गोस्वामी तुलसीदास जयंती : भारतीय साहित्य और भक्ति परंपरा के गगन में गोस्वामी तुलसीदास जी एक ऐसे जाज्वल्यमान सूर्य हैं, जिनकी रचनाओं ने युगों-युगों से समाज को दिशा दी है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को जन्मे तुलसीदास जी ने अपनी कालजयी रचनाओं से केवल हिंदी साहित्य को समृद्ध नहीं किया, बल्कि घर-घर में रामकथा को पहुँचाकर लोक-संस्कृति को एक नया जीवन दिया। उनकी जयंती के इस पावन अवसर पर उनके जीवन, रचना-संसार और अतुलनीय योगदान को याद करना हर साहित्य और भक्ति-प्रेमी के लिए गर्व का विषय है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि (आज 19 अगस्त) को तुलसीदास जयंती के अवसर पर हम आपको उस महाकवि से परिचय करवा रहे हैं.
जीवन की अलौकिक यात्रा और प्रेरक गाथाएं
गोस्वामी तुलसीदास जी का प्रारंभिक जीवन अत्यंत कठिनाइयों और संघर्षों से भरा रहा। बाल्यावस्था में ही माता-पिता का साया सिर से उठ जाने के बाद उनका पालन-पोषण गुरु नरहरिदास जी के संरक्षण में हुआ, जिन्होंने उन्हें रामकथा के संस्कारों से सींचा। उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ उनकी पत्नी रत्नावली से जुड़ी घटना मानी जाती है। मान्यता है कि तुलसीदास जी अपनी पत्नी से अत्यधिक मोह रखते थे। एक बार जब रत्नावली अपने मायके चली गईं, तो तुलसीदास जी तूफानी रात में उफनती नदी पार करके उनसे मिलने पहुँच गए। इस पर रत्नावली ने उन्हें टोकते हुए कहा- “अस्थि चर्म मय देह यह, तासों जितनी प्रीति। त्यों तुलसी महँ राम महँ, होत न भवभीति॥” अर्थात जितना प्रेम इस हाड़-मांस के शरीर से है, उतना अगर श्रीराम से होता, तो भवसागर से पार उतर जाते। यह बात तुलसीदास जी के हृदय में तीर की तरह चुभ गई और उन्होंने तुरंत गृहस्थ जीवन त्याग कर वैराग्य धारण कर लिया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन प्रभु श्रीराम की भक्ति और साधना में समर्पित कर दिया।
अमर कृति: रामचरितमानस की रचना
तुलसीदास जी का सबसे महान और युगांतरकारी कार्य ‘श्रीरामचरितमानस’ की रचना है। उन्होंने अयोध्या में संवत 1631 (सन 1574) के चैत्र रामनवमी के दिन इस महाकाव्य को लिखना प्रारंभ किया और लगभग दो वर्ष, सात महीने व छबीस दिनों में इसे पूर्ण किया। उस दौर में संस्कृत भाषा का बोलबाला था और विद्वानों का वर्चस्व था, लेकिन तुलसीदास जी ने लोकभाषा ‘अवधी’ को चुना ताकि श्रीराम का चरित्र और आदर्श समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच सके। उन्होंने वाल्मीकि रामायण के गहन अध्यात्म को अत्यंत सरल, सुबोध और संगीतमय चौपाइयों-दोहों में पिरोया। रामचरितमानस केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की कला, मर्यादा, भ्रातृ-प्रेम, पति-पत्नी के धर्म और एक आदर्श समाज के निर्माण का अनुपम दस्तावेज है।

जब श्रीराम और लक्ष्मण ने दिए तुलसीदास जी को दर्शन
घने जंगलों की नीरवता को चीरती हुई भोर की पहली किरण अभी चित्रकूट के घाटों पर उतरी ही थी, जब तुलसीदास जी चंदन घिसने में मग्न थे। अचानक उनके कानों में घोड़ों के टापों की गूंज सुनाई दी—सामने दो राजकुमार खड़े थे, जिनका स्वरूप ऐसा था मानो साक्षात सौंदर्य ही शरीर धारण कर आया हो। एक का वर्ण मेघ श्याम था और दूसरे का कंचन सा गौर; हाथ में धनुष-बाण लिए वे अलौकिक राजकुमार जब घोड़े से उतरे, तो तुलसीदास जी की सांसें थम गईं। वे उन्हें एकटक देखते रह गए, उनका हृदय बिना किसी तर्क के एक अनजाने स्पंदन से भर उठा, लेकिन बुद्धि संशय के जाल में उलझकर पहचान नहीं पाई। तभी पेड़ की डाल पर बैठे हनुमान जी ने उनकी इस उधड़बुन को ताड़ लिया और तोते का रूप धरकर मधुर स्वर में गा उठे— “चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर। तुलसीदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥”
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यह सुनते ही तुलसीदास जी के हाथ से चंदन की कटोरी छूट गई, संशय का कोहरा छंट गया और वे समझ गए कि सामने स्वयं उनके आराध्य प्रभु श्रीराम और भ्राता लक्ष्मण खड़े हैं। भगवान ने मुस्कुराते हुए अपने कोमल हाथों से तुलसीदास जी के माथे पर चंदन का तिलक लगाया। प्रभु के स्पर्श मात्र से तुलसीदास जी के नयन अश्रुधारा से भीग गए और वे वहीं उनके चरणों में गिर पड़े। जब उन्होंने नयन खोले, तो दोनों राजकुमार अंतर्ध्यान हो चुके थे, लेकिन उस परम आनंद की अनुभूति ने तुलसीदास जी के भीतर भक्ति के उस अमर प्रकाश को जला दिया था, जिसने आगे चलकर ‘रामचरितमानस’ जैसे महाकाव्य को जन्म दिया।
तुलसीदास जी और हनुमान जी के प्रथम दर्शन की कथा
तुलसीदास जी नित्य प्रातःकाल काशी में गंगा पार जाकर शौच से निवृत्त होते थे और लोटे का बचा हुआ जल एक बबूल के पेड़ की जड़ में डाल दिया करते थे। उस पेड़ पर एक प्रेत रहता था, जो जल मिलने से तृप्त रहता था। एक दिन प्रेत ने प्रसन्न होकर तुलसीदास जी से वरदान मांगने को कहा। तुलसीदास जी ने बिना पल गंवाए कहा— “मुझे साक्षात श्री रघुनाथ जी के दर्शन करा दो।” प्रेत ने हाथ जोड़कर कहा कि यह उसके वश में नहीं है, लेकिन उसने एक उपाय बताया— “एक कोढ़ी के रूप में हनुमान जी रोज़ गुप्त रूप से रामकथा सुनने आते हैं। वे सबसे पहले आते हैं और सबसे अंत में जाते हैं। तुम उन्हीं के चरण पकड़ लो, वही तुम्हें श्रीराम से मिला सकते हैं।”

अगले दिन कथा स्थल पर तुलसीदास जी ने सबसे पीछे बैठे एक वृद्ध कुष्ठरोगी को पहचान लिया। कथा समाप्त होते ही जब वह कोढ़ी उठकर जाने लगा, तो तुलसीदास जी पीछे-पीछे चलने लगे और एक एकांत स्थान पर पहुँचकर उनके पैर पकड़ लिए। हनुमान जी ने अपना पीछा छुड़ाने की बहुत कोशिश की और बहाने बनाए, लेकिन तुलसीदास जी रोते हुए बोले— “हे पवनपुत्र! मैं जानता हूँ कि आप ही हनुमान जी हैं, जब तक मुझे प्रभु श्रीराम के दर्शन का मार्ग नहीं बताएंगे, मैं आपके चरण नहीं छोड़ूँगा।” तुलसीदास जी की अनन्य भक्ति और निष्ठा देखकर हनुमान जी अपने वास्तविक दिव्य रूप में प्रकट हो गए। उन्होंने भावविभोर होकर तुलसीदास जी को गले लगाया और उन्हें चित्रकूट जाने का आदेश दिया, जहाँ आगे चलकर तुलसीदास जी को भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी के दर्शन प्राप्त हुए।
जब तुलसीदास जी को बचाने के लिए आई बंदरों की सेना
जब मुगल बादशाह अकबर ने गोस्वामी तुलसीदास जी को अपनी सभा में बुलाकर कोई चमत्कार दिखाने की चुनौती दी और इनकार करने पर उन्हें फतेहपुर सीकरी की जेल में बंद करवा दिया, तब तुलसीदास जी ने कालकोठरी में बैठकर हनुमान जी की स्तुति की रचना व पाठ करना शुरू कर दिया। उनकी निष्काम भक्ति के प्रभाव से अचानक पूरे सीकरी किले पर लाल-मुँह और काले-मुँह वाले लाखों भयंकर बंदरों के विशाल हुजूम ने धावा बोल दिया। बंदरों की इस अजेय सेना ने शाही दरबार, रसोइयों और बैरकों को तहस-नहस करते हुए ऐसा उत्पात मचाया कि पूरी सीकरी में भगदड़ मच गई और सिपाहियों का टिकना नामुमकिन हो गया। इस अप्रत्याशित और दिव्य संकट को देखकर अकबर को तुरंत अपनी भूल का अहसास हुआ; उसने स्वयं तुलसीदास जी की कोठरी के समक्ष जाकर उनसे क्षमा मांगी और उन्हें ससम्मान रिहा कर दिया, जिसके बाद ही बंदरों का वह तांडव शांत हुआ।

काशी के विश्वनाथ मंदिर की अलौकिक परीक्षा
जब तुलसीदास जी ने अवधी (लोकभाषा) में ‘श्रीरामचरितमानस’ की रचना पूर्ण की, तो काशी के पारंपरिक और अहंकारी संस्कृत विद्वानों ने इसका तीव्र विरोध किया। उनका मानना था कि ईश्वर की गाथा केवल देववाणी संस्कृत में ही लिखी जानी चाहिए, आम बोलचाल की भाषा में नहीं। ग्रंथों की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए विद्वानों ने एक परीक्षा रखी। रात्रि में काशी विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह में सबसे नीचे ‘श्रीरामचरितमानस’ की पोथी रखी गई, उसके ऊपर वेद, पुराण और अन्य शास्त्रीय ग्रंथ क्रम से सजाकर रख दिए गए और मंदिर का दरवाजा बंद कर दिया गया।
अगली सुबह जब मंदिर के कपाट खोले गए, तो एक अलौकिक दृश्य देखकर सभी स्तब्ध रह गए। ‘श्रीरामचरितमानस’ सबसे नीचे से निकलकर सभी वेदों और शास्त्रों के सबसे ऊपर रखी हुई थी और उस पर भगवान शिव की मुहर के रूप में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा था- “सत्यं शिवं सुन्दरम्”। साथ ही नीचे भगवान विश्वनाथ के हस्ताक्षर भी अंकित थे। यह चमत्कार देखते ही विरोध करने वाले सभी पंडितों के सिर श्रद्धा से झुक गए और रामचरितमानस को सर्वोपरि ग्रंथ स्वीकार कर लिया गया।
साहित्य और समाज को कालजयी योगदान
हिंदी साहित्य के ‘भक्ति काल’ की सगुण रामभक्ति शाखा के शीर्ष कवि के रूप में तुलसीदास जी का योगदान अतुलनीय है। रामचरितमानस के अलावा उन्होंने ‘विनय पत्रिका’, ‘कवितावली’, ‘दोहावली’, ‘गीतावली’, ‘हनुमान बाहुक’ और ‘जानकी मंगल’ जैसी कई कालजयी रचनाओं का सृजन किया। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से तत्कालीन समाज में फैले जातिगत भेदभाव, वैचारिक मतभेदों (शैव और वैष्णव संप्रदायों के विवाद) को समाप्त कर एक अद्भुत समन्वयवादी (Harmonious) दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। तुलसीदास जी ने रामराज्य की ऐसी कल्पना रखी जहाँ दरिद्रता, भय और विषमता के लिए कोई स्थान नहीं था। आज भी तुलसीदास जी की रचनाएं दुनिया भर में भारतीय संस्कृति की संवाहक बनी हुई हैं और उनकी जयंती हमें सत्य, मर्यादा, समरसता और निष्काम भक्ति के पथ पर चलने की प्रेरणा देती है।
तुलसीदासजी का जीवन दर्शन
गोस्वामी तुलसीदास जी का जीवन दर्शन केवल कोरी सैद्धांतिक ज्ञान की बातें नहीं है, बल्कि वह व्यावहारिक जीवन, भक्ति, समाज-सुधार और मानवीय मूल्यों का एक अनुपम संगम है। उनका दर्शन तत्कालीन मध्यकालीन भारतीय समाज की विषमताओं, हताशा और मतभेदों को दूर कर एक संतुलित व आदर्श जीवन जीने का मार्ग दिखाता है। तुलसीदास जी के दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता उनका ‘समन्वयवाद’ है। उन्होंने समाज में फैले वैचारिक और धार्मिक मतभेदों को मिटाने का ऐतिहासिक कार्य किया। उस दौर में शिव-उपासकों और विष्णु-उपासकों के बीच विवाद थे। तुलसीदास जी ने श्रीराम के मुख से कहलाया— “सिव द्रोही मम दास कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा॥” अर्थात् जो शिव से द्रोह करता है और मेरी भक्ति का दावा करता है, वह मुझे स्वप्न में भी नहीं पा सकता। उन्होंने ज्ञान और भक्ति के बीच कोई भेद नहीं माना। उन्होंने स्पष्ट लिखा— “अगुनहि सगुनहि कछु नहिं भेदा।”

तुलसीदास जी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के उपासक थे, इसलिए उनका दर्शन मर्यादा और कर्तव्य पर सर्वाधिक बल देता है। उन्होंने हर मानवीय संबंध के लिए एक उच्च आदर्श स्थापित किया. तुलसीदास जी का ईश्वर-दर्शन अत्यंत सहज है। उन्होंने भगवान के प्रति ‘दास्य भाव’ (सेवक और स्वामी का भाव) की भक्ति को अपनाया. तुलसीदास जी का साहित्य और दर्शन “स्वान्तः सुखाय” (स्वयं के सुख के लिए) शुरू होकर “लोक-हिताय” (जन-कल्याण) पर समाप्त होता है. तुलसीदास जी का मानना था कि सांसारिक विषयों का अति-मोह ही मनुष्य के दुखों का कारण है। जब तक मनुष्य का ध्यान क्षणभंगुर भौतिक सुखों से हटकर शाश्वत सत्य (ईश्वर) की ओर नहीं जाता, तब तक उसे वास्तविक शांति नहीं मिल सकती। उनका स्पष्ट संदेश था कि व्यक्ति को अपनी कमियों और विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह) पर विजय प्राप्त कर आत्म-निरीक्षण करना चाहिए।
गोस्वामी तुलसीदास जी का जीवन दर्शन एक ऐसा प्रकाशपुंज है जो व्यक्ति को ‘अहंकार से विनम्रता’ की ओर, ‘संसार के मोह से भक्ति’ की ओर और ‘विभाजन से समन्वय’ की ओर ले जाता है। उनका दर्शन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 400 साल पहले था।
डिस्क्लेमर
इस लेख में गोस्वामी तुलसीदास जी के जीवन से जुड़े कुछ प्रसंग लोकमान्यताओं, धार्मिक परंपराओं और प्रचलित कथाओं पर आधारित हैं। इन प्रसंगों को ऐतिहासिक तथ्य के बजाय प्रचलित मान्यता के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। लेख का उद्देश्य तुलसीदास जी के साहित्य, भक्ति और जीवन-दर्शन से पाठकों को परिचित कराना है।
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