नई दिल्ली। डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को महत्वपूर्ण सुझाव देते हुए कहा है कि आपराधिक कानूनों में डिजिटल अरेस्ट को अलग अपराध (Separate Offence) के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में कड़े दंड का स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए ताकि साइबर अपराधियों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों पर स्वतः संज्ञान याचिका की सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि यदि किसी आरोपी के खिलाफ पुख्ता साक्ष्य के आधार पर प्रथम दृष्टया मामला बनता है तो उसकी संपत्ति भी जब्त की जा सकती है।
केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि इस विषय पर एक अंतर-मंत्रालयी समिति विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रही है। इसका उद्देश्य डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी से जुड़ी मौजूदा व्यवस्था की कमियों को दूर करना है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि डीपफेक तकनीक भी अब गंभीर चुनौती बन चुकी है। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार डिजिटल अरेस्ट और डीपफेक जैसे साइबर अपराधों से निपटने के लिए नया कानूनी ढांचा तैयार कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी जताई थी चिंता
17 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार और सीबीआई को नोटिस जारी किया था। अदालत ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के फर्जी आदेश तथा न्यायाधीशों के नकली हस्ताक्षर दिखाकर लोगों से ठगी करना न्यायपालिका में जनता के विश्वास पर सीधा हमला है।
बुजुर्ग दंपति से हुई थी एक करोड़ रुपये से अधिक की ठगी
यह मामला अंबाला के एक बुजुर्ग दंपति से जुड़े डिजिटल अरेस्ट के मामले के बाद सामने आया था। दंपति ने तत्कालीन चीफ जस्टिस बी.आर. गवई को पत्र लिखकर बताया था कि साइबर अपराधियों ने उन्हें फर्जी अदालत के आदेश और वीडियो कॉल के जरिए डराकर एक करोड़ रुपये से अधिक की ठगी कर ली।
अदालत ने कहा था कि यह कोई अकेली घटना नहीं है और ऐसे मामलों में केंद्र तथा राज्यों की एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है।
