जिस बीहड़ में बंदूक ही कानून बन गई थी, वहां कुसुमा नाइन ने अपने नाम का ऐसा खौफ कायम किया कि उसकी कहानी आज भी चंबल की दास्तानों में जिंदा है।
दिल्ली। चंबल और यमुना के बीहड़ों की खामोशी जितनी रहस्यमयी है, यहाँ की हवाओं में उतना ही खून का इतिहास घुला हुआ है। यहाँ की बंजर ज़मीन और काँटेदार झाड़ियों ने कई ऐसे नाम पैदा किए, जिनका खौफ सुनकर अच्छे-अच्छों की रूह काँप जाती थी। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा नाम भी उभरा, जिसकी क्रूरता के आगे पुरुष डकैत भी कांपते थे। वह कोई पुरुष नहीं, बल्कि एक महिला थी-कुसुमा नाइन, जिसे लोग बीहड़ की सबसे खूंखार ‘दस्यु सुंदरी’ के नाम से जानते थे।
आखिर एक साधारण सी दिखने वाली महिला कैसे बीहड़ की सबसे खौफनाक मलिका बन गई? क्या यह सिर्फ वर्चस्व की भूख थी, या फिर उस अंधी व्यवस्था का नतीजा, जहाँ बंदूक ही एकमात्र न्याय बन चुकी थी? आइए इन सवालों के जवाब कुसुमा की कहानी में तलाशने की कोशिश करते हैं.
जब बीहड़ों में गूंजा कुसुमा का नाम
1980 और 90 के दशक का वह दौर, जब उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीहड़ गोलियों की तड़तड़ाहट से थर्राते थे। इसी दौर में कुसुमा नाइन ने अपराध की दुनिया में कदम रखा और कुछ ही समय में खौफ का दूसरा पर्याय बन गई। उसके बारे में कहा जाता है कि वह बेरहमी की हर हद पार कर चुकी थी। जब वह अपने विरोधियों या किसी अपहृत शख्स से पूछताछ करती थी, तो उसका तरीका बेहद खौफनाक होता था। बदला लेने के लिए वह बंधकों के शरीर पर जलती हुई लकड़ी दाग देती थी, ताकि उसके नाम का खौफ लोगों के दिलों में इस कदर बैठ जाए कि कोई उसके खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत तक न कर सके।
वह खूनी रात और आंखें निकाल लेने की दरिंदगी
कुसुमा नाइन के गुनाहों की फेहरिस्त बहुत लंबी थी, लेकिन उसके जीवन का एक ऐसा काला अध्याय भी है जिसे याद कर आज भी लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश के एक इलाके में वर्चस्व की जंग और मुखबिरी के शक में उसने और उसके गिरोह ने मिलकर एक ऐसा खूनी तांडव रचा, जिसमें कई बेकसूरों को मौत के घाट उतार दिया गया। सिर्फ इतना ही नहीं, क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए उसने अपने दुश्मनों की आंखें तक निकाल ली थीं और उन्हें तड़पता हुआ छोड़ दिया था।
एक बार उसने अपनी दरिंदगी की सारी हदें पार करते हुए एक साथ चौदह लोगों को गोलियों से भूनकर मौत के घाट उतार दिया था। यह इंसानियत के पतन की वह पराकाष्ठा थी, जहाँ दया और संवेदना का नामोनिशान मिट चुका था। कुसुमा के भीतर का इंसान पूरी तरह मर चुका था और उसकी जगह एक ऐसा शिकारी ले चुका था, जिसे सिर्फ खून की प्यास बुझानी आती थी।

फक्कड़ बाबा का साथ और बीहड़ का साम्राज्य
उस दौर के सबसे कुख्यात डकैतों में शुमार रामआसरे उर्फ ‘फक्कड़ बाबा’ के साथ कुसुमा का नाम जुड़ने के बाद उसका आतंक और बढ़ गया। फक्कड़ बाबा उस पर अंधी श्रद्धा और भरोसा रखता था। आधुनिक हथियारों से लैस इस गिरोह के सामने पुलिस भी हाथ मलते रह जाती थी।
दूसरी ओर, उस समय की चर्चित डकैत फूलन देवी के साथ उसकी अदावत भी बीहड़ के गलियारों में चर्चा का विषय बनी रहती थी। दोनों की यह वर्चस्व की लड़ाई कभी भी बड़े खून-खराबे का रूप ले लेती थी। लोग कहते हैं कि फूलन देवी भी कुसुमा के सामने नहीं पड़ना चाहती थी।
अपराध का अंत और सलाखों के पीछे की जिंदगी
कहते हैं कि पाप का घड़ा जब भर जाता है, तो कानून का शिकंजा कसना लाजिमी है। वक्त के साथ बीहड़ के समीकरण बदले और पुलिस का दबाव बढ़ता गया। आखिरकार, 8 जून 2004 का वह दिन आया जब कुसुमा नाइन ने अपने सरगना फक्कड़ बाबा के साथ मध्य प्रदेश के भिंड जिले में पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
इसके बाद अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई और वह जेल की सलाखों के पीछे चली गई। लंबे समय तक इटावा जेल में रहने और गंभीर बीमारियों (टीबी) से जूझने के बाद अंततः उसका अंत हो गया, वो कफन में लिपटी अपने गांव वापस पहुंची. लेकिन उसके नाम का सिहरन भरा इतिहास आज भी लोगों के जेहन में जिंदा है।
फूलन देवी और कुसुमा में ज्यादा खतरनाक कौन?
फूलन देवी और कुसुमा नाइन। एक तरफ सिस्टम और जातीय अत्याचार के खिलाफ बगावत का प्रतीक बनी फूलन, तो दूसरी तरफ क्रूरता की हर सीमा लांघने वाली कुसुमा। आखिर जुर्म के तराजू पर जब इन दोनों की तुलना की जाती है, तो कौन सा पलड़ा भारी पड़ता है? क्या राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि किसी के अपराध को हल्का या भारी बनाती है, या फिर दरिंदगी सिर्फ दरिंदगी होती है?
फूलन देवी के अपराधों की फेहरिस्त बहुत लंबी थी, लेकिन उसके पीछे एक गहरी सामाजिक टीस और व्यक्तिगत प्रतिशोध की आग थी। उसने अपने ऊपर हुए अत्याचारों और अपमान का बदला लेने के लिए बीहड़ का रास्ता चुना था। उसका सबसे चर्चित और बड़ा अपराध बेल्मा का था, जहाँ उसने सवर्णों द्वारा किए गए जुल्मों के खिलाफ एक साथ दर्जनों लोगों को लाइन में खड़ा कर गोलियों से भून दिया था।

हालांकि, बाद में उसने मुख्यधारा की राजनीति का रुख किया और सांसद बनीं, जिससे उसके चरित्र के दो अलग-अलग पहलू सामने आए-एक तरफ खूंखार डकैत, तो दूसरी तरफ शोषितों की मसीहा बनने की छवि। इसके विपरीत, अगर कुसुमा नाइन के गुनाहों की लिस्ट को देखा जाए, तो उसमें वैचारिक बगावत या सामाजिक न्याय की कोई पृष्ठभूमि नहीं दिखती, बल्कि वह सिर्फ और सिर्फ खौफ और निर्ममता का जीवंत उदाहरण थी। जब दोनों के गुनाहों का मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक विश्लेषण किया जाता है, तो यह स्पष्ट होता है कि दोनों के रास्ते और उद्देश्य अलग थे।
कुसुमा की कहानी का सबक
क्या जुर्म की राह पर चलने वाला इंसान कभी सुकून की नींद सो पाता है? क्या बीहड़ की इन खूनी कहानियों से समाज ने कोई सबक सीखा, या फिर अंधेरे साये आज भी किसी नए रूप में घात लगाए बैठे हैं? सोचिए, क्योंकि इतिहास के पन्नों में ऐसे कई राज अभी दबे हुए हैं. ये भी सच्चाई है कि कोई शौकिया डाकू नहीं बनता, कोई मजबूरी उसे हथियार उठाने पर मजबूर करती है. एक फिल्मी डॉयलॉग भी है- बीहड़ में डाकू नहीं बागी होते हैं।
चंबल के डकैत क्यों मशहूर हैं?

चंबल और यमुना नदियों के पानी ने सदियों में यहाँ की जमीन को काटकर ऐसे दुर्गम और जटिल बीहड़ (Ravines) बना दिए हैं, जिन्हें प्राकृतिक किले कहा जाए तो गलत नहीं होगा। ये घाटियाँ इतनी गहरी और भूलभुलैया जैसी हैं कि बाहरी व्यक्ति या पुलिस के लिए यहाँ रास्ता ढूंढना और छिपकर वार करना बेहद मुश्किल होता था, और इस बंजर तथा कठिन भौगोलिक बनावट ने ही उन लोगों को पनाह दी जो समाज, कानून या व्यवस्था से बगावत कर चुके थे।
इस प्राकृतिक भूगोल के साथ-साथ यहाँ के सामाजिक ताने-बाने की वह खौफनाक आग भी जुड़ी थी, जहाँ ज़मीन के छोटे-छोटे टुकड़ों के लिए खून-खराबा होना, जातिगत वर्चस्व की लड़ाई और आपसी रंजिशें आम बात थीं। जब किसी इंसान का हक छीन लिया जाता था या उसका अपमान होता था, तब न्याय पाने की आस टूटने पर वह बंदूक उठा लेता था, और इस तरह भूगोल और जातीय अहंकार का यह विस्फोटक मेल चंबल में बागी पैदा करने की सबसे बड़ी वजह बन जाता था।
किस्से-कहानियों और लोक-गाथाओं में डकैतों की कहानी का रोमांच
पान सिंह तोमर, फूलन देवी, मान सिंह से लेकर कुसुमा नाइन तक—चंबल के इन किरदारों ने भारतीय जनमानस में एक ऐसा खौफनाक रोमांच पैदा किया जिसने पीढ़ियों को झकझोर कर रख दिया। इनकी जिंदगी पर बनी फिल्मों, उपन्यासों और बीहड़ की दंतकथाओं (Folklore) ने इन्हें आम अपराधियों से ऊपर उठाकर एक ऐसा मिथक बना दिया, जो आज भी लोगों की जुबान पर जिंदा है। गोलियों की तड़तड़ाहट, पुलिस के साथ आँख-मिचौली और अपहरण की सनसनीखेज वारदातों के इन किस्सों ने मीडिया और जनमानस के बीच चंबल को हमेशा चर्चा और रहस्य के केंद्र में बनाए रखा।
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