नई दिल्ली। दिल्ली में चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (दिल्ली SIR) प्रक्रिया को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने गुरुवार को चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष इस मामले को मेंशन किया। उन्होंने कहा कि दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची में करीब 47.56 लाख मतदाता शामिल नहीं किए गए, जबकि करीब 33.13 लाख मतदाताओं को ‘No Mapping’ और ‘Logical Discrepancies’ के आधार पर नोटिस जारी किए जाने की बात कही गई है।
प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि नोटिस पाने वाले मतदाताओं के नाम और उन्हें नोटिस जारी करने के सटीक कारण सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। उन्होंने अदालत के सामने यह सवाल उठाया कि ‘Logical Discrepancies’ का आधार क्या है और किन मतदाताओं को ‘Unmapped’ माना गया है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने संकेत दिया कि इस मामले की सुनवाई 22 सितंबर, मंगलवार को होगी। उस दिन SIR से जुड़े अन्य मामले भी अदालत के सामने सूचीबद्ध हैं।
47 लाख मतदाता ड्राफ्ट सूची में क्यों नहीं आए?
याचिका में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 31 अगस्त को प्रकाशित दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची में 97,53,577 ऐसे मतदाता शामिल थे, जिन्होंने Enumeration Form जमा किया था।
इसके अलावा 47,56,722 मतदाताओं को ASDD यानी Absent, Shifted, Dead or Duplicate श्रेणी के तहत ड्राफ्ट रोल में शामिल नहीं किया गया। यह आंकड़ा याचिकाकर्ताओं द्वारा अदालत के सामने रखी गई जानकारी का हिस्सा है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इसे फिलहाल अंतिम मतदाता सूची से 47 लाख नाम हटना नहीं कहा जाना चाहिए। यह 31 अगस्त को प्रकाशित ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर रहने का आंकड़ा है।
33 लाख मतदाताओं को क्यों भेजे गए नोटिस?

याचिका के अनुसार ड्राफ्ट मतदाता सूची में शामिल करीब 33,12,919 मतदाताओं को दो श्रेणियों में नोटिस के लिए चिन्हित किया गया है।
इनमें:
- 13,79,785 मतदाता ‘No Mapping’ श्रेणी में बताए गए हैं।
- 19,33,134 मतदाता ‘Logical Discrepancies’ श्रेणी में बताए गए हैं।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर इन मतदाताओं के नाम और प्रत्येक मामले में नोटिस जारी करने का सटीक कारण सार्वजनिक नहीं किया गया है।
‘Logical Discrepancies’ पर क्या है सवाल?
याचिका में ‘Logical Discrepancies’ की श्रेणी की परिभाषा और इसके लिए इस्तेमाल किए जा रहे मानकों को लेकर सवाल उठाया गया है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मतदाताओं को भेजे गए कुछ नोटिस में नाम, माता-पिता के नाम या उम्र से जुड़े अंतर जैसे सामान्य कारण बताए गए हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि किस पुराने रिकॉर्ड से तुलना की गई और वास्तविक अंतर क्या है।
याचिका में यह भी मांग की गई है कि ‘Logical Discrepancies’ और ‘No Mapping’ के लिए इस्तेमाल होने वाले मानदंड, परिभाषा, तकनीकी/एल्गोरिथमिक पैरामीटर और संचालन संबंधी निर्देश सार्वजनिक किए जाएं।
वेबसाइट पर नाम और कारण सार्वजनिक करने की मांग
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि निर्वाचन आयोग के 14 मई 2026 के संचार के अनुसार जिन मतदाताओं को नोटिस जारी किया गया है, उनके नाम प्रकाशित किए जाने चाहिए।
इसी आधार पर याचिका में दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर नोटिस पाने वाले सभी मतदाताओं की searchable list, उनके पते और प्रत्येक व्यक्ति को नोटिस जारी करने का विशिष्ट कारण प्रकाशित करने की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट में 22 सितंबर को होगी सुनवाई
प्रशांत भूषण ने आज इस मामले को तत्काल सुनवाई के लिए मेंशन किया। वह अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी की ओर से अदालत में पेश हुए।
मामले में याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि मतदाताओं को दिए जा रहे नोटिस में संबंधित रिकॉर्ड और विसंगति की पूरी जानकारी दी जाए, ताकि वे अपनी स्थिति स्पष्ट कर सकें।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस मामले पर 22 सितंबर को सुनवाई करेगी। उस दिन SIR से जुड़े अन्य मामले भी अदालत के सामने हैं।
क्या है दिल्ली SIR?
Special Intensive Revision यानी SIR मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और उसमें पात्र मतदाताओं के नाम बनाए रखना तथा मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित या डुप्लीकेट प्रविष्टियों की पहचान करना है।
दिल्ली में 31 अगस्त को ड्राफ्ट मतदाता सूची प्रकाशित हुई थी। इसके बाद दावे और आपत्तियां दाखिल करने की प्रक्रिया चल रही है। मौजूदा विवाद मुख्य रूप से उन मतदाताओं के नाम और कारण सार्वजनिक करने से जुड़ा है जिन्हें नोटिस जारी किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट अब यह देखेगा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए पारदर्शिता और नोटिस प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर क्या निर्देश दिए जाने की जरूरत है।
ये भी पढ़ें:-
₹2,000 से ऊपर UPI पेमेंट पर MDR को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, जानिए क्या बदलेगा
