सावन के पवित्र माह में शिवभक्तों के लिए यह खास मौका होता है, जब वो भोले नाथ की विशेष पूजा अर्चना करते हैं। शिवालयों में दिखने वाली भीड़ बताती है कि सनातन संस्कृति में शिवा उपासना का क्या महत्व है। बारह ज्योतिर्लिंग हमारी आस्था के केंद्र यूं ही नहीं हैं। हम अपनी इस खास सीरीज बारह ज्योतिर्लिंग की यात्रा में आज आप को ले चल रहे हैं सातवें काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग। मोक्षदायिनी नगरी काशी (वाराणसी) के हृदय में विराजित श्री काशी विश्वनाथ मंदिर देवाधिदेव महादेव के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से अत्यंत महिमामयी और प्रमुख माना जाता है। मान्यता है कि यहाँ जो भी भक्त सच्चे मन से अपनी प्रार्थना लेकर आता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है. वाराणसी में गंगा नदी के पश्चिम तट पर स्थित यह ज्योतिर्लिंग केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति, ज्ञान, दर्शन और आध्यात्मिक चेतना की शाश्वत राजधानी है।
काशी और महादेव का संगम
काशी उत्तरवाहिनी गंगा का तट और ज्योतिर्लिंग का सानिध्य एक अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा का निर्माण करता है। सावन के महीने में यहाँ लाखों श्रद्धालु गंगाजल लाकर बाबा विश्वनाथ (ज्योतिर्लिंग) का जलाभिषेक करते हैं। सनातन परंपरा में मान्यता है कि काशी में मृत्यु प्राप्त करने वाले प्राणी के कान में स्वयं भगवान शिव ‘तारक मंत्र’ प्रदान करते हैं, जिससे जीव को पुनर्जन्म के चक्र से सदा के लिए मुक्ति (मोक्ष) मिल जाती है। इसी कारण काशी को ‘अविमुक्त क्षेत्र’ भी कहा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सम्पूर्ण काशी नगरी भगवान शिव के त्रिशूल के अग्रभाग पर टिकी हुई है। प्रलय काल में भी इस पावन क्षेत्र का विनाश नहीं होता।

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग का पौराणिक इतिहास
काशी विश्वनाथ का इतिहास जितना प्राचीन है, उतना ही यह संघर्ष और आस्था के पुनरुत्थान की अमर गाथा भी है। शिव पुराण के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु के बीच अपनी श्रेष्ठता को लेकर विवाद हो गया। तब भगवान शिव ने दोनों के भ्रम को दूर करने के लिए दिशाओं को भेदता हुआ एक अनंत और असीम ‘अग्नि स्तंभ’ (ज्योति-पुंज) प्रकट किया। ब्रह्मा जी और विष्णु जी इस स्तंभ का अंत खोजने में असमर्थ रहे। भगवान शिव जिस-जिस स्थान पर इस प्रकाश स्तंभ के रूप में साक्षात प्रकट हुए, वे ही स्थल ‘ज्योतिर्लिंग’ कहलाए। काशी में प्रकट हुआ यह ज्योति-पुंज ‘काशी विश्वनाथ’ के रूप में पूजा जाने लगा।
काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग का निर्माण और जीर्णोद्धार
काशी विश्वनाथ मंदिर पर इतिहास में कई बार आक्रमण हुए और इसे ध्वस्त करने के प्रयास किए गए, लेकिन सनातन धर्म की अटूट श्रद्धा ने हर बार इसका पुनर्निर्माण कराया। मंदिर का प्रारंभिक उल्लेख वेदों और पुराणों में मिलता है। 1194 ईस्वी में कुतुबुद्दीन ऐबक के आक्रमण से लेकर 17वीं सदी में मुगल शासक औरंगजेब द्वारा ध्वस्त किए जाने तक, मंदिर ने कई उतार-चढ़ाव देखे। 18वीं शताब्दी (वर्ष 1780) में इंदौर की महारानी पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर ने वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण करवाया। उन्होंने नष्ट किए गए स्थल के समीप ही एक नए विशाल मंदिर का निर्माण कराकर भगवान शिव को पुनः प्रतिष्ठित किया। वर्ष 1835 में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा प्रकट करते हुए लगभग 1000 किलोग्राम शुद्ध सोना दान दिया, जिससे मंदिर के शिखरों को स्वर्ण मंडित किया गया। इसी कारण इसे ‘गोल्डन टेम्पल’ (Golden Temple of Varanasi) भी कहा जाने लगा। दिसंबर 2021 में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का निर्माण पूरा हुआ, जिसने मंदिर को सीधे गंगा तट (ललिता घाट) से जोड़ दिया। इससे श्रद्धालुओं के लिए गंगा स्नान के बाद सीधे मंदिर परिसर में प्रवेश करना अत्यंत सुगम हो गया है।

औरंगजेब का हमला और ज्ञानवापी का निर्माण (1669 ईस्वी)
1669 ईस्वी में मुगल बादशाह औरंगजेब ने काशी के तत्कालीन विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करने का फरमान जारी किया था। इतिहासकार साकी मुस्तइद खान की पुस्तक ‘मासिर-ए-आलमगीरी’ में इस फरमान का उल्लेख मिलता है। औरंगजेब की सेना ने मुख्य मंदिर के अधिकांश हिस्से को ध्वस्त कर दिया। हालांकि, मंदिर के पिछले हिस्से की दीवारों और नक्काशीदार मेहराबों को पूरी तरह नष्ट नहीं किया गया और उसी मूल संरचना के ऊपर मस्जिद का निर्माण करा दिया गया, जिसे आज ज्ञानवापी मस्जिद के रूप में जाना जाता है। मस्जिद की दीवारों पर बने प्राचीन हिंदू स्थापत्य कला के अवशेष आज भी उस ऐतिहासिक घटना की गवाही देते हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित विशाल नंदी महाराज की मूर्ति का मुख आज भी उस ज्ञानवापी परिसर की दिशा में ही है, जहाँ मूल मंदिर की दीवारें खड़ी हैं। आमतौर पर शिव मंदिरों में नंदी का मुख सीधे गर्भगृह (शिवलिंग) की ओर होता है, लेकिन यहाँ नंदी का रुख मूल स्थान की ओर होना इस ऐतिहासिक हमले और परिवर्तन का प्रतीक माना जाता है।

ज्योतिर्लिंग को बचाने के लिए कुएं में कूद गए महंत
लोक कथाओं और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, जब औरंगजेब की सेना ने मंदिर पर आक्रमण किया, तो उस समय के मुख्य पुजारी (महंत) ने ज्योतिर्लिंग की पवित्रता को भंग होने से बचाने के लिए एक अदम्य साहस दिखाया। वे मूल ज्योतिर्लिंग को अपने आलिंगन (गोद) में लेकर मंदिर परिसर में स्थित ‘ज्ञानवापी कुएं’ में कूद गए। यह मान्यता आज भी जनमानस में गहराई से बसी हुई है कि मूल ज्योतिर्लिंग को आक्रांताओं के स्पर्श से सुरक्षित रखने के लिए कुएं के जल में समाहित कर दिया गया था।
इस हमले के बाद लगभग 100 से अधिक वर्षों तक काशी विश्वनाथ का मूल मंदिर ध्वस्त अवस्था में रहा। श्रद्धालु खंडित अवशेषों के पास ही पूजा-अर्चना करते रहे। इसके बाद 1780 ईस्वी में इंदौर की महारानी पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर ने असीम श्रद्धा का परिचय देते हुए ध्वस्त परिसर के ठीक बगल में वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर का भव्य निर्माण कराया, जहाँ आज बाबा विश्वनाथ का ज्योतिर्लिंग पूजित है।
शिव का हिमालय से काशी आगमन
भगवान शिव की नगरी काशी केवल वैराग्य ही नहीं, बल्कि अन्नपूर्णा स्वरूपा माता पार्वती के वात्सल्य और पोषण की भी अमर भूमि है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव कैलाश छोड़कर काशी आए, तब एक संवाद के दौरान शिव जी ने कहा कि ‘संसार और उसके सभी पदार्थ केवल माया (भ्रम) हैं’। प्रकृति स्वरूपा माता पार्वती ने शिव जी को यह बोध कराने के लिए कि जीव के अस्तित्व और सृष्टि के संचालन के लिए अन्न अत्यंत आवश्यक है, स्वयं को संपूर्ण ब्रह्मांड से गुप्त कर लिया, जिससे चारों ओर हाहाकार और भयंकर अकाल पड़ गया। जब स्वयं शिव जी के गण भूख से व्याकुल हो गए, तब शिव जी को आभास हुआ कि यद्यपि ब्रह्म सत्य है, परंतु शरीर धारण किए जीव के लिए प्रकृति और अन्न ही जीवन का आधार हैं। इसके बाद जब भगवान शिव काशी पहुंचे, तो माता पार्वती ‘माँ अन्नपूर्णा’ के दिव्य रूप में प्रकट होकर सभी भूखे जीवों को अन्न बांट रही थीं; तब स्वयं महादेव ने एक भिक्षुक का रूप धारण कर देवी के सामने झोली फैलाई और उनसे अन्न की भिक्षा मांगी। माता अन्नपूर्णा के इसी अभय वरदान और अक्षय भंडार के कारण आज भी यह अटूट मान्यता है कि मोक्षनगरी काशी में कभी कोई प्राणी भूखा नहीं सोता।

शिवनगरी – काशी, बनारस और वाराणसी
उत्तर प्रदेश का यह प्राचीन शहर तीन भिन्न ऐतिहासिक व आध्यात्मिक संदर्भों के कारण काशी, बनारस और वाराणसी नाम से जाना जाता है। ‘काशी’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की ‘काश्’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है ‘चमकना’ या ‘प्रकाशित होना’; इसी कारण इसे ‘प्रकाश की नगरी’ (City of Light) कहा जाता है। ‘वाराणसी’ नाम का सबसे ठोस भौगोलिक आधार यहाँ की दो पावन नदियों ‘वरुणा’ (उत्तर में) और ‘असि’ (दक्षिण में) का पवित्र संगम है, जिनके मध्य यह नगरी बसी हुई है। वहीं ‘बनारस’ नाम पाली और प्राकृत भाषाओं में ‘वाराणसी’ शब्द के ही अपभ्रंश तथा मध्यकालीन बोलचाल से विकसित हुआ, जिसे ब्रिटिश काल में आधिकारिक तौर पर अपनाया गया। इस प्रकार तीनों ही नाम एक ही मोक्षदायिनी नगरी की आध्यात्मिक ज्योति, भौगोलिक स्थिति और सांस्कृतिक यात्रा को दर्शाते हैं।
कैसे पहुंचें काशी विश्वनाथ धाम ?
काशी विश्वनाथ धाम (वाराणसी) पहुँचना अत्यंत सुगम है क्योंकि यह नगरी हवाई, रेल और सड़क मार्ग से देश के सभी प्रमुख हिस्सों से सीधे जुड़ी हुई है। यदि आप रेल मार्ग से आ रहे हैं, तो वाराणसी जंक्शन (कैंट) या बनारस रेलवे स्टेशन सबसे पास हैं, जहाँ से मंदिर की दूरी मात्र 4 से 6 किलोमीटर है (जबकि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन से यह लगभग 18 किमी दूर है)। हवाई मार्ग के लिए बाबतपुर स्थित लाल बहादुर शास्त्री अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा निकटतम विकल्प है, जो मंदिर परिसर से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर है। शहर पहुँचने के बाद आपको ऑटो, टैक्सी या ई-रिक्शा के माध्यम से गोदौलिया चौराहा या मैदागिन पहुँचना होता है, क्योंकि पुराने शहर की गलियों में बड़े वाहनों का प्रवेश वर्जित है। गोदौलिया चौराहे से मात्र 500 मीटर की पैदल दूरी पर मंदिर का मुख्य द्वार (गेट नंबर 4 – छत्ता द्वार) स्थित है। इसके अलावा श्रद्धालु गंगा नदी में नौका विहार करते हुए सीधे ललिता घाट पर उतरकर भव्य काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के ज़रिए भी सीधे मंदिर परिसर में प्रवेश कर सकते हैं।
हिंदू धर्म में आस्था के केंद्र कैसे बने बारह ज्योतिर्लिंग?

हिंदू धर्म में बारह ज्योतिर्लिंग प्राचीन काल से ही आस्था के अखंड केंद्र इसलिए बने क्योंकि ये केवल मानव-निर्मित मंदिर नहीं, बल्कि भगवान शिव के साक्षात ज्योति-पुंज (स्वयंभू प्राकट्य) के भौतिक प्रतीक माने जाते हैं। भारत के चारों कोनों—उत्तर में केदारनाथ से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम और पूर्व में वैद्यनाथ से लेकर पश्चिम में सोमनाथ—तक फैले ये ज्योतिर्लिंग देश को एक अटूट भौगोलिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सूत्र में पिरोते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार, प्रत्येक ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति के पीछे ईश्वर की कृपा, भक्तों के कल्याण और आरोग्य की दिव्य गाथा जुड़ी है, जहाँ निष्ठापूर्वक जलाभिषेक या केवल स्मरण मात्र से जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है; इसी अगाध फलदायिनी शक्ति और शिव-तत्व की प्रत्यक्ष अनुभूति के कारण ये युगों-युगों से करोड़ों श्रद्धालुओं की अचल आस्था के प्रतीक बने हुए हैं।
हिंदू धर्म में आस्था के केंद्र कैसे बने 12 ज्योतिर्लिंग? विस्तार से पढ़िए पूरी कहानी
भगवान शिव कैसे बने भारतीय जनमानस के पूज्य?
भगवान शिव भारतीय जनमानस के पूज्य इसलिए बने क्योंकि वे केवल एक दूरस्थ ईश्वर नहीं, बल्कि आम जन-जीवन, प्रकृति और संवेदनाओं से सीधे जुड़े देव हैं। वैदिक संस्कृति के ‘रुद्र’ से लेकर जनजातीय और लोक परंपराओं के ‘महादेव’ तक, शिव का स्वरूप समाज के हर वर्ग को समाहित करता है। जहाँ वे एक ओर सर्वोच्च योगी, ज्ञान के सागर और संहारक हैं, वहीं दूसरी ओर अत्यंत सरल, दयालु और ‘आशुतोष’ (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) हैं, जो छल-कपट से परे होकर मात्र जल और बेलपत्र से भी तृप्त हो जाते हैं। विष को अपने कण्ठ में धारण कर सृष्टि की रक्षा करने वाला उनका ‘नीलकंठ’ रूप त्याग का प्रतीक है, तो भूत-पिशाच, पशु-पक्षी और उपेक्षितों को भी अपने गले लगाने का उनका भाव उन्हें जन-जन का अपना ‘भोलेनाथ’ बनाता है। इसी सहजता, समदर्शिता और कल्याणकारी (शिव) स्वभाव के कारण वे युगों-युगों से भारत की आत्मा और आस्था के सर्वोपरि केंद्र बने हुए हैं।
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