अमरनाथ यात्रा आज यानी 3 जुलाई से शुरू हो रही है. यह यात्रा महज एक यात्रा नहीं, यह परम शिव से मिलने का एक सफर है. जो समुद्र तल से 13,000 फीट की ऊंचाई पर खतरनाक रास्तों से गुजरते हुए उसे परम शक्ति से एक मुलाकात है, जिसके लिए बूढ़े से लेकर बच्चे तक इस सफर पर उत्साह के साथ जाते हैं. यह यात्रा उनमें एक जज्बा और साहस पैदा करती है. जैसे ही शिव भक्तों का हुजूम बम बम भोले और जय बाबा बर्फानी के जयकारे के साथ घाटी में पहुंचता है. पूरी घाटी गुंजाएमान हो जाती है. यहां पहुंचते ही शिव भक्तों की सारी थकावट, सारा डर, सारा अहंकार पिघल कर खत्म हो जाता है. यहां पहुंचकर इंसान खुद को भूल जाता है और शिवमय हो जाता है. यहां आकर आप आध्यात्म के एक नए शिखर पर पहुंच जाते हैं. आइए आपको लेकर चलते हैं इस पवित्र अमरनाथ यात्रा पर जहां साक्षात शिवा बाबा बर्फानी के रूम में भक्तों को दर्शन देते हैं और उन पर कृपा बरसाते हैं.
भगवान शिव ने अमरनाथ गुफा में सुनाई थी अमर कथा
अमरनाथ की पवित्र गुफा एक दिव्य स्थान है, जहां भगवान भोले शंकर ने मां पार्वती को अमरत्व का परम रहस्य सुनाया था. यह रहस्य एक कथा के रूप में थी, इसलिए इसे अमर कथा भी कहा जाता है. इस गुफा में कथा सुनाए जाने की वजह से इस पवित्र गुफा को अमरनाथ गुफा कहा गया है. एक बार मां पार्वती ने भोले शंकर से जिज्ञासा में पूछा कि हे प्रभु आप अजर अमर हैं, लेकिन मुझे हर जन्म में नया शरीर धारण करना पड़ता है और इसके लिए कठिन तपस्या करनी पड़ती है. आपकी इस अमरता का रहस्य क्या है. पहले तो भगवान शिव ने मां पार्वती के इस सवाल को टालने की कोशिश की, लेकिन मां पार्वती के बार-बार कहने पर भगवान शिव सृष्टि के जन्म और मरण के रहस्य बताने को तैयार हो गए.

भगवान शिव चाहते थे कि जब वह मां पार्वती को यह कथा सुनाएं, उस वक्त पार्वती जी के अलावा ब्रह्मांड का कोई तीसरा जीव इसे ना सुन सके. इसलिए उन्होंने इस पवित्र गुफा को चुना और इसके लिए वह हिमालय की ओर चल दिए. कथा की गोपनीयता बनी रहे इसके लिए भगवान शिव ने रास्ते में अपनी हर सांसारिक और दैवीय चीजों का त्याग करना शुरू कर दिया. भगवान शिव इसी पारंपरिक रूट से पवित्र गुफा की ओर गए. इस दौरान पहलगाम में उन्होंने अपने वाहन नंदी को छोड़ा, चंदनवाड़ी में उन्होंने अपनी जटाओं से चंद्रमा को उतारा, शेषनाग झील पर उन्होंने अपने गले के सांपों को मुक्त कर दिया, महागुणस पर्वत पर उन्होंने अपने पुत्र गणेश को छोड़ दिया. पंचतरणी पर उन्होंने पांचों तत्वों का त्याग कर दिया. अंत में वह माता पार्वती के साथ इस पवित्र गुफा में पहुंचे. यहां उन्होंने गुफा के चारों ओर आग जला दी जिससे कि आग उस गुफा की पहरेदारी कर सके और इस आग की वजह से कोई जीव गुफा के अंदर प्रवेश न कर सके.
कथा सुनकर अमर हो गए कबूतरों के दो चूजे
जब भगवान शिव ने माता पार्वती को कथा सुनाना शुरू किया तो कथा सुनते-सुनते माता पार्वती गहरी नींद में सो गईं. लेकिन शिवजी अपनी धुन में कथा सुनाते रहे. उन्हें इस बात का एहसास नहीं हुआ की पार्वती जी सो गई हैं. दरअसल इस समय गुफा के अंदर दो कबूतरों के अंडे मौजूद थे जो इस कथा के प्रभाव से अपने तय वक्त से पहले फूट गए और उसे दो चूजे बाहर निकल आए. इन चूजों ने वह कथा सुन ली. यह चूजे कथा के दौरान हूं-हूं की आवाज कर रहे थे. इसलिए शिवजी को लगा की पार्वती जी जाग रही हैं और कथा सुन रही हैं.

क्या हुआ, जब कथा समाप्त हुई?
जब कथा समाप्त हुई तो भगवान शिव ने देखा की माता पार्वती तो सो रही हैं. उन्हें हैरानी हुई कि अगर वो सो रही हैं तो कथा के बीच में हूं-हूं कौन कर रहा था. जब उनकी नजर कबूतरों के चूजों पर पड़ी तो वह नाराज हो गए उन्होंने उन चूजों को मारने के लिए अपना त्रिशूल उठा लिया. इस पर कबूतरों ने हाथ जोड़कर शिवजी से कहा- हे भोले शंकर, हमने कथा सुन ली है यदि आप हमें मार देंगे तो आपकी कथा झूठी हो जाएगी, क्योंकि इसे सुनने वाला अमर हो जाता है. उनकी इस बात से भगवान शिव का गुस्सा शांत हो गया. उन्होंने उन चूजों को आशीर्वाद दिया कि वो हमेशा के लिए इस गुफा में साक्षात शिव और पार्वती के प्रतीक के रूप में निवास करेंगे. ऐसा कहा जाता है कि हजारों साल बाद भी इतने कम तापमान में बर्फ से ढकी हुई उस गुफा में कबूतरों का जोड़ा अक्सर दिख जाता है.
अमरनाथ यात्रा के रूट
अमरनाथ यात्रा के लिए दो रूट इस्तेमाल किए जाते हैं. पहला रूट जिसे पारंपरिक (पुराना) रूट भी कहा जाता है, वो है – पहलगाम, चंदनवारी, पिस्सू टॉप, नागाकोटी, शेषनाग, पंचतरणी संगम से होते हुए पवित्र गुफा. यह रूट 48 किलोमीटर लंबा लेकिन आसान है. जो अनंतनाग जिले के नुनवान-पहलगाम से शुरू होता है. इस रूट में तीन से पांच दिन का वक्त लगता है. लेकिन अगर आप कम वक्त में यात्रा पूरी करना चाहते हैं तो आपके लिए दूसरा रूट यानी बालटाल रूट सही रहेगा. सिर्फ 14 किलोमीटर लंबे इस रूट की बात करें तो इस रूट से यात्रा एक से दो दिन में ही पूरी हो सकती है. हालांकि इस रूट में चढ़ाई थोड़ी कठिन है.

अद्भुत पवित्र शिवलिंग
अमरनाथ गुफा में प्राकृतिक रूप से बर्फ का शिवलिंग निर्मित होता है. यहां बर्फ का पानी टपकने की वजह से करीब दस फुट लंबे बर्फीले शिवलिंग का निर्माण होता है. इसलिए इसे स्वयंभू हिमानी शिवलिंग भी कहा जाता है. खास बात ये कि यह शिवलिंग चंद्रमा के आकार के बढ़ने पर बढ़ता है और चंद्रमा के आकार के घटने पर शिवलिंग भी घटता है. सावन महीने की पूर्णिमा को यह शिवलिंग अपने पूर्ण रूप में आ जाता है. इसके बाद अमावस्या तक इसका आकार घटता जाता है. यही वजह है कि यह यात्रा आषाढ़ पूर्णिमा से आरम्भ हो कर पूरे सावन महीने तक चलते हुए रक्षाबंधन के दिन समाप्त होती है.
अमरनाथ गुफा के बारे में आम लोगों को कैसे पता चला?
छठी शताब्दी में लिखे गए नीलमत पुराण और तमाम प्राचीन पुस्तकों में अमरनाथ यात्रा का जिक्र मिलता है. हालांकि कुछ लोग ऐसा बेतुका दावा करते हैं कि साल 1850 में बूटा मलिक नाम के एक मुस्लिम गड़रिए ने अमरनाथ गुफा की खोज की थी. लेकिन जब छठी शताब्दी में लिखे नीलमत पुराण में इसका जिक्र है, ये वो वक्त है, जब इस्लाम इस धरती पर नहीं था. कल्हण की राजतरंगिणी में भी कश्मीर के राजा का अमरनाथ गुफा में शिवलिंग की पूजा का उल्लेख मिलता है.

यात्रा में केबल कार चलाने की तैयारी
अमरनाथ यात्रा को आसान और सुगम बनाने के लिए केबल कार चलाने की तैयारी हो रही है. बालटाल से संगम टॉप के बीच में ये केबल कार साल 2029 से चलनी शुरू हो जाएगी. इससे करीब सात घंटे का सफर कम होगा. इस दुरी को केबल कार के जरिए करीब आधे घंटे में पूरा किया जा सकेगा. केबल कार चलने से दूसरे मौसम में भी यहां तक आसानी से जाया जा सकेगा.
अमरनाथ यात्रा पर आतंकी हमले
अमरनाथ यात्रा हमेशा से आतंकवादियों के निशाने पर रही है. कश्मीर में दहशत फैलाने और सनातन संस्कृति पर हमला करने के मकसद से इस यात्रा में आए तीर्थयात्रियों को निशाना बनाया जाता रहा है. आइए जानते हैं कि इस्लामी आतंकवादियों ने इस यात्रा को कब-कब निशाना बनाया और बेगुनाह तीर्थयात्रियों को कितनी बेद्दी से मार दिया.
- 2 अगस्त, 2000 में अनंतनाग और डोडा जिले में अमरनाथ यात्रा पर आतंकी हमला हुआ. इसमें 105 निहत्थे लोग मारे गए.
- 20 जुलाई, 2001 को अमरनाथ तीर्थयात्रा पर हमला हुआ. कैंप पर ग्रेनेड अटैक और गोलाबारी में 13 लोग मारे गए.
- 2002 में तीर्थयात्रा पर नुनवान बेस कैंप पर हुए आतंकी हमले में 11 लोगों की मौत हुई.
- 2005 में तीर्थयात्रा पर हुए आतंकी हमले में 5 लोग घायल हुए.
- 10 जुलाई, 2017 को अनंतनाग जिले में तीर्थयात्रियों की बस पर हुए आतंकी हमले में सात तीर्थयात्री मारे गए. इस हमले की जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा ने ली थी.
इस बार भी हमले की आशंका
इस बार भी ऐसी खबरें हैं कि गुलाम कश्मीर में किस्तान के खिलाफ बन रहे माहौल से लोगों का ध्यान हटाने के लिए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने अमरनाथ तीर्थ यात्रा के दौरान किसी बड़े आतंकी घटना को अंजाम देने का प्लान बनाया है. इस संभावित खतरे की आशंका को देखते हुए भारतीय खुफिया एजेंसियां और सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट पर हैं. यात्रा के दौरान तीर्थ यात्रिओं की सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था की जा रही है. आधुनिक तकनीक के जरिए भी सुरक्षा को और मजबूत किया गया है, जिससे कि किसी भी बड़ी आतंकी घटना को अंजाम देने से रोका जा सके.

क्या 14वीं शताब्दी के बाद अमरनाथ यात्रा बंद हो गई थी?
14वीं और 15वीं शताब्दी में इस्लामी शासकों के आने और यहां से हिंदुओं के पलायन की वजह से यात्रा की भव्यता समाप्त हो गई थी. इस वजह से यात्रा में बाहरी राज्यों से लोगों का आना बंद हो गया था. लेकिन स्थानीय स्तर पर यह बेहद गुप्त या बाधित रूप से चलती रही. इसलिए हम ऐसा नहीं कह सकते कि यह यात्रा बंद हो गई थी. यह यात्रा कभी भी पूरी तरह से बंद नहीं हुई. 1872 के बाद कश्मीर के डोगरा राजाओं और प्रशासन के सहयोग से इसे आधुनिक स्वरूप मिला यानी 19वीं सदी के उत्तरार्ध में दोबारा से यह यात्रा व्यवस्थित रूप से शुरू हुई.
