Series Label: किस्से-कहानियां | रंगीलो राजस्थान के किस्से
जयपुर। राजस्थान के किलों और इतिहास के पन्नों में राजस्थान की वीरांगनाओं की जौहर की ऐसी कई गाथाएं दर्ज हैं, जिन्हें आज भी साहस, स्वाभिमान और बलिदान की कहानियों के रूप में याद किया जाता है। चित्तौड़ से रणथंभौर और चंदेरी तक, इन कथाओं में इतिहास के साथ लोकस्मृतियों की भी गहरी छाप दिखाई देती है। ‘रंगीलो राजस्थान के किस्से’ की इस कड़ी में जानिए उन वीरांगनाओं की कहानियां, जिनके जीवन और बलिदान ने राजस्थान की ऐतिहासिक स्मृति पर अमिट छाप छोड़ी।
रानी पद्मावती और चित्तौड़ की वीरांगनाओं द्वारा प्रज्वलित की गई जौहर की अग्नि केवल आत्मदाह का इतिहास नहीं, बल्कि पराधीनता के विरुद्ध स्वाभिमान, स्त्री अस्मिता और सर्वोच्च बलिदान की एक अमर गाथा है। आज जहाँ एक ओर इसे भारतीय चेतना में साहस और गरिमा के सर्वोच्च शिखर के रूप में देखा जाता है, वहीं आधुनिक विमर्श में अभिनेत्री स्वरा भास्कर जैसे कुत्सित विचारों द्वारा इसे केवल ‘योनि केंद्रित’ या मध्यकालीन पितृसत्ता का दबाव भी माना गया है। स्वाभिमान और सामाजिक दबाव के इसी वैचारिक द्वंद्व को गहराई से समझने के लिए आइए अपने खास सीरीज ‘रंगीलो राजस्थान के किस्से’ में जानते हैं रानी पद्मावती सहित इतिहास के पन्नों में दर्ज उन साहसी स्त्रियों की जौहर गाथाएं, जिन्होंने मृत्यु को स्वीकार किया पर अपनी आन-बान-शान पर आँच नहीं आने दी।
जैसलमेर के पहले जौहर की कहानी (लगभग 1299-1301 ईस्वी)
रेगिस्तान की तपती लाल रेत पर जब जैसलमेर का त्रिकूट पर्वत धुंधला सा दिखाई दे रहा था, तब थार के आंचल में बसी यह सोनार नगरी एक ऐसा इतिहास रचने जा रही थी, । बात लगभग 1299 से 1301 ईस्वी के बीच की है, जब जैसलमेर पर रावल जेतसिंह का शासन था। दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की शाही सेना ने जैसलमेर के किले (सोनार किले) को चारों तरफ से घेर लिया। दिन बीतते गए, महीने बीतते गए और यह घेराबंदी सालों में तब्दील हो गई। किले के भीतर का राशन और रसद धीरे-धीरे खत्म होने लगी, लेकिन रावल जेतसिंह और उनके निष्ठावान राजपूत योद्धाओं का हौसला डिगा नहीं। जब यह स्पष्ट हो गया कि अब आमने-सामने के अंतिम युद्ध के अलावा कोई दूसरा मार्ग नहीं बचा है, तब किले की चारदीवारी के भीतर एक गम्भीर और कारुणिक निर्णय लिया गया। राजपूत परंपरा में पराजय के बाद दुश्मनों की दासता स्वीकार करना मृत्यु से भी बदतर माना जाता था। इसी मध्यकालीन संकट के समय जन्म हुआ ‘जौहर’ और ‘केसरिया’ के महाव्रत का।

किले के विशाल प्रांगण में चंदन, तुलसी और सूखी लकड़ियों के विशाल ढेर से एक गगनचुंबी हवन कुंड तैयार किया गया। सूरज ढलने से ठीक पहले, रानी हरराज और रावल जेतसिंह की कुलवधुओं ने अपने पारंपरिक लाल जोड़ों और आभूषणों को धारण किया। उनके चेहरों पर भय की एक शिकन भी नहीं थी. जब विशाल अग्नि कुंड में ज्वाला की लपटें उठने लगीं, तो रानी हरराज ने अपनी कुलदेवी को नमन किया और हजारों राजस्थान की वीरांगनाओं के साथ उस धधकती हुई अग्नि में हंसते-हंसते प्रवेश कर लिया। किले की फिज़ाओं में ‘जय भवानी’ और हर-हर महादेव का उद्घोष गूंज उठा। अग्नि की वे लपटें केवल लकड़ियों को नहीं जला रही थीं, बल्कि वे खिलजी के अभिमान और उसकी बुरी नीयत को हमेशा-हमेशा के लिए राख में बदल रही थीं।
अगली सुबह, जब किले के विशाल प्रांगण में केवल राख के अवशेष बचे थे, तब किले के मुख्य द्वार खोले गए। रावल जेतसिंह और उनके जांबाज सैनिकों ने सिर पर केसरिया साफा बांधा, हाथों में नंगी तलवारें लीं और दुश्मन की विशाल सेना पर टूट पड़े। इसे इतिहास में ‘केसरिया करना’ कहा गया। राजपूत वीरों ने तब तक युद्ध किया जब तक कि अंतिम सैनिक वीरगति को प्राप्त नहीं हो गया। जैसलमेर के इस पहले जौहर ने यह साबित कर दिया कि थार की यह भूमि केवल रेत का ढेर नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की वीरांगनाओं की तपोभूमि है जिन्होंने मौत को गले लगाना पसंद किया, लेकिन अपनी आन, बान और शान पर रत्ती भर भी आंच नहीं आने दी।
सिंध की रानी लाडी बाई के जौहर की कहानी (712 ईस्वी)
कहानी की शुरुआत भारत के इतिहास में दर्ज पहले जौहर से करते हैं. बात ईस्वी सन् 712 की शुरुआत की है. सिंध की समृद्ध और विशाल धरती पर विपत्ति के गहरे बादल घिर आए थे। अरब से आए आक्रमणकारी मोहम्मद बिन कासिम की एक विशाल और क्रूर सेना सिंधु नदी पार कर राजा दाहिर के राज्य पर कहर बनकर टूट पड़ी थी। अरबी सेना और सिंध के राजा दाहिर के बीच रोरावर (Ror) के मैदान में एक भीषण और निर्णायक युद्ध हुआ। राजा दाहिर ने अपनी अंतिम सांस तक बहादुरी से मुकाबला किया, लेकिन युद्धभूमि में उनके वीरगति को प्राप्त होते ही सिंध की सेना में भगदड़ मच गई। जीत के नशे में चूर मोहम्मद बिन कासिम की नज़र अब रोरावर के प्रसिद्ध किले पर थी।

राजा दाहिर की मृत्यु की खबर जब किले के भीतर पहुँची, तो वहाँ मातम छा गया। लेकिन उस गहरे शोक के बीच, राजा की पटरानी लाडी बाई (जिन्हें इतिहास में रानी लाड़ी भी कहा गया है) ने आँसू बहाने के बजाय अपने भीतर की शक्ति को जगाया। उन्होंने रोरावर के किले के भारी लोहे के दरवाज़े बंद करवा दिए और किले की कमान अपने हाथों में ले ली। रानी लाडी बाई ने किले के भीतर बचे हुए मुट्ठी भर सैनिकों और प्रजा को इकट्ठा किया और कहा-“हमारा राजा वीरगति को प्राप्त हो चुका है, लेकिन सिंध की चेतना और आत्मसम्मान अभी मरा नहीं है। जब तक हमारी धमनियों में रक्त की अंतिम बूंद है, हम इस किले को दुश्मनों के आगे नहीं झुकने देंगे।”
अगले कुछ दिनों तक रानी लाडी बाई के कुशल नेतृत्व में किले से दुश्मनों पर पत्थरों और तीरों की बौछार होती रही। अरबी सेना किले के बाहर डेरा डाले रही। धीरे-धीरे किले के भीतर का राशन और पानी खत्म होने लगा। जब यह स्पष्ट हो गया कि अब बाहर से कोई मदद नहीं आने वाली और किले का पतन तय है, तब रानी लाडी बाई ने किले की स्त्रियों को एकत्र किया। मध्यकालीन युद्धों में पराजित राज्य की महिलाओं को बंदी बनाकर दासी (गनीमत का माल) बना लिया जाता था। रानी लाडी बाई के सामने दो रास्ते थे या तो वे विदेशी आक्रमणकारियों की दासी बनना स्वीकार करें, या फिर अपनी पवित्रता और स्वाभिमान के लिए मृत्यु को गले लगा लें।
रानी लाडी बाई ने स्वाभिमान का कठिन रास्ता चुना। उन्होंने किले के विशाल प्रांगण में लकड़ी और सूखी पत्तियों का एक गगनचुंबी ढेर लगवाया। संध्या के समय, जब सूरज डूब रहा था और किले के बाहर अरबी ढोल-नगाड़ों का शोर था, रानी लाडी बाई ने अपने पारंपरिक वस्त्र पहने और ईश्वर का स्मरण किया। उनके चेहरे पर किसी तरह का भय नहीं था, बल्कि अपनी मातृभूमि की मर्यादा रक्षा का तेज था। रानी लाडी बाई ने किले की अन्य राजपूत और सिंध की वीरांगनाओं को संबोधित करते हुए कहा-“मौत सिर्फ इस शरीर का अंत है, लेकिन हमारा स्वाभिमान अमर रहेगा।”
यह कहकर, रानी लाडी बाई ने ‘जय श्री राम’ और ‘जय सिंध’ के जयकारों के साथ उस जलती हुई चिता में छलांग लगा दी। उनके पीछे-पीछे किले की सैकड़ों महिलाओं ने एक-दूसरे का हाथ थामकर हंसते-हंसते उस अग्निकुंड को अपना लिया। अगली सुबह जब मोहम्मद बिन कासिम की सेना ने रोरावर के किले के दरवाज़े तोड़े, तो उन्हें वहाँ कोई जीवित स्त्री नहीं मिली। वहाँ केवल धधकती हुई राख का ढेर और उस राख से उठती स्वाभिमान की सुगंध थी। फारसी ऐतिहासिक ग्रंथ ‘चचनामा’ में दर्ज यह घटना भारतीय इतिहास का पहला प्रामाणिक और लिखित जौहर मानी जाती है। रानी लाडी बाई ने अपनी देह को राख में बदलकर इतिहास के पन्नों पर यह लिख दिया था कि भारत की वीरांगनाओं के लिए उनका आत्मसम्मान प्राणों से भी बढ़कर है।
राजस्थान की वीरांगनाओं की जौहर : चित्तौड़गढ़ के पहले जौहर की कहानी (1303 ईस्वी)
इतिहास जब भी राजस्थान के रेगिस्तान और पत्थरों से गुजरता है, तो चित्तौड़गढ़ के किले पर पहुँचकर उसकी साँसें थम जाती हैं। 1303 ईस्वी की वह रात सिर्फ एक युद्ध का अंत नहीं थी, बल्कि स्वाभिमान की एक ऐसी कहानी की शुरुआत थी जो सदियों बाद भी दिलों को कँपा देती है। यह वह दौर था जब चित्तौड़ की गद्दी पर रावल रतन सिंह विराजमान थे और उनकी रानी पद्मावती (पद्मिनी) के रूप और बुद्धिमत्ता की चर्चा दूर-दूर तक थी। दिल्ली की गद्दी पर बैठा अलाउद्दीन खिलजी किसी भी कीमत पर चित्तौड़ को जीतना चाहता था और उसकी नज़र रानी पद्मावती पर भी थी। अपनी विशाल सेना के साथ खिलजी ने चित्तौड़ के अभेद्य किले को घेर लिया।

महीनों बीत गए। खिलजी की सेना किले के बाहर डेरा डाले रही, और किले के भीतर राशन-पानी धीरे-धीरे खत्म होने लगा। जब यह साफ हो गया कि अब आमने-सामने के युद्ध के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है और दुश्मनों की संख्या राजपूत योद्धाओं से कहीं ज़्यादा है, तब किले के भीतर एक बहुत ही कठिन और बड़ा फैसला लिया गया। एक तरफ जहाँ रावल रतन सिंह और उनके योद्धाओं ने देश और अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए सिर पर केसरिया साफ़ा बाँधकर अंतिम युद्ध लड़ने की तैयारी की, वहीं दूसरी तरफ रानी पद्मावती और किले की स्त्रियों ने अपनी गरिमा और आत्मसम्मान को बचाने का रास्ता चुना।
चित्तौड़ के विशाल प्रांगण में एक बहुत बड़ा अग्नि-कुंड तैयार किया गया। सूखी लकड़ियों, चंदन और घी से लपटें उठने लगीं। रानी पद्मावती ने अपनी कुलदेवी की पूजा की, लाल जोड़ा पहना और चेहरे पर बिना किसी डर या शिकन के उस जलते हुए कुंड की तरफ कदम बढ़ाए। उनके पीछे-पीछे चित्तौड़गढ़ की लगभग 16,000 वीरांगनाएँ-जिनमें रानियाँ, सेनापतियों की पत्तियाँ, और छोटी-छोटी बच्चियाँ भी शामिल थीं। एक-दूसरे का हाथ थामे उस धधकती हुई आग की ओर बढ़ीं। पूरे किले में “जय भवानी” के नारे गूँज उठे। खिलजी जिस रानी और जिन स्त्रियों को बंदी बनाने का सपना देख रहा था, वे सब हँसते-हँसते उस अग्नि-कुंड में समा गईं।
अगली सुबह जब किले के भारी दरवाजे खोले गए, तो केसरिया बाना पहने राजपूत योद्धा नंगी तलवारें लेकर खिलजी की सेना पर भूखे शेरों की तरह टूट पड़े। वे तब तक लड़े जब तक कि आखिरी योद्धा वीरगति को प्राप्त नहीं हो गया। जब अलाउद्दीन खिलजी ने जीत का जश्न मनाने के लिए किले के भीतर कदम रखा, तो उसके हाथ सिर्फ राख, सन्नाटा और हार लगी। वह किला तो जीत गया था, लेकिन उन स्त्रियों के आत्मसम्मान और साहस के सामने पूरी तरह हार चुका था।
रणथंभौर के जल जौहर की कहानी (1301 ईस्वी)
ऐसी ही एक और कहानी है रणथंभौर के जल जौहर की. यह कहानी आग की नहीं, बल्कि पानी की लहरों में समाए उस अमर स्वाभिमान की है, जिसे इतिहास में ‘रणथंभौर का जल जौहर’ कहा जाता है। बात 1301 ईस्वी की है। रणथंभौर के अभेद्य किले पर राजा हम्मीरदेव चौहान का शासन था। हम्मीरदेव अपनी शरणागत वत्सलता के लिए जाने जाते थे—यानी जो भी उनकी शरण में आ जाता, वे अपनी जान देकर भी उसकी रक्षा करते थे। जब दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के कुछ बागी सेनापति भागकर हम्मीरदेव की शरण में आए, तो राजा ने उन्हें सौंपने से साफ इनकार कर दिया। खिलजी के लिए यह उसकी सत्ता को खुली चुनौती थी, और उसने अपनी विशाल सेना के साथ रणथंभौर के किले का घेरा डाल दिया।

महीनों तक घेराबंदी चलती रही। खिलजी की सेना किले के बाहर डटी रही और किले के भीतर राशन सामग्री पूरी तरह खत्म हो गई। नौबत यहाँ तक आ पहुँची कि सोने के बदले भी अनाज का एक दाना मिलना मुश्किल हो गया। जब स्थिति बेहद नाजुक हो गई और अंतिम युद्ध का समय आ गया, तो राजा हम्मीरदेव ने अपने वीरों के साथ रणभूमि में उतरने का फैसला किया। किले के भीतर मौजूद रानियों और स्त्रियों के सामने अपनी आन-बान-शान बचाने का संकट था। सामान्यतः इस परिस्थिति में अग्नि जौहर किया जाता था, लेकिन उस समय किले में आग जलाने के लिए सूखी लकड़ियों का आकाल पड़ चुका था।
ऐसे में राजा हम्मीरदेव की रानी रंगादेवी और उनकी राजकुमारी देवलदे (जिन्हें इतिहास में पदमला भी कहा गया है) ने एक ऐसा फैसला लिया जो इतिहास में अभूतपूर्व था। राजकुमारी देवलदे ने मुस्कुराते हुए अपनी माता से कहा कि उनके कारण ही पिता और राज्य पर यह संकट आया है, इसलिए वे पहले बलिदान देंगी। किले के भीतर बने विशाल ‘पद्म तालाब’ (पदमला तालाब) के किनारे रानी रंगादेवी, राजकुमारी देवलदे और उनके साथ सैकड़ों राजपूत महिलाएँ एकत्र हुईं। उन्होंने अपनी कुलदेवी का स्मरण किया और एक-दूसरे का हाथ थामकर एक के बाद एक उस गहरे तालाब के ठंडे पानी में छलांग लगा दी।
पानी की शांत लहरों ने उन वीरांगनाओं के समर्पण को अपने आंचल में समेट लिया। खिलजी की बुरी नज़र जिन स्त्रियों पर पड़ने वाली थी, वे जल की गहराइयों में अमर हो चुकी थीं। इसके बाद किले के भारी दरवाज़े खुले और राजा हम्मीरदेव चौहान सिर पर केसरिया साफ़ा बाँधकर अपने मुट्ठी भर जांबाज योद्धाओं के साथ खिलजी की विशाल सेना पर टूट पड़े। जब खिलजी किले के भीतर पहुँचा, तो उसे वहाँ न तो कोई खज़ाना मिला और न ही कोई बंदी बनाने योग्य स्त्री—उसके हिस्से सिर्फ खाली गलियाँ और पद्म तालाब का शांत जल आया।
मालवा / चंदेरी के जौहर की कहानी (1528 ईस्वी)
चंदेरी की पथरीली पहाड़ियों पर 1528 ईस्वी की वह सुबह एक ऐतिहासिक और दिल दहला देने वाले मोड़ की गवाह बनने जा रही थी। मालवा के इस विशाल और अभेद्य किले पर राजपूत राजा मेदनी राय का शासन था। मेदनी राय मेवाड़ के राणा सांगा के बेहद करीबी और भरोसेमंद साथी थे, जिन्होंने खानवा के युद्ध में मुगलों के खिलाफ जमकर लोहा लिया था। खानवा की जीत के बाद मुगल बादशाह बाबर की नज़र मालवा के सबसे रणनीतिक किले-चंदेरी पर टिकी थी। बाबर ने मेदनी राय के पास संदेश भिजवाया कि वे बिना युद्ध किए चंदेरी का किला मुगलों के हवाले कर दें और बदले में दूसरा राज्य ले लें। लेकिन मेदनी राय ने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि राजपूत अपनी जन्मभूमि का सौदा नहीं करते।

नतीजतन, बाबर की विशाल सेना ने चंदेरी के किले को चारों तरफ से घेर लिया। यह किला एक ऊँची पहाड़ी पर बना था और बेहद सुरक्षित माना जाता था। लेकिन बाबर ने अपने सैनिकों से रात-दिन मेहनत करवाकर पहाड़ी के नीचे से किले तक पहुँचने के लिए एक सीधा रास्ता कटवा दिया और तोपें चढ़ा दीं। जब राजपूत योद्धाओं को लगा कि अब किले की प्राचीरें मुगलों के तोपों के गोलों के आगे ज्यादा देर नहीं टिक पाएंगी और मुगलों का कब्जा होना तय है, तब किले के भीतर एक शांत लेकिन दृढ़ सन्नाटा छा गया।
राजपूत स्त्रियों के पास अब बहुत कम समय बचा था। चंदेरी के किले की सबसे ऊँची पहाड़ी पर सूखी लकड़ियों और घी से एक विशाल अग्नि-कुंड तैयार किया गया। मेदनी राय की रानियों और अन्य राजपूत वीरांगनाओं ने अपने पारंपरिक परिधान पहने, श्रृंगार किया और शांत कदमों से उस धधकती ज्वाला की ओर बढ़ीं। मुगल सैनिकों की चीख-पुकार और तोपों की गूंज के बीच, चंदेरी की सैकड़ों स्त्रियों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा और ‘जय भवानी’ के उद्घोष के साथ उस जलती हुई आग में कूद गईं। कुछ ही पलों में वह पूरी पहाड़ी धुएं और राख की चादर में लिपट गई।
जब बाबर की सेना ने अगले दिन किले के भीतर कदम रखा, तो उन्हें वहाँ जीत की खुशी मनाने के लिए कोई जीवित स्त्री नहीं मिली। वहाँ सिर्फ धधकती हुई राख और राजपूत योद्धाओं के शौर्य की गूंज थी, जिन्होंने सिर पर केसरिया बांधकर अंतिम सांस तक युद्ध किया था। चंदेरी के जौहर ने बाबर को भी यह अहसास करा दिया था कि किले जीते जा सकते हैं, लेकिन यहाँ की वीरांगनाओं के आत्मसम्मान को कभी झुकाया नहीं जा सकता।
चित्तौड़गढ़ के दूसरे जौहर की कहानी (1535 ईस्वी)
चित्तौड़गढ़ की पावन धरा ने इतिहास में एक नहीं, बल्कि तीन-तीन बार जौहर की भयानक ज्वालाओं को झेला है। 1535 ईस्वी की बात है, जब महाराणा सांगा के देहांत के बाद मेवाड़ का समय बेहद कठिन दौर से गुजर रहा था। चित्तौड़ की गद्दी पर महाराणा सांगा के छोटे पुत्र विक्रमादित्य बैठे थे, लेकिन राज्य की असली बागडोर और चिंता राणा सांगा की विधवा रानी कर्मावती के हाथों में थी। इसी कमज़ोरी का फायदा उठाने के लिए गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने अपनी विशाल सेना और आधुनिक तोपखाने के साथ चित्तौड़गढ़ पर हमला बोल दिया। बहादुर शाह की तोपों के आगे चित्तौड़ के किले की मजबूत दीवारें दरकने लगी थीं।

रानी कर्मावती ने हर संभव प्रयास किया। उन्होंने राज्य के भीतर बिखरे हुए राजपूत सरदारों को एकजुट किया और यहाँ तक कि मदद के लिए मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भी भेजी। लेकिन जब यह साफ हो गया कि बाहरी मदद समय पर नहीं पहुँच पाएगी और सुल्तान की सेना किले के मुख्य दरवाजों को तोड़ने ही वाली है, तब रानी कर्मावती ने एक माँ और एक राष्ट्रभक्त की तरह फैसला लिया। उन्होंने सबसे पहले मेवाड़ के भविष्य यानी छोटे राजकुमार उदय सिंह को सुरक्षित रास्ते से किले से बाहर भिजवा दिया, ताकि सिसोदिया वंश की मशाल जलती रहे। इसके बाद, अपनी और किले की हजारों स्त्रियों की पवित्रता और आत्मसम्मान की रक्षा का समय आ चुका था।
चित्तौड़ के दुर्ग में एक बार फिर विशाल जौहर कुंड सजाया गया। रानी कर्मावती के नेतृत्व में किले की लगभग 13,000 स्त्रियों ने—जिनमें नन्हीं बच्चियाँ और बुजुर्ग महिलाएँ भी शामिल थीं—अपने पारंपरिक लाल परिधान पहने और ईश्वर का ध्यान किया। जब तोपों की गूंज से पूरा पहाड़ कांप रहा था, तब रानी कर्मावती ने शांत और दृढ़ कदमों से धधकती हुई अग्नि में प्रवेश किया। उनके पीछे-पीछे हजारों वीरांगनाओं ने “जय एकलिंगनाथ” के उद्घोष के साथ आग की लपटों का आलिंगन कर लिया। अगली सुबह किले के भारी दरवाजे खोले गए और रावल बाघ सिंह के नेतृत्व में बचे हुए राजपूत वीरों ने सिर पर केसरिया साफा बांधकर अंतिम युद्ध लड़ा। जब बहादुर शाह ने किले में कदम रखा, तो उसके हिस्से में सिर्फ राख, धुएं के गुबार और मुट्ठी भर जांबाज योद्धाओं की लाशें ही आईं—वह किला जीतकर भी हार चुका था।
एक तरफ रानी कर्मावती (राणा सांगा की विधवा) के नेतृत्व में किले के भीतर हजारों स्त्रियों ने जौहर की तैयारी की। वहीं दूसरी ओर, रानी जवाहरबाई ने खुद लोहे का कवच पहना, हाथों में तलवार थामी और पुरुष सैनिकों के साथ मैदान-ए-जंग में कूद पड़ीं। उन्होंने सुल्तान की सेना का डटकर मुकाबला किया और युद्धभूमि में वीरगति पाई, जिसके बाद किले के भीतर रानी कर्मावती ने जौहर पूरा किया।
चित्तौड़गढ़ के तीसरे जौहर की कहानी (1567-1568 ईस्वी)
चित्तौड़गढ़ के दुर्ग पर जब 1567 ईस्वी की रात घिर रही थी, तब अरावली की पहाड़ियाँ इतिहास के सबसे भीषण संघर्ष की गवाह बनने जा रही थीं। मुगल बादशाह अकबर अपनी विशाल सेना, तोपखाने और अभेद्य सुरंगों (सबात) के साथ चित्तौड़ के किले को घेरकर बैठा था। उस समय मेवाड़ के महाराणा उदय सिंह थे। राजपूत सरदारों की सलाह पर महाराणा को राज्य के भविष्य की सुरक्षा के लिए जंगलों और पहाड़ियों में भेज दिया गया था, जबकि चित्तौड़गढ़ किले की रक्षा का पूरा जिम्मा दो वीर सेनापतियों-जयमल राठौड़ और पत्ता सिसोदिया-के कंधों पर सौंपा गया।

अकबर की सेना ने महीनों तक किले की घेराबंदी की और भारी तोपबाज़ी से दीवारों को उड़ाने की कोशिश की। एक रात, जब जयमल राठौड़ किले की टूटी हुई दीवार की मरम्मत करवा रहे थे, तब अकबर की प्रसिद्ध बंदूक ‘संग्राम’ से चली गोली जयमल के पैर में जा लगी और वे गंभीर रूप से घायल हो गए। अब यह स्पष्ट हो चुका था कि मुगलों की विशाल सेना के सामने किला ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाएगा। राजपूत वीरों के सामने केवल दो ही रास्ते थे—आत्मसमर्पण या बलिदान। राजपूतों ने बलिदान का रास्ता चुना।
जब पुरुषों ने ‘केसरिया’ करने का फैसला किया, तो किले के भीतर स्त्रियों ने अपने कुल और स्वाभिमान की रक्षा के लिए ‘जौहर’ की तैयारी शुरू कर दी। पत्ता सिसोदिया की पत्नी रानी फूल कंवर के नेतृत्व में किले की हजारों वीरांगनाएँ एकत्र हुईं। किले के प्रांगण में विशाल जौहर कुंड जलाया गया। रानी फूल कंवर, जयमल और पत्ता की माताओं, पत्नियों और बेटियों के साथ हजारों स्त्रियों ने अपने पारंपरिक वस्त्र और आभूषण धारण किए। जब बाहर तोपों का शोर और मुगलों के ढोल बज रहे थे, तब किले के भीतर ‘जय एकलिंगनाथ’ और ‘जय भवानी’ के जयकारों के साथ रानी फूल कंवर और उनके साथ मौजूद वीरांगनाओं ने धधकती हुई अग्नि की लपटों में प्रवेश कर लिया।
अगली सुबह, पैर में गोली लगने के कारण चलने में असमर्थ वीर जयमल को कल्ला जी राठौड़ ने अपने कंधों पर बिठाया और दोनों हाथों में तलवारें लेकर मुगलों पर टूट पड़े। पत्ता सिसोदिया और उनके साथी राजपूत वीरों ने अंतिम सांस तक युद्ध किया।
अकबर जब किले के भीतर दाखिल हुआ, तो उसे चारों तरफ केवल सन्नाटा, राख के ढेर और राजपूतों की अदम्य वीरता के अवशेष मिले। चित्तौड़ का यह तीसरा जौहर इतिहास के पन्नों में अमर हो गया, जिसने एक बार फिर साबित किया कि वीरांगनाओं के लिए उनका स्वाभिमान प्राणों से भी बढ़कर था।
रानी दुर्गावती के जौहर की कहानी (गोंडवाना – 1564 ईस्वी)
जंगल की ठंडी हवाओं के बीच गढ़ा-मंडला (गोंडवाना) की पहाड़ियाँ 1564 ईस्वी के उस ऐतिहासिक युद्ध की साक्षी बनने जा रही थीं, जिसने मध्यकालीन भारत के इतिहास में वीरता की एक नई मिसाल दर्ज की। चंदेल राजवंश की बेटी और गोंडवाना की महारानी दुर्गावती का नाम उस दौर के शक्तिशाली मुगल साम्राज्य के सामने स्वाभिमान का एक कभी न झुकने वाला स्तंभ था। पति राजा दलपत शाह के असामयिक निधन के बाद रानी दुर्गावती ने अपने छोटे से बेटे वीर नारायण को गद्दी पर बिठाया और खुद गोंडवाना की बागडोर संभाली। उनके कुशल नेतृत्व में गोंडवाना राज्य धन-धान्य और समृद्धि से परिपूर्ण हो गया। लेकिन मुगलों की साम्राज्यवादी नज़र इस समृद्ध राज्य पर टिक चुकी थी। अकबर के सेनापति असफ खान ने एक विशाल सेना, आधुनिक तोपखाने और बंदूकधारियों के साथ गोंडवाना पर आक्रमण कर दिया।

रानी दुर्गावती जानती थीं कि मुगलों की विशाल सेना की तुलना में उनका सैन्यबल बहुत छोटा है। फिर भी, उन्होंने घुटने टेकने के बजाय अपने आत्मसम्मान और मातृभूमि की रक्षा के लिए युद्ध का रास्ता चुना। रानी ने नरई नाले के पास घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरे एक प्राकृतिक मोर्चे को चुना, जहाँ मुगलों का भारी तोपखाना बेअसर साबित हुआ।
रानी दुर्गावती खुद लोहे का कवच पहनकर, हाथ में नंगी तलवार थामे और अपने प्रिय हाथी ‘सरमन’ पर सवार होकर युद्ध के मैदान में उतरीं। गोंड वीरों के अदम्य साहस और रानी के कुशल रणनीति-कौशल के आगे मुगल सेना पस्त होने लगी। पहले दिन के युद्ध में रानी ने मुगलों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। अगले दिन असफ खान ने दोगुनी तैयारी और अपनी भारी तोपों को आगे करके भीषण हमला बोला। रानी का नौजवान बेटा वीर नारायण भी वीरता से लड़ते हुए गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसे सुरक्षित स्थान पर भिजवाया गया। युद्धभूमि में रानी दुर्गावती अकेली मुगलों से लोहा ले रही थीं। अचानक एक तीर आकर रानी के गले में लगा और दूसरा तीर उनकी आँख को भेद गया। असह्य पीड़ा के बावजूद रानी ने अपने हाथों से तीर की नोक को खींचकर निकाला, लेकिन वे गंभीर रूप से घायल हो चुकी थीं और उनका शरीर ढलने लगा था।
जब सूरज ढल रहा था और मुगलों के सैनिक रानी को घेरने के लिए आगे बढ़ रहे थे, तब महारानी को यह आभास हो गया कि वे अब मूर्छित होने वाली हैं। उन्होंने अपने वफादार महावत से कहा-“मुझे मुगलों के हाथ नहीं लगना है। तुम अपनी कटार से मेरा सिर धड़ से अलग कर दो।” महावत रो पड़ा और उसका हाथ अपनी स्वामिनी पर कटार चलाने की हिम्मत न जुटा सका। समय बीत रहा था और मुगलों के कदम पास आ रहे थे।
रानी दुर्गावती ने पल भर का भी विलंब नहीं किया। उन्होंने अपनी ही कटार निकाली और ‘जय महाकाली’ का उद्घोष करते हुए उसे अपने सीने में घोंप लिया। युद्ध के मैदान में बहती हुई रक्तधारा के बीच गोंडवाना की रानी ने अपनी अंतिम सांस ली। रानी दुर्गावती ने दुश्मनों के हाथों बंदी बनने या जीवित पकड़े जाने के अपमान के बजाय मौत का आलिंगन करना चुना। गोंडवाना की इस महान रानी का यह बलिदान केवल एक युद्ध का अंत नहीं था, बल्कि वह अमर गाथा थी जिसने यह साबित कर दिया कि भारतीय नारियों के लिए उनका स्वाभिमान प्राणों से भी बढ़कर है।
जौहर और आत्मबलिदान की ये कहानियाँ केवल मध्यकालीन इतिहास की धूल चढ़ी दास्तानें नहीं हैं, बल्कि ये उस दौर के कठिन सामाजिक, राजनीतिक और मानसिक दबावों का प्रामाणिक दस्तावेज़ हैं। चाहे वह चित्तौड़गढ़ की ज्वाला हो, रणथंभौर का शांत जल या गोंडवाना के जंगलों में रानी दुर्गावती का आत्मोत्सर्ग-ये घटनाएँ हमें याद दिलाती हैं कि इतिहास को केवल किसी एक चश्मे से नहीं देखा जा सकता। जहाँ एक ओर ये गाथाएँ पराधीनता के विरुद्ध स्त्री स्वाभिमान और अदम्य साहस के सर्वोच्च शिखर की गवाही देती हैं, वहीं दूसरी ओर आधुनिक विमर्श के प्रश्नों को भी जीवित रखती हैं। आखिरकार, ये कहानियाँ हमें यह सोचने पर विवश करती हैं कि विषम से विषम परिस्थितियों में भी अपनी गरिमा और आन-बान-शान की रक्षा के लिए इंसान किस हद तक जा सकता है।
ये भी पढ़ें:-
तुलसीदास जयंती: पत्नी के एक ताने ने बदल दी जिंदगी, ऐसे बने अमर महाकवि
वंदे मातरम् के सिर्फ दो अंतरे क्यों अपनाए गए थे ? नेहरू, मुस्लिम लीग और 1937 के फैसले की पूरी कहानी
हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद : जिनकी हॉकी स्टिक के इशारे पर नाचती थी गेंद
