कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा प्राचीन ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ को लेकर दी गई तीखी टिप्पणी ने एक बार फिर देश का राजनीतिक पारा चढ़ा दिया है। मनुस्मृति की आलोचना के बहाने छिड़ी इस नई बहस ने भारतीय जनता पार्टी और हिंदूवादी संगठनों को राहुल गांधी के खिलाफ मोर्चा खोलने का एक और मौक़ा दे दिया है। सत्ता पक्ष और आलोचकों का साफ कहना है कि यह केवल एक ग्रंथ पर टिप्पणी नहीं, बल्कि बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक और सनातन चेतना को कटघरे में खड़ा करने का एक और सुविचारित या अनजाने में किया गया प्रयास है। हर बार उनके शब्दों का चयन और पेश करने का तरीका जाने-अनजाने में बहुसंख्यक हिंदू समाज की भावनाओं को आहत करता हुआ प्रतीत होता है। यही वजह है कि उनकी राजनीतिक यात्रा में ऐसे बयान न केवल उनकी अपनी पार्टी के लिए रक्षात्मक स्थिति पैदा करते हैं, बल्कि विरोधी दलों को एक मजबूत वैचारिक और चुनावी हथियार भी थमा देते हैं।
दूसरे धर्मों की कमियां नजर क्यों नहीं आती हैं?
यह पहला मौका नहीं है जब राहुल गांधी के बोल हिंदू मान्यताओं या सनातनी परंपराओं के खिलाफ देखे जा रहे हों; इससे पहले भी ‘हिंदुत्ववादियों’, ‘शक्ति’ की उपासना और पूजा-पद्धति को लेकर दिए गए उनके बयान विवादों की वजह बन चुके हैं। विपक्ष और विशेषकर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी राहुल गांधी के इन बयानों को तत्काल भुनाने में देर नहीं लगाती और उन्हें ‘हिंदू विरोधी’ साबित करने की रणनीति पर आक्रामक हो जाती है। समस्या यह है कि राहुल गांधी बार-बार ऐसी बातें क्यों करते हैं. सार्वजनिक बयानबाजी में गलती एक बार हो सकती है, दो बार हो सकती है, लेकिन बार-बार वही गलती दोहराने का मतलब है कि ये गलती जानबूझकर की जा रही है. उनके विरोधियों का कहना है कि अगर राहुल गांधी की मंशा साफ है और वो सच में सामाजिक न्याय के प्रति चिंतित हैं तो उन्हें दूसरे धर्मों की रूढ़ियां और कमियां क्यों नजर नहीं आती हैं, वो उन मुद्दों पर बात क्यों नहीं करते. जाहिर है विपक्ष के सवाल गलत नहीं हैं. ऐसे में उन पर सवाल उठता है कि वो अपने कोर वोटर (मुस्लिम मतदाताओं) को लुभाने के लिए ऐसे बयान देते हैं. वो ट्रिपल तलाक, पर्दा प्रथा, शाहबानो केस, पर्सनल लॉ पर खामोशी ओढ़ लेते हैं. जाहिर है, ये सवाल राजनीतिक रूप से बेहद अहम हैं। यही वजह है कि विरोधी आरोप लगाते हैं कि अपने कोर मुस्लिम वोट बैंक को साधे रखने के लिए कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व बहुसंख्यक समाज की आस्था और परंपराओं को निशाना बनाता है, जबकि अन्य सामाजिक सुधारों पर खामोशी ओढ़ लेता है।”

आइए राहुल गांधी के उन पिछले बयानों पर नजर डालते हैं, जिसमें उन्होंने सनातन धर्म के लोगों को आहत करने वाली बातें कहीं।
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“जो खुद को हिंदू कहते हैं, वे हिंसा करते हैं”
जुलाई 2024 में 18वीं लोकसभा के पहले सत्र के दौरान, सदन में नेता प्रतिपक्ष के रूप में अपने पहले संबोधन में राहुल गांधी ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर तीखा हमला बोला। भगवान शिव की तस्वीर और धार्मिक प्रतीकों का हवाला देते हुए राहुल गांधी ने सत्ता पक्ष की ओर इशारा करते हुए कहा था: “जो लोग खुद को हिंदू कहते हैं, वे 24 घंटे हिंसा, नफरत और असत्य की बात करते हैं। आप हिंदू हो ही नहीं। हिंदू धर्म में साफ लिखा है कि सत्य के साथ खड़े होना चाहिए और हिंसा नहीं करनी चाहिए।” उनके इस बयान के आते ही संसद में भारी हंगामा शुरू हो गया और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि पूरे हिंदू समाज को हिंसक कहना एक अत्यंत गंभीर विषय है। बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं ने राहुल गांधी से तुरंत बिना शर्त माफी मांगने की मांग की और आरोप लगाया कि कांग्रेस नेता ने देश के करोड़ों हिंदुओं और सनातन परंपरा का अपमान किया है।
इस मसले पर कांग्रेस पार्टी ने सफाई में कहा कि राहुल गांधी ने कहा कि उन्होंने यह बात पूरे हिंदू समाज के लिए नहीं, बल्कि बीजेपी, आरएसएस और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति के संदर्भ में कही थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि “बीजेपी या आरएसएस पूरा हिंदू समाज नहीं हैं, और न ही उनके पास हिंदू धर्म का एकाधिकार है।” कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ताओं और नेताओं ने भी सफाई देते हुए कहा कि सत्ता पक्ष ने राहुल गांधी के बयान के एक छोटे हिस्से (क्लिप) को संदर्भ से अलग करके पेश किया, जबकि उनका मकसद हिंदू धर्म की अहिंसक और समावेशी सोच की आड़ में नफरत फैलाने वाली बीजेपी की विचारधारा पर हमला करना था, न कि आम हिंदू श्रद्धालुओं को हिंसक बताना।
“हिंदुत्ववादी” बनाम “हिंदू” और “हिंदुत्ववादियों को सत्ता से बाहर करो”
दिसंबर 2021 में जयपुर में आयोजित कांग्रेस की एक विशाल रैली में राहुल गांधी ने ‘हिंदू’ और ‘हिंदुत्ववादी’ के बीच अंतर बताते हुए एक नया राजनीतिक विवाद छेड़ दिया था। उन्होंने कहा था, “भारत की राजनीति में दो शब्दों की टक्कर है-एक शब्द है ‘हिंदू’ और दूसरा ‘हिंदुत्ववादी’। ये दोनों एक शब्द नहीं हैं, इनका मतलब अलग है। मैं हिंदू हूँ, लेकिन हिंदुत्ववादी नहीं हूँ। महात्मा गांधी हिंदू थे, जबकि नाथूराम गोडसे हिंदुत्ववादी था।” राहुल गांधी ने आगे तर्क दिया कि हिंदू हमेशा सत्य की खोज (सत्याग्रह) में रहता है, जबकि हिंदुत्ववादी सिर्फ सत्ता (सत्ताग्रह) पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है और नफ़रत फैलाता है। उन्होंने मंच से आह्वान करते हुए कहा था कि देश में हिंदुत्ववादियों का राज खत्म करके ‘हिंदुओं का राज’ वापस लाना होगा और हिंदुत्ववादियों को सत्ता से बाहर करना होगा।

राहुल गांधी के इस बयान पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने तीखा पलटवार किया। बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी हिंदू धर्म और उसकी अंतर्निहित विचारधारा ‘हिंदुत्व’ के बीच काल्पनिक विभाजन पैदा करके बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को आहत कर रहे हैं। बीजेपी का तर्क था कि राहुल गांधी और कांग्रेस असल में सनातन संस्कृति और हिंदू राष्ट्रवाद को नीचा दिखाने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं, विवाद बढ़ने पर कांग्रेस पार्टी ने सफाई देते हुए कहा कि राहुल गांधी ने हिंदू धर्म की मूल भावना का कोई अपमान नहीं किया है, बल्कि उन्होंने उस ‘राजनीतिक हिंदुत्व’ पर प्रहार किया है जो धर्म का इस्तेमाल सत्ता पाने और समाज को बांटने के लिए करता है। कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि पार्टी स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी के समावेशी हिंदू धर्म के साथ खड़ी है, जो शांति और सहिष्णुता सिखाता है, न कि बीजेपी के हिंसक व नफरत फैलाने वाले राजनीतिक एजेंडे के साथ।
“मंदिर जाने वाले लोग लड़कियों को छेड़ते हैं”
वर्ष 2014 में महाराष्ट्र के वर्धा में एक रैली के दौरान दिए गए राहुल गांधी के एक बयान ने बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया था। भाषण के दौरान आरएसएस और बीजेपी की मानसिकता पर निशाना साधते हुए राहुल गांधी ने कहा था: “जो लोग मंदिर जाते हैं, देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, वे ही महिलाओं का सम्मान नहीं करते और बसों में लड़कियों को छेड़ते हैं।” उनके इस बयान का वीडियो सामने आते ही देशभर के धार्मिक संगठनों और विपक्षी दलों में भारी आक्रोश फैल गया।
भारतीय जनता पार्टी (BJP) और हिंदू संगठनों ने इस बयान पर तीखा हमला बोलते हुए इसे मंदिर जाने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का घोर अपमान बताया। बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने अपराध और महिलाओं के उत्पीड़न को सीधे तौर पर हिंदू पूजा-पद्धति और मंदिरों से जोड़कर बहुसंख्यक समाज की छवि को धूमिल करने की कोशिश की है। विपक्ष का कहना था कि महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वाले अपराधियों का कोई धर्म या आस्था नहीं होती, लेकिन राहुल गांधी ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए मंदिर जाने वाले आम नागरिकों को कठघरे में खड़ा कर दिया।

“हिंदू धर्म में एक शब्द है ‘शक्ति’…हम उस ‘शक्ति’ के खिलाफ लड़ रहे हैं”
मार्च 2024 में मुंबई के ऐतिहासिक शिवाजी पार्क में ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के समापन अवसर पर एक जनसभा को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा था: “हिंदू धर्म में एक शब्द है ‘शक्ति’। हम उस ‘शक्ति’ के खिलाफ लड़ रहे हैं। सवाल यह है कि वह ‘शक्ति’ क्या है? राजा की आत्मा ईवीएम (EVM) में है, देश की ईडी (ED), सीबीआई (CBI) और आयकर विभाग जैसी संस्थाओं में है।” उनके इस बयान का वीडियो सामने आते ही चुनावी माहौल में बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया। भारतीय जनता पार्टी और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी के इस बयान पर हमला बोलते हुए इसे सीधे तौर पर हिंदू आस्था और नारी शक्ति पर हमला करार दिया। पीएम मोदी ने चुनावी रैलियों में पलटवार करते हुए कहा कि “हिंदू धर्म में ‘शक्ति’ का अर्थ माँ दुर्गा, माँ काली और देश की नारी शक्ति से है। हम शक्ति के उपासक हैं और विरोधी गठबंधन इस शक्ति को खत्म करने की बात कर रहा है।” बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि कांग्रेस और उसका ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन बहुसंख्यक समाज की धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का लगातार अपमान कर रहा है।
विवाद गहराने के बाद राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी ने सोशल मीडिया तथा प्रेस कॉन्फ्रेंस के ज़रिए स्थिति साफ की। राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री उनके बयान को संदर्भ से भटका रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि “जिस ‘शक्ति’ का मैंने उल्लेख किया, वह कोई धार्मिक शक्ति नहीं है, बल्कि वह अधर्म, भ्रष्टाचार, अन्यायी सत्ता और संस्थाओं पर काबिज तानाशाही व्यवस्था का प्रतीक है।” उन्होंने कहा कि उनका मुकाबला उस असुरी राजनीतिक ताकत (Might of the State) से है जिसके मुखौटा खुद नरेंद्र मोदी हैं, न कि किसी धार्मिक अवधारणा से।
“आरएसएस के मंदिर” और “बोगस हिंदू” बयान पर विवाद
सितंबर 2021 में अखिल भारतीय महिला कांग्रेस के स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा पर तीखा हमला बोला था। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी और आरएसएस राजनीतिक फायदों के लिए धर्म का इस्तेमाल करते हैं। राहुल गांधी ने कहा: “ये किस प्रकार के हिंदू हैं? ये झूठे हिंदू (बोगस हिंदू) हैं। ये हिंदू धर्म का प्रयोग करते हैं, ये धर्म की दलाली करते हैं, मगर ये हिंदू नहीं हैं।” उन्होंने यह तर्क भी दिया कि यदि आरएसएस की विचारधारा वास्तव में हिंदू धर्म और अहिंसा को मानती, तो महात्मा गांधी-जिन्होंने हिंदू धर्म के सार को सबसे बेहतर समझा था-की हत्या क्यों की जाती? इसके अलावा, उन्होंने संघ की कार्यशैली पर निशाना साधते हुए कहा था कि उनकी विचारधारा में महिलाओं के लिए स्थान नहीं है और वे संस्थानों को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं।

राहुल गांधी के इस बयान पर बीजेपी ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। बीजेपी नेताओं और प्रवक्ताओं ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी लगातार बहुसंख्यक समाज की धार्मिक आस्थाओं को नीचा दिखाने का प्रयास करती है और हिंदू धर्म के अनुयायियों को ‘फर्जी’ या ‘बोगस’ कहकर उनका अपमान करती है। बीजेपी का कहना था कि राहुल गांधी के पास किसी की आस्था या हिंदू होने का प्रमाण-पत्र देने का अधिकार नहीं है। विवाद बढ़ने पर कांग्रेस पार्टी ने सफाई में कहा कि राहुल गांधी का प्रहार सामान्य हिंदू समाज या सनातनी श्रद्धालुओं पर बिल्कुल नहीं था, बल्कि वे उस राजनीतिक हिंदुत्व पर सवाल उठा रहे थे जो धर्म का सहारा लेकर नफ़रत फैलाने और चुनावी फायदा उठाने का काम करता है। कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि पार्टी महात्मा गांधी के समावेशी, सत्य और अहिंसा पर आधारित हिंदू धर्म में विश्वास रखती है, न कि राजनीतिक स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले आक्रामक रूप में।
‘मनुस्मृति की बेड़ियों’ पर बयान और उस पर मचा बवाल
हाल ही में महाराष्ट्र के पुणे में छात्रों के संवाद कार्यक्रम में कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्राचीन ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ को कोट करते हुए तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा था: “मनुस्मृति स्पष्ट रूप से कहती है कि एक महिला को जीवन के किसी भी पड़ाव पर स्वतंत्र नहीं होना चाहिए-बचपन में पिता के, युवावस्था में पति के और वृद्धावस्था में बेटों के अधीन रहना चाहिए। ये शब्द एक कलंक हैं और महिलाओं को ऐसी व्यवस्था तथा पितृसत्ता (Patriarchy) को पूरी तरह उखाड़ फेंकना चाहिए।” राहुल गांधी ने कहा कि देश की महिलाएं किसी की संपत्ति या पहचान की मोहताज नहीं हैं, वे स्वयं की मालिक हैं। उनके इस बयान के आते ही राजनीति और धार्मिक गलियारों में एक नया विवाद छिड़ गया। पुणे में राहुल गांधी का पूरा बयान
राहुल गांधी के इस बयान पर भाजपा के शीर्ष नेताओं, मुख्यमंत्रियों और साधु-संतों ने चौतरफा हमला बोला। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पलटवार करते हुए कहा कि “राहुल गांधी देश की सनातन परंपरा और भारत की सांस्कृतिक विरासत को कोसना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं।” वहीं असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और सांसद निशिकांत दुबे ने कहा कि राहुल गांधी महिला सशक्तिकरण की आड़ में केवल हिंदू धर्म को नीचा दिखाने का काम कर रहे हैं। भाजपा नेताओं ने चुनौती देते हुए सवाल उठाया कि जो राहुल गांधी मनुस्मृति पर बयानबाजी करते हैं, वे शरिया कानून या अन्य धार्मिक कुरीतियों में महिलाओं के अधिकारों और उनके खिलाफ होने वाले भेदभाव पर इतनी ही बेबाकी से मुंह क्यों नहीं खोलते?
विवाद बढ़ता देख कांग्रेस पार्टी ने इस पर अपनी स्थिति साफ की। पार्टी ने कहा कि राहुल गांधी का मकसद किसी धर्म या आस्था पर हमला करना नहीं, बल्कि सदियों पुरानी पुरुषवादी सोच, सामाजिक असमानता और संविधान निर्माता डॉ. बी.आर. आंबेडकर द्वारा खारिज की गई मनुवादी मानसिकता को चुनौती देना था। कांग्रेस प्रवक्ताओं का कहना था कि राहुल गांधी बाबा साहब आंबेडकर की उस सोच के साथ खड़े हैं जो महिलाओं को पूर्ण स्वतंत्रता, समानता और अधिकार देने की वकालत करती है। पार्टी के अनुसार, भाजपा इस गंभीर मुद्दे को संदर्भ से भटकाकर और धार्मिक रंग देकर मूल समस्याओं (जैसे महिलाओं की सुरक्षा और समानता) से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है।
2014 में हिंदू मतदाताओं ने सबक सिखाया?
बहुसंख्यक हिंदू समाज में बढ़ती इस नाराजगी और असंतोष का प्रमाण केवल विरोधी दलों के आरोपों में ही नहीं, बल्कि खुद कांग्रेस की अपनी अंदरूनी रिपोर्टों में भी मिलता है। 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली ऐतिहासिक हार के कारणों की समीक्षा के लिए गठित वरिष्ठ नेता ए.के. एंटनी समिति ने अपनी आधिकारिक रिपोर्ट में साफ तौर पर रेखांकित किया था कि पार्टी की छवि जनता के बीच ‘अल्पसंख्यक परस्त’ और ‘हिंदू-विरोधी’ बन गई है। रिपोर्ट में माना गया था कि कांग्रेस अपनी धर्मनिरपेक्षता की नीति को सही ढंग से पेश करने में नाकाम रही, जिससे बहुसंख्यक हिंदू मतदाताओं में यह संदेश गया कि उनके हितों की अनदेखी की जा रही है।
एंटनी समिति का यह निष्कर्ष इस बात की चेतावनी था कि धार्मिक आस्थाओं से दूरी और रणनीतिक चूक पार्टी को जन-जनाधार से अलग कर सकती है। इसके बावजूद, यदि सार्वजनिक मंचों पर इस तरह की बयानबाजी का सिलसिला जारी रहता है, तो यह दर्शाता है कि पार्टी ने अपनी ही कमियों और ऐतिहासिक समीक्षाओं से कोई सबक नहीं लिया है।

कांग्रेस के वो फैसले जब उस पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगे
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर विपक्षी दलों द्वारा लंबे समय से राजनीतिक लाभ और वोट बैंक के लिए ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ करने के आरोप लगते रहे हैं। इसके प्रमुख ऐतिहासिक उदाहरणों में 1937 में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के विरोध के बाद ‘वंदे मातरम’ के केवल शुरुआती दो अंतरों को स्वीकार करना और 1986 का शाह बानो मामला शामिल है, जहाँ सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संसद में कानून पास किया गया था। इसके अलावा, सलमान रुश्दी की पुस्तक ‘द सैटेनिक वर्सेज’ पर बैन लगाने का निर्णय, सच्चर कमेटी की सिफारिशें और केरल में ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ (IUML) के साथ कांग्रेस का दीर्घकालिक राजनीतिक गठबंधन ऐसे प्रमुख मुद्दे रहे हैं, जिनके आधार पर आलोचक पार्टी पर तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगाते हैं।
इसके विपरीत, कांग्रेस पार्टी इन आरोपों को पूरी तरह से खारिज करती आई है और उसका मानना है कि उसकी नीतियां तुष्टिकरण नहीं, बल्कि भारत के ‘सर्वधर्म समभाव’ और संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर आधारित हैं। पार्टी के अनुसार, 1937 में राष्ट्रगीत के पहले दो अंतरों को स्वीकार करने का निर्णय स्वतंत्रता संग्राम में सभी समुदायों की एकजुटता बनाए रखने के उद्देश्य से लिया गया था। कांग्रेस का रुख रहा है कि देश की विविधता, सामाजिक समरसता और अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों व सुरक्षा के लिए उठाए गए कदमों को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय राष्ट्रीय अखंडता के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
लोकतंत्र में विचारों का मतभेद और वैचारिक असहमति एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन जब राजनीति का केंद्र किसी वर्ग की गहरी धार्मिक आस्थाओं, मान्यताओं और परंपराओं को आहत करने लगे, तो यह एक गंभीर चिंता का विषय बन जाता है। राहुल गांधी भले ही खुद को समावेशी राजनीति और वैचारिक लड़ाई का पक्षधर बताते हों, लेकिन उनके बयानों से उपजा विवाद यह स्पष्ट करता है कि उनके शब्दों का चयन अक्सर बहुसंख्यक समाज के भीतर असुरक्षा और असंतोष का भाव पैदा करता है।
सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदार नेतृत्व की यह पहली शर्त होनी चाहिए कि वह सामाजिक न्याय और सुधारों की बात करते समय किसी एक धर्म या परंपरा को एकतरफा निशाना न बनाए। विपक्ष द्वारा इन बयानों को बार-बार राजनीतिक मुद्दा बनाने और जनता के बीच इसका असर दिखने से यह साफ है कि कांग्रेस पार्टी को भी इसका बड़ा राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ता है। ऐसे में, यदि राहुल गांधी सचमुच देश में भाईचारे और समरसता की बात करना चाहते हैं, तो उन्हें बहुसंख्यक हिंदू समाज की धार्मिक आस्थाओं, प्रतीकों और सनातन परंपराओं के प्रति संवेदनशीलता और सम्मान का भाव प्रदर्शित करना होगा। एक राष्ट्रीय नेता के रूप में उन्हें यह समझना होगा कि सुधार की भाषा हमेशा सर्वसमावेशी होनी चाहिए, न कि किसी एक वर्ग को आहत करने वाली।
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