सहरसा में पत्रकार से कथित मारपीट के बाद अब जमालपुर में भी पत्रकारों से बदसलूकी का आरोप, पत्रकार संगठनों में आक्रोश
मुंगेर/जमालपुर। जमालपुर में पत्रकारों से बदसलूकी का मामला सामने आने के बाद बिहार में पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर सवाल फिर खड़े हो गए हैं। सहरसा सदर अस्पताल में पत्रकार के साथ कथित मारपीट और अभद्रता के मामले के बीच अब मुंगेर के जमालपुर रेल इंजन कारखाने में कवरेज करने पहुंचे पत्रकारों के साथ भी कथित बदसलूकी का आरोप लगा है। पत्रकार संगठनों का कहना है कि घटनाओं की रिपोर्टिंग करना और संबंधित अधिकारियों से सवाल पूछना पत्रकारों का अधिकार और जिम्मेदारी है, लेकिन इसके जवाब में कथित दुर्व्यवहार या दबाव बनाना गंभीर चिंता का विषय है।
सहरसा मामले में बीमार बच्चों की रिपोर्टिंग करने पहुंचे पत्रकार अभिषेक कुमार ने अस्पताल के चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों पर मारपीट, गाली-गलौज, धमकी और सामान छीनने के आरोप लगाए हैं। मामले में दोनों पक्षों की ओर से शिकायतें सामने आई हैं और जिलाधिकारी ने जांच के आदेश दिए हैं।
इसी बीच मुंगेर के जमालपुर रेल इंजन कारखाने में सोमवार को कवरेज करने पहुंचे पत्रकारों से बदसलूकी का मामला सामने आने के बाद भारतीय पत्रकार संघ (AIJ) ने नाराजगी जताई है। संघ के प्रदेश अध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार लालमोहन महाराज तथा मुंगेर जिलाध्यक्ष पत्रकार योग चैतन्य ने मामले की निंदा करते हुए संबंधित अधिकारियों के आचरण की जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।
पत्रकार का काम सवाल पूछना है, बदसलूकी नहीं
भारतीय पत्रकार संघ के पदाधिकारियों ने कहा कि किसी भी घटना की रिपोर्टिंग करना, मौके पर जाकर तथ्य जुटाना और संबंधित विभाग, अधिकारी या जनप्रतिनिधि से सवाल पूछना पत्रकारिता का मूल काम है। उनके मुताबिक, यदि किसी खबर या रिपोर्टिंग को लेकर किसी पक्ष को आपत्ति है तो वह पत्रकार के सामने अपना पक्ष रख सकता है और तथ्यों को स्पष्ट कर सकता है। लेकिन पत्रकार के साथ कथित बदसलूकी, धमकी या कवरेज में बाधा डालना स्वीकार्य नहीं है।
संघ के नेताओं ने कहा कि पत्रकार से सवाल पूछने पर संवाद करने के बजाय दबाव बनाने की कोशिश लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक है।
सहरसा की घटना ने बढ़ाई चिंता
सहरसा सदर अस्पताल में 12 सितंबर को हुई घटना के बाद पत्रकार संगठनों में पहले से ही नाराजगी है। बीमार बच्चों की रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकार अभिषेक कुमार और अस्पताल के चिकित्सकों/कर्मचारियों के बीच विवाद हुआ था।
पत्रकार पक्ष ने मारपीट और दुर्व्यवहार के आरोप लगाए हैं, जबकि अस्पताल प्रशासन की ओर से भी पत्रकारों पर अस्पताल में इलाज के दौरान व्यवधान और हंगामा करने के आरोप लगाए गए हैं। मामले में जिला प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है। ऐसे में अब जमालपुर से सामने आए कथित बदसलूकी के मामले ने पत्रकारों की सुरक्षा और सरकारी संस्थानों में मीडिया के साथ व्यवहार को लेकर सवाल और बढ़ा दिए हैं।
जमालपुर रेल इंजन कारखाना फिर चर्चा में
जमालपुर रेल इंजन कारखाना हाल के दिनों में कई कारणों से चर्चा में रहा है। इसी महीने लोको शेड में शंटिंग के दौरान एक ही ट्रैक पर दो इंजनों की टक्कर के मामले में रेलवे ने चार कर्मचारियों को निलंबित किया था। जांच में परिचालन संबंधी लापरवाही सामने आने के बाद कार्रवाई की गई।
ऐसे संवेदनशील संस्थान में होने वाली घटनाओं की रिपोर्टिंग का सार्वजनिक महत्व होता है। पत्रकारों का कहना है कि किसी भी संस्थान में अनियमितता या लापरवाही से जुड़े सवालों का जवाब देना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है, न कि पत्रकारों को दबाव में लाना।
भारतीय पत्रकार संघ ने सरकार से कार्रवाई की मांग की
भारतीय पत्रकार संघ के प्रदेश अध्यक्ष लालमोहन महाराज और मुंगेर जिलाध्यक्ष योग चैतन्य ने कहा कि पत्रकारों के साथ होने वाली ऐसी घटनाओं को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने सरकार से मांग की कि:
- पत्रकारों से बदसलूकी की निष्पक्ष जांच हो।
- दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों/कर्मियों पर कार्रवाई की जाए।
- पत्रकारों को कवरेज के दौरान सुरक्षा और सहयोग सुनिश्चित किया जाए।
- सरकारी संस्थानों में मीडिया के साथ संवाद के लिए स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए।
उन्होंने कहा कि पत्रकारों को सवाल पूछने और घटनाओं की रिपोर्टिंग करने से रोकने का कोई भी प्रयास प्रेस की स्वतंत्रता के खिलाफ है।
‘भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने’ के आरोप की भी जांच की मांग
संघ की ओर से यह आरोप भी लगाया गया है कि जमालपुर में कवरेज के दौरान पत्रकारों से बदसलूकी के पीछे कथित अनियमितताओं या भ्रष्टाचार से जुड़े सवालों को दबाने की कोशिश हो सकती है।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी सामने नहीं आई है। इसलिए पूरे मामले में निष्पक्ष जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार की वास्तविक वजह क्या थी।
पत्रकारों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल
सहरसा और जमालपुर की घटनाओं को लेकर पत्रकार संगठनों में यह चिंता बढ़ रही है कि यदि किसी सरकारी अस्पताल, रेलवे प्रतिष्ठान या अन्य सार्वजनिक संस्थान में पत्रकारों को कवरेज के दौरान ही विरोध या दबाव का सामना करना पड़ेगा, तो आम लोगों तक सही जानकारी पहुंचाने का काम प्रभावित होगा।
पत्रकारिता का मतलब किसी अधिकारी या संस्थान के खिलाफ खड़ा होना नहीं, बल्कि जनता के सवालों को सामने रखना है। किसी रिपोर्ट से असहमति हो तो उसका जवाब तथ्य और आधिकारिक पक्ष के जरिए दिया जा सकता है। यही लोकतांत्रिक संवाद की बुनियादी शर्त है।
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