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Home»Featured»25 शव, जहरीली गैस और कई सवाल… क्या तीस्ता सुरंग हादसे में केवल तकनीकी नहीं, प्रशासनिक चूक भी जिम्मेदार?
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25 शव, जहरीली गैस और कई सवाल… क्या तीस्ता सुरंग हादसे में केवल तकनीकी नहीं, प्रशासनिक चूक भी जिम्मेदार?

Awadhesh Kumar MishraBy Awadhesh Kumar MishraJuly 24, 2026No Comments6 Mins Read56 Views
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25 शव...सिर्फ हादसा नहीं? NHPC की सुरक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल
EXCLUSIVE- तीस्ता सुरंग हादसा 25 मौतें क्या फैसले लेने वालों की भी होगी जांच?
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FreelancerPost Exclusive

25 शव… और अब केवल हादसे की नहीं, फैसले लेने वालों की भी जांच जरूरी

सिक्किम के नाम्ची जिले के समरदुंग क्षेत्र में एनएचपीसी ( NHPC ) की 500 मेगावाट तीस्ता स्टेज-6 जलविद्युत परियोजना की निर्माणाधीन ADIT-3 सुरंग में हुआ हादसा देश की सबसे दर्दनाक औद्योगिक त्रासदी बन गया है। बचाव अभियान से जुड़े अधिकारियों के अनुसार अब तक 20 शव बरामद किए जा चुके हैं। शेष पांच शव इतनी क्षत-विक्षत अवस्था में हैं कि उन्हें सुरंग से सम्मानपूर्वक बाहर निकालना भी राहत दल के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। आशंका है कि शायद सुरंग के भीतर अभी भी कुछ लोग फंसे हो सकते हैं।

20 जुलाई को हुई इस दुर्घटना के बाद से सुरंग के भीतर जहरीली गैस, घना धुआं, पानी भर जाने, सीमित ऑक्सीजन और लगातार बारिश के बीच राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ), राज्य आपदा मोचन बल (एसडीआरएफ), सिक्किम पुलिस, फायर एंड इमरजेंसी सर्विसेज, इंडिया रिजर्व बटालियन, डीजीएमएस की विशेष टीम और एनएचपीसी के इंजीनियर चौबीसों घंटे राहत अभियान चला रहे हैं।

घटनास्थल सुरंग के प्रवेश द्वार से लगभग डेढ़ किलोमीटर भीतर होने के कारण बचाव अभियान अत्यंत कठिन हो गया है। कई बार सुरंग में पानी भरने से अभियान रोकना पड़ा। जहरीली गैस और सीमित दृश्यता के कारण राहतकर्मियों को विशेष सुरक्षा उपकरणों के साथ काम करना पड़ रहा है।

घटना के तुरंत बाद प्रारंभिक आशंका मीथेन गैस के अचानक विस्फोट (Methane Gas Burst) की जताई गई थी। वहीं बचाव दल के अधिकारियों ने सुरंग के भीतर कार्बन मोनोऑक्साइड गैस की मौजूदगी के संकेत भी दिए हैं। पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर और आसनसोल से विशेषज्ञों की तकनीकी टीम तथा डायरेक्टरेट जनरल ऑफ माइंस सेफ्टी (DGMS) के विशेषज्ञ घटनास्थल पर पहुंच चुके हैं। अब वैज्ञानिक जांच के बाद ही दुर्घटना के वास्तविक कारण स्पष्ट हो सकेंगे।

सिक्किम की निर्माणाधीन तीस्ता स्टेज-6 परियोजना की ADIT-3 सुरंग में हुई भीषण त्रासदी के बाद केवल तकनीकी कारण नहीं, बल्कि सुरक्षा प्रबंधन और प्रशासनिक निर्णयों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।

वहीं एनएचपीसी दावा कर रहा है कि घटना के तुरंत बाद इमरजेंसी प्रोटोकॉल लागू कर दिया गया था। एनएचपीसी ने अपने आधिकारिक बयान में कहा है कि दुर्घटना के तुरंत बाद उसका इमरजेंसी रिस्पॉन्स प्रोटोकॉल सक्रिय कर दिया गया था। कंपनी का कहना है कि जिला प्रशासन, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, डीजीएमएस और अन्य एजेंसियों के साथ मिलकर हर संभव प्रयास किया जा रहा है तथा दुर्घटना के कारणों की विस्तृत जांच कराई जाएगी।

जहां एक ओर एनएचपीसी दुर्घटना के कारणों की विस्तृत जांच की बात कर रहा है, वहीं त्रासदी के बाद सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सबसे बड़े और गंभीर प्रश्न एनएचपीसी की सुरक्षा नीति और मानव संसाधन प्रबंधन पर उठ रहे हैं।

उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार एनएचपीसी के तीन मैनेजर (सेफ्टी) –

  • गौरव राठौर
  • नीरज कुमार
  • पीयूष कांत भास्कर
  • कॉरपोरेट ऑफिस के O&M डिवीजन में तैनात हैं।

जब निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनाओं में सुरक्षा विशेषज्ञों की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, तब क्या तीन-तीन सेफ्टी अधिकारियों का मुख्यालय में तैनात रहना उचित प्रशासनिक निर्णय था? यदि परियोजना स्थल पर अनुभवी सुरक्षा अधिकारियों की कमी थी, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?

FreelancerPost Investigation

अब सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा व्यवस्था पर

यह जांच केवल इस प्रश्न तक सीमित नहीं रह सकती कि गैस कैसे बनी। जांच एजेंसियों के सामने कई महत्वपूर्ण प्रश्न हैं-

  • क्या गैस मॉनिटरिंग सिस्टम पूरी तरह कार्यरत था?
  • क्या Ventilation System मानकों के अनुरूप था?
  • क्या नियमित Safety Audit हुए थे?
  • Emergency Evacuation System कितना प्रभावी था?
  • साइट पर कितने अनुभवी Safety Officers तैनात थे?
  • क्या पहले से किसी जोखिम की चेतावनी मिली थी?
  • यदि मिली थी तो क्या कार्रवाई हुई?

मानव संसाधन प्रबंधन पर भी उठे सवाल

उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड के अनुसार कॉरपोरेट स्तर पर सेफ्टी मैनेजर पदों पर अधिकारी कार्यरत हैं। यदि परियोजना स्थल पर सुरक्षा विशेषज्ञों की उपलब्धता सीमित थी, तो यह भी जांच का विषय हो सकता है कि सुरक्षा संसाधनों की तैनाती परियोजना की आवश्यकताओं के अनुरूप थी या नहीं।

FreelancerPost यह स्पष्ट करता है कि इस संबंध में किसी व्यक्ति या अधिकारी की जिम्मेदारी अभी किसी जांच एजेंसी द्वारा तय नहीं की गई है। यह प्रश्न सार्वजनिक हित में संभावित प्रशासनिक जवाबदेही के संदर्भ में उठाया जा रहा है।

बचाव अभियान क्यों बना सबसे कठिन ऑपरेशन

घटनास्थल सुरंग के प्रवेश द्वार से लगभग डेढ़ किलोमीटर अंदर स्थित है। राहत दल को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है-

  • जहरीली गैस
  • घना धुआं
  • पानी भरना
  • ऑक्सीजन की कमी
  • लगातार बारिश
  • सीमित दृश्यता

इन परिस्थितियों में बचाव अभियान कई बार रोकना पड़ा।

मीथेन या कार्बन मोनोऑक्साइड?

दुर्घटना के तुरंत बाद मीथेन गैस विस्फोट की आशंका जताई गई। बाद में राहत अभियान से जुड़े अधिकारियों ने सुरंग के भीतर कार्बन मोनोऑक्साइड की मौजूदगी के संकेत भी दिए। दुर्गापुर, आसनसोल तथा DGMS के विशेषज्ञ जांच में जुटे हैं। दुर्घटना का वास्तविक कारण अभी आधिकारिक जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।

NHPC का पक्ष

एनएचपीसी का कहना है कि—

  • दुर्घटना के तुरंत बाद Emergency Response Protocol लागू किया गया।
  • NDRF, SDRF, DGMS और जिला प्रशासन के साथ राहत अभियान चलाया जा रहा है।
  • दुर्घटना के कारणों की विस्तृत जांच कराई जाएगी।

2019 में NHPC ने संभाली थी परियोजना

500 मेगावाट की रन-ऑफ-द-रिवर परियोजना पहले Lanco Teesta Hydro Power Ltd के पास थी। कॉरपोरेट दिवालियापन प्रक्रिया के बाद 2019 में NHPC ने इसका अधिग्रहण किया और निर्माण कार्य आगे बढ़ाया।

सरकार सक्रिय, लेकिन जवाबदेही पर सवाल

राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर तथा मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तमांग घटनास्थल का दौरा कर चुके हैं। मुख्य सचिव रविंद्र तेलंग ने उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की। सरकार ने

  • मृतकों के परिजनों को 4 लाख रुपये
  • घायलों को 50 हजार रुपये

की सहायता देने की घोषणा की है।

सबसे बड़ा प्रश्न

25 लोगों की मौत केवल एक आंकड़ा नहीं है। यह उन परिवारों की कहानी है जिनके घर उजड़ गए। यदि जांच में सुरक्षा व्यवस्था, जोखिम प्रबंधन या प्रशासनिक स्तर पर किसी प्रकार की गंभीर चूक सामने आती है, तो जवाबदेही उसी स्तर तक तय होनी चाहिए जहां से निर्णय लिए गए थे। देश केवल यह नहीं जानना चाहता कि सुरंग में गैस कैसे बनी।

देश यह भी जानना चाहता है कि क्या बेहतर सुरक्षा प्रबंधन और समय पर लिए गए निर्णय इन जानों को बचा सकते थे। इसी प्रश्न का उत्तर स्वतंत्र, निष्पक्ष और व्यापक जांच से सामने आना चाहिए।

Disclaimer

यह रिपोर्ट उपलब्ध आधिकारिक बयानों, राहत एजेंसियों की जानकारी और सार्वजनिक रिकॉर्ड के आधार पर तैयार की गई है। दुर्घटना के कारणों तथा किसी भी अधिकारी या संस्था की जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण सक्षम जांच एजेंसियों की रिपोर्ट के बाद ही माना जाएगा।

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awdhesh kumar mishra
Awadhesh Kumar Mishra
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जहाँ हर खबर एक ज़िम्मेदारी है, और हर शब्द एक वचन। 25 सालों से अधिक के सफर में मैंने टीवी और प्रिंट मीडिया के हर पड़ाव को अपनी नज़रों से देखा, अनुभव किया और उसके माध्यम से समाज के सामने सच को रखा। NEWS18 उत्तराखंड में स्टेट हेड/ असाइनमेंट एडीटर रहते हुए मैं न केवल ख़बरों की निगरानी करता रहा, बल्कि हर मुश्किल घड़ी में, चाहे वह चुनावी घमासान हो या हिमालयी आपदा, सीधे मैदान में उतरकर रिपोर्टिंग करता रहा। सहारा टीवी, ETV, ZEE NEWS, जैन टीवी - हर मंच पर मैंने कंटेंट की आत्मा को समझते हुए समाज के उन मुद्दों को उठाया जिन पर अक्सर चुप्पी छाई रहती है। ईटीवी उर्दू के लिए 'हमारे मसाइल', 'गुफ्तगू', और 'कुछ लम्हें फुर्सत के' जैसे कार्यक्रमों के ज़रिए मैंने केवल बातें नहीं कीं, संवाद रचे। मेरे लिए पत्रकारिता महज़ सूचना देने का माध्यम नहीं, वह समाज की नब्ज़ है। और इस नब्ज़ को पकड़ने की कला मैंने अपने अनुभव, अध्ययन और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से मिले ज्ञान से सीखी है। आज भी जब मैं कैमरे के पीछे या कलम के सामने होता हूँ, तो मन में केवल एक विचार होता है - "जो कहूँ, वह सत्य हो। और जो सत्य हो, वह समाज के काम आए।" यह मेरी यात्रा है, जो एक पत्रकार तक सीमित नहीं, एक ज़िम्मेदार नागरिक की जो संवाद को ही बदलाव का सबसे बड़ा साधन मानता है।

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