अरवा राइस मिल एसोसिएशन के अधिवेशन में उठा धान खरीद का मुद्दा, विधायकों ने बंद मिलों को चालू कराने और खरीद का लक्ष्य बढ़ाने की मांग की
मनीष कुमार, संवाददाता, फ्रीलांसरपोस्ट
पटना। बिहार में धान के बड़े पैमाने पर उत्पादन के बावजूद सरकारी खरीद का लक्ष्य कम होने और अरवा राइस मिलों के बंद रहने का मुद्दा एक बार फिर उठा है। बिहार राज्य अरवा राइस मिल एसोसिएशन के सालाना अधिवेशन में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि राज्य की धान खरीद नीति के कारण किसानों को अपनी उपज औने-पौने दाम पर बेचनी पड़ती है। वहीं, कर्ज लेकर मिल लगाने वाले संचालकों को भी आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
गुरुवार, 8 अक्टूबर को पटना के वीरचंद पटेल पथ स्थित पटेल भवन में आयोजित अधिवेशन में बंद पड़ी अरवा राइस मिलों को चालू कराने, धान खरीद का लक्ष्य बढ़ाने और अरवा मिलों को धान की मिलिंग का अवसर देने की मांग की गई। बैठक में विधायकों ने भी इस मुद्दे को सरकार के सामने उठाने का भरोसा दिलाया।
153 लाख टन धान का उत्पादन, खरीद का लक्ष्य सिर्फ 35 लाख टन
अधिवेशन में वक्ताओं ने बताया कि बिहार में वर्ष 2026-27 के दौरान धान का उत्पादन 154 लाख मीट्रिक टन से अधिक होने का अनुमान बताया जा रहा है, जबकि सरकारी खरीद का लक्ष्य करीब 35 लाख मीट्रिक टन है। एसोसिएशन के पदाधिकारियों के अनुसार, इस व्यवस्था में उत्पादन का लगभग 23 प्रतिशत धान ही सरकारी खरीद के दायरे में आता है। बाकी धान बेचने के लिए किसानों को बाजार और बिचौलियों पर निर्भर रहना पड़ता है।
वक्ताओं ने दावा किया कि सरकारी व्यवस्था में धान की कीमत करीब 2,425 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि बिचौलिये किसानों से करीब 1,800 रुपये प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदते हैं। उनका कहना था कि यदि सरकारी खरीद का लक्ष्य बढ़ाया जाए, तो किसानों को अपनी उपज कम कीमत पर बेचने की मजबूरी से राहत मिल सकती है।
एसोसिएशन ने दूसरे राज्यों की तरह बिहार में भी धान खरीद की व्यवस्था मजबूत करने की मांग की। वक्ताओं का कहना था कि धान की खरीद के बाद उसकी मिलिंग कर चावल केंद्रीय पूल में देने से राज्य के किसानों और मिल संचालकों, दोनों को लाभ मिल सकता है।
करीब 4000 अरवा राइस मिलें बंद होने का दावा
एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने कहा कि बिहार में करीब 4,000 अरवा राइस मिलें लंबे समय से बंद हैं। उनके मुताबिक, पहले राज्य में धान की मिलिंग में अरवा राइस मिलों की अहम भूमिका थी, लेकिन बाद में उसना चावल मिलों के जरिए मिलिंग कराने की व्यवस्था लागू होने से अरवा मिलों को काम मिलना बंद हो गया।
वक्ताओं ने दावा किया कि राज्य में धान का उत्पादन काफी अधिक है, लेकिन उसना राइस मिलों की क्षमता पूरी उपज की मिलिंग करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी वजह से धान की खरीद और मिलिंग से जुड़ी व्यवस्था में समस्याएं पैदा हो रही हैं। उन्होंने पिछले वर्ष करीब 15 लाख मीट्रिक टन धान की मिलिंग लंबित रहने की बात भी कही।
एसोसिएशन का कहना है कि यदि अरवा राइस मिलों को फिर से मिलिंग का अवसर दिया जाए, तो राज्य में उपलब्ध क्षमता का इस्तेमाल होगा, बंद पड़े उद्योग चालू हो सकेंगे और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
विधायक अरुण मांझी बोले- मिलों को काम देने से बिहार को होगा फायदा
विधायक अरुण मांझी ने कहा कि बिहार में अरवा राइस मिलों को सरकार की अनुमति और लाइसेंस के आधार पर स्थापित किया गया था। ऐसे में इन मिलों को काम नहीं मिलना गंभीर समस्या है।
उन्होंने कहा कि एसोसिएशन की मांग है कि सरकार जिस न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर धान खरीदती है, उस व्यवस्था में अरवा मिलों को भी मिलिंग का अवसर दिया जाए। यदि बिहार दूसरे राज्यों से अरवा चावल मंगाकर वितरण करता है, तो राज्य की अपनी मिलों में तैयार चावल का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा सकता?
अरुण मांझी ने भरोसा दिलाया कि एसोसिएशन की मांग को खाद्य आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले के मंत्री डॉ. अशोक चौधरी के सामने उठाया जाएगा। यदि वहां समाधान नहीं निकला, तो इस मुद्दे को मुख्यमंत्री के समक्ष रखा जाएगा।
राधा चरण सेठ ने 15 लाख टन धान खरीद का हिस्सा अरवा मिलों को देने की मांग की
विधायक राधा चरण सेठ ने कहा कि सरकार ने केंद्र के सामने धान खरीद का लक्ष्य 35 लाख मीट्रिक टन से बढ़ाकर 50 लाख मीट्रिक टन करने की बात रखी है। उन्होंने मांग की कि बढ़ाए जाने वाले 15 लाख मीट्रिक टन के हिस्से का लाभ बंद पड़ी अरवा राइस मिलों को भी दिया जाए।
उन्होंने कहा कि एक ओर बिहार में उद्योग-धंधे बढ़ाने की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर पहले से स्थापित उद्योगों को काम नहीं मिल रहा है। कर्ज लेकर अरवा राइस मिल स्थापित करने वाले संचालकों पर ब्याज का बोझ बढ़ रहा है और उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
राधा चरण सेठ ने कहा कि यदि ये मिलें चालू होती हैं, तो हजारों लोगों को रोजगार मिल सकता है। खासकर शाहाबाद क्षेत्र के किसानों और धान उत्पादकों को इसका लाभ मिलेगा। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को संबंधित स्तर पर उठाया जाएगा, क्योंकि यह किसानों और मिल संचालकों के लिए जीवन-मरण का सवाल बन गया है।
100 फीसदी धान की मिलिंग करने में सक्षम होने का एसोसिएशन का दावा

बिहार राज्य अरवा राइस मिल एसोसिएशन के सचिव आनंद सिंह ने कहा कि वर्ष 2002 में धान की सरकारी खरीद शुरू होने के बाद 2020 तक अरवा राइस मिलों के जरिए मिलिंग होती रही। उनके मुताबिक, वर्ष 2022 के आसपास अरवा मिलों को मिलिंग का काम मिलना बंद हो गया।
आनंद सिंह का दावा है कि यदि सरकार अरवा राइस मिलों को मिलिंग करने की अनुमति देती है, तो बिहार में उत्पादित धान की पूरी मात्रा की मिलिंग करने की क्षमता मौजूद है। इससे किसानों को सरकारी खरीद का लाभ मिलेगा और मिल संचालकों को भी काम मिलेगा।
उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था से करीब पांच लाख लोगों को आजीविका के अवसर मिल सकते हैं। इससे रोजगार बढ़ेगा और काम की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर जाने वाले मजदूरों के पलायन को कम करने में मदद मिल सकती है।
पीडीएस के लिए 52 लाख टन धान की जरूरत का तर्क
एसोसिएशन के सचिव आनंद कुमार ने कहा कि बिहार में धान खरीद का लक्ष्य 30 से 35 लाख मीट्रिक टन से बढ़ाकर 50 लाख मीट्रिक टन करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि बिहार की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को चलाने के लिए करीब 33 लाख मीट्रिक टन चावल की जरूरत होती है। इसके लिए लगभग 52 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद आवश्यक होगी।
उन्होंने कहा कि यदि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पर्याप्त मात्रा में धान खरीदा जाता है, तो राज्य की जरूरत के मुताबिक चावल उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। उनके अनुसार, एक ओर बिहार में धान का उत्पादन 153 लाख मीट्रिक टन से अधिक है, जबकि दूसरी ओर सरकारी खरीद का लक्ष्य करीब 35 लाख मीट्रिक टन है। यह अंतर राज्य के किसानों के हित में नहीं है।
आनंद कुमार ने कहा कि अरवा राइस मिलों को मिलिंग का अवसर मिलने से किसानों, मिल संचालकों और राज्य की अर्थव्यवस्था को फायदा हो सकता है।
किसानों और मिल संचालकों के हित में नीति बदलने की मांग
अधिवेशन में वक्ताओं ने कहा कि बिहार में धान की खरीद का लक्ष्य बढ़ाने के साथ-साथ अरवा राइस मिलों को सरकारी व्यवस्था में उचित स्थान दिया जाना चाहिए। एसोसिएशन का तर्क है कि इससे किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिल सकता है, बंद मिलें फिर से चालू हो सकती हैं और स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ सकता है।
एसोसिएशन ने सरकार से धान खरीद नीति की समीक्षा करने और अरवा राइस मिलों को मिलिंग का अवसर देने की मांग की। अब देखना होगा कि सरकार इस मांग पर क्या निर्णय लेती है।
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