क्या मुसलमानों को खुश करने के लिए वंदेमातरम् का गला घोंटा गया? वंदेमातरम् पर मुस्लिम लीग के आगे नेहरूजी ने क्यों घुटने टेके? क्या सच में नेहरूजी ने जिन्ना के खौफ में जानबूझकर वंदेमातरम् के टुकड़े कर दिए। क्या सच में उनके इस कदम ने देश के बंटवारे की नींव रख दी थी। क्या सच में मुस्लिमों को खुश करने के लिए वंदेमातरम का गला घोंट दिया गया। जिस वंदेमातरम ने आजादी की लड़ाई को ताकत दी। क्या सच में उसके साथ विश्वासघात किया गया। आइए इन्हीं आरोपों को इतिहास के पन्नों की मदद से सच की कसौटी पर परखने की कोशिश करते हैं।
वंदे मातरम्, यही वो गीत था, जिसने करीब दो सौ साल से अंग्रेजी हुकूमत की बेड़ियों में जकड़े भारतीय जनमानस को जगाने का काम किया, इसी गीत ने गुलामी की मानसिकता को तोड़ने के लिए ऊर्जा देने का काम किया। लेकिन आजादी मिलने के बाद जब इस गीत को पूरा सम्मान देने का वक्त आया तो ये सत्ता संघर्ष की सियासत का शिकार हो गया। ये कुछ कुछ ऐसी ही बात थी। मानो अपनी मां के कोख से जन्मा बच्चा, जन्म लेते ही अपनी मां का गला दबाने की कोशिश कर रहा हो।
ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाला अमर गीत
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब भारत के मतवालों ने ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष शुरू किया, तो उसकी गूंज से ब्रिटिश हुकूमत के ईंट-से-ईंट बजने लगी। वास्तव में, इस कालजयी रचना का जन्म 1870 के दशक में अंग्रेजों के एक दमनकारी फरमान के जवाब में हुआ था। उस समय औपनिवेशिक शासन ने सभी सार्वजनिक और सांस्कृतिक आयोजनों में ब्रिटिश राजशाही के सम्मान में गाया जाने वाला गीत ‘गॉड सेव द क्वीन’ (God Save the Queen) अनिवार्य कर दिया था। सरकारी सेवा में कार्यरत प्रख्यात लेखक बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को अपनी मातृभूमि पर किसी विदेशी सम्राट की जयकार थोपे जाने का यह विचार कतई स्वीकार नहीं हुआ। इसी प्रतिरोध की भावना से प्रेरित होकर उन्होंने ‘वंदे मातरम’ की रचना की।
साहित्यिक शुरुआत से राष्ट्रीय मंच तक का सफर
यह गीत पहली बार 7 नवंबर, 1875 को बंकिम चंद्र जी की प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में छपा। रचना के सात वर्षों पश्चात उन्होंने इसे अपने सुप्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बनाया। वर्ष 1896 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने इस गीत को अपना संगीतमय स्वर दिया। यह पहला अवसर था जब ‘वंदे मातरम्’ का गायन इतने बड़े राष्ट्रीय मंच पर सार्वजनिक रूप से हुआ, जिसके बाद यह जन-जन का कंठहार बन गया।

बंगाल विभाजन से वैश्विक पटल तक: क्रांति का पर्याय
1905 के बंगाल विभाजन के खिलाफ उपजे आक्रोश ने इस गीत को भारतीय राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा प्रतीक बना दिया। 20 मई, 1906 को बारीसाल में निकले ऐतिहासिक ‘वंदे मातरम् जुलूस’ में सामाजिक और धार्मिक सीमाओं को तोड़कर विशाल जनसैलाब उमड़ पड़ा। अंग्रेजी सरकार इस गीत की बढ़ती लोकप्रियता से इस कदर खौफजदा हो गई कि उसने इसके गायन पर कड़े प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए। भय का आलम यह था कि वर्तमान बांग्लादेश के रंगपुर स्थित एक विद्यालय में यह गीत गाने वाले छात्रों पर पांच-पांच रुपये का आर्थिक दंड ठोक दिया गया। तमाम बंदिशों के बावजूद, यह केवल एक रचना न रहकर क्रांति का सबसे प्रभावी नारा बन चुका था। जब मैडम भीकाजी कामा ने जर्मनी के स्टटगार्ट (तथा बर्लिन सम्मेलनों के दौरान) भारत का शुरुआती ध्वज फहराया, तो उसके मध्य में ‘वंदे मातरम’ अंकित था। 17 अगस्त, 1909 को जब महान क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा ब्रिटेन में फांसी के फंदे पर झूले, तो उनके मुख से निकले अंतिम शब्द ‘वंदे मातरम’ ही थे। आगे चलकर अमर शहीद भगत सिंह और उनके सहयोगियों ने भी इसी उद्घोष के साथ देश में आजादी की अलख जगाए रखी।
अंग्रेजी कूटनीति और विरोध का बीजारोपण
एक ओर जहाँ यह गीत स्वाधीनता आंदोलन की रीढ़ बन चुका था, वहीं ब्रिटिश हुकूमत ने अपनी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के तहत इसे निशाना बनाना शुरू किया। अंग्रेजों की शह पर मुस्लिम लीग के कुछ नेताओं ने इस गीत की शब्दावली को लेकर आपत्तियां उठाईं और इसे सांप्रदायिक रंग देने का प्रयास किया। इस तरह, औपनिवेशिक सत्ता की कूटनीतिक चालों के कारण आजादी का यह महान प्रतीक राजनीतिक मतभेदों के घेरे में लाया गया। वर्ष 1908 के मुस्लिम लीग अधिवेशन के दौरान सर सैयद अली इमाम ने इस गीत की स्वीकार्यता पर गंभीर सवाल उठाए। उनका तर्क था कि देश के सबसे प्रगतिशील प्रांत द्वारा ‘वंदे मातरम’ को एक सर्वमान्य राष्ट्रीय नारे के रूप में आगे बढ़ाना चिंताजनक है। उनके अनुसार, इस रचना से यह संदेश जाता है कि भारतीय राष्ट्रवाद के आवरण में दरअसल एक विशेष धार्मिक पहचान को बढ़ावा दिया जा रहा है। समय के साथ, कई अन्य राजनीतिक मंचों से भी इसे मूर्तिपूजा का प्रतीक और गैर-इस्लामिक करार देकर इसका विरोध तेज कर दिया गया।
1923 का कांग्रेस अधिवेशन और बढ़ता राजनीतिक विवाद
तनाव तब और गहरा गया जब 1923 के कांग्रेस अधिवेशन में सार्वजनिक रूप से इस गीत के गायन पर आपत्ति दर्ज की गई। इसके बाद मुस्लिम लीग ने आक्रामक रुख अपनाते हुए कांग्रेस पर आरोप मढ़ना शुरू कर दिया कि वह अल्पसंख्यक समुदाय पर धार्मिक अवधारणाएं थोपने का प्रयास कर रही है। आगे चलकर 17 मार्च, 1938 को पंडित जवाहरलाल नेहरू को प्रेषित एक पत्र में मोहम्मद अली जिन्ना ने दाव किया कि यह गीत जिस उपन्यास (आनंदमठ) से लिया गया है, उसका मूल ताना-बाना मुस्लिम विरोधी पृष्ठभूमि पर आधारित है।
‘वंदे मातरम् में ‘रिपुदलवारिणी’ शब्द को लेकर गहराया संशय
विवाद का एक बड़ा मुख्य केंद्र ‘वंदे मातरम्’ की काव्य-शब्दावली थी। गीत में भारत भूमि को देवी स्वरूपा मानते हुए ‘रिपुदलवारिणी’ (शत्रुओं का संहार करने वाली) संबोधित किया गया था। मुस्लिम लीग और उसके समर्थकों का मानना था कि ‘रिपु’ (शत्रु) शब्द का प्रयोग अप्रत्यक्ष रूप से उनके समुदाय के लिए किया गया है। वहीं, स्वतंत्रता संग्राम के विशेषज्ञों और विचारकों का स्पष्ट मत था कि बंकिम चंद्र जी द्वारा प्रयुक्त ‘रिपु’ शब्द विदेशी औपनिवेशिक शासकों (ब्रिटिश हुकूमत) का प्रतीक था, न कि किसी देशवासी का।
आंदोलन पर प्रभाव और कांग्रेस का रुख
जिन्ना और मुस्लिम लीग द्वारा लगातार लगाए जा रहे इन आरोपों से स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं में गहरी चिंता व्याप्त हो गई। उन्हें भय था कि इस वैचारिक दरार से अंग्रेजों के खिलाफ जारी एकजुट लड़ाई कमजोर पड़ सकती है। देश की अखंडता और सांप्रदायिक सौहार्द को बचाए रखने के दबाव में, अंततः कांग्रेस को इस विरोध के सामने एक बीच का रास्ता खोजने और रणनीतिक कदम उठाने पर विवश होना पड़ा। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान जब ‘वंदे मातरम’ पर आपत्तियां उठने लगीं, तो कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के भीतर इस विषय को लेकर गहन मंथन शुरू हुआ।
नेहरू का दृष्टिकोण और महात्मा गांधी का पक्ष
आलोचकों का मानना है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने मुस्लिम लीग के एतराजों को पूरी तरह खारिज करने के बजाय उनके संशय को समझने की कोशिश की। नेताजी सुभाष चंद्र बोस को भेजे एक पत्र में नेहरू ने उल्लेख किया कि वे इस रचना की पृष्ठभूमि को गहराई से समझने के लिए ‘आनंदमठ’ का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ रहे हैं, और उन्हें लगता है कि इसके कुछ अंशों को लेकर अल्पसंख्यक समुदाय में वाकई असहजता है। दूसरी ओर, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने एक लेख में ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गान के रूप में अपनी पहली पसंद बताया था। गांधी जी का विचार था कि दुनिया के कई राष्ट्रीय गीतों में अन्य राष्ट्रों या समूहों के प्रति आक्रामकता या अपमान का भाव होता है, जबकि यह गीत इस तरह की कमियों से पूरी तरह मुक्त है। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट भी किया था कि किसी भी राष्ट्रीय प्रतीक को किसी पर जबरन नहीं थोपा जाना चाहिए।
समिति का गठन और बीच का रास्ता
विवाद को सुलझाने और आंदोलन की एकजुटता बनाए रखने के लिए कांग्रेस ने एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया। इस समिति में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, पंडित जवाहरलाल नेहरू, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे दूरदर्शी नेता शामिल थे। समिति ने अध्ययन के बाद ये सिफारिशें दीं.
- प्रथम दो छंदों की सार्वभौमिकता : गीत के शुरुआती दो अंतरे विशुद्ध रूप से मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता और उसकी वंदना को समर्पित हैं, जिससे किसी भी वर्ग की भावनाएं आहत नहीं होतीं।
- संशोधन का सुझाव : शुरुआती दो छंदों के बाद की पंक्तियों में विशिष्ट धार्मिक आकृतियों और प्रतीकों का उल्लेख है, जिन्हें सर्वसमावेशी बनाने के उद्देश्य से अलग रखा जा सकता है।
समिति के इस सुझाव के आधार पर राष्ट्रीय आयोजनों और सार्वजनिक मंचों के लिए ‘वंदे मातरम’ के केवल शुरुआती दो अंतरों को ही आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया।
बंटवारे की त्रासदी और स्वतंत्रता के बाद ‘वंदे मातरम्’
इतिहास गवाह है कि जिस मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना के संशय दूर करने के लिए राष्ट्रगीत के स्वरूप में यह समायोजन किया गया था, उसने अंततः धार्मिक आधार पर देश के विभाजन का रास्ता चुना। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान उछाले गए इन वैचारिक मतभेदों की गूंज आजादी और विभाजन के दशकों बाद भी भारतीय राजनीति में समय-समय पर सुनाई देती रहती है। आजादी के बाद भी ‘वंदे मातरम’ का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व अक्षुण्ण रहा, लेकिन इसके अनिवार्य गायन को लेकर विवाद समय-समय पर सामने आते रहे। 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता के पावन अवसर पर ‘ऑल इंडिया रेडियो’ से प्रसारित होने वाली पहली संगीतमय ध्वनि ‘वंदे मातरम’ ही थी। आगे चलकर 24 जनवरी 1950 को भारत की संविधान सभा ने इसे आधिकारिक रूप से ‘राष्ट्रगीत’ का दर्जा प्रदान किया।
‘वंदे मातरम्’ के अनिवार्य गायन पर उपजे विवाद
हालांकि स्वतंत्रता मिलने से पहले ही इसके केवल शुरुआती दो अंतरों को सर्वसमावेशी बनाकर स्वीकार कर लिया गया था, फिर भी इसके अनिवार्य गायन के प्रयासों पर आपत्तियां उठती रहीं। साल 1998 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा राज्य के प्राथमिक विद्यालयों में इस गीत को अनिवार्य करने का निर्देश जारी हुआ, तो मुस्लिम समुदाय की ओर से असंतोष व्यक्त किया गया। सामाजिक समरसता को ध्यान में रखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हस्तक्षेप के बाद इस आदेश को वापस ले लिया गया। फिर साल 2006 में ‘वंदे मातरम’ के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर केंद्र सरकार ने शिक्षण संस्थानों में इसके गायन का परामर्श जारी किया। कुछ संस्थाओं और मुस्लिम संगठनों द्वारा ‘एकेश्वरवाद’ का तर्क देकर जताई गई आपत्तियों के बाद सरकार को यह स्पष्ट करना पड़ा कि इसका गायन पूरी तरह वैकल्पिक है।
‘जन गण मन’ के समकक्ष दर्जा और कानूनी स्थिति
समय-समय पर ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान पूर्ण वैधानिक दर्जा और प्रोटोकॉल दिए जाने की मांग उठती रही है। साल 2019 में राष्ट्रगीत को राष्ट्रगान के समान संवैधानिक दर्जा देने की मांग को लेकर दायर एक याचिका को दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि इस विषय पर नीतियां तय करना अदालत के बजाय कार्यपालिका का अधिकार क्षेत्र है। सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार ध्वजारोहण और राजकीय समारोहों के दौरान राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ का गायन और उसके सम्मान में खड़ा होना अनिवार्य प्रोटोकॉल के अंतर्गत आता है, जबकि राष्ट्रगीत के लिए ऐसा कोई सख्त वैधानिक नियम तय नहीं किया गया था।
राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2026 और वंदे मातरम
संसद द्वारा पारित राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2026 का उद्देश्य भारत के राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’, राष्ट्रीय ध्वज और संविधान के समान वैधानिक संरक्षण और कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है। यह कानून 1971 के मूल अधिनियम की धारा 3 में संशोधन करता है, जिसके तहत अब राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के गायन को जानबूझकर रोकने, इसका अनादर करने या इसके गायन में लगी सभा में व्यवधान उत्पन्न करने को दंडनीय अपराध घोषित किया गया है। ऐसा करने पर दोषी को अधिकतम 3 साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान है, जबकि दोबारा अपराध करने पर न्यूनतम 1 साल की जेल हो सकती है। यह संशोधन 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा द्वारा ‘वंदे मातरम’ को दिए गए ऐतिहासिक और समान दर्जे को विधायी रूप से मजबूती प्रदान करता है।
वंदेमातरम् सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि इस देश की प्राणवायु है। ये देश की धड़कन है, जो हर सच्चे हिंदुस्तानी के दिल में धड़कता है। ये सिर्फ एक गीत के शब्द नहीं, एक स्मृति है, एक प्रण है, जो यह बताता है कि देश सिर्फ मानचित्र नहीं, मां की तरह महसूस किया जाने वाला एक जीवित एहसास है। उम्मीद है कि आने वाली पीढ़ियां इसके एहसान को नहीं भूलेंगी। जिसने हमें खुली हवा में सांस लेने की आजादी दी।
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