फिल्म लेखक और निर्देशक इकबाल दुर्रानी से खास बातचीत: सामवेद के उर्दू अनुवाद के पीछे की कहानी, छह साल का संघर्ष, आर्थिक तंगी और समाज में मोहब्बत का संदेश।
पैगंबर मोहम्मद से जुड़ी इस्लामी परंपरा में वर्णन मिलता है कि जब फरिश्ते ने उनसे कहा, “पढ़ो”, तो उन्होंने जवाब दिया कि उन्हें पढ़ना नहीं आता। बार-बार कहे जाने के बाद उन्हें कसकर आलिंगन में लिया गया। इस घटना के बाद पढ़ने की प्रेरणा और ज्ञान से जुड़ा एक नया अध्याय शुरू हुआ।
कुछ ऐसी ही प्रेरणा की अनुभूति लेखक, पटकथा लेखक और फिल्म निर्देशक डॉ. इकबाल दुर्रानी भी अपने सामवेद के उर्दू तर्जुमे की यात्रा से जोड़कर देखते हैं।
हिंदी सिनेमा में अपनी लेखनी से पहचान बनाने वाले मशहूर लेखक, पटकथा लेखक और फिल्म निर्देशक इकबाल दुर्रानी ने सामवेद के उर्दू अनुवाद के लिए अपनी कामयाब फिल्मी जिंदगी तक छोड़ दी। इस काम को पूरा करने के लिए उन्होंने छह साल तक संघर्ष किया और अपनी पसंदीदा मर्सिडीज कार भी बेच दी। दुर्रानी का दावा है कि सामवेद केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि प्रेम का संदेश देने वाला ग्रंथ भी है।
सामवेद के अनुवाद की प्रेरणा उन्हें कैसे मिली? एक ऐसे लेखक ने, जिसने संस्कृत नहीं पढ़ी थी, वैदिक मंत्रों के अनुवाद का कठिन रास्ता क्यों चुना? और आज समाज में बढ़ती नफरत के बीच वह मोहब्बत का क्या संदेश देना चाहते हैं? इन सवालों पर Freelancer Post के संपादक योगेश चक्रवर्ती ने इकबाल दुर्रानी से विस्तृत बातचीत की। पेश हैं इस खास बातचीत के प्रमुख अंश।
फिल्मों की दुनिया से सामवेद तक: डॉ. इकबाल दुर्रानी की अनोखी यात्रा
सवाल: दर्शकों और पाठकों को अपना परिचय कैसे देंगे आप?
इकबाल दुर्रानी: हूं… जहाँ-जहाँ दर्द का पानी है, वहाँ-वहाँ इकबाल दुर्रानी है। जमीन पर चलता हूं, मगर ख्वाब आसमानी है। हाँ, वहीं तो आपका इकबाल दुर्रानी है… तालियाँ तो बजनी चाहिए
सवाल: इकबाल साहब, आपने बॉलीवुड में कहानियाँ लिखकर लोगों का मनोरंजन किया, लेकिन सामवेद का अनुवाद करके आप लोगों को क्या संदेश देना चाहते हैं?
इकबाल दुर्रानी: सामवेद है क्या, ये नहीं पता लोगों को। लोगों को यह भी पता नहीं कि हमने सामवेद का अनुवाद क्यों किया उर्दू में। हिंदी में तो इसके अनुवाद बहुत हैं मार्केट में, लेकिन उर्दू में अनुवाद करने वाला संपूर्ण जगत में पहला आदमी मैं हूं।
उसकी वजह है, कई बातें हैं। पहली बात तो ये है कि सामवेद का अनुवाद मैंने करना ही नहीं चाहा था, क्योंकि मैं इतना छोटा आदमी हूं, इतना छोटा राइटर हूं कि मैं वैदिक काल के सामवेद का रूपांतर करूंगा, मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था। न तो मेरे सपनों को इतना साहस मिला हुआ था कि वो इस बात का सपना देख सके।
ये भगवान की इच्छा थी कि सामवेद के प्रति प्रेम मेरे में डाल दिया।
हुआ यूं था कि मैं फिल्म की लोकेशन देखने एटा गया हुआ था। यूपी का एक शहर है, जो इंसानों के लिए कम, डाकुओं के लिए ज्यादा मशहूर रहा है। तो वहाँ पर मैं गया तो वहाँ एक गुरुकुल था, जहाँ 99 हवन कुंड बने हुए थे। लोकेशन मैंने देखा, बहुत अच्छा लगा। तो मैंने कहा, मिलता हूं इनके प्राचार्य महोदय से।

जहाँ पर मैं बैठा हुआ था, वहाँ चारों तरफ संगमरमर के पत्थरों पर वेदों के मंत्र लिखे हुए थे और भावार्थ भी था हिंदी में। भावार्थ पढ़ने लगा तो मुझे अच्छा लगा। तो मैंने कहा, मिलेगा क्या इसकी प्रतियां?
तो उन्होंने कहा कि आने दीजिए राम प्रसाद जी को, जो यहाँ के प्राचार्य हैं। वो आए। फिर हम दोनों बैठे। इस दौरान क्या बात हुई, ये ठीक से याद नहीं। लेकिन इतना याद है कि उन्होंने कहा, “इकबाल जी, आपसे मिलकर बड़ा अच्छा लगा, क्योंकि आप तो मुझे फिल्मी आदमी लगते ही नहीं हो, जो शराब, शबाब, कबाब और पैसे की बात करता हो, दिखावा हो। आप तो आध्यात्मिक आदमी हो।”
मैंने कहा, “जो हूं, सो यही हूं।”
तो उन्होंने कहा कि एक चीज मैं आपको भेंट करूंगा, जहनसीब। तो उन्होंने फिर अपने आदमी की ओर इशारा किया। फिर वो एक लाल कपड़े में बड़ा-सा चीज लाल कपड़े में लेकर आया। राम प्रसाद जी ने अपने हाथों में लिया और कहा, “ये लीजिए, ये हमारी तरफ से भेंट है आपको।”
मैंने नहीं पूछा, क्या है। क्योंकि जो मोहब्बत से भेंट दी जा रही है, तो मोहब्बत होगी। पूछना क्या है? फिर मेरे हाथ में दिया। उसमें वजन था। फिर उन्होंने लाल रंग का कपड़ा हटाया तो देखा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद था। तो तीनों वेद थे।
फिर उन्होंने कहा कि चौथा वेद इसलिए नहीं दे रहा, क्योंकि वो आयुर्वेद है। उसका कोई मतलब नहीं है। ये मेरी तरफ से।
इसके बाद उन्होंने कहा कि ये जो तीनों वेद की किताबें हैं, इसे मैंने बहुत पहले खरीदी थी, जब ये गुरुकुल बनाया था, 1950 में। उसके बाद तो बहुत सारी किताबें हैं, लेकिन ये पहली किताब है। ये हमारे लिए एंटीक पीस की तरह है, इसलिए मैं आपको दे रहा हूं।
किताब का वजन मेरे हाथ पर था और इस सवाल का वजन मेरे दिल पर था कि हे प्रभु, हे ईश्वर, ये खुदा, मैं आया फिल्म का लोकेशन देखने के लिए और तुम मेरे हाथ में तीनों वेद दे रहे हो। तुम चाहते क्या हो?
मैं मुंबई आया और तीनों वेदों का भावार्थ पढ़ गया। इस तरह मैं त्रिवेदी बन गया।
इसके बाद मैंने अपने बेटे मशाल से कहा कि मशाल, देखो तो किसी ने इसका उर्दू में ट्रांसलेट किया है? फिर उन्होंने गूगल सर्च किया। उसके बाद उन्होंने कहा कि नहीं, किसी ने नहीं किया है। तो मैंने कहा कि मैं सामवेद का ट्रांसलेशन करता हूं।
वो क्या रोक पाता मुझे? अब प्रॉब्लम ये था कि किसी से कहा जाए कि समुद्र किनारे रेत पर उसे फेंक दो, फिर बोलो कि तैरो। तो आदमी चिल्लाएगा न कि रेत पर मैं कैसे तैरूंगा? मेरा भी यही हाल था।
हिंदी मैंने मैट्रिक तक पढ़ी हुई। संस्कृत मैंने पढ़ी ही नहीं। और जो संस्कृत में किताब है, वो वैदिक काल की संस्कृत है, वो आज की संस्कृत से अलग है। तो उस काल की संस्कृत की किताब का ट्रांसलेशन करना, ये तो बालू की रेत पर तैरने के समान था मेरे लिए।
खैर, फिर मैंने डिक्शनरी मंगाई। फिर जितने भी भावार्थ की किताबें थीं, मार्केट में, सब मंगाईं। गूगल में अवेलेबल थीं तीन, उसका भी प्रिंट आउट कराया। फिर अंग्रेजी में जितनी किताबें थीं, पाँच, वो भी मंगवाईं।
तो गोया कि इस तरह डिक्शनरी, 17-18 किताबें मेरे चारों तरफ। एक शब्द पढ़ता था तो पहले डिक्शनरी में मतलब देखता था। फिर उसके बाद यहाँ भावार्थ पढ़ता था। टंग… टंग… टंग… टंग… जलतरंग की तरह 18 बार बजता था, एक शब्द के लिए। फिर यहाँ नोट लिखता था। फिर दूसरा शब्द।
ये मेहनत दो साल करनी पड़ी, तब जाकर रेत पानी हुआ। मैं तैरने के लायक बना। फिर तैरने लगा।
लेकिन परेशानी क्या थी कि मैं एक मुसलमान आदमी, एक फिल्मवाला आदमी। मैं जब सामवेद लिखूंगा तो सारे लोग मुझे तलवार की धार पर रखेंगे कि पता नहीं क्या-क्या किया है। तो इस तरह मैं ज्यादा कॉन्शस था। फिर उसी हिसाब से मैंने लिखना शुरू किया।
पहले मैंने हिंदी में उसका अनुवाद किया, फिर उर्दू में किया। तो उसमें भी एक प्रॉब्लम आई। जैसे “हे प्रकाशमान” लिखा हुआ है मंत्र। अब उसका ट्रांसलेशन किया करेंगे हिंदी में—“ऐ प्रकाश वाले”, “ऐ उजाला वाले”, “ऐ रोशनी वाले”—तो लगता है कि बगल की दुकान से किसी लाइटवाले को बुला रहा हूं। “ऐ रोशनी वाले।” ये भगवान के लिए जा नहीं रहा है।
मुझे लगा कि बात नहीं बन रही है। भगवान को मैं कहूं, “ऐ रोशनी वाले”? मैंने कहा कि नहीं, इसे प्रकाशमान ही रहने दो। “हे प्रकाशमान।” तो लगता है कि साउंड ऊपर जा रही है।
अब रहा उर्दू में क्या करूं? क्या करूं? “ऐ रोशनी वाले”, “ऐ उजाले वाले।” इधर प्रकाशमान हिंदी में, उधर मैं उर्दू में लिखूं “ऐ रोशनी वाले।” तो बात बैठती नहीं है, वजन बराबर बैठता ही नहीं है।
तो मैंने कहा कि ये जो प्रकाशमान है, इसके बराबर का शब्द ढूंढने के लिए मुझे फारसी में जाना पड़ेगा या अरबी में जाना पड़ेगा। तो फिर मैं फारसी में गया।
अब ट्रांसलेशन आप सुनो। “हे प्रकाशमान।” उर्दू में आया, “ऐ नूरेमुजस्सम।” तो लगता है, हाँ, अब जाकर बराबर की बात बनी।
तो इसके रूपांतरण में मैंने हिंदी, उर्दू, संस्कृत, फारसी, अरबी—सारी भाषाओं को लाया, ताकि जो विकार पैदा होते हैं, जो उनके लिए बातें पैदा होती हैं, उसको सही में जिस्म मिले। ऐसा लगे कि भगवान के लिए कहा जा रहा है। ये करते-करते मुझे चार साल लग गए इसमें।
सवाल: आप कह रहे हैं कि आपने प्लानिंग के तहत नहीं, ईश्वरीय प्रेरणा से सामवेद का हिंदी से उर्दू में अनुवाद किया है।
इकबाल दुर्रानी: हाँ, बिल्कुल, क्योंकि वो ईश्वरीय किताब है न। तो ईश्वरीय प्रेरणा है मेरी। मेरे सपनों का कोई हाथ नहीं है। मेरी तो हिम्मत ही नहीं थी कि इतना बड़ा काम करने की सोचूं।
ईश्वरीय प्रेरणा थी और इसके अलावा एक चीज और थी, जो मैं आपको बताना चाहूंगा।
मोकामा एक जगह है पटना में। वहाँ पर एक मिडिल स्कूल है, सीसीएमई मिडिल स्कूल। वहाँ मेरे दादा टीचर थे। वहीं उनका डेथ भी हुआ। जिस दिन रिटायर किए, उसी दिन हुआ। वो जाना नहीं चाहते थे वहाँ से, तो उनका डेथ हो गया।
तो जब भी मैं वहाँ जाता था तो लोग मुझे कहते थे, “पंडित जी का पोता आया हुआ है।” तो मैं घबरा जाता था। मेरी आठ-दस साल की उम्र थी। मैं पंडित जी का पोता कैसे बन गया? यहाँ ये नाम क्यों दे रहे हैं लोग? और बड़ी इज्जत से बोल रहे हैं कि पंडित जी की काफी इज्जत है।
हुआ यूं था कि उस जमाने में जो उर्दू पढ़ाए, फारसी पढ़ाए, वो मौलवी साहब कहलाता था। जैसे रत्नलाल सरसार। ये बहुत बड़े शायर थे। फारसी पढ़ाते थे, तो उनको सब मौलवी साहब बोलते थे। और जो संस्कृत पढ़ाते थे, वो पंडित जी। चाहे वो जिस कास्ट का हो, जिस धर्म का हो। कर्म से नाम लिया जाता था।
तो हैरत की बात ये थी कि मेरे दादा उस स्कूल में संस्कृत पढ़ाते थे। ये आज तक मुझे पता नहीं चला कि उन्होंने संस्कृत सीखी कहाँ। लेकिन उन्होंने सीसीआईएम मिडिल स्कूल में 30 साल संस्कृत पढ़ाई। तो इसलिए मुझे लोग पंडित जी का पोता कहते थे।
तो वो मेरे डीएनए में आ गया। दादा जी संस्कृत पढ़ाते थे। बाबूजी की लाइन तो अलग हो गई। तो वो संस्कृत पढ़ाते थे और मैं संस्कृत का अनुवाद करने वाला बन गया।
मेरे अंदर जो हुआ है, जो लोगों को अजूबा लग रहा है, अगर इसका डीएनए टेस्ट करेंगे तो मेरे दादा जी से मिलेगा। तो वहाँ प्रकृति ने बीजारोपण कर दिया था। पेड़ बन के या शाख बन के मेरे रूप में फैला।
मॉडर्न एज में अगर करें तो मजे की बात ये बताऊं कि मेरी वाइफ ब्राह्मण है। कानपुर की ब्राह्मण है मेरी वाइफ। ये मेरे डीएनए को कहीं से हेल्प करता है। तो ये सारी चीजें होती हैं, तभी जाकर कुदरत किसी चीज को पैदा करता है।

सवाल: इकबाल दुर्रानी साहब, आपने कहा कि दो साल में मैंने तैरना सीखा, तब जाकर आप सामवेद का संस्कृत से उर्दू में ट्रांसलेट कर पाए।
इकबाल दुर्रानी: लिखने जब लगा तो मुझे लगा मैं फिल्म के दो काम एक साथ नहीं कर सकता। तो मैंने फिल्म लाइन छोड़ दी। जिस फिल्म लाइन को पाने के लिए मैंने घर छोड़ दिया, और सामवेद के लिए मैंने उस फिल्म लाइन को छोड़ दिया।
तो जब तक आपको किसी चीज को छोड़ना और त्याग करना नहीं आएगा, आप कोई नई चीज कर नहीं सकते हैं। तो मेरे अंदर वो ताकत थी। मैं कामयाब था फिल्म लाइन में। मैं चल रहा था, और चलती हुई लाइन का शटर मैंने डाउन कर दिया। और सामवेद के प्यार के शटर को उठाकर इसी में खो गया।
18-18 घंटे मैं काम करता था। तो गणेश जी की तरह अपना पांव राइट पांव लेफ्ट पर रखकर, यही मेरी अदा थी। मैंने किया।
सारे लोग नाराज रहे, क्योंकि फिल्म लाइन छूट गई तो आमदनी खत्म हो गई। और सामवेद लिख रहा था तो ऊपर से भगवान कोई मनीऑर्डर भेज नहीं रहा था। तो बिना किसी आमदनी के मैंने छह साल सर्वाइव किया।
इसको लिखने के लिए मैंने त्याग किया। इसको त्याग कह सकते हैं आप। वो जज्बा था मेरे अंदर। जब मैं काम शुरू किया, जब काम शुरू किया हूं तो उसे खत्म करूंगा।
उसकी एक वजह और थी। अगर ये छह साल में दो-चार फिल्में लिख लेता तो करोड़ों कमा लेता। लेकिन वो फिल्में मर भी जाती हैं। लेकिन ये सामवेद, मुझे पूरा यकीन है कि कयामत तक नहीं मरेगा। और जब ये जिंदा रहेगा तो मैंने जो थोड़ा-बहुत काम भी किया है, वो भी जिंदा रहेगा। मेरा नाम जिंदा रहेगा।
बस, ये नहीं मरने की लालच मुझे झुकने नहीं दिया, रुकने नहीं दिया।
सवाल: दुर्रानी साहब, जैसा कि आपने कहा, इन छह सालों में आपकी कमाई शून्य रही, मनीऑर्डर नहीं आ रहा था। फिर भी मेरा आपसे ये सवाल है कि इन छह सालों में आपको सबसे बड़ी कीमत क्या चुकानी पड़ी?
इकबाल दुर्रानी: मेरी सबसे फेवरेट गाड़ी, नई-नई ली थी मैंने मर्सिडीज। काले रंग की थी। उसका नंबर भी 786 था। तो वो मुझे बहुत प्यारी थी। उसको मुझे बेचना पड़ा। कई छोटी-मोटी चीजें बेचनी पड़ीं।
चूंकि घर वालों ने कह दिया था कि आप घर की चीजों को हाथ नहीं लगाएं। अपनी चीजों पर हाथ लगाएं। ये आपका शौक है। आप समझे? मेरा शौक था। मैंने समझा। और किसी भी पॉइंट के ऊपर मैंने कॉम्प्रोमाइज नहीं किया
सवाल: दुर्रानी साहब, छह साल का लंबा वक्त और आर्थिक तंगी के बावजूद आपने सामवेद का संस्कृत से उर्दू में ट्रांसलेट किया। अब उसका विमोचन होने वाला है, तो अपने काम से कितना संतुष्ट हैं?
इकबाल दुर्रानी: देखो, वन बाय वन मैं बात करता हूं। ये जो लोकार्पण हो रहा है, इसके पहले भी लोकार्पण हो चुका है।
जब मेरी किताब बन गई, चार साल लिखने में लगा और डेढ़ साल लिखने में लगा। हर पेज जो है, चित्रमय है किताब में। आपको किताब भी दूंगा, आप उसका कुछ फोटोग्राफ ले लेना। हर पेज चित्रमय है, बॉक्स है। और ये इंडिया बुक रिकॉर्ड में भी है, एशियन बुक रिकॉर्ड में भी है और वर्ल्ड बुक रिकॉर्ड में भी है।
तो जब ये चार साल और डेढ़ साल, साढ़े पांच साल लगे, और छह महीने मुझे लगे आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत जी तक पहुंचने में। क्योंकि मैं चाह रहा था कि जो अद्भुत किताब मैंने लिखी है, इसका विमोचन भी अद्भुत व्यक्ति से कराऊं।
तो मैं पहुँचा वहाँ तक, मोहन जी भागवत तक। और उनको मैंने मना लिया अपनी किताब के विमोचन के लिए। और उन्होंने 17 अप्रैल 1924 को लाल किला के प्राची में इस किताब का विमोचन किया, जिसमें बड़े-बड़े फिल्म स्टार आए हुए थे। शंकरानंद महाराज आए हुए थे। कैलाशानंद आए हुए थे। बहुत बड़ी जर्नी थी, क्योंकि मोहन जी भागवत की उपस्थिति थी।
तो इसका विमोचन वहाँ हो गया। तो वो डिजिटल फॉर्म था किताब का। सौ कॉपी निकाली थी मैंने डिजिटल। अभी जो लोकार्पण हो रहा है, वो उसका मार्केटिंग फॉर्म है। अब ये किताब मार्केट में आएगी।
सोच रहे हैं इसकी शुरुआत मैं अपनी मिट्टी से करूं। मैं बिहारी हूं तो। इसलिए मैंने पटना में लोकार्पण का कार्यक्रम रखा है। यहाँ गवर्नर साहब के हाथ से, साथ में शिक्षा मंत्री मिथलेश तिवारी जी भी रहेंगे। और भी लोग आ सकते हैं। अभी 15 दिनों का वक्त है। इसका हम लोगों ने यहाँ पर विमोचन रखा है। तो ये है सिलसिला, जिसको मैं कंटिन्यू कर रहा हूं।
मैं मोहन भागवत जी को नमस्ते करते हुए कहूंगा कि उन्होंने विमोचन कार्यक्रम में कहा था कि “इकबाल जी, आपने इतना बड़ा काम कर दिया कि आपको तो जीते जी मोक्ष मिल जाएगा।” ये उनकी जुबानी थी।
और दूसरी बात ये थी कि शाहजहाँ के हुकूमत में दारा शिकोह जो काम नहीं कर पाया था, उसको श्री आदरणीय नरेंद्र मोदी जी के हुकूमत में इकबाल दुर्रानी ने कर दिया। इस पर तो वहाँ दस मिनट तक तालियां बजती रही थीं।
तो अब क्या हुआ कि मेरे दिल से मौत का डर खत्म हो गया। मारना है, मारो। ये जो मेरी उपलब्धियाँ हैं, इसको कैसे मार पाओगे?
मजे की बात है कि इस काम के बाद लोगों की नजरें झुक गईं। पहले जब मैं फिल्म में काम करता था तो लोग आँखों में आँखें डालकर नमस्ते-वमस्ते करते थे। अब तो ये हालत है कि लोग पाँव छूने लगे। लोगों की नजरें झुक गईं मेरे आगे। ये इज्जत दी है मुझे सामवेद ने।
सवाल: आपने कहा कि सामवेद के अनुवाद से पहले मन में सुरक्षा को लेकर संशय था। आप डरे हुए थे। आज के माहौल को लेकर बहुत सारे लोग सवाल उठाते हैं। ऐसे में आपका अनुभव क्या कहता है?
इकबाल दुर्रानी: अंधेरा है, तभी तो उजाले का माहौल है। उजाला नहीं है, अंधेरा है। तो यही तो आपको आना है। यही तो आपके लिए असली माहौल है कि नफरत बढ़ गई है। यहीं पर तो मोहब्बत का आह्वान देने का काम है।
अगर सामवेद आप पढ़ेंगे तो सामवेद एक धार्मिक ग्रंथ तो है, लेकिन ये एक प्रेम ग्रंथ भी है। आप पढ़ेंगे, नहीं तो मैं पढ़कर साबित करूंगा कि ये देखो कौन-सी ऐसी चीज है, जिसे पढ़कर हिंदू भ्रष्ट हो जाए और मुसलमान काफिर हो जाए। ऐसी कोई चीज नहीं है सामवेद में। इसको मुसलमान भी आराम से पढ़े, कोई काफिर नहीं होगा।

ये मोहब्बत की भाषा लिखी गई है। इसलिए मैं चाहता हूं कि ये जन-जन तक पहुँचे। ये चिराग जले।
दूसरी बात, जो जलने वाले हैं, बुराई करने वाले हैं, वो करें। हमारी नीयत अच्छी है और हमको कोई धर्माधिकारी नहीं बनना, जो मुझे कोई पोस्ट चाहिए। वो नहीं चाहिए। मेरा पोस्ट तो फिल्म लाइन में है। मेरा रोजी-रोटी तो वहाँ है।
मैं तो सिर्फ लैंप पोस्ट की रोशनी बनना चाहता हूं, जो रास्ते में खड़ा रहता है, जो रोशनी देता है। मैं किसी धर्मांतरण के पक्ष में नहीं हूं। मैं तो चाहता हूं एक हिंदू अच्छा हिंदू बने और एक अच्छा मुसलमान एक अच्छा मुसलमान बने। और वे बनेंगे तभी, जब वे अपनी चीजों को जानेंगे।
सवाल: आपने कहा कि नफरत है, तभी तो मोहब्बत आएगी। राहुल गांधी भी यही कह रहे हैं।
इकबाल दुर्रानी: मुझसे सियासत की बात नहीं करें आप। मैं वही कर रहा हूं, जो सूरज करता है। जब अंधेरा गहरा हो जाता है तो सूरज निकलने की कोशिश करता है। मैं भी वही कर रहा हूं।
ये सब जो बातें हैं, जो हाल की बात है, लेकिन जो हजारों साल से सनातनी सत्य है, वो यही है न—अंधेरा बढ़ता है तो उजाला आता है।
सवाल: मतलब दुर्रानी साहब बेखौफ हैं?
इकबाल दुर्रानी: किससे खौफ? ये करके तो लगता है मैंने मौत को जीत लिया है। जब मैंने प्यार की बात की तो प्यार कोई मौत नहीं है। सामवेद भी कोई मौत नहीं है। उससे मैं लगा हुआ हूं तो शायद मेरी मौत भी नहीं है
सवाल: धर्म-संस्कृति की आड़ में नफरत के बीज बोने वालों को आप क्या कहना चाहेंगे? उन्हें सामवेद से क्या सीखना चाहिए?
इकबाल दुर्रानी: मैंने एक ही लफ्ज में कह दिया, सामवेद प्रेम ग्रंथ है। पहले पढ़कर सामवेद को झुठलाओ, तो हम जानें कि मेरा यकीन कम है।
रही संदेश की बात, तो दो बातें मैं कहूंगा आपसे। निचोड़ना एक शब्द है। जैसे रोमांटिकली सोचें तो जुल्फों को निचोड़ा, दुपट्टे को निचोड़ा, फूलों को निचोड़ा—ये सब शब्द आते हैं। लेकिन ये जो मैं कहने जा रहा हूं, वह अलग है।
अपनी रूह को निचोड़ कर,
मोहब्बत की एक बूंद गिरा दो, बस।
देखना, सारा समंदर मीठा हो जाएगा।
यहाँ से अगर हम अपना सफर जारी करते हैं तो मायूसी और उदासी की कोई जगह नहीं है।
रही सियासत, राजनीति, तो उसके लिए मेरी एक दुआ है कि वफा धर्म बन जाए। एक लफ्ज हिंदी का, एक लफ्ज उर्दू का है। आप देखिएगा—
वफा धर्म बन जाए,
मोहब्बत ईमान हो जाए,
तुम अपने दिल को इतना फैला दो
कि हिंदुस्तान हो जाए।
हमें जरूरत है अपने दिलों को फैलाने की। हमारे दिलों में तो बगल का पड़ोसी भी नहीं समा पाता। तो हिंदुस्तान कैसे समाएगा? ये सवाल मेरी तरफ से आप रख लीजिए।
सवाल: आप तो बहुत गंभीर सवाल उठा दिए, लेकिन मेरा मानना है कि जो माहौल है, उसमें बहुत सारे लोगों को ये स्वीकार नहीं होगा।
इकबाल दुर्रानी: अपना तो काम है जलाते चलो चिराग, रास्ते में चाहे दोस्तों और दुश्मन का घर मिले।
देखो भाई, सूरज की आप पूजा करते हैं, एनर्जी लेते हैं, लेते हैं न? एक शिक्षा भी ले लो सूरज से। सूरज की किरणें जब उतरती हैं तो क्या वो छतों को देखते हुए उतरती हैं कि ये छत उसका है, वहाँ नहीं उतरूं; ये छत उसका है, वहाँ नहीं उतरूं? वो सारे छतों पर तो समान रूप से उतरती हैं न।
उसी तरह, उसी सूरज की तरह आप भी अपने प्यार की किरणें सबकी छतों पर उतारो, समान रूप से। मत गिनो कि ये उसका है, ये उसका है, यहाँ उतरूं, यहाँ नहीं उतरूं। सब समान है। यही सामवेद भी है।
सामवेद की जो तालीम है, इसका जो सबक है, ये सबके लिए है, सूरज की रोशनी की तरह। पढ़ो तो सही, जानो तो सही।
आजकल तो हमने अपने धर्मों की लगाम दूसरे के हाथों में दे दी है। तुम टट्टू की तरह उस लगाम से बंधे हुए चलोगे, तो कैसे पाओगे सच तुम? सारी किताबें मौजूद हैं, खरीदो, पढ़ो। उसको मानो जो सच है। किसी के कहने की मत मानो।
सवाल: आजकल एआई का जमाना है। जेन-जी का जमाना है। जेन-जी आंदोलन भी कर रहे हैं देश में बदलाव को लेकर, तरह-तरह के सवाल भी उठा रहे हैं। क्या आपने जो सामवेद का अनुवाद किया है, उसमें जेन-जी के लिए कुछ है?
इकबाल दुर्रानी: सारा कुछ तो मैंने कह दिया न आपको। अपने दिल को इतना फैलाओ कि हिंदुस्तान हो जाए। फैलाओ न दिल को। क्यों नहीं फैलाते हो?
सिर्फ भाषण और मैथेमेटिक्स से कुछ हल नहीं होता। जब तक आप अपने अंदर ही—यहाँ हम सब दूसरे को बदलना चाहते हैं, खुद नहीं बदलते हैं—तो कैसे मुमकिन है?
सवाल: आप ये कह रहे हैं कि खुद को सुधारो। सामवेद का भी यही संदेश है?
इकबाल दुर्रानी: हाँ, सामवेद आपको रोटी बनाकर नहीं देगा। अगर आपको धन कमाने की जरूरत है तो सामवेद पराठे बनाकर नहीं देगा। लेकिन सामवेद आपके वजूद के आटे को इतना गीला कर देगा कि आप जैसा चाहो, वैसा रंग दे सकते हो। सामवेद वो काम करता है।
सवाल: तो आपको ये उम्मीद है, यकीन है कि जब आपकी पुस्तक लोगों के हाथों में पहुँचेगी…
इकबाल दुर्रानी: सवाल पूरा होने से पहले ही, मैं घबराता नहीं हूं रिजल्ट से। सामवेद कैसे चार हजार साल पहले आ गया और चार हजार साल बाद कैसे हमारे हाथ में आ गया? पहुँचा कि नहीं पहुँचा? इससे मुश्किल सफर थोड़े ही है, जो हम आगे करने वाले हैं।
अपना नेक काम करो, ऊपर वाले पर भरोसा रखो। अपने साथ जुनून रखो काम करने का।
सवाल: नहीं, मेरा सवाल ये है कि आपको लगता है कि सामवेद उर्दू में अनुवाद होकर लोगों के हाथों में आएगा तो बदलाव आएगा?
इकबाल दुर्रानी: मुझे सब कुछ लगता है। वो जब प्रेम ग्रंथ पढ़ेगा तो बदलाव तो आएगा न? प्रेम आएगा न उसके अंदर?
दुनिया की सारी बातें मैंने कह दिया। मैंने कहा, आटे को गीला करेगा, नरमी लाएगा। मोहब्बत आए तो आप सब कुछ एक्सेप्ट करने लगोगे। अगर जिद्दीपन रहेगा, तो रहेगा। उसमें सामवेद क्या करेगा? सामवेद किसी को जाकर तीर नहीं मार रहा।
सवाल: इकबाल दुर्रानी साहब, ये बताएं कि मुस्लिम समुदाय का सबसे पवित्र ग्रंथ कुरान और सामवेद में क्या समानता है? आप दर्शकों और पाठकों को कुछ बताएं।
इकबाल दुर्रानी: क्या है कि एक बड़ा प्रॉब्लम हो जाता है सबके साथ, चाहे हिंदू हो या किसी के साथ भी। आप जब एक धर्म को मानते हुए दूसरे धर्म की पुस्तक पढ़ते हैं तो उनको ये प्रॉब्लम आती है।
जैसे तसव्वुर कीजिए, एक कपड़ा है पीले रंग का, उस पर लाल रंग का आपने लगाया। तो जैसा आपने लगाया, वैसा वो उभरेगा नहीं, एक डिफरेंट कलर आ जाएगा। उसका टेक्सचर अलग जाएगा। ब्लू कपड़ा है, उस पर ब्लैक लगाए तो उसकी डेंसिटी कम हो जाएगी, चूंकि ब्लू से मिक्स हो रहा है।
तो यही हाल होता है जब कोई हिंदू दूसरे की किताब पढ़ता है, तो पढ़ते वक्त उसे अपना धर्म याद आता है। अच्छा, ये वाला मेरे धर्म में ऐसा है, ये इसमें ऐसा है। तो एक डब्ल्यूडब्ल्यू शुरू हो जाती है उसके दिल के अंदर।
उसी तरह एक मुसलमान जब हिंदू का धार्मिक ग्रंथ पढ़ता है तो अपनी कुरान को भूल नहीं पाता। और जब यहाँ देखते हैं कि ऐसा, तो फिर वहाँ देखता है, मेरे में तो ऐसा है। तो फिर डब्ल्यूडब्ल्यूएफ हो गया। तो सही तरीके से रूपांतरण नहीं कर पाएगा वो।
इसलिए जो हिंदी किताबों का ज्यादातर रूपांतरण है, वो सही नहीं है। रूपांतरण करने वाला अगर मुसलमान है तो वो मुसलमान होकर रूपांतरण किया है, वो बढ़ा-चढ़ाकर। हिंदू है तो घटा-बढ़ाकर। मुसलमान ने हिंदू का किया है तो उसमें भी अपना वाला डाल दिया है।
ये प्रॉब्लम मुझे पहले समझ में आ गई थी। तो मैंने क्या किया, अपने को निराकार बनाया पहले। पहले मैंने ये सोचना बंद कर दिया कि मैं मुसलमान हूं। कितना मुश्किल काम है ये—जिस धर्म को मान रहे हो, उसे छोड़ देना कि नहीं, मैं मुसलमान नहीं हूं।
तो मेरा खत्म हो गया, जो ब्लैकबोर्ड पर लिखा हुआ था। अब जब मैंने पढ़ा तो मुझे सही रंग दिखा। उसमें मैंने कोई क्रिटिसाइज नहीं किया। उसमें कुछ ये न किया। उसमें न कुछ बढ़ाया, न घटाया। जो उसमें है, वही दिया।
निराकार हो जाना, आकार रखकर, बहुत मुश्किल काम है। तभी जाकर सही न्याय कर सकते हैं। तो इस तरह से हमने सामवेद के साथ न्याय करने की कोशिश की।
इसलिए सामवेद में जहाँ परमेश्वर है, वहाँ पर मैंने उर्दू में भी परमेश्वर लिखा, वहाँ पर अल्लाह नहीं बनाया। जैसे भजन एक शब्द है, उर्दू में भजन कोई लफ्ज ही नहीं है, तो भजन को भजन ही रहने दिया। ये कोशिश मैंने नहीं की कि अपने इस्लाम को कहीं न कहीं थोपूं।
सवाल: आपने कहा कि मैं निराकार हो गया था। आपने बहुत बड़ी बात कह दी। निराकार होना मतलब ईश्वर के काफी करीब हो जाना। तो इसमें भी आपको बहुत वक्त लगा होगा।
इकबाल दुर्रानी: यही अध्यात्म है। इसी को अध्यात्म कहते हैं। ट्रांसफॉर्म होने में हमें समय लगा।
आपके सामवेद में भी है, ईश्वर का कोई रूप नहीं है। ईश्वर का कोई रूप नहीं है, कोई आकार नहीं है। सामवेद में राम, शंकर, विष्णु, दुर्गा किसी का जिक्र नहीं है, आप ये जान लें।
जब उपनिषद आया, चार सौ साल के बाद वेद के। उसके बाद आया कुरान, चार सौ साल के बाद। उसके बाद आया महाभारत और रामायण। पुराण जब आया, तब भगवानों को इंसानों ने पैदा किया, लिखित रूप में। होंगे पहले से। जिसकी आस्था है, उस पर मुझे कोई क्वेश्चन मार्क नहीं है। आप मानें।
हम तो अभी सामवेद तक सीमित हैं। ऋग्वेद के बारे में पूछेंगे तो नहीं बता पाऊंगा। तो सामवेद में “हे परमेश्वर”, “हे अग्नेय”, “हे इंद्रेय”—भगवान को जब भी पुकारा गया तो इन लफ्जों से पुकारा गया। “हे शांति स्वरूप”, “हे शक्ति स्वरूप”—इन लफ्जों से पुकारा गया भगवान को।
तो ये तो निराकार ही है। और अग्नेय हो, अग्नि हो, प्रकाशमान हो—सारी रोशनी के प्रतीक हैं। और जो इस्लाम है, उसके पास भी खुदा का जो प्रतीक है, वह भी रोशनी है। नूर।
तो यहाँ पर दोनों चीजें एक ही हैं। वहाँ पर प्रकाशमान है तो यहाँ पर नूरेमुजस्सम है, जो ऊपर से नीचे तक रोशनी है। तो दोनों जगह रोशनी है। दोनों का प्रतीक रोशनी है। तो रोशनी प्रतीक है भगवान का। उसे निराकार ले लो या आकार ले लो। रोशनी के शोलों को आप कोई आकार नहीं दे सकते। वह हमेशा बदलता रहता है।
तो ये जो दोनों का मुकाबला है, तो ये मुकाबला है ही नहीं। मैं वही कहना चाह रहा हूं, मुकाबला नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि सत्य दो तरह के होते हैं। एक वह सत्य जो बदलता रहता है। जैसे जमीन पहले ऐसी थी, तो ऐसी हो गई, तो चौड़ी हो गई, गोल हो गई, तो अंडाकार हो गई। तो ये सच्चाई बदलती रही।
और एक होता है शाश्वत सत्य, जो बदलता नहीं है। जो ऊपर वाले का बनाया हुआ सच है। और ये जो है, वो इंसानों का बनाया हुआ सच है कि धरती गोल है, तो चपटी है। इंसानों ने बनाया। लेकिन जो शाश्वत सत्य है, वो इंसानों ने नहीं बनाया।
जैसे मिसाल के तौर पर दोनों में फर्क बताता हूं। एक लड़की अफ्रीका में पैदा होती है तो काली है, हिंदुस्तान में पैदा होती है तो सांवली है, चीन में पैदा होती है तो गोरी-गोरी है। यूरोप में पैदा होती है तो गोरी में थोड़ा लाल रंग है। इजिप्शियन में पैदा होती है तो ताम्र कलर है। है न?
तो ये जितनी औरतें जहाँ-जहाँ जाइए, भौगोलिक रीजन से वहाँ के हवा, पानी और दूसरे कारणों से उनके बदन के रंग अलग-अलग हैं। ये दुनिया ने उनके रंग अलग-अलग बनाए हैं। ये औरतें माँ भी बनती हैं सारी जगह। ये भी सही है। लेकिन सबके रंग अलग-अलग हैं—गोरे, काले, सांवले, ताम्र, गुलाबी, हल्के काले, गहरे काले—लेकिन सब औरतों के सीने से उबलता हुआ दूध का रंग एक है। उजला। वो शाश्वत है। ये नहीं बदलता।
आप काले हो, गोरे हो, एशिया के हो या फिर अफ्रीका के हो, दूध का रंग नहीं बदलता। क्यों? ऊपर का तो सब चेंज है। ऊपर वाला रंग बदलने वाला है, उसे हमने-आपने बनाया। लेकिन इतनी हिम्मत है बेटे, तो माँ के दूध का रंग बदल डालो। समझ जाएंगे तुम खुदा को समझते हो और खुदा तुम्हें समझता है। बदलो वो रंग, बदलो न। नहीं बदलते हो तो एक काम करो।
शादी होती है आपके यहाँ लाल रंग की साड़ी पहनते हैं, शिया काले रंग की पहनती है, अंग्रेज उजले रंग के पहनते हैं, अफ्रीका में छींट वाले सब कलर पहनते हैं। हर जगह के लोगों की शादी की रस्म अलग-अलग है। कपड़ों के रंग भी अलग-अलग हैं।
लेकिन सारे आदमी जब मरते हैं तो उनके कफन का रंग एक होता है। बदलो उसे। किसने दिया? यहाँ के पंडितों को भी कहा उजला रंग पहनो, अरब के शेखों को भी कहा उजला रंग पहनो। किसने बोला, ये सब एक ही क्यों है पूरी दुनिया में? बदलो उसे।
अरे पागल, जानते हो ये दूध जो है, जिंदगी का पैगाम है। वो भी उजला। और कफन जो है, वो मौत का ऐलान है। वह भी उजला। इसके अंदर क्या राज छुपा है? बताओ। सनातन को समझो। शाश्वत सत्य को समझो। सब एक हो जाओगे। तुलना मत करो।
सवाल ये किया गया था। तुलना करने की चीज ही नहीं है। ये भी ईश्वरीय है, वो भी ईश्वरीय है। वो उस जमाने में आया, उस जमाने के हिसाब से। ये इस जमाने में आया है, इस जमाने के हिसाब से।
सवाल: इकबाल दुर्रानी साहब कह रहे हैं, अल्लाह या ईश्वर सब एक ही है?
इकबाल दुर्रानी: मैं ये नहीं कह रहा। ये प्रकृति कह रही है हजारों सालों से। बंदे, कहाँ फंसे हो उजले-काले के झगड़े में? अपना स्तन निचोड़ो न, देखो क्या पीकर तुम पैदा हुए और क्या पीकर वह जवान हुआ। इसका मतलब इसकी शिक्षा को समझो न।
सवाल: इकबाल दुर्रानी साहब, ये बताएं कि आप इतने बड़े राइटर हैं, बहुत सारी पटकथाएँ आपने लिखी हैं, तो क्या कभी आपने फिल्मी कहानियाँ लिखते हुए वेद, पुराण, प्राचीन ग्रंथों से प्रेरित कहानियों का इस्तेमाल किया है? ऐसा कुछ प्रयोग किया है?
इकबाल दुर्रानी: क्योंकि शुरू से ही हिंदुस्तान के माहौल में रहा है। रामायण, महाभारत, ये सब तो नजरों से गुजरा है। इस्लाम की किताबें भी गुजरी हैं। तो जाहिर है, उसका एक असर हमारे दिमाग पर तो था। तो इसमें से कई चीजें मेरी कहानियों में मिलेंगी आपको।
जहाँ तक याद है, आप देखिए, धरती पुत्र। इसमें एक लड़के की कहानी है, जो जेल में पैदा होता है। तो वो आपको कृष्ण जी से मिलती है कि जेल में पैदा हुए थे।
फिर उसमें एक सवाल है, एक आदमी क्राइम करने से डरता है, क्योंकि वह जेल जाने से डरता है। लेकिन जो बच्चा जेल में ही पैदा हुआ, उसे आप किस चीज से डराएंगे? अगर वह क्रिमिनल बना तो कितना बड़ा क्रिमिनल बनेगा? ये क्वेश्चन ही उस फिल्म में थी, धरती पुत्र में।
दूसरा है, जो सबसे मेरी हिट फिल्म है, फूल और कांटे। उसमें अर्जुन और कर्ण का जो कॉन्सेप्ट था। एक है जो पैदाइशी बड़ा है और एक जो अपने कर्मों से बड़ा हुआ है। लेकिन उसको जगह नहीं दी जाती है। अर्जुन को ही बनाया जाता है।
तो आप देखिएगा, फूल और कांटे, उसमें मैंने रोल भी किया है, एक्टिंग भी की है। मेरा रोल कर्ण का था और अजय देवगन का रोल अर्जुन का था। तो मैं कहता हूं अमरेश पुरी से, “आखिर मेरे में क्या कमी थी? क्या मैंने आपके लिए खून नहीं बहाया? तो फिर उत्तराधिकारी क्यों उसे बना रहे हैं आप? मैं क्यों नहीं?”
तो इस तरह से फ्लैशेज, जो बचपन से मेरे दिमाग में थे, वो फिल्मों में आते रहे हैं। और इसलिए उसे आने का मौका मिला कि मेरे जेहन में जो आ रहा था, उसके रास्ते में कोई अंग्रेजी फिल्म नहीं थी।
मैं उन राइटरों में से हूं, जिसने किसी अंग्रेजी फिल्म का अनुवाद नहीं किया। अंग्रेजी फिल्मों या तमिल या तेलुगु फिल्मों को पकड़कर ऊपर नहीं गए। मेरी हर कहानी ओरिजिनल है और मेरी है। जब मेरी है तो हिंदुस्तान की है, जिसे मैंने यहीं की मिट्टी से कहीं न कहीं लिया है।
सवाल: अगर इकबाल साहब को सामवेद पर फिल्म बनाने का मौका मिले तो उसकी कहानी कैसी होगी?
इकबाल दुर्रानी: सामवेद जो है, इसके ज्यादा पॉपुलर नहीं होने का कारण है, जो मुझे समझ में आता है। जैसे महाभारत है, रामायण है, इसमें कहानी है। इसमें कहानी की चाशनी है, खटास है, मिठास है, तो लोगों को मजा आता है। इसके कथावाचक होते हैं।
लेकिन सामवेद एक अर्चना है, वंदना है, इसमें फरियाद है। संगीत और गीत है, आत्मसमर्पण है। तो इसमें वो कोई मनोरंजक चीज नहीं है। ये आशिकों को अच्छा लगेगा। और वो सब कहानी, जो आशिक नहीं भी हैं, उन्हें वहाँ लड़ाई हो रहा, वहाँ वो रहा है, ये सब पसंद आता है। इसलिए पीछे रह गई।
इसलिए ये वजह भी है कि सामवेद पर कोई फिल्म नहीं बनाई जा सकती, चूंकि उसमें कैरेक्टर है ही नहीं, पात्र नहीं है। हर एक छंद है। तो उसमें आप म्यूजिक एल्बम बना सकते हैं।
लेकिन इसके बावजूद भी मैं ट्राई कर रहा हूं कि उस पर एक सीरियल बनाई जाए, नौ-नौ मिनट के। हर एक मंत्र को कोई शंकराचार्य पढ़े और हिंदी में उसका अनुवाद करें, और उर्दू वाला उर्दू में करे। नौ-नौ मिनट एक चंक बनेगा।
तो सामवेद वर्ल्ड नाम से मैंने एक कंपनी भी रजिस्टर कराई है यूट्यूब पर। उसमें हर दिन एक एपिसोड, मंत्र आएगा। 1875 मंत्र हैं सामवेद में, तो ये छह साल तक चलेगा। तो इस पर मैं प्रोग्राम कर रहा हूं। फरवरी इसकी हम शुरुआत करने वाले हैं।
सवाल: आप आज के युवा लेखकों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
इकबाल दुर्रानी: आज के लेखक, उसमें कई लेखक ऐसे भी हैं जिनका मेरे से कोई रिश्ता नहीं है, फिर भी वे अपने नाम के आगे दुर्रानी लगा लेते हैं। तो ऐसे भी चाहने वाले हमारे हैं।
एक जमाने में था कि हार्ड-हिटिंग डायलॉग के लिए इकबाल दुर्रानी के पास जाओ। क्योंकि मैं जिस जमाने में आया, उस जमाने में सलीम-जावेद अलग-अलग होकर टूट चुके थे। राही मासूम रजा की डेथ हो चुकी थी। कादर खान थे, तो कादर खान के डायलॉग लच्छेदार ज्यादा होते थे। श्रृंगार रस ज्यादा होता था। कहीं-कहीं वल्गैरिटी भी आ जाती थी।
मैंने जब कलम उठाया तो मैं बिल्कुल सटीक वार किया। कोई श्रृंगार रस नहीं। एकदम डायरेक्ट। तो हार्ड-हिटिंग डायलॉग में इकबाल दुर्रानी मशहूर हो गया। और मैं रातों-रात नंबर वन राइटर हो गया।
जैसे कि आप पत्रकार हैं, तो पत्रकारों के लिए एक डायलॉग मैंने लिखा था फिल्म खुद्दार में—
“मैं वो पत्रकार नहीं, जिनका कलम तवायफों की तरह अमीरों के इशारे पर ठुमके लगता है।”
इस तरह से मैंने स्ट्रेट वार किया। इसमें कोई श्रृंगार नहीं। अनिल धवन ने ये डायलॉग बोला था, तालियाँ पड़ती थीं।
तो मैंने रखा कि एकदम स्ट्रेट फॉरवर्ड डायलॉग बोलूंगा। जैसे धरती पुत्र में एक डायलॉग है। एक सिपाही आकर कहता है तवायफ से, सुजाता मेहता से, “मैं तुझे आईने की तरह तोड़ दूंगा।”
तो सुजाता मेहता ने कहा, “हुजूर, आईने तो बच्चे भी तोड़ देते हैं। आईने तो बच्चे भी तोड़ देते, मजा तो तब है जब आईने में कोई ऐसी तस्वीर डालिए कि आईना खुद टूट जाए।”
तो ये जो रंग रहा मेरा, बहुत ही तल्ख रहा, हार्ड रहा। और समाज की बुराइयों पर भी।
“उसने तुम्हारे खिलाफ कमीशन बिठा दिया है। ये कमीशन हिजड़ों की तरह है, एक सौ हिजड़े मिलकर भी एक बच्चा पैदा नहीं कर सकते।”
तो मेरी डायलॉग की एक पूरी किताब निकली है। हम हिंदुस्तान के पहले राइटर हैं, जिसके डायलॉग की किताब निकली है। फूल और कांटे उसमें डायलॉग का कलेक्शन है।
मैं अपने बच्चों से कहना चाहूंगा, अगर टेम्परेरी जिंदगी चाहिए तो कुछ भी कर लो, अंग्रेजी फिल्में देख लो, वहाँ से स्क्रीनप्ले मार लो। कर लो। जिंदा रह जाओगे।
लेकिन पच्चीस साल, पचास साल के बाद भी जिंदा रहो, इसके लिए ओरिजिनल काम करना पड़ेगा।
जैसे आज मेरी फिल्म को लीजिए, धरती पुत्र, तो उसका तेलुगु में रीमेक हो गया। फूल और कांटे का चार लैंग्वेज में रीमेक हो गया है। तो मेरी फिल्मों का लोगों ने रीमेक बनाया, मैंने आज तक किसी की फिल्मों का रीमेक नहीं बनाया।
जब आप ओरिजिनल रहेंगे, तो ही रीमेक बनेगा न। मेरी पहली फिल्म के रिलीज हुए 41 साल हो गए। फिर भी आप इकबाल दुर्रानी को याद रखते हैं, क्यों? सौगंध। क्योंकि मैंने जो दिया, ओरिजिनल दिया। कोई उसे मिटा नहीं पाया।
लेकिन आजकल आप पूरी फिल्म देखिए, दो डायलॉग भी अच्छे नहीं लगेंगे आपको।
सवाल: आपकी शुरुआत कैसे हुई? बिहार के बांका से मुंबई तक पहुँचने और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने का सफर कैसा रहा?
इकबाल दुर्रानी: एक्चुअली क्या हुआ कि वो एक ईश्वरीय देन था कि मेरे दिल में उसने एक डर पैदा कर दिया। मैं बहुत कुछ अच्छी-बुरी चीजें लेकर आया।
सलीम-जावेद ने मिलकर भी 41 कुछ लिखा है। लेकिन मैंने अकेले 52 लिखा है। लेकिन लोगों से पूछेंगे तो पाँच या दस फिल्मों का नाम याद है—फूल और कांटे, मुकद्दर का बादशाह, शिवा, कोहराम, पाँच या दस फिल्मों के नाम याद हैं। खुद्दार। बाकी तो 42 मर गए। उसका नाम ही किसको नहीं मालूम है।

तो मैं वो धृतराष्ट्र हूं, जिसके आधे बच्चे तो मर गए। तो मैंने कहा, कुछ ऐसा काम करो जो नहीं मरने की गारंटी हो। फिर मेरे को मन में आया सामवेद। क्योंकि इसका जो मूड है, वो मेरे मूड से मैच करता है। इसमें नरमी है, संगीत है, गीत है। कलाकार मन को ये अच्छा लगा। इस पर मैं काम करूं।
यही वजह है कि ऋग्वेद और यजुर्वेद पर मैंने काम नहीं किया।
मैं जब अपने गांव से निकलता हूं तो एक ब्लू रंग का पहाड़ है। उस पर एक मंदिर है। उस पहाड़ का नाम है मंदार। मंदार वो पहाड़ है, जिससे समुद्र का मंथन हुआ था। और इसका जिक्र विष्णु पुराण में भी है कि चीर और चानन नदी के बीच में पहाड़ है।
तो वो जो जिक्र है विष्णु पुराण में, उसी के किनारे मेरा गांव है। तो बचपन से जब भी मैं घर से निकलूं तो वही पहाड़ नजर आए। और बड़ा ही खूबसूरत। तो पूछा, ये क्या है? तो बताया, ये मंदार पर्वत है, जिससे समुद्र मंथन हुआ था। विष, अमृत, लक्ष्मी निकली, ऐरावत हाथी निकला।
तो बचपन से ये कहानी मेरे अंदर गूंज रही थी। तो उससे एक इंस्पायर मिलता था कि इससे समुद्र मंथन हुआ। तो शायद मेरे अंदर यही इंस्पायर कर गया और मैं भी समुद्र मंथन करने मुंबई चला गया।
तो इसीलिए उधर गांव तरफ के लोग मुझे “मंदार पुत्र इकबाल दुर्रानी” लिखते हैं। आप भी लिख सकते हैं।
सवाल: फूल और कांटे, शिवा, दिल आशना है और खुद्दार जैसी फिल्मों से जुड़ने का अनुभव कैसा था? इनमें से किस फिल्म ने आपके लेखन को सबसे ज्यादा पहचान दी?
इकबाल दुर्रानी: सवाल के बीच में ही, देखिए, उसमें एक बात ऐड करते हैं। फिल्में लिखने वाले और भी राइटर हैं, लेकिन खैर, हमसे ज्यादा नहीं लिखा। डायरेक्टर और भी अच्छे-अच्छे हैं। लेकिन मेरे साथ एक और चीज जुड़ी हुई है।
जैसे शाहरुख खान की पहली फिल्म दिल आशना है, अजय देवगन की पहली फिल्म फूल और कांटे, नागार्जुन की पहली फिल्म शिवा, अक्षय कुमार की पहली फिल्म सौगंध और रानी मुखर्जी की दूसरी फिल्म मेहंदी। ये सारी फिल्में मेरी लिखी हुई हैं।
तो इतने एक्टरों के लिए पहली फिल्म लिखना और उस पहली फिल्म का हिट होना, जिसने उन्हें स्टार बनाया, तो ये मेरी झोली में सबसे बड़ा एजाज है। तो इकबाल दुर्रानी जिसको छूता है, वो स्टार बन जाता है। तो लोग मुझे पारस भी कहते थे कि जिसको छू लेगा, सोना बन जाएगा।
ये किसी और को नहीं है। उसकी वजह है, जैसे यश चोपड़ा ही थे, बड़े डायरेक्टर थे। लेकिन उनका जिगर इतना बड़ा नहीं था कि किसी नए आदमी को चांस दें। लेकिन इकबाल दुर्रानी के पास जागीर भी पड़ी नहीं थी, लेकिन जिगर बहुत बड़ा था।
नए-नए लोगों को मैंने चांस दिया। म्यूजिक डायरेक्टर महेश शर्मा को चांस दिया। सिंगर में दिया। कितने लिरिक्स में चांस दिया। मेरे को नए-नए लोगों को चांस देने का शौक है।
ऐसा नहीं है कि गरीबी की बस्ती से निकला तो अमीरों के महलों में खो गया। नहीं। मैं निकल के बाहर आता था और देखता, जिसके पास टैलेंट है, उसे खींचकर बाहर ले आता था। इससे बड़ी संतुष्टि मिलती है। शाहरुख खान और अजय देवगन की कामयाबी मेरी अपनी लगती है।
सवाल: फिल्मों की कहानी और संवाद लिखते समय आप किसी किरदार को वास्तविक बनाने के लिए क्या प्रक्रिया अपनाते हैं?
इकबाल दुर्रानी: नहीं, मैंने इन स्टारों को आजमाया नहीं। ये भी समझो मेरा जिद्दीपन है। अगर आपको बना दिया तो फिर आपसे मांगने नहीं गया आपके दरवाजे पर कि इसके बदले में मुझे कुछ दो।
इसलिए शाहरुख खान, अजय देवगन के साथ मेरी कोई दूसरी फिल्म नहीं है। अक्षय कुमार के साथ मेरी दूसरी फिल्म नहीं है। किसी के साथ नहीं है। क्योंकि मैं बाप बन गया हूं न, तो बेटे के दरवाजे पर भीख मांगने नहीं जाऊंगा। मैं दूसरा पैदा कर लूंगा।
और अभी दूसरा पैदा करने के चक्कर में हूं, उसका नाम है मशाल दुर्रानी।
सवाल: ये मशाल दुर्रानी कौन हैं?
इकबाल दुर्रानी: ये जो है, जैसे राइटर सलीम खान का बेटा सलमान खान, राइटर जावेद अख्तर का बेटा फरहान अख्तर। उसी तरह राइटर-डायरेक्टर का बेटा मशाल दुर्रानी। एक फिल्म उनकी आ चुकी है। मॉडलिंग कर रहे हैं और उनकी फिल्में आने वाली हैं।
सवाल: आपने लेखन के साथ निर्देशन भी किया। लेखक और निर्देशक के रूप में आपकी सोच में क्या अंतर रहता है?
इकबाल दुर्रानी: हर कैरेक्टर अलग होता है। तो मैं कोशिश करता हूं कि जो मेरा कैरेक्टर है, जो फिल्म में कर रहे हैं, उसके मुताबिक मैं डायलॉग लिखूंगा।
जैसे कोई रिक्शावाला है, तो वह क्या भाषा इस्तेमाल करेगा? तो मैं उस हिसाब से लिखूंगा। तो मेरे जो डायलॉग होते हैं, वह आपको सच्चे लगेंगे। ऐसा नहीं लगेगा कि इसे इकबाल दुर्रानी ने लिखा है। ऐसा लगेगा कि कैरेक्टर ने खुद लिखा है।
कैरेक्टर की अपनी भाषा होती है। तो वहाँ इकबाल दुर्रानी को गौण कर देते हैं। अगर कैरेक्टर के हिसाब से नहीं लिखूंगा तो हर एक्टर एक ही भाषा बोलने लगेगा। लेकिन मेरी फिल्मों में हर एक्टर की भाषा आपको अलग नजर आएगी।
तो वो इंद्रधनुषी रंग मैं डालता हूं, वो मैं ही डालता हूं। किसी की भी डायलॉग देखिए, सब लगेगा कि कादर खान बोल रहे हैं।
सवाल: आज की फिल्मों में कहानी और संवादों की गुणवत्ता को आप किस तरह देखते हैं? क्या व्यावसायिक दबाव में मौलिक लेखन पीछे छूट रहा है?
इकबाल दुर्रानी: बेसिक फिल्म जो है, वह राइटर की होती है। अगर वो राइटर है, अगर कोई राइटर अंग्रेजी फिल्म से कैरेक्टर मार लिया, साउथ की फिल्म से मार लिया, तो वो राइटर ही नहीं है। वह तो डुप्लिकेटर है न।
लेकिन अगर वह ओरिजिनल कोई राइटर है, जिसके अंदर से निकली हुई कहानी है, तो अपनी कहानी और उसके कैरेक्टर को उससे ज्यादा कोई समझ नहीं सकता है। अगर वो डायरेक्शन पर आता है तो ज्यादा इंसाफ कर पाता है।
आप यहीं पर देखिए, बहुत सारे राइटर हैं। जैसे सुभाष घई का नाम लीजिए। वह खुद राइटर हैं, खुद डायरेक्ट करते हैं। तो वो ज्यादा समझ पाते हैं, अगर वह खुद राइटर हैं तो।
और अगर आप फॉरेन में जाएं, तो फॉरेन में जितने बड़े राइटर हैं, स्टीवन स्पीलबर्ग, डेविड लीन वगैरह, सब राइटर थे, बहुत कामयाब हुए।
हमारे यहाँ परेशानी ये है कि जो डायरेक्टर है, वह राइटर है ही नहीं। आज आप साहित्यकार दिखाएं, जिसकी कहानी छपती हो बड़े-बड़े मैगजीनों में। ऐसा कोई राइटर नहीं मिलेगा आपको।
“अरे यार, वो फिल्म मार ले न।” डायरेक्टर ही बोलता है। तो ठीक है, उसी को मार लेते हैं। तो राइटर ही नहीं है। राइटर ही नहीं है, तो इसलिए उसका वर्चस्व भी नहीं है।
इसलिए आप देखिएगा, ज्यादातर डायरेक्टर, एडिटर और राइटर वही हो गए हैं। जब बाहर की फिल्में मारते हैं, तो उन्हें किसी राइटर की जरूरत क्या है? आप अपना ही नाम दे देते हैं और उसका पैसा ले लेते हैं प्रोड्यूसर से।
योगेश चक्रवर्ती: आपका बहुत शुक्रिया सर, हमसे बात करने के लिए। आपकी आने वाली पुस्तक बहुत कामयाब हो, लोग हाथों-हाथ लें, यही कामना करता हूं।
हाँ, हमारी ख्वाहिश है कि जिस तरह से हर घर में रामायण-महाभारत और गीता रहती है, उसी तरह वेद की पुस्तक भी हर घर में रहे। विडंबना ये है कि हिंदू लफ्ज तो दो सौ साल पहले आया। हिंदू जो धर्म मानते हैं, वो वैदिक धर्म है, लेकिन वैदिक धर्म मानने वाले लोगों के घरों में वेद ही नहीं है। ये कितनी बड़ी विडंबना है।
तो मैं चाहता हूं कि यहाँ के घरों में रामायण, महाभारत और गीता के साथ-साथ वेद की भी पुस्तक रहे। तो मेरा अरमान कहीं न कहीं से पूरा होगा।
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