“पवन कुमार सिन्हा इस्तीफा दो” के नारों से गूंजा परिसर; कर्मचारियों का आरोप- कुलसचिव निरंजन प्रसाद यादव और विश्वविद्यालय पदाधिकारियों के साथ कथित अमर्यादित व्यवहार बर्दाश्त नहीं
पटना, 14 सितंबर 2026। आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय, पटना में गठित जांच समिति को लेकर विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। जांच समिति की प्रक्रिया, उसके अधिकार क्षेत्र और जांच के दौरान समिति के समन्वयक पवन कुमार सिन्हा के कथित व्यवहार के विरोध में विश्वविद्यालय के कर्मचारियों ने सोमवार को जोरदार प्रदर्शन किया। आक्रोशित कर्मचारियों ने पवन कुमार सिन्हा का पुतला दहन किया और “पवन कुमार सिन्हा इस्तीफा दो” के नारे लगाए।
कर्मचारियों का कहना है कि जांच के नाम पर आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय के अधिकारियों पर दबाव बनाया जा रहा है और जांच समिति की कार्यप्रणाली को लेकर कई गंभीर सवाल हैं। प्रदर्शनकारियों ने खास तौर पर कुलसचिव निरंजन प्रसाद यादव और आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय के अन्य पदाधिकारियों के साथ कथित अमर्यादित व्यवहार का मुद्दा उठाते हुए इसे विश्वविद्यालय की गरिमा के खिलाफ बताया।
जांच समिति की प्रक्रिया पर कर्मचारियों ने उठाए सवाल
कर्मचारियों के अनुसार, राज्यपाल सचिवालय, बिहार की ओर से आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय के संबंध में एक जांच समिति का गठन किया गया था। आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय की ओर से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पत्रांक A.K.U.-08/2026-1596/रा.स.-(1), दिनांक 27 जुलाई 2026 के माध्यम से समिति का गठन किया गया था।
इस समिति में श्री पवन कुमार सिन्हा, विशेष सचिव, उच्च शिक्षा विभाग, बिहार को समन्वयक बनाया गया था।कर्मचारियों का सवाल है कि जब संबंधित पत्र में जांच की अवधि 15 दिन निर्धारित की गई थी, तो 12 सितंबर 2026 को समिति विश्वविद्यालय परिसर में किस आधार पर जांच के लिए पहुंची।

प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों का दावा है कि जांच की अवधि बढ़ाए जाने से संबंधित कोई आधिकारिक पत्र आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय को प्राप्त नहीं हुआ था। इसी को लेकर उन्होंने जांच समिति के अधिकार क्षेत्र और प्रक्रिया को स्पष्ट करने की मांग की है।
कुलसचिव और पदाधिकारियों से कथित दुर्व्यवहार का आरोप
विवाद का सबसे गंभीर पहलू कुलसचिव निरंजन प्रसाद यादव और आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय के पदाधिकारियों के साथ कथित अमर्यादित व्यवहार को लेकर लगाए जा रहे आरोप हैं। आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय पक्ष का आरोप है कि 12 सितंबर को जांच के दौरान पवन कुमार सिन्हा ने कुलपति और विश्वविद्यालय के पदाधिकारियों के साथ कथित तौर पर अभद्र एवं आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया। आरोप है कि बातचीत के दौरान कथित तौर पर धमकी भरे शब्दों का भी इस्तेमाल किया गया।
आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय पक्ष के अनुसार, इस दौरान यह कथित टिप्पणी भी की गई कि “इन लोगों को डंडे से मारकर हाथ-पैर तुड़वा देने चाहिए।” यदि यह आरोप सही पाया जाता है तो यह न केवल व्यक्तिगत मर्यादा का मामला होगा, बल्कि विश्वविद्यालय के संवैधानिक एवं प्रशासनिक पदों की गरिमा से भी जुड़ा गंभीर प्रश्न होगा।
हालांकि, इस कथित टिप्पणी और पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र पुष्टि जांच या संबंधित पक्षों के आधिकारिक बयान के बाद ही हो सकेगी।
कर्मचारियों का सवाल- जांच के नाम पर कितना अधिकार?
कर्मचारियों ने जांच समिति के अधिकार क्षेत्र को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका आरोप है कि निर्धारित जांच विषय से अलग-अलग कई फाइलों और दस्तावेजों की मांग की गई तथा आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय के पदाधिकारियों पर दबाव बनाया गया।
आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, जांच से संबंधित 1,344 पृष्ठों के अनुलग्नक उपलब्ध कराए जाने के बावजूद अन्य फाइलों की मांग किए जाने से कर्मचारियों के बीच नाराजगी बढ़ी। कर्मचारियों का कहना है कि जांच होनी चाहिए, लेकिन वह निर्धारित विषय, अधिकार क्षेत्र और प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए।
पुतला दहन कर जताया आक्रोश
इसी मुद्दे को लेकर विश्वविद्यालय परिसर में कर्मचारियों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान “पवन कुमार सिन्हा इस्तीफा दो”, “विश्वविद्यालय की गरिमा से खिलवाड़ बंद करो” जैसे नारे लगाए गए। इसके बाद कर्मचारियों ने पवन कुमार सिन्हा का पुतला दहन किया।
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था और पदाधिकारियों की गरिमा से किसी भी स्थिति में समझौता नहीं किया जाएगा।

‘कुलसचिव के साथ ऐसा व्यवहार स्वीकार नहीं’
आंदोलन कर रहे कर्मचारियों का कहना है कि कुलसचिव निरंजन प्रसाद यादव समेत विश्वविद्यालय के पदाधिकारियों के साथ यदि जांच के दौरान किसी तरह का दबाव, धमकी या अमर्यादित व्यवहार किया गया है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
कर्मचारियों के मुताबिक, किसी जांच अधिकारी को जांच के अधिकार प्राप्त हो सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि विश्वविद्यालय के पदाधिकारियों के साथ कथित तौर पर अपमानजनक या धमकीपूर्ण भाषा का इस्तेमाल किया जाए।
कर्मचारियों ने कहा कि वे जांच के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि जांच की प्रक्रिया और कथित व्यवहार पर सवाल उठा रहे हैं। यह अंतर महत्वपूर्ण है-कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें जांच से आपत्ति नहीं, बल्कि जांच के तरीके और अधिकार क्षेत्र को लेकर आपत्ति है।
कुलाधिपति से हस्तक्षेप की मांग
कर्मचारियों ने माननीय कुलाधिपति-सह-राज्यपाल, बिहार से पूरे मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
उनकी प्रमुख मांगों में:
- जांच समिति के गठन की प्रक्रिया की समीक्षा,
- समिति के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट करना,
- जांच अवधि से संबंधित स्थिति स्पष्ट करना,
- 12 सितंबर की घटना की निष्पक्ष जांच,
- कुलसचिव और विश्वविद्यालय पदाधिकारियों के साथ कथित अमर्यादित व्यवहार की जांच,
- दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई
शामिल हैं।
‘विश्वविद्यालय की गरिमा से समझौता नहीं’
कर्मचारियों ने कहा कि आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय की स्वायत्तता, गरिमा और प्रशासनिक व्यवस्था की रक्षा करना उनकी जिम्मेदारी है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को चरणबद्ध और व्यापक किया जाएगा।
कर्मचारियों का कहना है कि वे लोकतांत्रिक तरीके से अपना विरोध जारी रखेंगे और विश्वविद्यालय की गरिमा से जुड़े मुद्दे पर पीछे नहीं हटेंगे।

जांच होगी तो सामने आएगी पूरी सच्चाई
फिलहाल इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि जांच समिति की प्रक्रिया और अधिकार क्षेत्र क्या था, 15 दिन की निर्धारित अवधि के बाद समिति किस आदेश के आधार पर आगे बढ़ी और 12 सितंबर को विश्वविद्यालय परिसर में वास्तव में क्या हुआ।
कुलसचिव निरंजन प्रसाद यादव और विश्वविद्यालय पदाधिकारियों के साथ कथित अमर्यादित व्यवहार के आरोप भी गंभीर हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि घटनाक्रम में किसकी क्या भूमिका थी और लगाए गए आरोप कितने सही हैं।
जांच का उद्देश्य यदि तथ्य सामने लाना है, तो जांच की प्रक्रिया भी पारदर्शी, निर्धारित अधिकार क्षेत्र के भीतर और सभी पक्षों की गरिमा का सम्मान करते हुए होनी चाहिए।
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