मुख्य बातें :- Somnath Temple।
- भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम और सबसे प्राचीन माने जाने वाले सोमनाथ मंदिर का गौरवशाली इतिहास।
- सदियों में कई बार ध्वस्त होने के बावजूद हर बार पुनर्निर्माण का अद्भुत उदाहरण।
- चंद्रदेव की तपस्या से जुड़ी पौराणिक मान्यता और प्रभास क्षेत्र का धार्मिक महत्व।
- सरदार पटेल के संकल्प से स्वतंत्र भारत में हुआ भव्य पुनर्निर्माण।
- आज आस्था, विरासत और आधुनिक विकास का वैश्विक केंद्र बन चुका है सोमनाथ।
इन दिनों सावन का पवित्र माह चल रहा है। शिवभक्तों के लिए यह विशेष अवसर होता है, जब वे भगवान भोलेनाथ की आराधना में लीन होकर शिवालयों में जलाभिषेक और पूजा-अर्चना करते हैं। देशभर के मंदिरों में उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़ सनातन संस्कृति में भगवान शिव की आराधना के महत्व को स्वयं प्रमाणित करती है।
बारह ज्योतिर्लिंग केवल मंदिर नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और भारतीय सभ्यता की आध्यात्मिक धरोहर के प्रतीक हैं। FreelancerPost की विशेष श्रृंखला “बारह ज्योतिर्लिंग यात्रा” की पहली कड़ी में हम आपको लेकर चल रहे हैं भारत के प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर।
सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की अदम्य जीवटता का प्रतीक है। सदियों के संघर्ष, अनेक आक्रमणों और बार-बार हुए पुनर्निर्माण की यह गाथा बताती है कि आस्था को मिटाने के हर प्रयास के बाद भी वह पहले से अधिक सशक्त होकर खड़ी हुई।
कहा जाता है कि इस मंदिर को 17 बार मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा तोड़ा गया। लेकिन हर बार ध्वस्त होने के बाद इसका पुनर्निमाण कराया गया। आज वो अपने पूरे वैभव के साथ हमारे विश्वास को मजबूत करता नजर आ रहा है। जितनी जिद इसे तोड़ने वालों ने दिखाई, उतनी ही जिजीविषा के साथ ये फिर से अपने पुराने वैभव में लौटा। आइए इस मंदिर की खासियत और इसके इतिहास के बारे में जानते हैं। क्यों मुस्लिम आक्रमणकारियों ने बार-बार इसे निशाना बनाया, क्यों ये मंदिर आजाद भारत के बाद सियासत के केंद्र में रहा।
सोमनाथ क्यों कहलाता है प्रथम ज्योतिर्लिंग

चंद्रदेव की तपस्या से जुड़ी है मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोमनाथ मंदिर की स्थापना स्वयं चंद्रदेव ने की थी। पौराणिक कथा के अनुसार, जब चंद्रदेव को उनके श्वसुर दक्ष प्रजापति ने क्षय रोग का श्राप दिया, तब उन्होंने गुजरात के प्रभास क्षेत्र (प्रभास पाटन) में भगवान शिव की कठोर तपस्या की।
भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उन्हें श्राप से मुक्ति प्रदान की। कृतज्ञता स्वरूप चंद्रदेव ने यहां स्वर्ण का भव्य मंदिर बनवाया। चंद्रदेव का एक नाम ‘सोम’ भी है, इसी कारण भगवान शिव यहां सोमनाथ के रूप में प्रतिष्ठित हुए। इसी धार्मिक मान्यता के कारण यह स्थान भगवान शिव के प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजनीय माना जाता है।
कहते हैं ईसा पूर्व से यह मंदिर अस्तित्व में था। बाद में सातवीं सदी में वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने इसका पुनर्निमाण कराया।

प्रभास क्षेत्र का आध्यात्मिक महत्व
प्रभास पाटन केवल सोमनाथ मंदिर के कारण ही प्रसिद्ध नहीं है। यह वही पवित्र भूमि मानी जाती है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अपने अवतार का समापन किया था। हिरण, कपिला और सरस्वती नदियों के त्रिवेणी संगम के समीप स्थित यह क्षेत्र प्राचीन काल से भारत के प्रमुख तीर्थों में गिना जाता रहा है।
सोमनाथ मंदिर का इतिहास
इतिहासकारों और धार्मिक परंपराओं के अनुसार, सोमनाथ मंदिर का इतिहास अत्यंत प्राचीन माना जाता है। कहा जाता है कि इसका अस्तित्व ईसा पूर्व काल से जुड़ा हुआ है। समय-समय पर विभिन्न राजवंशों ने मंदिर का पुनर्निर्माण और संरक्षण किया।
बाद में सातवीं शताब्दी में वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने मंदिर का पुनर्निर्माण कराया और इसे पुनः भव्य स्वरूप प्रदान किया। इसके बाद भी अलग-अलग कालखंडों में अनेक शासकों ने मंदिर के संरक्षण और पुनर्निर्माण में योगदान दिया।
सोमनाथ का इतिहास केवल एक धार्मिक स्थल का इतिहास नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, स्थापत्य कला, सांस्कृतिक चेतना और पुनर्निर्माण की अद्भुत परंपरा का भी इतिहास है। यही कारण है कि सदियों बाद भी यह मंदिर श्रद्धा और इतिहास दोनों का केंद्र बना हुआ है।
प्रभास क्षेत्र का आध्यात्मिक महत्व
प्रभास पाटन केवल सोमनाथ मंदिर के कारण ही प्रसिद्ध नहीं है। यह वही पवित्र भूमि मानी जाती है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अपने अवतार का समापन किया था। हिरण, कपिला और सरस्वती नदियों के त्रिवेणी संगम के समीप स्थित यह क्षेत्र प्राचीन काल से भारत के प्रमुख तीर्थों में गिना जाता रहा है।
सोमनाथ मंदिर का इतिहास
इतिहासकारों और धार्मिक परंपराओं के अनुसार, सोमनाथ मंदिर का इतिहास अत्यंत प्राचीन माना जाता है। कहा जाता है कि इसका अस्तित्व ईसा पूर्व काल से जुड़ा हुआ है। समय-समय पर विभिन्न राजवंशों ने मंदिर का पुनर्निर्माण और संरक्षण किया।
बाद में सातवीं शताब्दी में वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने मंदिर का पुनर्निर्माण कराया और इसे पुनः भव्य स्वरूप प्रदान किया। इसके बाद भी अलग-अलग कालखंडों में अनेक शासकों ने मंदिर के संरक्षण और पुनर्निर्माण में योगदान दिया।
सोमनाथ का इतिहास केवल एक धार्मिक स्थल का इतिहास नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, स्थापत्य कला, सांस्कृतिक चेतना और पुनर्निर्माण की अद्भुत परंपरा का भी इतिहास है। यही कारण है कि सदियों बाद भी यह मंदिर श्रद्धा और इतिहास दोनों का केंद्र बना हुआ है।
सोमनाथ एक नजर में :-
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| स्थान | प्रभास पाटन, गिर सोमनाथ, गुजरात |
| धार्मिक महत्व | भगवान शिव का प्रथम ज्योतिर्लिंग |
| समुद्र | अरब सागर |
| प्रमुख नदी संगम | हिरण, कपिला और सरस्वती |
| विशेषता | बाण स्तंभ, समुद्र तट, प्राचीन इतिहास |
कितनी बार टूटा सोमनाथ मंदिर
सोमनाथ मंदिर का इतिहास केवल उसकी भव्यता का नहीं, बल्कि संघर्ष, पुनर्निर्माण और अटूट आस्था का भी इतिहास है। सदियों के दौरान इस मंदिर पर कई बार आक्रमण हुए। अलग-अलग ऐतिहासिक स्रोतों में इनकी संख्या को लेकर मतभेद मिलते हैं, लेकिन यह निर्विवाद है कि हर बड़े आक्रमण के बाद मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया और यह फिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनकर खड़ा हुआ।
ध्वंस और पुनर्निर्माण की प्रमुख घटनाएँ
1. 725 ईस्वी
सिंध के अरब गवर्नर जुनायद ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण के लिए सेना भेजी।
2. 815 ईस्वी
गुर्जर-प्रतिहार शासक राजा नागभट्ट ने मंदिर का पुनर्निर्माण कराया।
3. 1025 ईस्वी
महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर हमला किया, मंदिर को भारी क्षति पहुंचाई और यहां की संपत्ति लूटी।
4. 1026–1042 ईस्वी
गुजरात के राजा भीमदेव प्रथम और मालवा के राजा भोज ने मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य कराया।
5. 1169 ईस्वी
चालुक्य (सोलंकी) शासक कुमारपाल ने मंदिर को फिर से भव्य स्वरूप दिया।
6. 1297 ईस्वी
दिल्ली सल्तनत के विस्तार के दौरान अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने मंदिर को नुकसान पहुंचाया।
7. 1308 ईस्वी
सौराष्ट्र के चूड़ासमा वंश के राजा महिपाल प्रथम ने पुनर्निर्माण कराया। बाद में उनके पुत्र खेंगारा ने 1331 से 1351 के बीच शिवलिंग की पुनः स्थापना कराई।

8. 1395 ईस्वी
जफर खान ने मंदिर पर हमला किया।
9. 1452 ईस्वी
गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा के शासनकाल में मंदिर को फिर क्षति पहुंची।
10. 1665 ईस्वी
मुगल सम्राट औरंगजेब ने मंदिर को तोड़ने और वहां मस्जिद बनाने का आदेश दिया।
11. 1706 ईस्वी
औरंगजेब के शासनकाल में दोबारा मंदिर पर कार्रवाई की गई।
12. 1947
स्वतंत्र भारत में तत्कालीन उपप्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया।
महमूद गजनवी का हमला
सोमनाथ मंदिर के इतिहास में 1025 ईस्वी का आक्रमण सबसे चर्चित घटनाओं में माना जाता है। महमूद गजनवी ने विशाल सेना के साथ सोमनाथ पर हमला किया और मंदिर की संपत्ति लूट ली।
इस घटना का उल्लेख अनेक ऐतिहासिक ग्रंथों और विवरणों में मिलता है। हालांकि लूट, जनहानि और अन्य घटनाओं के संबंध में विभिन्न इतिहासकारों के विवरण अलग-अलग हैं। इसलिए इन घटनाओं का अध्ययन करते समय स्रोतों के अंतर को भी ध्यान में रखना आवश्यक माना जाता है।
गजनवी के आक्रमण के बाद भी मंदिर लंबे समय तक खंडहर नहीं रहा। गुजरात के राजा भीमदेव प्रथम और मालवा के राजा भोज ने इसके पुनर्निर्माण की पहल की और सोमनाथ फिर श्रद्धालुओं के लिए खुल गया।
17 बार क्यों बनाया गया निशाना?
आध्यात्मिक गुरू जग्गी वासुदेव सदगुरू कहते हैं कि सोमनाथ मंदिर को पहली बार तोड़ा गया तो समझा जा सकता है कि संपत्ति लूटने के लिए ऐसा किया गया। लेकिन 17 बार आकर इसे तोड़ा गया। मैंने पूछा ऐसा क्यों हुआ, ऐसा सिर्फ संपत्ति लूटने के लिए नहीं किया गया।
असल में वो तीन देवियां, जिनकी इस्लाम पूर्व काल से अरब में बात होती है। उनमें से एक देवी, जिनकी एक मूर्ति को कोई एक भक्त वहां से ले आया और सोमनाथ में शिव की अर्धांगिनी के रूप में स्थापित कर दिया। वो उस देवी को मिटाना चाहते थे। इसलिए एक आदमी 13 से 1400 किलोमीटर दूर आया।
इसके अतिरिक्त, अनेक इतिहासकार यह भी मानते हैं कि सोमनाथ मंदिर को मिलने वाली अपार संपत्ति, पश्चिमी भारत के समुद्री व्यापार मार्गों के निकट इसकी स्थिति तथा धार्मिक महत्व ने भी इसे राजनीतिक और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बना दिया था।

औरंगजेब के समय क्या हुआ
मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल में भी सोमनाथ मंदिर इतिहास के केंद्र में रहा। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार 1665 ईस्वी में मंदिर को तोड़ने और वहां मस्जिद बनाने का आदेश दिया गया। इसके बाद 1706 ईस्वी में भी मंदिर के विरुद्ध कार्रवाई का उल्लेख मिलता है।
हालांकि इन घटनाओं के संबंध में भी विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में अलग-अलग विवरण मिलते हैं, लेकिन इतना स्पष्ट है कि मंदिर लंबे समय तक संघर्ष का प्रतीक बना रहा।
इसके बावजूद सोमनाथ की आस्था समाप्त नहीं हुई। समय-समय पर स्थानीय शासकों, समाज और श्रद्धालुओं ने मंदिर को फिर से स्थापित किया और उसकी धार्मिक परंपरा को जीवित रखा।
प्रमुख आक्रमण और पुनर्निर्माण
- 725 : पहला बड़ा आक्रमण
- 1025 : महमूद गजनवी
- 1297 : खिलजी काल
- 1452 : महमूद बेगड़ा
- 1665–1706 : औरंगजेब काल
- 1947 : सरदार पटेल का पुनर्निर्माण संकल्प
मंदिर की विशेषता और पौराणिक महत्व
ऋग्वेद और शिवपुराण में सोमनाथ को 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वोच्च स्थान दिया गया है। यानी उन्हें प्रथम ज्योतिर्लिंग कहा गया है। मंदिर प्रांगण में स्थित बाण स्तंभ प्राचीन भारतीय भू-विज्ञान और खगोलशास्त्र का एक अद्भुत नमूना है।
इस स्तंभ पर उत्कीर्ण श्लोक का अर्थ है कि इस बिंदु से दक्षिणी ध्रुव (Antarctica) तक सीधी रेखा में कोई भी भू-भाग या द्वीप नहीं है। यानी सोमनाथ और अंटार्कटिका के बीच केवल जल ही जल है.
यह मंदिर समुद्र तट की दिव्यता के साथ विराजमान है. जहां तीन नदियों-हिरण, कपिला और सरस्वती के पावन ‘त्रिवेणी संगम’ के पास समुद्र तट पर स्थित यह मंदिर अलौकिक सौंदर्य और असीम आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र भी है।
सोमनाथ केवल भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम होने के कारण ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, स्थापत्य और प्राचीन ज्ञान परंपरा का भी अद्भुत प्रतीक माना जाता है।

बाण स्तंभ की अनोखी विशेषता
मंदिर परिसर में स्थित बाण स्तंभ भारतीय भूगोल और खगोल ज्ञान का अद्भुत उदाहरण माना जाता है। इस स्तंभ पर अंकित शिलालेख का आशय है कि इस स्थान से दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में कोई भूभाग नहीं है।
अर्थात सोमनाथ और अंटार्कटिका के बीच केवल समुद्र ही समुद्र है। आज भी लाखों श्रद्धालु इस स्तंभ को देखने विशेष रूप से पहुंचते हैं।
त्रिवेणी संगम और समुद्र तट की दिव्यता
अरब सागर के तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण भी अद्वितीय माना जाता है।
हिरण, कपिला और सरस्वती नदियों के पवित्र त्रिवेणी संगम के निकट स्थित यह मंदिर आध्यात्मिक ऊर्जा और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।
सूर्योदय और सूर्यास्त के समय समुद्र की लहरों के बीच मंदिर का दृश्य श्रद्धालुओं के लिए अविस्मरणीय अनुभव माना जाता है।
📌 क्या आप जानते हैं?
सोमनाथ मंदिर का बाण स्तंभ अक्सर भारत की प्राचीन भौगोलिक समझ के संदर्भ में उल्लेखित किया जाता है और यह मंदिर परिसर के प्रमुख आकर्षणों में से एक है।
आजादी के बाद पुनर्निर्माण
स्वतंत्र भारत के इतिहास में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। 1947 में जूनागढ़ के भारत में विलय के बाद सोमनाथ के भव्य पुनर्निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ।
13 नवंबर 1947 को तत्कालीन उपप्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल प्रभास पाटन पहुंचे। समुद्र का जल हाथ में लेकर उन्होंने संकल्प लिया कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया जाएगा।
इसके बाद प्रसिद्ध साहित्यकार और स्वतंत्रता सेनानी कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (के.एम. मुंशी) ने इस अभियान को संगठित रूप दिया और मंदिर के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
सोमनाथ का आधुनिक स्वरूप स्वतंत्र भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।
नेहरू और डॉ. राजेंद्र प्रसाद के बीच मतभेद
सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण केवल धार्मिक या सांस्कृतिक विषय नहीं रहा, बल्कि स्वतंत्र भारत की प्रारंभिक राजनीति में भी चर्चा का विषय बना।
जब 11 मई 1951 को नए मंदिर में ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा का कार्यक्रम तय हुआ, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने यह मत व्यक्त किया कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के संवैधानिक पदाधिकारियों को किसी धार्मिक आयोजन से दूरी बनाए रखनी चाहिए।
दूसरी ओर, भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का मत अलग था। उनका मानना था कि सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय अस्मिता और विदेशी आक्रमणों के बाद पुनर्जागरण का प्रतीक है।
नेहरू की आपत्तियों के बावजूद डॉ. राजेंद्र प्रसाद 11 मई 1951 को सोमनाथ पहुंचे और प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में शामिल हुए।
अपने ऐतिहासिक संबोधन में उन्होंने कहा-
“सोमनाथ का यह मंदिर केवल एक ढांचा नहीं है, यह इस बात का प्रतीक है कि निर्माण की शक्ति विनाश की शक्ति से हमेशा बड़ी होती है।”
यह भाषण आज भी स्वतंत्र भारत के सांस्कृतिक इतिहास के महत्वपूर्ण दस्तावेजों में गिना जाता है।
📌 फैक्ट बॉक्स
सोमनाथ पुनर्निर्माण से जुड़े प्रमुख नाम

- सरदार वल्लभभाई पटेल
- के.एम. मुंशी
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद
- प्रभास पाटन
- जूनागढ़ का भारत में विलय
आज का भव्य सोमनाथ
21वीं सदी में सोमनाथ मंदिर केवल धार्मिक श्रद्धा का केंद्र ही नहीं, बल्कि वैश्विक पर्यटन और भारतीय सांस्कृतिक विरासत का भी एक प्रमुख केंद्र बन चुका है।
हाल के वर्षों में मंदिर परिसर और प्रभास पाटन क्षेत्र के समग्र विकास पर विशेष ध्यान दिया गया है। समुद्र तट के किनारे लगभग 1.5 किलोमीटर लंबे वॉकवे का निर्माण किया गया है, जहाँ श्रद्धालु समुद्र की लहरों के बीच मंदिर के मनोहारी दृश्य का आनंद ले सकते हैं।
‘PRASHAD (Pilgrimage Rejuvenation and Spiritual Heritage Augmentation Drive)‘ योजना के तहत यात्री सुविधा केंद्र, प्रदर्शनी केंद्र, प्रकाश एवं ध्वनि (Sound & Light) शो तथा अन्य आधुनिक सुविधाएँ विकसित की गई हैं।
सोमनाथ आज आधुनिक परिवहन, डिजिटल सुविधाओं और पर्यटन अवसंरचना से जुड़कर देश-विदेश के श्रद्धालुओं के लिए पहले से अधिक सुलभ हो गया है। अपनी प्राचीन चालुक्य (नागर) स्थापत्य शैली को संरक्षित रखते हुए यह मंदिर आधुनिक भारत के “विकास भी, विरासत भी” के संकल्प का सशक्त उदाहरण बनकर उभरा है।

धूल में मिली बर्बरता, सीना ताने खड़ा सोमनाथ का शिखर
सोमनाथ मंदिर केवल पत्थरों का एक ढांचा नहीं है, यह भारत के महाकाल का वह अमर स्तूप है जो यह संदेश देता है कि सत्य, संस्कृति और आस्था को कितनी भी बार कुचलने का प्रयास किया जाए, वह हर बार पहले से अधिक तेजस्वी होकर सामने आती है।
गजनवी से लेकर औरंगजेब तक की बर्बरता धूल में मिल गई, नेहरूकालीन वैचारिक संकोच इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए, लेकिन सोमनाथ का शिखर आज भी अरब सागर की लहरों के ऊपर सीना ताने खड़ा है।
सरदार पटेल के संकल्प, डॉ. राजेंद्र प्रसाद की दूरदर्शिता और वर्तमान भारत के पुनर्जागरण के साथ सोमनाथ आज भारत के गौरवमयी अतीत और स्वर्णिम भविष्य का दैदीप्यमान प्रतीक है.

कैसे पहुँचें सोमनाथ मंदिर
✈️ हवाई मार्ग
निकटतम हवाई अड्डा दीव है, जो सोमनाथ से लगभग 85 किलोमीटर दूर स्थित है। इसके अलावा राजकोट और अहमदाबाद से भी सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है।
🚆 रेल मार्ग
सोमनाथ (वेरावल) रेलवे स्टेशन देश के कई प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। स्टेशन से मंदिर की दूरी बहुत कम है और टैक्सी तथा ऑटो की सुविधा उपलब्ध रहती है।
🛣️ सड़क मार्ग
अहमदाबाद, राजकोट, जूनागढ़, द्वारका और गिर सोमनाथ से नियमित बस एवं टैक्सी सेवाएँ उपलब्ध हैं। गुजरात राज्य सड़क परिवहन निगम (GSRTC) की बसें भी बड़ी संख्या में संचालित होती हैं।
दर्शन का समय
- सुबह : लगभग 6:00 बजे से दर्शन प्रारंभ
- मंगला आरती
- दोपहर आरती
- संध्या आरती
- रात्रि दर्शन
- साउंड एंड लाइट शो (शाम के समय)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. सोमनाथ मंदिर कहाँ स्थित है?
गुजरात के गिर सोमनाथ जिले के प्रभास पाटन में।
2. सोमनाथ प्रथम ज्योतिर्लिंग क्यों कहलाता है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार चंद्रदेव ने भगवान शिव की आराधना कर यहाँ प्रथम ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी।
3. सोमनाथ मंदिर का इतिहास कितना पुराना माना जाता है?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसका इतिहास अत्यंत प्राचीन है, जबकि ऐतिहासिक स्रोतों में सातवीं शताब्दी से इसके पुनर्निर्माण के उल्लेख मिलते हैं।
4. सोमनाथ मंदिर कितनी बार टूटा?
विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में इस संबंध में अलग-अलग विवरण मिलते हैं। कई लोकप्रिय विवरणों में अनेक आक्रमणों और पुनर्निर्माणों का उल्लेख है।
5. सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण किसने कराया?
स्वतंत्र भारत में सरदार वल्लभभाई पटेल के संकल्प के बाद के.एम. मुंशी के मार्गदर्शन में आधुनिक मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया।
6. सोमनाथ मंदिर घूमने का सबसे अच्छा समय कौन-सा है?
अक्टूबर से मार्च का समय मौसम की दृष्टि से अनुकूल माना जाता है। हालांकि सावन और महाशिवरात्रि के दौरान यहाँ विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं।
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