नीम करौली बाबा के जीवन पर बनी फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने एक तरह से चमत्कार ही कर दिया है। रिलीज के 24वें दिन इस फिल्म ने 13 करोड़ की कमाई की है. बिना किसी बड़े स्टारकास्ट, भारी-भरकम बजट या आक्रामक पब्लिसिटी के बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रचना आसान नहीं होता। लेकिन सनातन आस्था और जन-विश्वास के बल पर बनी फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने यह कर दिखाया है। महज 2 करोड़ रुपये की लागत में तैयार हुई इस डिवोशनल फिल्म ने सिनेमाघरों में ‘आवारपन 2’ और ‘टॉक्सिक’ जैसी 500 करोड़ी व बड़े सितारों से सजी फिल्मों के बीच अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।
फिल्म ‘हनुमान अंश’ 7 अगस्त को पर्दे पर उतरी थी। शुरुआत बेहद धीमी रही, जहाँ पहले दिन महज 10 लाख रुपये का कलेक्शन हुआ और शुरुआती दो हफ्तों में फिल्म करीब 1.48 करोड़ रुपये ही बटोर सकी। ट्रेड एनालिस्ट इसे एक सामान्य रिलीज मान रहे थे, लेकिन तीसरे हफ्ते से जो हुआ, उसने सबको चौंका दिया। दर्शकों के ‘वर्ड ऑफ माउथ’ और सोशल मीडिया पर मिले शानदार रिस्पॉन्स के बाद फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने अचानक रफ्तार पकड़ी और सिनेमाघरों में शोज़ की संख्या तेजी से बढ़ने लगी।
बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ‘हनुमान अंश’ का प्रदर्शन
| समयावधि / दिन | कलेक्शन / प्रदर्शन | मुख्य बिंदु |
|---|---|---|
| पहला दिन | ₹10 लाख | धीमी शुरुआत |
| शुरुआती 2 सप्ताह | ₹1.48 करोड़ | कम शोज |
| तीसरा सप्ताह | ₹10 करोड़+ | ‘माउथ पब्लिसिटी’ से उछाल |
| चौथा शुक्रवार (22वां दिन) | ₹6.25 करोड़ | कमाई में तेजी |
| चौथा शनिवार (23वां दिन) | ₹9.25 करोड़ | करीब 48% की बढ़त |
| चौथा रविवार (24वां दिन) | ₹12.75 करोड़ | अब तक का शानदार दैनिक आंकड़ा |
| कुल बॉक्स ऑफिस कलेक्शन | ₹40.13 करोड़ (अब तक) | फिल्म की बड़ी सफलता |

कम बजट, बड़ा धमाका: ‘हनुमान अंश’ की सफलता
जहाँ भारी-भरकम बजट, पाश्चात्य संस्कृति की नकल और अत्यधिक हिंसा पर बनी फिल्में दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने में नाकाम रहीं, वहीं मात्र 2 करोड़ रुपये में बनी ‘हनुमान अंश’ ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों और नीम करौली बाबा के प्रति जन-आस्था के बल पर इतिहास रच दिया। बिना किसी महंगे प्रमोशन के रिलीज़ हुई इस फिल्म ‘हनुमान अंश’ की असली ताकत दर्शकों की ‘माउथ पब्लिसिटी’ बनी, जिसके दम पर धीमी शुरुआत के बावजूद तीसरे और चौथे हफ्ते में इसके शोज़ तेजी से बढ़े। नतीजतन, 500 करोड़ी फिल्मों को पछाड़ते हुए 40 करोड़ रुपये से अधिक का कलेक्शन कर ‘हनुमान अंश’ 2026 की सबसे बड़ी और अप्रत्याशित ब्लॉकबस्टर बनकर उभरी।
फिल्म डायरेक्टर ने कमाई गिनना बंद किया
फिल्म ‘हनुमान अंश’ की इस अप्रत्याशित सफलता और सिनेमाघरों में लगातार बढ़ते शोज़ के बीच निर्देशक विशाल चतुर्वेदी ने एक बेहद भावुक प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अब बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों और कमाई का हिसाब रखने की दौड़ से पूरी तरह बाहर हो चुके हैं। उनका मानना है कि जब किसी फिल्म को दर्शकों का इतना अगाध प्रेम और आत्मिक जुड़ाव मिलने लगे, तो उसे रुपये-पैसे के गणित में तौलना बेमानी हो जाता है। सिनेमाघरों में रोजाना बढ़ते शोज़ और दर्शकों की आंखों में उमड़ती आस्था ही उनके लिए सबसे बड़ी कमाई है।
फिल्म पर बरसी बजरंगबली और बाबा की कृपा
फिल्म ‘हनुमान अंश’ को मिल रहे इस अभूतपूर्व जन-समर्थन को सिनेमा जगत केवल बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों से आंक रहा है, लेकिन आम दर्शक इसे एक अलौकिक संयोग मान रहे हैं। बाबा नीम करौली का संपूर्ण जीवन चमत्कारों, अटूट भक्ति और हनुमान जी की कृपा से भरा रहा है; वे स्वयं हनुमान जी के अनन्य भक्त और उनके अवतार स्वरूप माने जाते हैं। ऐसे में बिना किसी भारी-भरकम प्रचार के एक साधारण बजट की फिल्म का 500 करोड़ी फिल्मों को पछाड़कर यूं सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित करना, लोगों की दृष्टि में महज एक ‘सफलता’ नहीं बल्कि बाबा नीम करौली की सूक्ष्म लीला और बजरंगबली का प्रत्यक्ष आशीर्वाद है। जहाँ एक ओर फिल्म ‘हनुमान अंश’ की विषयवस्तु दर्शकों के दिलों को छू रही है, वहीं दूसरी ओर सनातन चेतना से जुड़ा यह जन-सैलाब यह संदेश दे रहा है कि जब निष्ठा और सत्य का पर्दा पर्दे पर जीवंत होता है, तो कृपा अपने आप बरसने लगती है।

फ़िल्म की सफलता के पीछे छिपी सात्विक साधना और आध्यात्मिक अनुशासन
फ़िल्म ‘हनुमान अंश’ की रिकॉर्डतोड़ सफलता के बीच निर्देशक विशाल चतुर्वेदी ने इसके पीछे का एक अनोखा आध्यात्मिक पहलू उजागर किया है। उन्होंने बताया कि ‘हनुमान अंश’ की शूटिंग शुरू होने से पहले जब निर्माता पूज्य प्रेमानंद महाराज जी के दर्शन करने पहुँचे, तो महाराज जी ने मुख्य भूमिका निभाने वाले कलाकार के लिए पूर्ण शाकाहार और पवित्र आचरण की अनिवार्यता बताई थी। इस सीख को आत्मसात करते हुए पूरी शूटिंग के दौरान सेट को एक आश्रम की तरह अनुशासित रखा गया। वहाँ मांसाहार, मदिरा और अपशब्दों पर पूरी तरह पाबंदी थी तथा केवल शुद्ध सात्विक भोजन ही परोसा जाता था। हर दिन के काम की शुरुआत और समाप्ति पूरे क्रू द्वारा सामूहिक हनुमान चालीसा पाठ से होती थी। निर्देशक के अनुसार, सेट के इसी भक्तिमय और सकारात्मक माहौल की वजह से फ़िल्म ‘हनुमान अंश’ में वह अलौकिक प्रभाव पैदा हो सका, जिसने दर्शकों के दिलों को गहराई से छू लिया।
आइए, बाबा नीम करौली के चमत्कार और लीलाओं को जानते हैं.
जब हैरान प्रो.रिचर्ड अल्बर्ट बने ‘राम दास’
यह बात 1967 की है, जब अमेरिका के प्रतिष्ठित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रिचर्ड अल्बर्ट भारत की यात्रा पर आए थे। मनोविज्ञान और मानव चेतना पर शोध कर रहे रिचर्ड उस समय ‘एलएसडी’ (LSD) नामक एक शक्तिशाली साइकेडेलिक ड्रग पर रिसर्च कर रहे थे, जिसके प्रभाव से इंसान का समय और दिशा का भान खत्म हो जाता था और एक साधारण खुराक का असर भी 12 से 24 घंटे तक बना रहता था। इसी वैज्ञानिक उत्सुकता और अहंकार के साथ रिचर्ड कैंची धाम में संत बाबा नीम करौली से मिले। जब उन्होंने इस जादुई गोली के कसीदे पढ़े, तो बाबा ने शांत भाव से मुस्कुराते हुए उनसे गोलियां मांगीं। रिचर्ड ने मुट्ठी भर गोलियां उनके हाथ में रख दीं, यह सोचकर कि बाबा शायद एक-दो का परीक्षण करेंगे; लेकिन बाबा नीम करौली ने बिना किसी झिझक के वह पूरी मुट्ठी भर गोलियां एक साथ फाँक लीं।
रिचर्ड हक्के-बक्के रह गए और सोचने लगे कि इस प्राणघातक मात्रा (Lethal dose) से या तो बाबा का शरीर ढह जाएगा या वे सुध-बुध खो बैठेंगे। लेकिन घंटे बीत जाने के बाद भी न तो बाबा की आंखों में कोई बदलाव आया और ना ही चेहरे पर; वे अपने कंबल में लिपटे शांत मुस्कुराते रहे। उस रसायन का अलौकिक चेतना के स्वामी बाबा पर शून्य असर हुआ, जिसने रिचर्ड के वैज्ञानिक अहंकार और तार्किक दिमाग को हमेशा के लिए ध्वस्त कर दिया। उसी क्षण उन्होंने बाबा के चरणों में घुटने टेक दिए और उन्हें अपना गुरु मानकर ‘महाराजजी’ कहना शुरू किया। बाबा ने उन्हें नया नाम दिया-राम दास। इसके बाद 2019 में अपनी अंतिम सांस लेने तक वे ‘राम दास’ के रूप में ही सनातन अध्यात्म, योग और सेवा के प्रचार-प्रसार में समर्पित रहे।

स्टीव जॉब्स को नीम करौली बाबा की कृपा से मिली सफलता
यह बात 1974 की है, जब एप्पल (Apple) के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स अपने जीवन के सबसे कठिन और मानसिक उलझन वाले दौर से गुजर रहे थे। उस समय 19 वर्षीय जॉब्स सत्य, जीवन के उद्देश्य और आत्मिक शांति की तलाश में भारत आए थे। उन्होंने अपने दोस्त डैन कॉटके के साथ नीम करौली बाबा की प्रसिद्धि सुनकर कैंची धाम (उत्तराखंड) की यात्रा की योजना बनाई। हालांकि, जब स्टीव जॉब्स आश्रम पहुंचे, तो उन्हें पता चला कि बाबा नीम करौली सितंबर 1973 में ही अपना शरीर त्याग (समाधि) चुके थे।
बाबा के सशरीर न होने के बावजूद स्टीव जॉब्स ने कैंची धाम आश्रम में कुछ समय बिताया, जहाँ उन्हें बाबा की ऊर्जा, सादगी और विचारों का गहरा अहसास हुआ। वहाँ रहकर उन्होंने भारतीय दर्शन और ध्यान (Meditation) को समझा। भारत यात्रा और नीम करौली बाबा के स्थान से मिली इस आत्मिक शांति और स्पष्टता ने जॉब्स के जीवन की दिशा बदल दी। अमेरिका वापस लौटकर 1976 में उन्होंने एप्पल कंपनी की नींव रखी।
स्टीव जॉब्स ने बाद में स्वीकार किया था कि भारत यात्रा और बाबा के आश्रम की ऊर्जा ने उन्हें चीजों को सरल (Minimalistic) और स्पष्ट तरीके से देखने का दृष्टिकोण दिया, जो एप्पल के प्रोडक्ट्स के डिज़ाइन की सबसे बड़ी ताकत बनी। इतना ही नहीं, जब फेसबुक (अब Meta) के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग 2015 में भारत दौरे पर आए थे, तब उन्होंने खुलासा किया था कि जब फेसबुक अपने कठिन दौर से गुजर रहा था, तब स्टीव जॉब्स ने ही उन्हें भारत जाकर नीम करौली बाबा के कैंची धाम आश्रम जाने की सलाह दी थी। आज दुनिया की सबसे सफल तकनीकी कंपनियों के पीछे नीम करौली बाबा के उस पावन स्थल की प्रेरणा और सूक्ष्म कृपा को एक बड़ा मोड़ माना जाता है।
मार्क जुकरबर्ग की कैंची धाम यात्रा: जब फेसबुक को मिला नया जीवन
यह बात 2000 के दशक के मध्य की है, जब फेसबुक अपनी शुरुआत के कुछ ही सालों बाद बेहद कठिन दौर से गुजर रहा था। कंपनी को तकनीकी समस्याओं के साथ-साथ कई व्यापारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था और हालात इतने बिगड़ चुके थे कि मार्क जुकरबर्ग के पास फेसबुक को बेचने के प्रस्ताव आने लगे थे। दुविधा और मानसिक तनाव से घिरे जुकरबर्ग ने जब अपने मेंटर और एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स से सलाह ली, तो जॉब्स ने उन्हें तुरंत भारत स्थित बाबा नीम करौली के कैंची धाम आश्रम जाने का सुझाव दिया। जॉब्स ने बताया कि कैसे अपनी युवावस्था के कठिन दिनों में कैंची धाम की यात्रा ने उन्हें आत्मिक स्पष्टता और जीवन का नया दृष्टिकोण दिया था।
स्टीव जॉब्स की सलाह पर जुकरबर्ग भारत आए और उन्होंने उत्तराखंड के कैंची धाम आश्रम में एक हफ्ता बिताया। आश्रम के अलौकिक और शांत वातावरण में ध्यान लगाते हुए उन्हें गहराई से अहसास हुआ कि उनका और फेसबुक का असली उद्देश्य केवल एक कंपनी चलाना नहीं, बल्कि दुनिया भर के लोगों को आपस में जोड़ना है। वहाँ से एक नई ऊर्जा और सोच के साथ अमेरिका वापस लौटकर उन्होंने कंपनी बेचने का विचार हमेशा के लिए त्याग दिया और फेसबुक को दुनिया का सबसे बड़ा सोशल मीडिया नेटवर्क बनाने में जुट गए। 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक संवाद के दौरान जुकरबर्ग ने स्वयं स्वीकार किया था कि कैंची धाम की उस यात्रा और बाबा के सूक्ष्म आशीर्वाद ने फेसबुक का भविष्य बदल दिया था।

जब बाबा की लीला के आगे रुका रेलवे का चक्का
यह घटना बाबा नीम करौली के शुरुआती जीवन की है, जब वे प्रथम श्रेणी (First Class) के डिब्बे में यात्रा कर रहे थे। ‘नीब करोरी’ स्टेशन पर जब टिकट चेकर (TTE) ने उनके पास टिकट नहीं पाया, तो उसने बाबा को भला-बुरा कहकर जबरन ट्रेन से नीचे उतार दिया। बाबा बिना किसी विरोध के मुस्कुराते हुए उतरे और पटरी के पास पेड़ के नीचे शांत बैठ गए। लेकिन असली चमत्कार तब हुआ जब गार्ड के झंडी दिखाने के बाद भी ट्रेन का इंजन टस से मस नहीं हुआ। दूसरा इंजन लगाया गया, तमाम तकनीकी जांचें हुईं, लेकिन ट्रेन आगे ही नहीं बढ़ी।
जब अधिकारियों को एक यात्री के माध्यम से अहसास हुआ कि उन्होंने एक महान संत का अपमान किया है, तो वे तुरंत बाबा के पास दौड़े और उनसे क्षमा मांगी। बाबा दो शर्तों पर ट्रेन में वापस बैठने को तैयार हुए—पहला, नीब करोरी गाँव में स्थायी रेलवे स्टेशन बने और दूसरा, साधु-संतों के साथ दोबारा कभी दुर्व्यवहार न हो। अधिकारियों के सहमति जताते ही बाबा जैसे ही डिब्बे में चढ़े, बंद पड़ी ट्रेन पलक झपकते ही चल पड़ी। इस अलौकिक घटना के बाद ही रेलवे ने वहाँ नीब करोरी स्टेशन का निर्माण कराया और बाबा का नाम ‘नीब करोरी वाले बाबा’ के रूप में विख्यात हो गया।
जब बाबा ने मिटाया माता-पिता का विलाप: मृत्यु के मुख से वापस लौटा बेटा
नीम करौली बाबा के जीवन से जुड़ा यह प्रसंग उनकी असीम अनुकंपा और भक्तों के दुख को स्वयं पर ले लेने की सामर्थ्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है। एक बार एक परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा; उनका एकमात्र युवा बेटा गंभीर रूप से बीमार हो गया और डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया। बेटे की सांसें थमने लगी थीं और घर में माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल था। जब इस बात की खबर बाबा नीम करौली को लगी, तो वे स्वयं उस भक्त के घर पहुँचे।
कमरे में बेसुध पड़े लड़के को देखकर बाबा ने करुणामयी दृष्टि से उसे निहारा और अपना अलौकिक कंबल उसके शरीर पर ओढ़ा दिया। बाबा कुछ देर वहीं शांत बैठे रहे और सूक्ष्म रूप से उस बालक के सारे कष्ट और बीमारी का भार स्वयं पर ले लिया। थोड़ी ही देर में वह लड़का, जिसे डॉक्टर मृतप्राय घोषित कर चुके थे, पूरी तरह स्वस्थ होकर उठ बैठा। वहीं दूसरी ओर, भक्त के संकट को हरने के कारण बाबा का अपना शरीर कुछ समय के लिए भारी और अस्वस्थ हो गया। इस अलौकिक घटना ने न केवल एक बुझते हुए चिराग को नया जीवन दिया, बल्कि रोते हुए माता-पिता के विलाप को हमेशा के लिए अटूट आस्था में बदल दिया।
नीम करौली बाबा की अनूठी लीलाएँ
बाबा नीम करौली की अलौकिक शक्तियों में सबसे अद्भुत उनकी द्वि-उपस्थिति (Bilocations) और मौसम को नियंत्रित करने की लीलाएँ थीं। ऐसे कई प्रसंग दर्ज हैं जहाँ बाबा एक ही समय में दो अलग-अलग शहरों में भक्तों की मदद करते पाए गए। भीषण गर्मी और तपती धूप में पदयात्रा करते समय भक्तों को धूप से बचाने के लिए उनके ऊपर बादलों का छत्र बन जाना आम बात थी। वहीं युद्ध के समय की एक प्रसिद्ध घटना है, जब बाबा ने एक सैनिक भक्त को भीषण गोलीबारी के बीच ढाल बनकर बचाया और बाद में अपने कंबल से बंदूक की दर्जनों गोलियाँ झाड़कर नीचे गिरा दी थीं। बाबा की एक और अनूठी लीला जल और भोजन को कभी खत्म न होने देने की थी। कैंची धाम और वृंदावन आश्रम में जब भी अचानक हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती और भोजन कम पड़ने लगता, तो बाबा के केवल कड़ाही को छूने मात्र से वह प्रसाद हजारों लोगों के पेट भरने के बाद भी कम नहीं पड़ता था। बाबा बिना कहे किसी के भी मन की बात जान लेते थे और अतीत या भविष्य को हथेली पर रखी वस्तु की तरह देख सकते थे। वे कोई लंबे प्रवचन नहीं देते थे; ‘सबकी सेवा करो, सबको भोजन कराओ और ईश्वर को याद रखो’ का उनका सरल संदेश ही लाखों जिंदगियों का मार्गदर्शन करता रहा।

साधारण वेशभूषा में अलौकिक यात्रा
बाबा नीम करौली का जन्म उत्तर प्रदेश के अकबरपुर (फ़िरोज़ाबाद) गाँव में एक समृद्ध ब्राह्मण परिवार में हुआ था, जहाँ उनका नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा रखा गया। महज 11 वर्ष की अल्पायु में विवाह होने के बावजूद, उनका मन सांसारिक सुख-सुविधाओं में नहीं लगा और वे गृहत्याग कर सत्य व साधना की खोज में निकल पड़े। शुरुआती वर्षों में उन्होंने एक रमता जोगी की तरह पूरे उत्तर भारत में भ्रमण किया और कठोर तपस्या की। इस दौरान फर्रुखाबाद के नीब करोरी गाँव में एक बावड़ी के पास गुफा बनाकर की गई उनकी साधना विशेष रूप से प्रसिद्ध हुई, जिसके बाद ग्रामीणों ने उन्हें ‘नीब करोरी वाले बाबा’ का नाम दिया। अपनी पहचान को हमेशा छिपाकर रखने वाले बाबा की सादगी, बिना किसी आडंबर के जन-कल्याण करने की भावना और हनुमान जी के प्रति उनकी अनन्य भक्ति ने शुरुआती दौर में ही लोगों को उनकी ओर आकर्षित करना शुरू कर दिया था।
कैंची धाम का इतिहास: आस्था और अलौकिक चेतना का केंद्र
उत्तराखंड के नैनीताल जिले में भवाली-अल्मोड़ा मार्ग पर शिप्रा नदी के तट पर स्थित कैंची धाम देश-विदेश के श्रद्धालुओं के लिए असीम श्रद्धा और आत्मिक शांति का केंद्र है। देवभूमि की शांत पहाड़ियों में बसे इस आश्रम की स्थापना 1960 के दशक में महान संत बाबा नीम करौली ने की थी। दो घुमावदार पहाड़ियों के बीच ‘कैंची’ के आकार में बने इस स्थान पर बाबा ने 15 मई 1962 को एक चबूतरे की नींव रखी थी। इसके बाद 15 जून 1964 को आश्रम में हनुमान जी की मूर्ति की भव्य प्रतिष्ठा की गई, जिसके उपलक्ष्य में हर साल 15 जून को कैंची धाम का प्रसिद्ध स्थापना दिवस मनाया जाता है, जहाँ लाखों भक्त विशाल भंडारे का प्रसाद ग्रहण करने पहुँचते हैं।
स्थापना के बाद से ही कैंची धाम कई अलौकिक घटनाओं और चमत्कारों का साक्षी रहा है; जैसे भंडारे के दौरान घी कम पड़ने पर शिप्रा नदी का जल कड़ाही में डालते ही शुद्ध देसी घी में बदल जाना। यह पावन धाम केवल भारतीय साधकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हार्वर्ड के प्रोफेसर रिचर्ड अल्बर्ट (राम दास), एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स और फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग जैसी वैश्विक हस्तियों ने भी अपने कठिन दौर में यहाँ आकर आत्मिक दिशा प्राप्त की। 11 सितंबर 1973 को बाबा के महासमाधि लेने के बाद यहाँ उनकी समाधि और भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। आज भी बिना किसी आडंबर के, कैंची धाम बाबा की सूक्ष्म उपस्थिति और जन-कल्याणकारी चेतना का अमर प्रतीक बना हुआ है।

सादगी में छिपी अलौकिक चेतना
बाबा नीम करौली का जीवन और उनकी लीलाएँ यह सिद्ध करती हैं कि सच्चा अध्यात्म आडंबरों, लंबे प्रवचनों या दिखावे में नहीं, बल्कि निस्वार्थ प्रेम और जन-सेवा में निहित है। एक साधारण कंबल लपेटे, सादगी से मुस्कुराते हुए उन्होंने न केवल भारत के आम ग्रामीण श्रद्धालुओं का दुख हरा, बल्कि पश्चिमी जगत के वैज्ञानिकों, विचारकों और तकनीकी दिग्गजों को भी जीवन की सही दिशा दिखाई। कैंची धाम आज भी उसी निरहंकार और दिव्य ऊर्जा का संवाहक बना हुआ है, जो हर भटकती आत्मा को शांति का मार्ग दिखाती है।
समय और स्थान के बंधनों से परे, बाबा नीम करौली का संदेश आज के इस आधुनिक और आपाधापी भरे युग में और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। उनकी दिखाई राह हमें सिखाती है कि चाहे सफलता के शिखर पर पहुँचना हो या जीवन के कठिन संकटों से जूझना हो, ‘सबकी सेवा, सबको भोजन और ईश्वर पर अटूट विश्वास’ ही मानवता का सबसे बड़ा कल्याणकारी मार्ग है। बाबा आज भी अपने भक्तों के दिलों में और कैंची धाम की पावन फिज़ाओं में सूक्ष्म रूप से विराजमान हैं।
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