे हृदय को दोबारा सक्रिय करने की कोशिश की जाती है।
यह हार्ट अटैक से अलग स्थिति है। हार्ट अटैक होने पर मरीज को इस तरह घर पर उपचार नहीं करना चाहिए। उसे अस्पताल ले जाना चाहिए। वहां जरूरत के अनुसार थ्रोम्बोलाइटिक एजेंट, ऑक्सीजन, मॉर्फीन ग्रुप की दवाएं और दूसरी दवाएं दी जा सकती हैं। ICU और CCU की जरूरत हो सकती है। घर में इसका पूरा उपचार नहीं हो सकता।
हाई BP को कैसे पहचानें और नियंत्रित रखें?

सवाल 11: हाई BP को ‘Silent Killer’ क्यों कहा जाता है? इसकी पहचान कैसे करें?
जवाब: अगर आपकी उम्र 60 साल से कम है, तो 120/80 का बीपी सामान्य माना जाता है। एक नए रिकमेंडेशन के मुताबिक, आपका बीपी 120/80 है तो आप सुरक्षित हैं और इसे सामान्य माना जाता है।
लेकिन जैसे ही बीपी 120/80 से बढ़कर 130/80 होता है, तो इसे हाइपरटेंशन नहीं कहेंगे, लेकिन आप प्री-हाइपरटेंशन की स्थिति में आ गए। पहले 130/80 को सामान्य मानते थे, लेकिन आजकल इसे प्री-हाइपरटेंशन की तरह देखा जाता है। अब उन्हें सावधान हो जाना चाहिए। दवा तो नहीं खानी है, लेकिन नमक से परहेज, मॉर्निंग वॉक, प्राणायाम वगैरह करना चाहिए।
जैसे ही बीपी 130 से 140 और नीचे वाला स्तर 80 से 89 होता है, इसे स्टेज-1 हाइपरटेंशन कहा जाता है। जब बीपी 140 से 150 और नीचे वाला स्तर 90 से 100 होता है, तो इसे स्टेज-2 हाइपरटेंशन कहा जाता है।
हाइपरटेंशन में हम लोग अधिक उम्र के लोगों के लिए 140/90 को कटऑफ वैल्यू रखते हैं। बीपी उतना या उससे ऊपर है, तो उन्हें बीपी की समस्या मानी जाती है। युवा व्यक्ति में 130/80 से ऊपर होने पर हम एहतियात के तौर पर ध्यान देते हैं, ताकि भविष्य में ज्यादा दिक्कत न हो।
सवाल 12: हाई BP शरीर को किस तरह नुकसान पहुंचाता है?
जवाब: हाइपरटेंशन से कोरोनरी आर्टरी डिजीज (CAD), CKD यानी क्रॉनिक किडनी डिजीज, ब्रेन स्ट्रोक और पेरिफेरल आर्टरी डिजीज (PAD) जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसका असर शरीर के कई सिस्टम पर पड़ता है।
अगर इसे नियंत्रित करेंगे तो हार्ट अटैक का खतरा कम होगा, ब्रेन स्ट्रोक की आशंका घटेगी और किडनी की तकलीफ भी कम हो सकती है। आंखों का रेटिना भी खराब हो सकता है, जिसे रेटिनोपैथी कहते हैं। हाइपरटेंशन से कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं।
सवाल 13: क्या हाइपरटेंशन कई बीमारियों का कारण बन सकता है?
जवाब: बिल्कुल। हाइपरटेंशन और डायबिटीज दुनियाभर में शरीर के दो प्रमुख दुश्मन हैं। इनसे किडनी और हार्ट की समस्याएं बढ़ सकती हैं। एक बीमारी होने पर दूसरी का खतरा भी बढ़ जाता है। बीपी है तो शुगर होने का खतरा बढ़ सकता है और शुगर है तो बीपी की समस्या भी हो सकती है।
सवाल 14: किस व्यक्ति को दिनभर में कितनी बार BP चेक करवाना चाहिए?
जवाब: नहीं, यह एक ऐसी आदत बन गई है, जो कई बार परेशानी बढ़ा देती है। लोग खुद मशीन खरीद लेते हैं और बार-बार बीपी चेक करते हैं। इससे वे सोच-सोचकर अपना तनाव बढ़ा लेते हैं।
मैं हर बार खुद से बीपी चेक करने की सलाह नहीं देता। आप चिकित्सक पर भरोसा कीजिए। महीने में एक दिन उनके पास जाकर जांच कराइए। जब बीपी नियंत्रित हो जाए तो तीन-तीन महीने में जांच करा सकते हैं। हर हफ्ते या दिनभर में तीन बार बीपी चेक करने का कोई सामान्य नियम नहीं है।
आजकल डिजिटल बीपी मशीनें आ गई हैं। उनमें भी एरर हो सकता है। पारंपरिक मशीन का इस्तेमाल डॉक्टर स्टेथोस्कोप के साथ करते हैं। मरीज जितनी बार बीपी नापेगा, उसमें कुछ अंतर आ सकता है। ऐसे में उसे तनाव हो जाता है कि उसका बीपी नियंत्रित नहीं हुआ।
इससे घबराहट बढ़ सकती है और शरीर की सिम्पैथेटिक एक्टिविटी बढ़ने से बीपी और बढ़ सकता है। इसलिए खुद से बार-बार मॉनिटरिंग करना अच्छी आदत नहीं है। शुगर की जांच घर पर कर सकते हैं। ब्लड प्रेशर के लिए नियमित अंतराल पर डॉक्टर के पास जाएं और देखें कि वह नियंत्रित है या नहीं।
बीपी का टारगेट 130/80 से कम होना चाहिए, अगर आपकी उम्र 60 साल से कम है। यदि उम्र 60 साल से ऊपर है और आप वरिष्ठ नागरिक हैं, तो बीपी का टारगेट 140/90 से कम होना चाहिए। इन लक्ष्यों को याद रखिए। दवाओं के सहारे बीपी नियंत्रित रखें और दवा छोड़ें नहीं।
सवाल 15: कई मरीज दवा शुरू करने के बाद कहते हैं, “अब BP ठीक है, दवा बंद कर देते हैं।” क्या यह खतरनाक हो सकता है?
जवाब: ऐसे लोगों को पढ़े-लिखे मूर्ख कहा जा सकता है। उन्हें जानकारी भी है, लेकिन वे गलती करते हैं। दवा के बल पर बीपी नियंत्रित हुआ है, अपने आप नहीं। इस बात पर मैं फिर जोर देकर कहता हूं कि आपका बीपी और शुगर दवा के बल पर नियंत्रित हुआ है, अपने आप नहीं।
बीपी और शुगर लाइफस्टाइल डिजीज हैं। ये जीवनशैली से जुड़ी हैं। अभी एलोपैथी में इनका पूरी तरह इलाज यानी क्योर नहीं है, लेकिन इन्हें नियंत्रित जरूर किया जा सकता है। अगर आपका बीपी और शुगर अच्छी तरह नियंत्रित हैं, तो शरीर के दूसरे सिस्टम भी ठीक रह सकते हैं और आप लंबे समय तक जी सकते हैं।
लेकिन किसी भ्रांति, किसी बाबा के चूर्ण, नेचुरोपैथी या किसी अप्रमाणित दावे के झांसे में आकर दवा छोड़ देते हैं, तो दो-चार-पांच दिन बाद बीपी तेजी से बढ़ सकता है। वही मरीज अचानक ब्रेन स्ट्रोक के साथ इमरजेंसी में भर्ती हो सकता है।
यह कितनी बड़ी बेवकूफी है कि बिना डॉक्टर की सलाह के बीपी की दवा छोड़ दी जाए, यह सोचकर कि बीपी नियंत्रित हो गया। बीपी दवा के बल पर नियंत्रित हुआ है, अपने आप नहीं। डायबिटीज के मरीज भी कभी-कभी दवा खाकर जांच कराते हैं और फिर रिपोर्ट देखकर गलत निष्कर्ष निकाल लेते हैं।
सवाल 16: क्या BP की दवा हमेशा जिंदगी भर चलती है या कुछ मरीजों में लाइफस्टाइल सुधारने के बाद डॉक्टर की निगरानी में दवा कम या बंद भी हो सकती है?
जवाब: जैसे मैं आपसे पूछता हूं कि आप जिंदगी भर भोजन खाते हैं न? नाश्ता करते हैं, दोपहर का लंच करते हैं और रात में डिनर करते हैं। क्या इससे ऊबकर ऐसा कहते हैं कि आज खाया, कल नहीं खाना?
जब जीने के लिए भोजन जरूरी है और आप भरकर खाते हैं, तो एक छोटी-सी टैबलेट या पिल खाने से हमारा जीवन बच रहा है, तो समस्या क्या है? हमें यह सोचकर परेशान क्यों होना चाहिए कि दवा जिंदगी भर खानी पड़ेगी?
हां, दवा लेनी पड़ सकती है। लाइफस्टाइल में सुधार करेंगे तो दवा की मात्रा कम हो सकती है। हो सकता है कि बाद में बंद भी हो जाए। लेकिन यह डॉक्टर तय करेगा। अमूमन दवा की मात्रा कम-ज्यादा होती रहती है। अगर आपने लाइफस्टाइल में सुधार किया है, तो डॉक्टर दवा की मात्रा कम कर सकते हैं। मरीज अपने मन से निर्णय लेकर अचानक दवा बंद नहीं करेगा।
डायबिटीज, प्री-डायबिटीज और जरूरी जांच

सवाल 17: आजकल कम उम्र में Diabetes के मामले क्यों बढ़ते दिखाई दे रहे हैं?
जवाब: मैंने आपको शुरुआत में ही बताया कि हमारी जीवनशैली पर विरासत में अंग्रेजों का प्रभाव रहा है। हमारी दिनचर्या सेडेंटरी लाइफस्टाइल हो गई है। हम लोग मेहनत करना छोड़ चुके हैं। हम मोटा अनाज छोड़कर रिफाइंड अनाज पर आ गए हैं। हमें आशीर्वाद का आटा ही अच्छा लगता है और जो मोटा अनाज था, वह हमारी थाली से दूर होता जा रहा है।
हम बाजार से जो सब्जियां और आलू खरीदते हैं, उनमें भी खाद का इस्तेमाल होता है। हम लोग कुछ भी शुद्ध नहीं खा रहे हैं। ऐसी स्थिति में अगर हम फिजिकल एक्टिविटी भी नहीं करेंगे, तो जाहिर है कि इन बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं।
सवाल 18: Prediabetes क्या है? अगर किसी व्यक्ति को Prediabetes है, तो क्या वह Diabetes होने से बच सकता है?
जवाब: WHO के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति का फास्टिंग ब्लड शुगर लेवल 126 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर या उससे अधिक हो, या भोजन के दो घंटे बाद ब्लड शुगर 200 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर या उससे अधिक हो, अथवा किसी भी समय रैंडम ब्लड शुगर लेवल 200 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर या उससे अधिक हो, तो उसे डायबिटीज की श्रेणी में रखा जा सकता है।
लेकिन मान लीजिए किसी व्यक्ति का फास्टिंग शुगर 126 से नीचे है, लेकिन 110 से ऊपर है और खाने के बाद वाला स्तर 140 से नीचे, लेकिन 120 से ऊपर है। ऐसे लोग डायबिटिक तो नहीं हैं, लेकिन जोखिम वाली श्रेणी में आ सकते हैं। इन्हें प्री-डायबिटीज कहा जा सकता है।
ऐसे लोगों को हम आम तौर पर दवा नहीं देते, बल्कि परहेज बताते हैं और लाइफस्टाइल चेंज पर जोर देते हैं। क्योंकि यही वह आबादी है, जिसमें आगे चलकर डायबिटीज विकसित हो सकती है। इस स्थिति को रोकने की कोशिश करनी है। प्री-डायबिटीज की अवस्था में बदलाव करके डायबिटीज के खतरे को कम किया जा सकता है।
अगर डायबिटीज हो गया, तो उसे पूरी तरह रोकने के बजाय उसके कॉम्प्लिकेशन कम करने पर ध्यान दिया जाता है। दवाओं के सहारे बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है। प्री-हाइपरटेंशन और प्री-डायबिटीज को रोकने की दिशा में काम किया जा सकता है। लेकिन डायबिटीज और हाइपरटेंशन विकसित होने के बाद उनकी प्रगति को धीमा किया जा सकता है। यही इस चर्चा का क्रक्स है। प्री-डायबिटीज और प्री-हाइपरटेंशन इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं, यह समझना जरूरी है।
सवाल 19: क्या सिर्फ ज्यादा चीनी खाने से Diabetes होती है या इसके पीछे जेनेटिक्स, मोटापा, फिजिकल इनएक्टिविटी और लाइफस्टाइल जैसे दूसरे कारण भी हैं?
जवाब: यह एक मिथक है कि सिर्फ ज्यादा चीनी या मिठाई खाने से डायबिटीज हो जाती है। इसमें पूरी सच्चाई नहीं है। कुछ लोग मिठाई खाते हैं, फिर भी उन्हें डायबिटीज नहीं होती। कुछ लोग परहेज करते हैं, फिर भी उन्हें हो जाती है।
अगर कोई व्यक्ति चीनी या मिठाई खा रहा है और उसका शरीर उतने कार्बोहाइड्रेट का इस्तेमाल कर रहा है, तो जरूरी नहीं कि उसे डायबिटीज हो ही जाए। ऐसा नहीं है कि मिठाई खाने से हर व्यक्ति को डायबिटीज हो जाएगी।
सवाल 20: एक सामान्य व्यक्ति को Sugar और HbA1c की जांच कब करवानी चाहिए?
जवाब: देखिए, एक स्वस्थ व्यक्ति को साल में एक बार हेल्थ चेकअप करवाना चाहिए। इसमें ब्लड शुगर की जांच कराएं, लिपिड प्रोफाइल यानी खून में चर्बी की जांच कराएं और ब्लड प्रेशर चेक कराएं। पेशाब में प्रोटीन तो नहीं आ रहा है, यह भी देख लें। लिवर और किडनी की जांच करा लें। साल में एक बार इतना काफी है, अगर व्यक्ति स्वस्थ है।
नौकरी करने वाले कर्मचारियों का भी साल में एक बार चेकअप होता है। अधिकारियों को प्रमोशन देना होता है, इसलिए IG और IPS अधिकारियों समेत कई लोगों का वार्षिक स्वास्थ्य परीक्षण होता है। इसे एनुअल हेल्थ चेकअप कहते हैं। स्वस्थ व्यक्ति को साल में एक बार जांच करानी चाहिए।
ब्रेन स्ट्रोक, खुद से दवा लेना और एंटीबायोटिक

सवाल 21: ब्रेन स्ट्रोक के ऐसे कौन-से शुरुआती संकेत हैं, जिन्हें देखकर परिवार को तुरंत समझ जाना चाहिए कि मामला गंभीर है?
जवाब: देखिए, स्ट्रोक अचानक होता है। वह मौका ही नहीं देगा। आप काम कर रहे हैं और अचानक आपका मुंह टेढ़ा हो गया, आवाज लड़खड़ाने लगी या आप बेहोश होकर गिर गए। शरीर का एक हिस्सा काम करना बंद कर सकता है। कभी-कभी व्यक्ति को पता भी नहीं चलता। सुबह उठकर पेशाब करने जाते समय भी ऐसी घटना हो सकती है।
लेकिन ऐसा क्यों हुआ, यह हमेशा पहले से अनुमान लगाना संभव नहीं है। अगर आपका बीपी नियंत्रित रहता है और आप दवा खाते हैं, तो भी दवा छोड़ने से समस्या हो सकती है। मान लीजिए आप पार्टी में गए और रात की दवा नहीं खाई। बीपी बढ़ गया और स्ट्रोक हो गया। इसलिए सावधानी रखनी चाहिए।
अगर शुगर, बीपी और खून में चर्बी यानी लिपिड प्रोफाइल के स्तर नियंत्रित रहें, तो स्ट्रोक का खतरा कम हो सकता है। बैड कोलेस्ट्रॉल भी नियंत्रित रखना चाहिए। इसके अलावा भावनात्मक तनाव और शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन भी कुछ स्थितियों में जोखिम बढ़ा सकते हैं।
युवा पीढ़ी में 40 साल की उम्र के आसपास भी स्ट्रोक देखा जा सकता है। एम्फेटामिन्स और दूसरी नशीली दवाओं का इस्तेमाल भी जोखिम बढ़ा सकता है। कुछ लोगों में खून के जमने की क्षमता से जुड़े विकार होते हैं। कुछ फैक्टर्स की कमी, जैसे प्रोटीन C और प्रोटीन S की कमी, भी कम उम्र में स्ट्रोक का कारण बन सकती है।
इसलिए बीपी, शुगर और लिपिड के अलावा भी कई ऐसे फैक्टर हैं, जो स्ट्रोक का कारण बन सकते हैं।
सवाल 22: अगर अचानक चेहरे का एक हिस्सा टेढ़ा हो जाए, हाथ-पैर में कमजोरी हो या बोलने में परेशानी हो, तो परिवार को क्या करना चाहिए?
जवाब: देखिए, स्ट्रोक एक इमरजेंसी है। झोलाछाप डॉक्टर के चक्कर में पड़ने के बजाय मरीज को तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए। न्यूरोलॉजिस्ट हर जगह नहीं मिलते, लेकिन MD फिजिशियन से मदद ली जा सकती है। CT स्कैन ब्रेन एक शुरुआती महत्वपूर्ण जांच है। CT स्कैन से यह पता लगाने में मदद मिलती है कि दिमाग की नस फटी है या दिमाग के किसी हिस्से में खून की आपूर्ति रुक गई है।
अगर दिमाग की नस फट गई है, तो उसे ब्रेन हैमरेज कहते हैं। अगर नस नहीं फटी, लेकिन खून की आपूर्ति रुक गई है, तो यह इस्कीमिक स्ट्रोक हो सकता है। दोनों का इलाज अलग-अलग है।
मरीज के परिजनों को मरीज की देखभाल करनी चाहिए और डॉक्टर के निर्देशों का पालन करना चाहिए। हाथ-पैर की कमजोरी को एक्सरसाइज और पुनर्वास के जरिए बेहतर करने की कोशिश की जाती है। बाकी डॉक्टर दवाएं देते हैं।
लंबे समय तक बिस्तर पर लेटे रहने से बेड सोर हो सकता है। अगर डॉक्टर मरीज को घर ले जाने की सलाह देते हैं, तो परिजनों को बेड सोर पर ध्यान देना चाहिए और मरीज की करवट बदलते रहना चाहिए, ताकि पीठ पर छाले न पड़ें। सामान्य देखभाल और नर्सिंग केयर जरूरी है।
एक बार स्ट्रोक हो जाने के बाद दोबारा स्ट्रोक का खतरा भी बढ़ सकता है। अगर शुगर और ब्लड प्रेशर नियंत्रित नहीं रहेंगे, तो स्ट्रोक दोबारा हो सकता है। इसलिए दवाओं से इन्हें नियंत्रित रखना और इलाज का नियमित पालन करना जरूरी है।
सवाल 23: आज लोग Google, YouTube और सोशल मीडिया देखकर खुद दवाइयां लेने लगे हैं। आप इसे कितना खतरनाक मानते हैं?
जवाब: यह बहुत खराब प्रैक्टिस है। यह जमाना किस दिशा में जा रहा है, मुझे समझ में नहीं आता। इंसान अपना ही विनाश करने पर तुला हुआ है।
आप इंटरनेट पर खोज लीजिए। बुखार में काम आने वाली पैरासिटामोल जैसी दवा के बारे में भी लिखा मिलता है कि इससे लिवर को नुकसान हो सकता है। कोई ऐसी दवा नहीं है जिसका साइड इफेक्ट बिल्कुल न हो। आप यह सब पढ़ेंगे, तो शायद दवा लेना ही शुरू नहीं करेंगे।
कहावत है, अधजल गगरी छलकत जाए। आपके पास अधकचरा ज्ञान है और आप उसे पूरी तरह समझ नहीं पाते। मेडिकल साइंस इतना आसान नहीं है। MBBS डॉक्टर बनने में लगभग छह साल लगते हैं। इस दौरान डॉक्टर 18 विषय पढ़ते हैं। मैं MBBS की बात कर रहा हूं, MD तो उसके बाद की बात है।
इसलिए डॉक्टर के ज्ञान को सिर्फ Google के आधार पर चुनौती नहीं देनी चाहिए। आप तीन सौ, चार सौ या पांच सौ रुपये बचाने के लिए सोचते हैं कि डॉक्टर की फीस क्यों दें, खुद ही देख लेते हैं। लोग खुद जांच भी कराने लगते हैं। अपोलो और दूसरी जगहों पर जाते हैं और पैसा भी खर्च करते हैं। यह गलत प्रैक्टिस है। समाज को सुधरना होगा।
डॉक्टर को अपना काम करने दीजिए और वकील को अपना काम करने दीजिए। अगर हमारे घर की बिजली खराब हो जाए, तो क्या हम डॉक्टर होकर उसे बनाने लगेंगे? नहीं। हम प्लंबर या इलेक्ट्रिशियन को बुलाएंगे। जिसका जो काम है, वह करेगा। यह बात समाज को समझनी होगी।
सोशल मीडिया पर दी गई जानकारी भ्रामक हो सकती है। उसकी सत्यता जांचने का कोई एक निश्चित पैमाना नहीं होता। इसलिए वहां बताए गए नुस्खों को आंख बंद करके नहीं अपनाना चाहिए।
सवाल 24: Antibiotic को लोग सामान्य बुखार, सर्दी-जुकाम में भी ले लेते हैं। क्या हर बुखार में Antibiotic जरूरी होती है?
जवाब: यह गलत है। अगर बुखार अचानक आया है, तापमान 102 या 103 डिग्री तक पहुंच गया है और गले में खराश या सर्दी के लक्षण हैं, तो वायरल इंफेक्शन की आशंका हो सकती है।
वायरस को मारने के लिए एंटीबैक्टीरियल दवा या एंटीबायोटिक काम नहीं करती। एंटीबायोटिक बैक्टीरिया पर काम करती है। वायरस को मारने के लिए एंटीबायोटिक खाना गलत है।
किसी भी बुखार में कम से कम 48 घंटे सिर्फ पैरासिटामोल लेने की बात मैं बुखार कम करने के संदर्भ में कह रहा हूं। सिरदर्द हो तो पैरासिटामोल का सेवन दिन में दो से तीन बार किया जा सकता है। पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं, सूप पिएं, आराम करें और जरूरत के अनुसार ठंडे पानी से शरीर पोंछें। दो दिन बाद भी बुखार बना रहे, तो फिजिशियन से मिलकर उचित जांच और इलाज कराएं।
हर बुखार वायरल नहीं होता और हर बुखार बैक्टीरियल भी नहीं होता। मेडिकल किताबों में बुखार के अनेक कारण बताए गए हैं। डॉक्टर जांच करके समझ सकता है कि बीमारी क्या है।
मान लीजिए डेंगू है। आप मेडिकल स्टोर पर गए और कहा कि दर्द हो रहा है और बुखार है, कोई दवा दे दीजिए। दुकानदार ने कोई दवा दे दी और आपने खा ली। अगर वह दवा डेंगू में रक्तस्राव का खतरा बढ़ाने वाली दर्द निवारक दवा हुई, तो आपकी स्थिति बिगड़ सकती है और अस्पताल में भर्ती होना पड़ सकता है।
डेंगू में कुछ दर्द निवारक दवाएं नुकसानदायक हो सकती हैं। अगर आप फिजिशियन से मिलते और जांच कराते, तो वह उचित दवा की सलाह देता। बुखार में पैरासिटामोल के अलावा किसी भी दर्द निवारक दवा को बिना चिकित्सकीय सलाह नहीं लेना चाहिए।
झोलाछाप डॉक्टर भी कई बार बिना बीमारी समझे डेक्सोना का इंजेक्शन दे देते हैं और लोग जल्दी ठीक होने की उम्मीद में लगवा लेते हैं। लोग कहते हैं, “सुई दे दीजिए भाई, जल्दी ठीक हो जाएंगे।” कितना भी समझाएं, अज्ञानता अभी भी बनी हुई है।
सवाल 25: कई लोग दवा का डोज कम कर लेते हैं या ज्यादा कर लेते हैं। क्या इससे भी नुकसान हो सकता है?
जवाब: बिल्कुल। अपने मन से दवा लेना गलत है। इस बात को समझिए। हम 21वीं सदी में वैज्ञानिक बात करते हैं, लेकिन खुद ही उलटे-सीधे काम करते हैं। इस बारे में लोगों को जागरूक होना पड़ेगा।
वरना लोग डॉक्टर को दोष देते हैं कि डॉक्टर की लापरवाही से मरीज मर गया। गलती आपने की और इल्जाम डॉक्टर पर लगा दिया। आपको डेंगू था, आपने जांच नहीं कराई और अपने मन से दर्द की गोली खा ली। गंभीर अवस्था में अस्पताल में भर्ती हुए और मरीज की मौत हो गई। ऐसे में यह देखना होगा कि गलती कहां हुई। डॉक्टर को बिना पूरी बात समझे दोष देना उचित नहीं है।
स्वस्थ रहने के लिए जीवनशैली में क्या बदलें?

सवाल 26: अगर कोई व्यक्ति अपनी lifestyle सुधारना चाहता है, तो शुरुआत किस एक चीज से करे?
जवाब: सबसे पहले भोजन से शुरुआत करें। संतुलित आहार लें। आप नॉनवेज खाते हैं या वेज, इससे मेरा कोई मतलब नहीं है। मैं शाकाहारी हूं और मुझे शाकाहारी भोजन अच्छा लगता है। कोई नॉनवेज खाने वाला भी होगा, तो उसकी मात्रा सीमित होनी चाहिए।
स्मोकिंग बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। अल्कोहल का सेवन भी नहीं करना चाहिए। बिहार ड्राई स्टेट है, तो हम मानकर चलते हैं कि लोग इसका सेवन नहीं करते होंगे, लेकिन जो करते हैं, उन्हें इसमें सुधार लाना चाहिए।
सोने और जागने का समय निश्चित कीजिए। सोशल मीडिया देखते-देखते रात के 11 या 12 बज जाते हैं। कभी रील देख रहे हैं, कभी ईमेल देख रहे हैं। इससे परेशानी बढ़ सकती है। सोने से एक घंटा पहले फोन छोड़ दीजिए। भोजन कीजिए। मन हो तो कुछ न्यूज देखिए या अच्छी किताब पढ़िए। घर में छोटे बच्चे हैं, तो उन्हें पढ़ाइए। लेकिन सोने से पहले इन चीजों से दूर हो जाइए।
समय पर सोने जाइए। उम्र के हिसाब से पर्याप्त नींद लेना जरूरी है। अगर आठ घंटे नहीं सो पाते, तो कम से कम छह घंटे की नींद लें। उससे कम नींद लेने पर दिमाग बोझिल हो सकता है और सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। नींद पूरी नहीं होगी तो तनाव और ब्लड प्रेशर बढ़ने लग सकता है। शरीर में कॉर्टिसोल जैसे हार्मोन का स्तर भी प्रभावित हो सकता है।
दो चीजें आपके हाथ में हैं—समय पर सोना और समय पर खाना।
कोई आपको चाय देता है, तो आप न चाहते हुए भी पी लेते हैं। दिन में चार, पांच या छह बार चाय हो जाती है। फिर डॉक्टर के पास जाकर कहते हैं कि भूख नहीं लगती। आप जहां जाते हैं, लोग आपको चाय देते हैं और आप मना नहीं करते। आप प्रेम और सम्मान समझते हैं, लेकिन विनम्रता से मना भी कर सकते हैं। कह सकते हैं कि अभी चाय पी है, एक गिलास पानी पी लेंगे।
आप समझिए कि अपने शरीर में क्या डाल रहे हैं। शरीर आपका है, इसलिए आपको सोचना है कि उसमें क्या डालना है। आप होटल में बैठे हुए स्प्राइट पी रहे थे और थोड़ी देर बाद कॉफी भी पी ली। हम लोग ऐसा ही कर रहे हैं। सलाद की मात्रा घटती जा रही है। पनीर चिल्ली और चिकन चिल्ली चाहिए, लेकिन सलाद कम होता जा रहा है।
इसलिए आम आदमी को कब्ज की समस्या रहती है। सुबह पेट साफ करने के लिए चाय चाहिए। खाली पेट चाय पीना नुकसानदायक हो सकता है। चाय हमारी पारंपरिक संस्कृति का हिस्सा नहीं थी। अंग्रेज आए, चाय की खेती की और चाय पीने की आदत बढ़ी। लेकिन मैं यह नहीं कहता कि चाय पूरी तरह छूट जाएगी। फाइबरयुक्त आहार लीजिए और मोटा अनाज खाइए, जैसे ज्वार, बाजरा और रागी।
पतंजलि वाले भी इसे बेच रहे हैं। मैंने भी खरीदा है और गेहूं के आटे में मिला देता हूं। पत्नी से कहता हूं कि रोटी बनाओ, ताकि मल्टीग्रेन का कुछ लाभ मिले। हमें थोड़ा पारंपरिक भोजन की तरफ लौटना पड़ेगा। बच्चों को भी यह समझाना होगा। बच्चे रिफाइंड फूड ज्यादा पसंद करते हैं और ऑनलाइन ऑर्डर कर देते हैं। उन्हें समझाइए कि फास्ट फूड से दूर रहना चाहिए।
मैं एक डॉक्टर हूं। मेरा काम सिर्फ इलाज करना नहीं है, बल्कि समाज को जागरूक करना भी है। अगर पूरा समाज बीमार पड़ जाएगा, तो डॉक्टर कम पड़ जाएंगे। मेरी मेडिसिन OPD में रोज पांच से छह सौ मरीजों की भीड़ रहती है। ये सब जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां हैं। इसलिए जागरूकता जरूरी है।
सवाल 27: नमक, चीनी और तेल—इन तीनों में आम भारतीय परिवार को सबसे ज्यादा किस बात का ध्यान रखना चाहिए?
जवाब: रिकमेंडेशन के अनुसार, दिनभर में पांच ग्राम नमक यानी लगभग एक छोटी चम्मच नमक की मात्रा बताई जाती है। अगर आप पांच ग्राम से ज्यादा नमक ले रहे हैं, तो बीपी की समस्या का खतरा बढ़ सकता है। पैमाना यही है कि पांच ग्राम नमक की मात्रा का ध्यान रखें और उससे ज्यादा न लें।
सेंधा नमक हो या कोई दूसरा नमक, इसमें कई भ्रांतियां हैं। आखिर नमक में सोडियम क्लोराइड ही होता है। कई लोग कहते हैं कि हम सेंधा नमक खा रहे हैं, इसलिए हमें कोई परेशानी नहीं होगी। यह भ्रम है। अलग-अलग नमक को लेकर कई तरह के दावे किए जाते हैं। नमक जीवन के लिए जरूरी है, लेकिन इसका सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए।
तेल में हम सरसों के तेल का इस्तेमाल करते हैं। कुछ लोग नारियल का तेल भी खाते हैं। रिफाइंड तेल का इस्तेमाल कम करें। मैदा कम खाएं। मोटा अनाज और दाल खाएं। स्वस्थ रहिए।
सवाल 28: हर रोज कितनी physical activity एक सामान्य व्यक्ति के लिए उपयोगी मानी जाती है?
जवाब: सप्ताह में 150 मिनट या प्रतिदिन 30 मिनट। सप्ताह में पांच दिन भी कर लेते हैं, तो पर्याप्त है। प्रतिदिन 30 मिनट और सप्ताह में 150 मिनट मध्यम स्तर का व्यायाम या वॉकिंग करना चाहिए। अगर आप इतना कर रहे हैं, तो स्वस्थ रहने के लिए जरूरी न्यूनतम गतिविधि के स्तर तक पहुंच रहे हैं।
सवाल 29: नींद कितनी महत्वपूर्ण है? देर रात तक मोबाइल देखने और लगातार कम सोने का शरीर पर क्या असर पड़ सकता है?
जवाब: देखिए, बचपन में हम पढ़ते थे कि विज्ञान वरदान है या अभिशाप। टेक्नोलॉजी दोनों है। हम टेक्नोलॉजी का विरोध नहीं करते। इसका उपयोग कीजिए और इसका लाभ लीजिए।
स्मार्टवॉच पहनकर टहलते हैं, तो वह बताती है कि 30 मिनट हो गए और इतने स्टेप पूरे हुए। मोबाइल से हम बैठे-बैठे ईमेल कर देते हैं और संदेश प्राप्त कर लेते हैं। लेकिन इन सुविधाओं में जरूरत से ज्यादा शामिल मत होइए। सुविधाओं का उपयोग कीजिए, उपभोग मत कीजिए।
उपयोग और उपभोग में बहुत अंतर है। उपयोग का मतलब है कि जितनी जरूरत है, उतना इस्तेमाल कर रहे हैं। उपभोग का मतलब लग्जरी की तरफ जाना है। एपल का ही फोन चाहिए—क्यों भाई? बात करनी है, मैसेज करना है, तो एपल का फोन क्यों चाहिए? एपल की स्मार्टवॉच क्यों चाहिए?
हम अपने बच्चों को लग्जरी लाइफ क्यों सिखा रहे हैं? मैं खुद एपल का फोन इस्तेमाल नहीं करता। मेरे पास सैमसंग का साधारण फोन है। इसका जो काम है, वह करना है।
इसलिए गैजेट का इस्तेमाल जरूर करें, लेकिन सीमित मात्रा में। मैं फिर कहूंगा—उपयोग करें, उपभोग नहीं करें। आज साइंस और टेक्नोलॉजी का जमाना है। पीछे मत रहिए। हम यह नहीं कह रहे कि लालटेन के युग में चले जाइए। यह जेट का जमाना है।
सवाल 30: पटना में air pollution भी एक बड़ा मुद्दा है। क्या लंबे समय तक polluted air में रहने का असर सिर्फ फेफड़ों पर पड़ता है या heart और दूसरी बीमारियों का जोखिम भी प्रभावित हो सकता है?
जवाब: देखिए, यह तो पॉलिसी मैटर है। सरकार को सोचना चाहिए। किसी व्यक्ति के पास पैसा आ गया, तो उसने तीन-तीन गाड़ियां रख लीं। हमारे यहां ऐसे ऑटो पर प्रतिबंध लगाया गया है, जो डीजल और केरोसिन से चलते हैं। लेकिन जुगाड़ गाड़ी आज भी चल रही है। कोई देखने वाला नहीं है।
हम लोग अपना क्या कर सकते हैं? कम से कम मास्क का इस्तेमाल तो कर सकते हैं। समाज को सुधारिए और अपना बचाव भी कीजिए। मास्क का इस्तेमाल करें और धूल व धुएं से बचें। पेड़ लगाएं। मैंने अपनी बालकनी में भी पौधे लगाए हैं। करीब 20 से 25 पौधे लगाए हैं। जिनका अपना घर है, वे पौधारोपण करें। प्रकृति के बीच रहना सीखिए। हम जहां भी रहें, पौधारोपण में योगदान करें। वही बचाएगा, कोई और नहीं बचाएगा। प्रदूषण कम करने का एक उपाय पौधारोपण भी है—पौधारोपण, पौधारोपण, पौधारोपण।
सवाल 31: प्रदूषण वाले दिनों में बच्चों, बुजुर्गों और heart/lung patients को किन सावधानियों का ध्यान रखना चाहिए?
जवाब: सांस की बीमारियां प्रमुख रूप से प्रभावित करती हैं। अस्थमा और COPD जैसी बीमारियां फेफड़ों को नुकसान पहुंचाती हैं। टीबी भी होती है। इम्यूनिटी भी मजबूत रखनी है।
सवाल 32: मान लीजिए हमारे सामने एक 35 साल का व्यक्ति बैठा है। वह अभी बिल्कुल स्वस्थ महसूस करता है और चाहता है कि अगले 20–30 साल तक उसे गंभीर बीमारी से बचने के लिए क्या करना चाहिए। आप उसे पांच ऐसी बातें क्या बताएंगे, जिन्हें वह आज से अपनी जिंदगी में शामिल कर ले?
जवाब: मेहनत करना सीखें और फिजिकल एक्टिविटी बढ़ाएं। सात से आठ घंटे की नींद लें। संतुलित और स्वस्थ आहार लें। सिगरेट और नशीले पदार्थों से दूर रहें और तनाव से बचें। अगर ये पांच चीजें कर लेते हैं, तो उनकी लॉन्जिविटी यानी लंबे समय तक स्वस्थ जीवन जीने की संभावना बढ़ सकती है। इसमें कोई संदेह नहीं है।ह अभी बिल्कुल स्वस्थ महसूस करता है और चाहता है कि अगले 20–30 साल तक उसे गंभीर बीमारी से बचने के लिए क्या करना चाहिए। आप उसे पांच ऐसी बातें क्या बताएंगे, जिन्हें वह आज से अपनी जिंदगी में शामिल कर ले?
जवाब: मेहनत करना सीखें और फिजिकल एक्टिविटी बढ़ाएं। सात से आठ घंटे की नींद लें। संतुलित और स्वस्थ आहार लें। सिगरेट और नशीले पदार्थों से दूर रहें और तनाव से बचें। अगर ये पांच चीजें कर लेते हैं, तो उनकी लॉन्जिविटी यानी लंबे समय तक स्वस्थ जीवन जीने की संभावना बढ़ सकती है। इसमें कोई संदेह नहीं है।
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