नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे दो बालिगों के अधिकारों को लेकर अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि जब दो बालिग लोग अपनी मर्जी और आपसी सहमति से साथ रह रहे हों, तो उन्हें अपने साथी को चुनने और उसके साथ रहने का पूरा अधिकार है। माता-पिता, रिश्तेदार या दोस्त उनकी निजी पसंद में दखल नहीं दे सकते और न ही उनकी जान या आजादी को खतरे में डाल सकते हैं।
जस्टिस सौरभ बनर्जी ने लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे एक जोड़े की याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। जोड़े ने आरोप लगाया था कि लड़की के परिवार की ओर से उनके रिश्ते का विरोध किया जा रहा है और उन्हें धमकियां मिल रही हैं।
लिव-इन रिलेशनशिप शादी के समान, लेकिन कानूनी शादी नहीं
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता कानूनी रूप से विवाहित नहीं हैं और लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं, लेकिन दोनों बालिग और सहमति से इस रिश्ते में हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लिव-इन रिश्ता “विवाह के समान” है, हालांकि इसे कानूनी तौर पर विवाह नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि दोनों ने 17 फरवरी 2026 को एक Live-in Relationship Agreement भी किया था, जिसमें साथ रहने की उनकी इच्छा और निर्णय दर्ज था।
माता-पिता और रिश्तेदारों को दखल का अधिकार नहीं
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब दोनों व्यक्ति बालिग हैं और अपनी इच्छा से रिश्ते में रह रहे हैं, तो उनके माता-पिता, रिश्तेदार या दोस्त उनके फैसले में हस्तक्षेप नहीं कर सकते।
कोर्ट के मुताबिक, किसी को भी उनके रिश्ते में बाधा डालने या उनकी जान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को खतरे में डालने का अधिकार नहीं है।
जाति, धर्म और सामाजिक पूर्वाग्रह के आधार पर नहीं रोक सकते
अदालत ने कहा कि भारत में दो सहमति वाले बालिग लोगों के बीच विवाह को उनकी जाति, पंथ, रंग, धर्म या आस्था के आधार पर अलग नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत मिले स्वतंत्रता, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों का भी उल्लेख किया।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Shafin Jahan v. Asokan K.M. फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सामाजिक नैतिकता और पूर्वाग्रहों के आधार पर इन मौलिक अधिकारों को सीमित करना व्यक्ति की अपनी पहचान और स्वतंत्रता को प्रभावित करता है।
धमकियों के बीच कोर्ट ने दी पुलिस सुरक्षा
जोड़े ने हाई कोर्ट से अपनी जान और स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग की थी। उनका कहना था कि लड़की के पिता समेत परिवार के लोग उनके रिश्ते से खुश नहीं थे और उन्हें धमकियां दी जा रही थीं।
हाई कोर्ट ने याचिका मंजूर करते हुए जोड़े को जरूरत पड़ने पर संबंधित थाने के SHO या बीट कांस्टेबल से संपर्क करने की अनुमति दी और पुलिस को कानून के मुताबिक आवश्यक सहायता और सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
दूसरे इलाके में जाने पर भी सुरक्षा जारी रहेगी
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जोड़ा किसी दूसरे पुलिस थाना क्षेत्र में रहने के लिए जाता है, तो उसे तीन दिनों के भीतर संबंधित SHO को अपने नए पते की जानकारी देनी होगी। इसके बाद संबंधित पुलिस थाना भी उन्हें आवश्यक सहायता और सुरक्षा उपलब्ध कराएगा।
बालिगों की पसंद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर कोर्ट का जोर
दिल्ली हाई कोर्ट का यह आदेश एक बार फिर इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि बालिग व्यक्ति अपने जीवन और रिश्तों से जुड़े निजी फैसले अपनी इच्छा से ले सकते हैं। परिवार या समाज की असहमति किसी व्यक्ति की जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को खत्म नहीं कर सकती।
हालांकि, कोर्ट की टिप्पणी का अर्थ यह नहीं है कि लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी विवाह का दर्जा मिल गया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से इसे कानूनी विवाह से अलग, लेकिन परिस्थितियों में विवाह के समान बताया है।
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