नई दिल्ली। NEET प्रदर्शन के दौरान जंतर-मंतर पर दिल्ली पुलिस की ओर से कथित लाठीचार्ज की जांच की मांग वाली जनहित याचिका को दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ ने कहा कि केवल मीडिया रिपोर्टों में किए गए दावों के आधार पर इस तरह की PIL पर विचार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने याचिका में कोई जनहित नहीं पाया।
याचिका नितिन नरेश ने दायर की थी, जिन्होंने खुद को मीडिया समुदाय से जुड़ा बताया। याचिका में कहा गया था कि कुछ मीडिया रिपोर्टों में NEET प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज का दावा किया गया, जबकि दिल्ली पुलिस ने इससे इनकार किया। इसी कथित विरोधाभास की तथ्यात्मक जांच कराने की मांग की गई थी।
हाईकोर्ट ने पूछा- आधिकारिक बयानों में विरोधाभास कहां है?
सुनवाई के दौरान पीठ ने सवाल किया कि क्या दिल्ली पुलिस और केंद्रीय पुलिस बलों के आधिकारिक बयानों में वास्तव में कोई विरोधाभास है। कोर्ट ने यह भी कहा कि मीडिया रिपोर्ट अपने आप में साक्ष्य नहीं हैं।
पीठ ने PIL के जरिए इस तरह के मामलों को उठाने पर भी आपत्ति जताई और कहा कि हर मामले को जनहित याचिका के रूप में अदालत के सामने नहीं लाया जा सकता। इसके बाद याचिका खारिज कर दी गई।
याचिकाकर्ता ने क्या मांग की थी?
नितिन नरेश की याचिका में NEET प्रदर्शन में कथित लाठीचार्ज के संबंध में फैक्ट-फाइंडिंग जांच की मांग की गई थी। याचिका का आधार यह था कि घटना को लेकर मीडिया रिपोर्टों और पुलिस के रुख में अंतर बताया जा रहा है।
याचिकाकर्ता चाहते थे कि संबंधित अधिकारियों को इस विरोधाभास पर स्थिति स्पष्ट करने और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर तथ्य सामने लाने का निर्देश दिया जाए। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस आधार पर PIL पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
20 जुलाई के प्रदर्शन में क्या हुआ था?
यह मामला 20 जुलाई 2026 के जंतर-मंतर से संसद की ओर प्रस्तावित ‘संसद चलो’ मार्च से जुड़ा है, जिसे Cockroach Janta Party (CJP) ने NEET पेपर लीक के मुद्दे पर आयोजित किया था।
उस NEET प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों की ओर से हुई कथित हिंसा को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए थे। बाद में इन घटनाओं के विभिन्न पहलुओं की जांच का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के सामने भी पहुंचा।सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही बना दी है पांच सदस्यीय कमेटी
इसी व्यापक घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त में पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड इंक्वायरी कमेटी (HPEC) गठित की थी। कमेटी की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी को सौंपी गई है।
कमेटी में:
- पूर्व पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रवि शंकर झा
- दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व जज जस्टिस शालिंदर कौर
- पूर्व CBI निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला
- पूर्व मेघालय DGP एलआर बिश्नोई
शामिल हैं। कमेटी को NEET प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई और पुलिसकर्मियों के खिलाफ हुई कथित हिंसा समेत घटनाक्रम के विभिन्न पहलुओं की जांच के लिए बनाया गया है।
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का मतलब क्या है?
दिल्ली हाईकोर्ट के बुधवार के आदेश का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने लाठीचार्ज के आरोप को सही या गलत ठहरा दिया है। अदालत ने इस PIL को इस आधार पर स्वीकार नहीं किया कि मीडिया रिपोर्टों में मौजूद विरोधाभास अपने आप में जनहित याचिका के जरिए जांच शुरू करने का पर्याप्त आधार नहीं है।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित हाई-पावर्ड कमेटी का दायरा इससे व्यापक है। इसलिए जंतर-मंतर NEET प्रदर्शन से जुड़े पुलिस कार्रवाई के सवाल पर आगे की तस्वीर उस जांच और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष होने वाली कार्यवाही से भी सामने आ सकती है।
H2: एक ही घटनाक्रम पर दो अदालतों में अलग तस्वीर
इस मामले का अहम पहलू यही है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने एक विशिष्ट PIL को खारिज किया है, जबकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही पूरे प्रदर्शन से जुड़े पुलिस कार्रवाई और अन्य पहलुओं की तथ्य-जांच के लिए कमेटी बना चुका है।
इसलिए हाईकोर्ट का आज का फैसला पूरे जंतर-मंतर प्रदर्शन या उसमें पुलिस कार्रवाई पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। यह फैसला विशेष रूप से नितिन नरेश की PIL और उसमें मांगी गई फैक्ट-फाइंडिंग जांच से संबंधित है।
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