वंदे मातरम् विवाद को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच सियासी टकराव लगातार बढ़ता जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस पर हमलावर है। इस विवाद की शुरुआत 15 अगस्त को दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान शुरू हुआ था। कांग्रेस पर आरोप लग रहा है कि इस समारोह के दौरान पूरा वंदे मातरम गाए जाने पर सोनिया गांधी ने उसे पूरा गाने से रोकने की कोशिश की। क्योंकि दो से अधिक अंतरे गाए जाने लगे थे। भाजपा ने आरोप लगाया कि सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने गाना रोकने का इशारा किया। इसका वीडियो भी सामने आया है। भाजपा ने इसे राष्ट्रगीत का अपमान बताया, जबकि कांग्रेस ने इसे महज एक सामान्य बातचीत कहा। कांग्रेस का कहना है कि सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी मांग रही थीं, क्योंकि वो काफी देर से खड़े थे।
कुल मिला कर यह विवाद पूरे 6 अंतरों वाले राष्ट्रगीत के नए कानूनी स्वरूप और 1937 से चले आ रहे केवल 2 अंतरों को गाने के पारंपरिक राजनीतिक स्टैंड के बीच की खींचतान के कारण गरमाया हुआ है। हाल ही में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2026 पारित किया। इसके तहत ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान ही कानूनी संरक्षण दिया गया है। अब राष्ट्रगीत के गायन में बाधा डालने या इसका अपमान करने पर 3 साल तक की जेल या जुर्माने का प्रावधान है। बढ़ते विवाद के बीच कांग्रेस कार्य समिति (CWC) ने आधिकारिक निर्णय लिया कि पार्टी के आयोजनों में ‘वंदे मातरम’ के केवल शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाएंगे। कांग्रेस का तर्क है कि वह 1937 में महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल द्वारा लिए गए फैसले का पालन कर रही है, जिसमें सर्वधर्म समभाव और विविधता का ध्यान रखते हुए केवल शुरुआती दो छंदों को राष्ट्रीय आयोजनों के लिए उपयुक्त माना गया था।
वंदे मातरम् का पूरा इतिहास पढ़ें

गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा नेताओं ने कांग्रेस के इस फैसले को ‘राष्ट्रविरोधी’ और संसद द्वारा बनाए गए 2026 के नए कानून की अवहेलना बताया है। गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में कांग्रेस कार्य समिति (CWC) द्वारा अपने कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम’ के केवल शुरुआती दो अंतरों को ही गाने के फैसले पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कांग्रेस के इस कदम को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित इस पवित्र राष्ट्रगीत और स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग का घोर अपमान बताया। शाह ने आरोप लगाया कि कांग्रेस आज भी तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति के तहत राष्ट्रगीत को खंडित करने का काम कर रही है, जो कि संसद द्वारा हाल ही में पारित राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2026 की भावना के भी खिलाफ है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस इस पवित्र गीत और स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान का अपमान कर रही है।
वंदे मातरम् विवाद कांग्रेस का तुष्टिकरण या सियासी मजबूरी?
गौर करने वाली बात यह भी है कि हाल ही में कांग्रेस शासित राज्यों में आयोजित स्वतंत्रता दिवस के सरकारी समारोहों में ‘वंदे मातरम’ का संपूर्ण गायन किया गया था। भारतीय जनता पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस आज भी अपने वोट बैंक और केरल में अपनी सहयोगी ‘मुस्लिम लीग’ (IUML) के दबाव में आकर ‘वंदे मातरम’ को उसके पूर्ण स्वरूप में स्वीकार करने से कतराती है। भाजपा का कहना है कि 1937 में नेहरू ने जिन्ना की मुस्लिम लीग के दबाव में फैसला लिया था और आज की कांग्रेस केरल में IUML के दबाव में वही रुख अपना रही है। केरल की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) भी कई बार इस मुद्दे पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच के राजनीतिक समीकरणों को लेकर UDF को घेरती रही है। बता दें कि केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) में ‘इण्डियन यूनियन मुस्लिम लीग’ (IUML) उसकी सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण सहयोगी पार्टी है।
वंदे मातरम् विवाद पर कांग्रेस का अंदरूनी मंथन और कानूनी पहलू
इस पूरे घटनाक्रम के बीच वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने इस मुद्दे के कानूनी पक्ष को रेखांकित किया है। एक अंग्रेजी समाचार पत्र से बातचीत में उन्होंने स्पष्ट किया कि मौजूदा वैधानिक प्रावधानों का विश्लेषण उनके वास्तविक संदर्भ में किया जाना आवश्यक है। सिंघवी ने आधिकारिक सरकारी आयोजनों और राजनीतिक दलों के आंतरिक कार्यक्रमों के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा: वर्तमान कानून मुख्य रूप से शासन द्वारा आयोजित औपचारिक और आधिकारिक समारोहों में राष्ट्रगीत के गायन और प्रोटोकॉल से संबंधित है, राजनीतिक दलों या संगठनों के आंतरिक आयोजनों को लेकर कानून में इस प्रकार की कोई बाध्यकारी या स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। यह कानूनी तर्क कांग्रेस के उस निर्णय के संदर्भ को समझने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसको लेकर खुद पार्टी के भीतर ही नेताओं के बीच भिन्न-भिन्न राय देखने को मिल रही है।
वंदे मातरम् विवाद में दो से अधिक अंतरे का मामला समझिए
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित मूल ‘वंदे मातरम’ में कुल 6 अंतरे हैं, जिन्हें लेकर स्वतंत्रता संग्राम के समय से ही राजनीतिक और धार्मिक दृष्टिकोण से अलग-अलग राय रही है। इस गीत के पहले दो अंतरों में केवल मातृभूमि (भारत भूमि) की प्राकृतिक सुंदरता, हरियाली, नदियों और उसकी वंदना का वर्णन है। इसमें किसी विशेष धार्मिक प्रतीक का उल्लेख नहीं है। तीसरे अंतरे के बाद से मातृभूमि को ‘दुर्गा’ और ‘लक्ष्मी’ जैसी हिंदू देवी-देवताओं के रूप में चित्रित किया गया है और ‘रिपुदलवारिणी’ (शत्रुओं का संहार करने वाली) जैसे शब्दों का प्रयोग हुआ है।

1937 का ऐतिहासिक फैसला (कांग्रेस का रुख)
1930 के दशक में जब मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना ने आगे के अंतरों में प्रयुक्त धार्मिक प्रतीकों पर आपत्ति जताई, तो पंडित जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद और रवींद्रनाथ टैगोर की एक समिति ने इस पर विचार किया। वंदे मातरम् विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू 1937 में लिए गए उस फैसले से जुड़ा है। सर्वधर्म समभाव और स्वतंत्रता संग्राम में सभी वर्गों की एकजुटता बनाए रखने के लिए 1937 में कांग्रेस ने यह व्यवस्था बनाई कि सार्वजनिक और राष्ट्रीय मंचों पर ‘वंदे मातरम’ के केवल शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाएंगे। 24 जनवरी 1950 में जब संविधान सभा ने ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया, तब भी इसके केवल शुरुआती दो अंतरों को ही आधिकारिक मान्यता दी गई।
2026 के हालिया घटनाक्रम से क्यों गरमाया मामला?
केंद्र सरकार ने हाल ही में नया कानून राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2026: पारित कर राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के गायन में बाधा डालने या इसका अनादर करने पर 3 साल तक की सजा का प्रावधान किया है। इसके बाद जब कांग्रेस कार्य समिति (CWC) ने अपने आयोजनों में 1937 के प्रस्ताव का हवाला देते हुए केवल शुरुआती दो अंतरे गाने का फैसला दोहराया, तो भाजपा और गृह मंत्री अमित शाह ने इसका कड़ा विरोध किया। भाजपा का तर्क है कि पूरे 6 अंतरों वाले राष्ट्रगीत को सम्मान मिलना चाहिए और इसे टुकड़ों में बांटना राष्ट्रगीत का अपमान है, जबकि कांग्रेस का कहना है कि वह सर्वसमावेशी परंपरा के तहत शुरुआती दो अंतरे ही गाती आ रही है। दो से अधिक अंतरों का विवाद इस बात पर केंद्रित है कि क्या ‘वंदे मातरम’ को केवल उसके पहले दो अंतरों (जो विशुद्ध रूप से मातृभूमि की वंदना हैं) तक सीमित रखा जाए या इसके सभी 6 अंतरों को आधिकारिक स्वरूप में स्वीकार किया जाए।
कांग्रेस के वो फैसले जब उस पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगे
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर विपक्षी दलों द्वारा लंबे समय से राजनीतिक लाभ और वोट बैंक के लिए ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ करने के आरोप लगते रहे हैं। इसके प्रमुख ऐतिहासिक उदाहरणों में 1937 में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के विरोध के बाद ‘वंदे मातरम’ के केवल शुरुआती दो अंतरों को स्वीकार करना और 1986 का शाह बानो मामला शामिल है, जहाँ सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संसद में कानून पास किया गया था। इसके अलावा, सलमान रुश्दी की पुस्तक ‘द सैटेनिक वर्सेज’ पर बैन लगाने का निर्णय, सच्चर कमेटी की सिफारिशें और केरल में ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ (IUML) के साथ कांग्रेस का दीर्घकालिक राजनीतिक गठबंधन ऐसे प्रमुख मुद्दे रहे हैं, जिनके आधार पर आलोचक पार्टी पर तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगाते हैं।
इसके विपरीत, कांग्रेस पार्टी इन आरोपों को पूरी तरह से खारिज करती आई है और उसका मानना है कि उसकी नीतियां तुष्टिकरण नहीं, बल्कि भारत के ‘सर्वधर्म समभाव’ और संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर आधारित हैं। पार्टी के अनुसार, 1937 में राष्ट्रगीत के पहले दो अंतरों को स्वीकार करने का निर्णय स्वतंत्रता संग्राम में सभी समुदायों की एकजुटता बनाए रखने के उद्देश्य से लिया गया था। कांग्रेस का रुख रहा है कि देश की विविधता, सामाजिक समरसता और अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों व सुरक्षा के लिए उठाए गए कदमों को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय राष्ट्रीय अखंडता के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
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