राम मंदिर चढ़ावा चोरी को लेकर के इन दोनों सियासत गरमाई हुई है. आस्था से जुड़ा मुद्दा होने की वजह से इन दिनों हर किसी की नजर इस मुद्दे पर है. क्योंकि लोगों ने दिल खोलकर राम लला को दान किया था. अब चोरी की खबरें आने के बाद हर कोई सच जानना चाहता है. आखिर हिंदुओं के सबसे बड़े आस्था के केंद्र में दान पात्रों से चोरी किसने की, कैसे की और इसके लिए जिम्मेदार कौन है. यह सवाल हर किसी के जेहन में है. इस बीच मीडिया में जिस तरह की खबरें आ रही है वह बेहद निराश करने वाली हैं. मीडिया में चल रही खबरों के मुताबिक बैंक ऑफ़ इंडिया ने 3 महीने पहले ही दान की राशि की गिनती करने वाले कर्मचारियों को बदलने की सिफारिश की थी. स्टेट बैंक को आशंका थी कि कोई मंदिर के दान पात्रों में से चोरी कर रहा है. इसलिए स्टेट बैंक ने दान गिनने वाले कर्मचारियों को हटाने की सिफारिश भी की थी. खबर सिर्फ इतनी नहीं है पीटीआई ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि आउटसोर्सिंग एजेंसी ने उन्हें बदलने का प्रक्रिया शुरू भी कर दी थी लेकिन ट्रस्ट के पदाधिकारी ने इसमें हस्तक्षेप किया और उन्हें बदलने से रोक दिया.
ऐसी तमाम बातें हैं जो संदेह को बढ़ाती हैं, आइए पूरे मामले को तह से समझने की कोशिश करते हैं कि कैसे चोरी का खुलासा हुआ, क्या अब इस मामले में लीपापोती हो रही है, कहीं दोषी बच कर निकल तो नहीं जाएंगे और इस मामले में सियासी रोटियां सेंकने वालों को कितना फायदा होगा.
क्या पीएम मोदी और सीएम योगी की साख दांव पर लगी?
अब यह मुद्दा सिर्फ चढ़ावा चोरी का नहीं रह गया है, बल्कि सीधे तौर पर देश के दो बड़े कद्दावर नेताओं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जीरो टॉलरेंस वाली छवि और प्रतिष्ठा से जुड़ गया है. मंदिर के भव्य निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा का पूरा श्रेय राजनीतिक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है. ऐसे में जब रामलला मंदिर के भीतर इतनी बड़ी चूक सामने आती है तो तो प्रशासनिक निगरानी पर सवाल उठता है. ऐसे में अब सभी की निगाहें भी इन्हीं दोनों नेताओं की ओर हैं.

सियासी रोटियां सेंकने में जुटा विपक्ष
इन दिनों विपक्ष की खुशी का ठिकाना नहीं है. राम मंदिर चढ़ावा चोरी की खबर ने विपक्ष को खाद पानी देने का काम किया है. भारतीय जनता पार्टी पर हमलावर विपक्ष का कहना है कि अयोध्या तो अभी झांकी, काशी-मथुरा बाकी है. जबकि ये वही कांग्रेस थी जिसने मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में दूरी बना ली थी. ऐसा कहा जाता है कि अपने कोर वोटर को लुभाने के लिए कांग्रेस ने ऐसा किया था. लेकिन अब राममंदिर में चढ़ावा चोरी के मामले में कांग्रेस की सबसे आगे नजर आ रही है.
दूध का दूध और पानी का पानी कैसे होगा?
यूपी गवर्नमेंट द्वारा गठित एसआईटी ने अपनी जांच में पाया कि मंदिर में चढ़ावे के लिए आई नकदी और कीमती सामान के रखरखाव में गड़बड़ियां पाई गई हैं. जिसके बाद यूपी पुलिस ने एफआईआर दर्ज की गई. अभी तक इस मामले में आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है. जिसमें लवकुश मिश्रा, अनुकल्प मिश्रा, अविनाश शुक्ला, मनीष कुमार यादव, करुणेश पांडे, सुभाष श्रीवास्तव, रमाशंकर मिश्रा, रमाशंकर यादव उर्फ टीनू यादव शामिल हैं. इस मामले में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि अयोध्या के बारे में जो खबरें आ रही हैं उसे लेकर हमने एसआईटी का गठन कर दिया है उसकी रिपोर्ट आने के साथ ही हमारी कार्रवाई भी शुरू कर दी है. मैं आश्वस्त करता हूं कि हम दूध का दूध और पानी का पानी करके रहेंगे.

कौन हैं चंपत राय?
राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव पद से इस्तीफा दे चुके चंपत राय का इस मामले में बयान दर्ज हो चुका है. उनका कहना है कि चढ़ावा चोरी में उनकी कोई भूमिका नहीं है. उसकी जानकारी मिलते ही वो एक्टिव हो गए थे और उन्होंने संदिग्धों को पड़कर एफआईआर भी कराई उनका कहना है कि टीनू यादव बहुत पहले से ऐसा कर रहा था, उसने गलत किया. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राम मंदिर निर्माण और उसके संचालन की जिम्मेदारी श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को दी गई थी. इस ट्रस्ट के महासचिव चंपत्र राय चढ़ावा चोरी मामले के बाद से चर्चा में हैं. चंपत राय राम मंदिर आंदोलन के रणनीतिकारों में से एक थे। ट्रस्ट के सभी प्रशासनिक फैसले में चंपत राय शामिल रहे हैं. उनकी जिम्मेदारी में मंदिर निर्माण की निगरानी और दान और चढ़ावे का प्रबंध भी शामिल था. फिलहाल चंपावत राय अपने ऊपर लग रहे आरोपों का खंडन कर रहे हैं. उन्होंने कहा है कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र अपने कामों का ऑडिट करता रहता है. दान पत्र के कमरों का ऑडिट भी स्टेट बैंक के कर्मचारियों के साथ मिलकर होता है. राम मंदिर निर्माण के दौरान राष्ट्रव्यापी चंदा अभियान में भी चंपत राय की बड़ी भूमिका रही है.

क्या भक्तों का भरोसा लौट पाएगा?
सियासी गलियारों में भले ही इस मुद्दे पर बयानबाजी के दौर चल रहे हों, लेकिन सबसे बड़ा आघात उस आम राम भक्त को लगा है, जिसने अपनी गाड़ी कमाई का एक हिस्सा भगवान राम के चरणों में अर्पित किया था. अब यह मामला सिर्फ चढ़ावा चोरी का नहीं बल्कि उस विश्वास का भी है जो करोड़ों सनातनियों ने इस पावन स्थल के प्रबंधन पर जताया था.
कई सवाल ऐसे हैं जिनके जवाब अभी भी तलाशे जाने बाकी हैं. आखिर वह कौन सी मजबूरियां थी जिनकी वजह से बैंक के अलर्ट के बाद भी संदिग्ध चेहरों को दान पात्रों से दूर नहीं किया गया? क्या इस मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाएगी? या अंदरूनी लीपा पोती करके छोटे प्यादों को फंसा कर असली चेहरों को बचा लिया जाएगा? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारी आस्था के सबसे बड़े केंद्र को इन प्रशासनिक और राजनीतिक विवादों से कभी मुक्त रखा जा सकेगा?
