प्रयागराज। ‘दंशः विस्थापन का’ नाटक भारत-पाकिस्तान विभाजन की त्रासदी और विस्थापन के दर्द को मंच पर जीवंत करता है। प्रयागराज में हुए इस मंचन के दौरान दर्शक भावुक हो गए और प्रस्तुति के बाद कलाकारों का तालियों से जोरदार स्वागत किया गया।
“इक आग का दरिया बह निकला, लपटों में घर संसार किया मेरे देश पर कैसा वार किया” जैसे ही ये शब्द मंच पर गूंजे, केन्द्र प्रेक्षागृह में सन्नाटा छा गया। मंच पर बंटवारे का दर्द था, अपनों से बिछड़ने की पीड़ा थी और उजड़ते घरों की चीख थी।
उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, प्रयागराज NCZCC एवं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय,संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित प्रस्तुतिपरक नाट्य कार्यशाला के अंतर्गत प्रशिक्षित कलाकारों द्वारा तैयार नाटक ‘दंशः विस्थापन का’ का मंचन केन्द्र प्रेक्षागृह में हुआ।
प्रसिद्ध नाट्य निर्देशक व प्रकाश परिकल्पक अवतार साहनी द्वारा निर्देशित नाटक ‘दंशः विस्थापन का’ भारत-पाकिस्तान विभाजन की त्रासदी, विस्थापन और मानवीय संवेदनाओं को केंद्र में रखता है। कलाकारों की जीवंत और भावपूर्ण प्रस्तुति ने दर्शकों को भावुक कर दिया और पूरा प्रेक्षागृह देर तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा।

नम आंखों और तालियों के बीच गूंजा दंशः विस्थापन का
नाटक की शुरुआत 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की उस साझी विरासत से होती है, जब हिंदू और मुस्लिमों ने मिलकर अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ संघर्ष किया था। इसके बाद अंग्रेजों की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति, बढ़ती सांप्रदायिक दूरियां, मुस्लिम लीग की अलग राष्ट्र की मांग और 16 अगस्त 1946 की सीधी कार्रवाई के बाद भड़की हिंसा को घटनाक्रम के रूप में प्रस्तुत किया गया।
नाटक का सबसे मार्मिक प्रसंग विभाजन की सीमा रेखा खींचे जाने का रहा। रेडक्लिफ द्वारा कुछ ही सप्ताह में खींची गई रेखा ने सदियों से साथ रह रहे लोगों, परिवारों, खेतों और नदियों को बांट दिया। इसके साथ ही शुरू हुआ ऐसा विस्थापन, जिसमें लाखों लोगों को अपना घर-बार, जमीन और अपनों को छोड़कर अनजान रास्तों पर निकलना पड़ा।

“आज़ादी की कीमत हमने कितनी बड़ी चुकाई है” जैसे संवाद ने दर्शकों को भीतर तक झकझोर दिया। मंच पर कलाकारों ने उस दौर की भावनाओं को इतने प्रभावी ढंग से जीवंत किया कि दर्शक खुद को कहानी से जुड़ा हुआ महसूस करने लगे।
नाटक यह संदेश भी देता है कि नफरत, हिंसा और बंटवारे के माहौल में भी इंसानियत, प्रेम और भाईचारे की भावना सबसे बड़ी ताकत होती है। दंशः विस्थापन का की प्रस्तुति के दौरान कई ऐसे दृश्य आए जब दर्शकों की आंखें नम हो गईं। उनके संवाद और भावनात्मक अभिव्यक्ति ने विभाजन की पीड़ा को सजीव कर दिया।
सभागार में मौजूद कई दर्शक भावुक नजर आए और प्रस्तुति समाप्त होने पर कलाकारों का तालियों से जोरदार स्वागत किया।

घर, आंगन से बिछड़ने का दर्द
नाटक में यह भी दिखाया गया कि पीढ़ियों से जिस भूमि और समाज में लोग रहते आए थे, अचानक उससे बिछड़ना कितना कष्टदायक था। अपने घर, पड़ोस, रिश्ते और यादों को छोड़कर अनिश्चित भविष्य की ओर बढ़ने की मजबूरी ने लाखों लोगों को गहरे मानसिक और सामाजिक आघात दिए।
कलाकारों ने इन भावनाओं को बेहद प्रभावशाली ढंग से मंच पर प्रस्तुत किया। मंच सज्जा, प्रकाश व्यवस्था और अभिनय के माध्यम से विभाजन काल के वातावरण को जीवंत कर दिया। नाट्य रूपांतरण किया था सुशील कुमार सिंह ने, संगीत परिकल्पना राजेश कुमार पाठक की थी और सह- निर्देशक अनुराग शुक्ला की भूमिका शानदार रही।

मंच पर अमरजीत सिंह ने क्रांतिकारी, राम कृष्ण यादव ने ब्रिटिश ऑफिसर, श्रृष्टि भारद्वाज ने शरणार्थी, भारतेंदु कुमार ने पहरेदार, अर्चिता श्रीवास्तव ने लाला जी की बेटी, आकाश अग्रवाल ने चौधरी, वृषाली वर्मा ने बिंद्रो तथा अनुराग शिवा ने किन्नर नरेश की भूमिका निभाई।
इनके साथ हार्दिक भारद्वाज, कन्हैया सिंह, आस्था श्रीवास्तव, मो आजाद और राहुल कुमार ने अपने शानदार अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि अतुल कुमार मिश्रा, उप महाप्रबंधक, आई.आर.पी.एस., उत्तर मध्य रेलवे, प्रयागराज, केंद्र निदेशक सुदेश शर्मा, उपनिदेशक डॉ. मुकेश उपाध्याय, कार्यक्रम सलाहकार श्रीमती कल्पना सहाय एवं नाट्य निर्देशक श्री अवतार साहनी द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया।
कार्यक्रम के अंत में मुख्य अतिथि एवं केंद्र निदेशक द्वारा नाट्य निर्देशक, सहायक निर्देशक को स्मृति चिन्ह व अंग वस्त्र भेंट कर उन्हें सम्मानित किया। सभी कलाकारों को प्रमाण पत्र देकर उनका उत्साहवर्धन किया।

इस अवसर पर डॉ. धनंजय चोपड़ा, अनिल कुमार कालरा, आर.एस.बेदी, डॉ. राज बबेजा, सरोज ढींगरा, हरजिंदर सिंह, देवेन्द्र पाल, राणा चावला, मंजीत सिंह, मलकियत सिंह, यश पाल सैनी, के.एन. कुमार, प्रवीण शेखर, डॉ. कृष्णानंद पाण्डेय, अभिलाष नारायण सहित केंद्र के समस्त अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।
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