दादी-नानी की गोद से मोबाइल स्क्रीन तक पहुंची कहानी; लोककथाओं, पंचतंत्र, रामायण-महाभारत और डिजिटल दौर ने बदलते समय के साथ अपनाए नए रूप
प्रयागराज। शाम ढल रही थी। आँगन में चारपाई बिछी थी। दिन भर खेलकर थके बच्चे अपनी दादी की कहानी सुनने को उनके आसपास जमा थे। दादी ने पल्लू ठीक किया, पानी का एक घूँट लिया और कहानी शुरू की-“बहुत समय पहले की बात है”
कहानी शुरू होते ही जैसे घर का वातावरण बदल जाता था। बच्चे चुप हो जाते। किसी को राजा की चिंता होती, किसी को जंगल में भटकते राजकुमार की, किसी को उस चतुर लोमड़ी की जो हर मुश्किल से निकल आती थी। कहानी खत्म होते-होते रात गहरा जाती, लेकिन बच्चों के मन में कहानी का संसार देर तक जागता रहता। यह दृश्य आज बहुत सामान्य नहीं रहा।
आँगन की जगह मोबाइल की स्क्रीन ने ले ली है। दादी की आवाज की जगह वीडियो और पॉडकास्ट की आवाज सुनाई देती है। कहानी सुनने के लिए अब किसी बुजुर्ग के पास बैठना जरूरी नहीं। एक क्लिक पर हजारों कहानियाँ सामने हैं। लेकिन एक सवाल अब भी हमारे सामने है- क्या कहानी बदल जाने से कहानी की जरूरत भी खत्म हो गई है?
शायद नहीं।क्योंकि मनुष्य जितना पुराना है, कहानी उतनी ही पुरानी है। कहानी केवल मनोरंजन नहीं रही। उसने मनुष्य को दुनिया समझने का तरीका दिया, अनुभवों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाया और समाज की सामूहिक स्मृति को सुरक्षित रखा। भारतीय संस्कृति में तो कथा का स्थान और भी व्यापक रहा है। यहाँ कथा धर्म से जुड़ी, दर्शन से जुड़ी, लोकजीवन से जुड़ी और अंततः मनुष्य के दैनिक अनुभव का हिस्सा बन गई।
कहानी लिखने से पहले सुनाई जाती थी
आज हम कहानी को किताब में पढ़ते हैं। लेकिन कहानी की यात्रा किताब से शुरू नहीं हुई थी।किताब आने से बहुत पहले मनुष्य कहानी सुनाता था।आग के आसपास बैठकर, यात्रा के दौरान, खेतों में काम करते हुए, त्योहारों में, विवाह के अवसर पर, बच्चों को सुलाते समय कहानियाँ कही जाती थीं। उनके साथ कोई पुस्तक नहीं होती थी। शब्द स्मृति में रहते थे और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचते थे।
भारत में इस मौखिक परंपरा की गहराई का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि वैदिक साहित्य की अनेक ऋचाएँ लंबे समय तक विशिष्ट मौखिक परंपराओं और उच्चारण-पद्धतियों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रहीं। बाद में पुराणों, रामायण और महाभारत की कथाओं ने भी श्रुति, वाचन और प्रदर्शन की परंपराओं के माध्यम से व्यापक लोकजीवन में प्रवेश किया।
यही कारण है कि भारत में एक ही कथा के अनेक रूप दिखाई देते हैं। राम की कथा का एक रूप तुलसीदास के रामचरितमानस में मिलता है, तो वही कथा लोक में रामलीला के रूप में जीवित दिखाई देती है। अयोध्या, चित्रकूट, वाराणसी और देश के अनेक हिस्सों में रामलीला की अपनी स्थानीय शैली और प्रस्तुति है। उत्तर भारत से आगे बढ़ें तो दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर और दक्षिण-पूर्व एशिया तक रामकथा के अलग-अलग सांस्कृतिक रूप मिलते हैं। कथा वही रहती है, लेकिन कथाकार और समाज उसे अपने अनुभव से नया अर्थ दे देते हैं। यही भारतीय कथा-परंपरा की खूबसूरती है।
पंचतंत्र : कहानी में छिपी जीवन की समझ

पंचतंत्र की कहानियों में पशु-पक्षी बोलते हैं, योजनाएँ बनाते हैं, मित्रता करते हैं, धोखा देते हैं और संकट से निकलने के उपाय खोजते हैं। पहली दृष्टि में वे बच्चों की कहानियाँ लगती हैं, लेकिन उनके भीतर मनुष्य और समाज के व्यवहार की गहरी समझ दिखाई देती है।सिंह, लोमड़ी, कौआ, कछुआ या चूहा वास्तव में केवल पशु नहीं हैं। वे मनुष्य के स्वभाव के प्रतीक बन जाते हैं।
कहीं मित्रता की परीक्षा है, कहीं जल्दबाजी का नुकसान, कहीं बुद्धि की शक्ति, कहीं लालच का परिणाम।
पंचतंत्र की विशेषता यह है कि जीवन की जटिल बातों को सरल कथा के माध्यम से समझाया गया। बच्चे कहानी सुनते हुए मनोरंजन करते हैं, लेकिन उसी के साथ व्यवहार, मित्रता, सावधानी, निर्णय और विवेक जैसी बातें भी सीखते हैं।
यही कारण है कि पंचतंत्र की कथाएँ भारत की सीमाओं से बाहर भी पहुँचीं और अनेक भाषाओं में रूपांतरित हुईं। इससे एक महत्वपूर्ण बात समझ में आती है-अच्छी कहानी की कोई सीमा नहीं होती।
वह भाषा बदल सकती है, पात्र बदल सकते हैं, लेकिन मनुष्य की मूल संवेदनाएँ नहीं बदलतीं।
जातक कथाएँ : करुणा की कहानियाँ
बौद्ध परंपरा में जातक कथाओं का अपना विशेष स्थान है। इन कथाओं में बुद्ध के पूर्वजन्मों से जुड़ी अनेक कहानियाँ आती हैं। इनमें राजा भी हैं, व्यापारी भी, पशु-पक्षी भी और सामान्य मनुष्य भी,लेकिन इन कथाओं का मूल भाव करुणा, त्याग, सत्य और नैतिकता के आसपास घूमता है। इन कथाओं की एक विशेषता यह है कि नैतिक संदेश सीधे उपदेश के रूप में नहीं आता। वह पात्रों के अनुभव से सामने आता है। उदाहरण के लिए, किसी कथा में कोई पशु अपने साथी की रक्षा के लिए त्याग करता है। कहानी सुनने वाला केवल घटना नहीं सुनता, बल्कि त्याग और करुणा का अर्थ भी महसूस करता है। जब किसी बच्चे से कहा जाता है कि “झूठ मत बोलो”, तो वह शायद कुछ देर सुनकर भूल जाए। लेकिन यदि उसे ऐसे व्यक्ति की कहानी सुनाई जाए जिसके झूठ ने उसे स्वयं संकट में डाल दिया, तो वह बात लंबे समय तक उसके मन में रह सकती है।
रामायण और महाभारत : ग्रंथ से आगे की यात्रा

भारत की सांस्कृतिक स्मृति में रामायण और महाभारत का प्रभाव केवल धार्मिक ग्रंथ के रूप में नहीं है। इनकी कथाएँ भारतीय समाज के अनेक स्तरों में प्रवेश कर चुकी हैं। राम केवल एक पात्र नहीं रहे। वे आदर्श, मर्यादा और लोकविश्वास के अनेक रूपों से जुड़े। कृष्ण केवल महाभारत के पात्र नहीं रहे; वे लोकगीतों, नृत्य, संगीत और भक्ति की विशाल परंपरा का हिस्सा बने।
रामकथा का प्रभाव केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहा। रामलीला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मंच पर कलाकार राम, सीता, लक्ष्मण और रावण के पात्र निभाते हैं और पूरा गाँव या मोहल्ला उस कथा का सहभागी बन जाता है।
इसी तरह ब्रज क्षेत्र की रासलीला में कृष्ण की कथाएँ संगीत, नृत्य, संवाद और अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत होती हैं। यहाँ कथा पढ़ी नहीं जाती, उसे जिया जाता है। महाभारत की कथा भी केवल युद्ध की कहानी नहीं है। उसमें परिवार है, राजनीति है, नैतिक दुविधाएँ हैं, रिश्तों की जटिलता है और मनुष्य के भीतर चलने वाला संघर्ष है।
महाभारत की कथा का एक अद्भुत लोक रूप छत्तीसगढ़ की पंडवानी में दिखाई देता है। पंडवानी की गायिका या गायक केवल कथा नहीं सुनाता; वह अपनी आवाज, हाव-भाव, अभिनय और संगीत के माध्यम से पात्रों को सामने खड़ा कर देता है। तीजन बाई जैसी कलाकारों ने पंडवानी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। इससे स्पष्ट होता है कि भारत में महाकाव्य केवल ग्रंथ नहीं रहे—वे लोक की अपनी जीवित अभिव्यक्तियाँ भी बने।
दादी-नानी की कहानियाँ : घर की पहली पाठशाला

भारतीय परिवारों में कहानी सुनाने की परंपरा का सबसे आत्मीय रूप दादी और नानी की कहानियों में दिखाई देता है।इन कहानियों का कोई निश्चित लेखक नहीं होता था। कहानी सुनाने वाली दादी ने भी शायद वह कहानी अपनी दादी से सुनी थी। उसने उसमें कुछ बदला होगा, कोई नया पात्र जोड़ा होगा, किसी प्रसंग को अपने अनुभव से जोड़ दिया होगा। फिर वही कहानी अगली पीढ़ी तक पहुँची।
इस तरह कहानी हर पीढ़ी के साथ थोड़ी बदलती रही, लेकिन उसकी आत्मा बची रही। कई घरों में पंचतंत्र, अकबर-बीरबल, तेनालीराम, विक्रम-बेताल और लोकदेवताओं से जुड़ी कथाएँ सुनाई जाती थीं। कहीं राजा-रानी और परियों की कहानियाँ थीं, तो कहीं गाँव के किसी चतुर किसान की कथा, लेकिन इन कहानियों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उनका घरेलू परिवेश था।
दादी अगर कहती थीं-“बहुत लालच मत करना”, तो उसके पीछे केवल कोई उपदेश नहीं होता था। कई बार वह अपने जीवन का कोई अनुभव भी कहानी में जोड़ देती थीं। यही कारण है कि दादी की कहानी में शिक्षा किताब के अध्याय की तरह नहीं आती थी।
लोककथा : जनता की अपनी स्मृति
भारतीय लोककथा का संसार इतना व्यापक है कि उसे किसी एक सूची में बाँधना कठिन है। हर प्रदेश की अपनी लोककथाएँ हैं। बुंदेलखंड, राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल, असम, महाराष्ट्र, गुजरात, कश्मीर, केरल और तमिलनाडु—हर जगह कहानी कहने की अपनी शैली विकसित हुई।
बुंदेलखंड की आल्हा परंपरा इसका शानदार उदाहरण है। आल्हा-ऊदल की वीरगाथाएँ केवल पढ़ी नहीं जातीं; वे गाई जाती हैं। गायन में वीरता, संघर्ष और स्थानीय स्मृति एक साथ सामने आती है।
राजस्थान में पाबूजी की फड़ कथा, चित्र और प्रदर्शन का अनोखा मेल है। एक चित्रित फड़ को सामने रखकर भोपे-भोपी गीत और वाचन के माध्यम से पाबूजी की कथा प्रस्तुत करते हैं। यहाँ चित्र स्वयं कहानी का एक हिस्सा बन जाता है।
राजस्थान की कठपुतली परंपरा भी इसी व्यापक कथा-संसार का उदाहरण है। लकड़ी और कपड़े से बने पात्र जब कलाकार के हाथों में गति पाते हैं तो इतिहास, लोककथा, वीरता और मनोरंजन एक साथ मंच पर आ जाते हैं।
पूर्वी भारत में लोककथाओं और लोकगीतों की अपनी समृद्ध परंपराएँ हैं। असम की लोककथाओं से लेकर बंगाल की कथाओं तक, हर क्षेत्र ने अपने भूगोल, समाज और विश्वासों को कहानी का हिस्सा बनाया है। लोककथा का महत्व इस बात में है कि इसमें इतिहास हमेशा राजाओं के नाम से नहीं आता। कई बार उसमें एक सामान्य किसान, चरवाहा, स्त्री, कारीगर या गाँव का कोई बुजुर्ग अपने समय की कहानी कह रहा होता है। इस अर्थ में लोककथाएँ समाज की जन-स्मृति हैं।
वे हमें बताते हैं कि आम लोगों ने अपने समय को कैसे देखा, किन चीजों से डरते थे, किस बात पर गर्व करते थे और किन मूल्यों को महत्वपूर्ण मानते थे।
कथा केवल शब्द नहीं, प्रस्तुति भी है

भारतीय कथा-परंपरा की एक विशेषता यह भी है कि यहाँ कहानी केवल बोलकर नहीं कही जाती थी। कभी संगीत उसके साथ होता था, कभी अभिनय, कभी चित्र, कभी कठपुतली और कभी नृत्य। पंडवानी में महाभारत की कथा गायन और अभिनय के साथ सामने आती है। पाबूजी की फड़ में चित्र कथा के दृश्य संसार को सामने रखता है। कठपुतली में निर्जीव पात्रों को गति मिलती है। रामलीला में कथा सामूहिक अभिनय बन जाती है। रासलीला में कृष्णकथा संगीत और नृत्य के साथ जीवंत होती है।
दक्षिण भारत में यक्षगान जैसे लोकनाट्य रूपों में वेशभूषा, संगीत, नृत्य और संवाद के माध्यम से पौराणिक कथाएँ प्रस्तुत होती हैं। केरल की कथकली में चेहरे की अभिव्यक्ति, नृत्य-भंगिमा, वेशभूषा और संगीत के सहारे कथाएँ मंच पर आकार लेती हैं।अर्थात भारतीय संस्कृति में कहानी साहित्य की सीमा से बाहर निकलकर प्रदर्शन कला का भी आधार बनती रही है।
जब कहानी गाँव से मंच और किताब तक पहुँची
मुद्रण कला के आने से कहानियाँ किताबों में सुरक्षित होने लगीं। समाचार पत्रों और पत्रिकाओं ने कहानी को एक नया पाठक वर्ग दिया। आधुनिक हिंदी साहित्य में कहानी ने समाज के बदलते जीवन को अभिव्यक्ति दी।प्रेमचंद की कहानियों में गाँव, किसान, गरीबी, सामाजिक असमानता और मानवीय संबंधों का संसार दिखाई देता है। ‘ईदगाह’ में हामिद का अपनी दादी अमीना के प्रति प्रेम हो या ‘पूस की रात’ में हल्कू का संघर्ष—कहानी पाठक को किसी दूर की दुनिया में नहीं ले जाती, बल्कि अपने ही समाज के सामने खड़ा करती है।
रेडियो ने आवाज को फिर लौटा दिया
एक समय ऐसा आया जब कहानी फिर से आवाज बनकर घरों में लौट आई। रेडियो ने कहानी को उस व्यक्ति तक पहुँचाया जिसके पास किताब खरीदने या पढ़ने का समय नहीं था। आकाशवाणी के नाटक, वार्ताएँ, रूपक और साहित्यिक कार्यक्रमों ने कथा को आवाज, संगीत और ध्वनि प्रभावों के माध्यम से श्रोताओं तक पहुँचाया।
टेलीविजन और दृश्य कथा
टेलीविजन के आने के बाद कहानी को एक नया माध्यम मिला।अब पात्र दिखाई देने लगे। स्थान दिखाई देने लगे। संगीत, संवाद और दृश्य एक साथ आने लगे। 1980 के दशक में ‘रामायण’ और बाद में ‘महाभारत’ जैसे धारावाहिकों ने पूरे देश में एक साथ बैठकर कथा देखने का अनुभव पैदा किया। निर्धारित समय पर परिवार टेलीविजन के सामने बैठते थे। कई जगहों पर पड़ोसी भी एक ही घर में इकट्ठा होकर धारावाहिक देखते थे।

मोबाइल के दौर में कहानी
अब कहानी सुनने के लिए दादी के पास बैठना या किताब खोलना जरूरी नहीं। मोबाइल फोन में हजारों कहानियाँ हैं। ऑडियोबुक, पॉडकास्ट, वेब सीरीज, शॉर्ट वीडियो और सोशल मीडिया ने कथा के नए रूप पैदा किए हैं। आज कोई व्यक्ति कुछ मिनटों में एक कहानी सुन सकता है। कोई अपनी कहानी कैमरे के सामने कह सकता है। कोई लोककथा रिकॉर्ड करके लाखों लोगों तक पहुँचा सकता है। पहले कहानी प्रकाशित कराने के लिए प्रकाशक चाहिए था। अब कोई व्यक्ति अपने अनुभव को डिजिटल मंच पर साझा कर सकता है। किसी गाँव की लोककथा, जो शायद कुछ वर्षों बाद भुला दी जाती, अब रिकॉर्ड होकर दूर-दराज के लोगों तक पहुँच सकती है। मसलन, किसी बुजुर्ग लोकगायक से उसके क्षेत्र की कोई पुरानी कथा रिकॉर्ड कर उसे डिजिटल संग्रह में सुरक्षित किया जाए, तो वह कथा केवल उस गाँव की स्मृति नहीं रहेगी।
लेकिन क्या डिजिटल कहानी दादी की कहानी जैसी हो सकती है?
यहाँ एक कठिन प्रश्न सामने आता है।मोबाइल पर सुनी कहानी और दादी की गोद में बैठकर सुनी कहानी में क्या अंतर है?
कहानी तो दोनों जगह है।लेकिन अनुभव अलग है। दादी की कहानी में केवल शब्द नहीं थे। उसमें दादी की आवाज थी, उनका स्पर्श था, बीच-बीच में आने वाली हँसी थी, कहानी भूल जाने पर उनका रुकना था और फिर अपनी तरफ से कुछ जोड़ देना था।
डिजिटल माध्यम हमें सुविधा देता है, गति देता है और व्यापक पहुँच देता है।लेकिन वह आत्मीयता हमेशा नहीं दे सकता।
इसलिए चुनौती तकनीक को छोड़ने की नहीं है।चुनौती यह है कि तकनीक का उपयोग करते हुए संस्कृति की आत्मा को कैसे बचाया जाए।
कहानी का भविष्य : तकनीक और परंपरा का मिलन
आज डिजिटल अभिलेखन, पॉडकास्ट, वीडियो और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे माध्यमों ने कथा के लिए नई संभावनाएँ खोली हैं। हम लोककथाओं को रिकॉर्ड कर सकते हैं। बुजुर्ग कथाकारों की आवाज सुरक्षित कर सकते हैं। विलुप्त होती भाषाओं की कहानियों का डिजिटल संग्रह बना सकते हैं। लोकनाट्य और कठपुतली परंपराओं के प्रदर्शन रिकॉर्ड किए जा सकते हैं।
कल्पना कीजिए-बुंदेलखंड का कोई बुजुर्ग आल्हा गायक अपने गाँव की चौपाल पर आल्हा गा रहा है। उसका वीडियो रिकॉर्ड होता है, गीत के शब्द लिखित रूप में सुरक्षित किए जाते हैं और स्थानीय भाषा के साथ उसका हिंदी अनुवाद भी तैयार किया जाता है। अब वह प्रस्तुति केवल एक रात की स्मृति नहीं रहती; वह आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक दस्तावेज बन सकती है।
इसी तरह किसी ग्रामीण कथावाचक की दादी से सुनी लोककथा रिकॉर्ड की जाए तो उसके साथ केवल कहानी ही नहीं, बल्कि कथाकार का नाम, स्थान, बोली, प्रसंग और प्रस्तुति शैली भी सुरक्षित की जा सकती है।
लेकिन केवल रिकॉर्ड करना पर्याप्त नहीं होगा।हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इन कथाओं को सुनने वाले लोग हों।
किसी संस्कृति को डिजिटल फाइल में सुरक्षित रखना और उसे जीवित रखना दो अलग बातें हैं। संस्कृति तब जीवित रहती है जब कोई उसे सुनता है, समझता है और आगे कहता है। इसलिए स्कूलों, सांस्कृतिक संस्थाओं, पुस्तकालयों, रंगमंच समूहों और डिजिटल मंचों के बीच संवाद आवश्यक है। एक बच्चा अगर पंचतंत्र की कहानी मोबाइल पर सुनता है और फिर उसी कहानी पर विद्यालय में नाटक करता है, तो परंपरा और आधुनिकता का सुंदर मिलन हो सकता है।
कहानी हमें जोड़ती है
आज के समय में हम पहले से अधिक जुड़े हुए हैं, लेकिन कई बार पहले से अधिक अकेले भी दिखाई देते हैं। सोशल मीडिया पर हजारों लोग हमारे संपर्क में होते हैं, फिर भी आमने-सामने बैठकर बातचीत कम होती जा रही है।
ऐसे समय में कहानी की भूमिका फिर महत्वपूर्ण हो जाती है।कहानी सुनना एक सामूहिक अनुभव है। जब कोई अपनी कहानी कहता है तो सामने वाला केवल शब्द नहीं सुनता, वह उस व्यक्ति का अनुभव समझने की कोशिश करता है।
किसी किसान की कहानी सुनना हमें खेती की कठिनाइयों से जोड़ सकता है। किसी कारीगर की कहानी उसके शिल्प के पीछे छिपे श्रम का परिचय करा सकती है। किसी लोक कलाकार की कहानी हमें उस परंपरा की यात्रा समझा सकती है जिसे हम केवल मंच पर कुछ मिनट देखकर भूल जाते हैं।
मान लीजिए किसी कुम्हार से पूछा जाए कि वह दीपक क्यों बनाता है। उसके उत्तर में केवल मिट्टी और चाक की तकनीक नहीं होगी। उसमें परिवार की परंपरा, त्योहारों की स्मृति, बाजार का बदलता स्वरूप और अपने काम के प्रति लगाव भी हो सकता है।
यही कहानी को सांस्कृतिक दस्तावेज बनाता है। कहानियाँ हमें दूसरे मनुष्य के जीवन के भीतर थोड़ी देर के लिए प्रवेश करने का अवसर देती हैं। शायद इसी कारण कहानी मनुष्य को अधिक संवेदनशील बनाने का सबसे सरल माध्यम है।
संस्कृति की सबसे सुरक्षित जगह
हम स्मारकों को सुरक्षित रख सकते हैं। पांडुलिपियों को संरक्षित कर सकते हैं। संग्रहालय बना सकते हैं। दस्तावेज डिजिटल कर सकते हैं, लेकिन संस्कृति की सबसे सुरक्षित जगह अंततः मनुष्य की स्मृति है।
जब तक कोई बच्चा अपनी दादी से कहानी सुनता है, जब तक कोई लोक कलाकार अपने शिष्य को गीत सिखाता है, जब तक कोई कथावाचक अपने श्रोताओं के सामने कथा कहता है, तब तक संस्कृति जीवित रहती है।

पंडवानी की परंपरा इसलिए जीवित है कि कलाकार उसे अगली पीढ़ी को सिखाते रहे। रामलीला इसलिए केवल पुरानी स्मृति नहीं बनी कि आज भी अनेक स्थानों पर लोग उसके पात्र बनते हैं। लोकगीत इसलिए बचे हैं कि वे केवल पुस्तकों में दर्ज नहीं हुए, बल्कि विवाह, त्योहार, श्रम और उत्सव के अवसरों पर गाए जाते रहे। किसी परंपरा को जीवित रखने का सबसे अच्छा तरीका है-उसे अगली पीढ़ी के अनुभव का हिस्सा बनाना।
फिर लौटें उस आँगन में
कल्पना कीजिए कि कई वर्षों बाद कोई बच्चा अपने दादा या दादी से पूछता है—“आपके बचपन में कहानियाँ कैसे सुनाई जाती थीं?”अगर उसके पास केवल मोबाइल में कुछ वीडियो होंगे, तो कहानी का एक हिस्सा तो बचा रहेगा, लेकिन अनुभव का एक बड़ा संसार खो चुका होगा। इसलिए हमें तकनीक के साथ-साथ उस आँगन को भी बचाना होगा जहाँ कहानी सुनाई जाती थी।
यह जरूरी नहीं कि आज हर घर में वही पुराना आँगन हो।कहानी का स्थान बदल सकता है। आज वह पुस्तकालय में हो सकती है, विद्यालय में हो सकती है, रंगमंच पर हो सकती है, पॉडकास्ट में हो सकती है या मोबाइल की स्क्रीन पर।
जरूरी यह है कि कहानी और मनुष्य के बीच का संबंध बना रहे।क्योंकि कहानी केवल अतीत की चीज नहीं है। वह वर्तमान को समझने और भविष्य की कल्पना करने का माध्यम भी है। कहानी केवल बीते समय की आवाज नहीं है।
वह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाती हुई स्मृति है।वह समाज का अनुभव है, मनुष्य की संवेदना है और संस्कृति की जीवित धड़कन है।और शायद आने वाले समय में भी, किसी न किसी रूप में, किसी बच्चे के सामने कोई आवाज फिर उठेगी—
“बहुत समय पहले की बात है…”और कहानी फिर शुरू हो जाएगी।
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