सावन के पवित्र माह में शिवभक्तों के लिए यह खास मौका होता है, जब वो भोले नाथ की विशेष पूजा अर्चना करते हैं. शिवालयों में दिखने वाली भीड़ बताती है कि सनातन संस्कृति में शिवा उपासना का क्या महत्व है. बारह ज्योतिर्लिंग हमारी आस्था के केंद्र यूं ही नहीं हैं. द्वादश ज्योतिर्लिंगों की पूरी यात्रा। हम अपनी इस खास सीरीज बारह ज्योतिर्लिंग की यात्रा में आज आप को ले चल रहे हैं ज्योतिर्लिंग ‘बाबा वैद्यनाथ’ धाम. जहां लंकापति रावण का घमंड भी चूर हो गया था. झारखंड के देवघर (Santhal Pargana) स्थित बाबा वैद्यनाथ मंदिर (वैद्यनाथ धाम) देश के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक अत्यंत महिमामयी और ऐतिहासिक तीर्थ स्थल है. बाबा वैद्यनाथ को ‘कामना लिंग’ के रूप में जाना जाता है. मान्यता है कि यहाँ जो भी भक्त सच्चे मन से अपनी प्रार्थना लेकर आता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है.
शिव-शक्ति का लाल गठबंधन
वैद्यनाथ धाम की एक सबसे अनोखी खासियत यह है कि यहाँ भगवान शिव और माता पार्वती का मंदिर एक-दूसरे के आमने-सामने स्थित है. दोनों मंदिरों के शिखरों को लाल धागे (कलावा) से बाँधा जाता है, जिसे ‘गठबंधन’ कहते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवघर की इस पवित्र भूमि पर आस्था केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि उस हर धागे में भक्तों की प्रगाढ़ आस्था और आध्यात्मिक चेतना स्पष्ट दिखाई देती है जिसे श्रद्धालु अटूट विश्वास के साथ बाँधते हैं। बाबा और मां पार्वती के शिखरों को जोड़ने वाला यह लाल धागा शिव और शक्ति के शाश्वत और अनंत बंधन को दर्शाता है। यह दांपत्य जीवन में सुख और प्रेम का प्रतीक है.

बाबा धाम आने वाले लाखों श्रद्धालु इस पावन गठबंधन के दर्शन कर खुद को सौभाग्यशाली मानते हैं। मान्यता है कि इस दिव्य गठबंधन के दर्शन मात्र से वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि आती है और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। बाबा बैद्यनाथ धाम आज भी देश-दुनिया के श्रद्धालुओं के लिए उस आस्था का केंद्र बना हुआ है जहाँ शिव और शक्ति का यह पवित्र बंधन युगों-युगों से चला आ रहा है।
शिव और शक्ति का दुर्लभ संगम (पंचशूल)
आमतौर पर शिव मंदिरों के शिखर पर ‘त्रिशूल’ होता है, लेकिन वैद्यनाथ मंदिर और आसपास के सभी मंदिरों के शिखर पर ‘पंचशूल’ (पाँच शूलों वाला अस्त्र) स्थापित है. इसे तंत्र साधना की दृष्टि से सुरक्षा कवच माना जाता है. सावन (श्रावण) के महीने में यहाँ विश्व का सबसे लंबा और अनवरत चलने वाला धार्मिक मेला लगता है. भक्त कठिन पैदल यात्रा करके ‘बोल-बम’ का जयकारा लगाते हुए देवघर पहुँचते हैं और बाबा का जलाभिषेक करते हैं.
शिवलिंग को लंका ले जाना चाहता था रावण
पौराणिक कथाओं के अनुसार, लंकापति रावण भगवान शिव का परम भक्त था। वह चाहता था कि भगवान शिव कैलाश पर्वत को छोड़कर उसकी राजधानी लंका में हमेशा के लिए निवास करें, ताकि उसकी लंका अजेय रहे और शिव जी का सानिध्य हमेशा मिलता रहे। इसके लिए रावण ने हिमालय पर जाकर भगवान शिव की अत्यंत कठिन तपस्या की। जब शिव जी प्रकट नहीं हुए, तो रावण ने एक-एक करके अपने सिर काटकर शिवलिंग पर अर्पित करना शुरू कर दिया। जब वह अपना 10वाँ सिर काटने ही वाला था, तब भगवान शिव उसकी इस अनन्य भक्ति और समर्पण से अत्यंत प्रसन्न होकर प्रकट हो गए।
भगवान शिव ने प्रकट होकर रावण के सभी कटे हुए सिरों को पुनः जोड़ दिया और उसे पूर्ण रूप से स्वस्थ कर दिया। भगवान शिव ने एक ‘वैद्य’ (चिकित्सक/डॉक्टर) की तरह रावण का इलाज करके उसके शरीर और सिरों को जोड़ा, इसलिए इस स्थान और शिवलिंग का नाम ‘वैद्यनाथ’ (वैद्यों के नाथ यानी डॉक्टरों के भगवान) पड़ा। प्रसन्न होकर भगवान शिव ने रावण से वरदान मांगने को कहा।

रावण ने प्रार्थना की, “हे प्रभु! आप मेरे साथ लंका चलिए और वहीं निवास कीजिए।” भगवान शिव अपने भक्त की इच्छा टाल नहीं सके, लेकिन उन्होंने एक ‘शिवलिंग’ (आत्मलिंग) के रूप में रावण के साथ चलने की बात स्वीकार की। इसके साथ ही उन्होंने एक सख्त शर्त रखी: “रावण! तुम इस शिवलिंग को लंका ले जा सकते हो, लेकिन रास्ते में इसे जहाँ भी भूमि (जमीन) पर रख दोगे, यह वहीं स्थापित हो जाएगा। इसके बाद इसे पुनः उठाया नहीं जा सकेगा।” रावण ने शिव जी की यह शर्त सहर्ष स्वीकार कर ली और शिवलिंग लेकर लंका की ओर चल पड़ा।
देवताओं को सताने लगी रावण के अजेय होने की चिंता
जब देवताओं को पता चला कि रावण भगवान शिव (आत्मलिंग) को लंका ले जा रहा है, तो वे भयभीत हो गए। देवताओं को लगा कि यदि शिव जी लंका में स्थापित हो गए, तो रावण अजेय हो जाएगा और उसका अत्याचार और बढ़ जाएगा। सभी देवता मदद के लिए भगवान विष्णु के पास पहुँचे।
विष्णु ने कैसे रोका रावण का रास्ता?
भगवान विष्णु ने रावण की यात्रा में बाधा डालने की एक योजना बनाई: विष्णु जी के आदेश पर वरुण देव (जल के देवता) ने आचमन के बहाने रावण के पेट में प्रवेश कर लिया, जिससे रावण को तीव्र लघुशंका (Toilet) की इच्छा महसूस होने लगी।
रावण जब वर्तमान देवघर (झारखंड) के पास से गुजर रहा था, तो लाचार होकर वह नीचे उतरा। वहाँ भगवान विष्णु एक ‘वैजू’ (बैजू) नाम के अहीर/ग्वाले के रूप में घूम रहे थे। रावण ने उस ग्वाले (विष्णु जी) से प्रार्थना की कि जब तक वह लघुशंका से निवृत्त होकर लौटता है, तब तक वह इस शिवलिंग को अपने हाथों में पकड़े रखे। ग्वाले ने हाँ कर दी, लेकिन शर्त रखी कि यदि शिवलिंग भारी होने लगा, तो वह उसे ज़मीन पर रख देगा। रावण की लघुशंका में काफी समय बीत गया। इधर ग्वाले रूपी विष्णु जी ने शिवलिंग के भारी होने का नाटक किया और उसे पृथ्वी पर रख दिया।
रावण ने शिवलिंग को उठाने की पूरी कोशिश की
जब रावण वापस आया और उसने देखा कि शिवलिंग ज़मीन पर रखा हुआ है, तो वह अत्यंत क्रोधित हो गया। उसे देवताओं की चाल समझ आ गई. रावण ने अपनी पूरी ताकत लगाकर उस शिवलिंग को उखाड़ने और उठाने का प्रयास किया, लेकिन भगवान शिव की शर्त के अनुसार वह शिवलिंग टस से मस नहीं हुआ. क्रोध और निराशा में रावण ने अपने अंगूठे से उस शिवलिंग को ज़मीन में दबा दिया (कहा जाता है कि आज भी देवघर के शिवलिंग पर रावण के अंगूठे का निशान/दबाव दिखाई देता है). इसके बाद रावण निराश होकर खाली हाथ लंका लौट गया. फिर ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवताओं ने आकर उस शिवलिंग की विधिवत पूजा-अर्चना की और उसे ‘वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग’ के रूप में स्थापित किया.

बाबा वैद्यनाथ धाम कैसे पहुंचें?
बाबा वैद्यनाथ धाम (देवघर, झारखंड) पहुँचने के लिए हवाई, रेल और सड़क तीनों मार्गों के बेहतरीन विकल्प उपलब्ध हैं. आप अपनी सुविधानुसार यहाँ पहुँच सकते हैं. बाबा वैद्यनाथ मंदिर से देवघर एयरपोर्ट की दूरी केवल 8 से 10 किलोमीटर है. दिल्ली, कोलकाता, पटना और बेंगलुरु जैसे प्रमुख शहरों से यहाँ के लिए सीधी व कनेक्टिंग उड़ानें उपलब्ध हैं. एयरपोर्ट से मंदिर के लिए ऑटो, ई-रिक्शा और टैक्सी आसानी से मिल जाती हैं. यदि आपके शहर से देवघर की सीधी फ्लाइट न मिले, तो आप रांची (बिरसा मुंडा एयरपोर्ट – ~250 किमी) या पटना (जयप्रकाश नारायण एयरपोर्ट – ~250 किमी) उतरकर ट्रेन या बस/टैक्सी से देवघर आ सकते हैं.
जसडीह जंक्शन (Jasidih Junction – JSME) देवघर का मुख्य और सबसे बड़ा रेलवे स्टेशन है, जो मंदिर से लगभग 8 से 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जसडीह स्टेशन दिल्ली-हावड़ा मुख्य रेल मार्ग पर है, इसलिए यह देश के लगभग सभी प्रमुख शहरों (दिल्ली, कोलकाता, पटना, वाराणसी, मुंबई आदि) से सीधी ट्रेनों द्वारा जुड़ा हुआ है. देवघर जंक्शन (Deoghar Junction – DGHR) लोकल/पैसेंजर ट्रेनों के लिए मंदिर के और करीब (लगभग 3-4 किमी) स्थित स्टेशन है.

देवघर अंतरराज्यीय बस सेवाओं और राष्ट्रीय राजमार्गों द्वारा पड़ोसी राज्यों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. पटना, रांची, गया, भागलपुर, धनबाद, असंसोल और कोलकाता से देवघर के लिए नियमित सरकारी और प्राइवेट (AC/Non-AC) बसें चलती हैं. यदि आप अपनी गाड़ी से आ रहे हैं, तो झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल से स्टेट हाईवे और नेशनल हाईवे द्वारा आसानी से आ सकते हैं. सावन के महीने में अत्यधिक भीड़ और कड़े रूट डायवर्जन के कारण गाड़ियों की आवाजाही शहर के बाहर ही रोक दी जाती है.
इस दौरान ट्रेन या फ्लाइट का विकल्प चुनना सबसे बेहतर रहता है. देवघर शहर के अंदर घूमने और मंदिर तक जाने के लिए ई-रिक्शा (टोटो) और ऑटो सबसे सुविधाजनक और सस्ते साधन हैं.
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