भारत को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें सामाजिक पिछड़ापन, आर्थिक कमजोरी, शिक्षा और वास्तविक प्रतिनिधित्व-सभी को साथ देखकर अवसर तय हों।
आरक्षण की आलोचना सामाजिक न्याय का विरोध नहीं
भारतीय राजनीति में कुछ सवाल ऐसे हैं जिन पर बोलते ही तर्क पीछे छूट जाते हैं और पहचान आगे आ जाती है। आरक्षण उन्हीं सवालों में से एक है।
जो आरक्षण का विरोध करता है, उसे तत्काल सामाजिक न्याय का विरोधी घोषित कर दिया जाता है। जो आरक्षण के वर्तमान ढांचे पर सवाल उठाता है, उसे किसी न किसी जातीय खांचे में डाल दिया जाता है। नतीजा यह कि जिस प्रश्न पर सबसे अधिक गंभीर, तथ्यपरक और संवेदनशील बहस होनी चाहिए, वह नारेबाजी में बदल जाता है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या आरक्षण की आलोचना करना सामाजिक न्याय की आलोचना है?
उत्तर है – नहीं।
और अब इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या 21वीं सदी के भारत में किसी गरीब, वंचित और प्रतिभाशाली बच्चे की सबसे बड़ी पहचान उसकी जाति होनी चाहिए?
इसका उत्तर भी होना चाहिए – नहीं।
आरक्षण की जरूरत क्यों पड़ी और समीक्षा क्यों जरूरी है
आरक्षण की मूल भावना को समझना बेहद जरूरी है। संविधान ने इसे केवल गरीबी दूर करने की योजना के रूप में नहीं बनाया था। Articles 15(4) और 16(4) सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन तथा पर्याप्त प्रतिनिधित्व के प्रश्न से जुड़े हैं।
अर्थात् भारत में आरक्षण की ऐतिहासिक आवश्यकता केवल यह नहीं थी कि कोई व्यक्ति गरीब था; बल्कि यह भी थी कि सामाजिक संरचना के कारण कुछ समुदाय शिक्षा, रोजगार, सम्मान और संस्थागत अवसरों से लंबे समय तक दूर रहे या उन्हें रखा गया।
इस ऐतिहासिक सत्य से कोई इनकार नहीं करेगा। लेकिन इसी के साथ एक दूसरा सत्य भी स्वीकार करना होगा, और वह सत्य है समाज का बदलना। इतिहास कभी स्थिर नहीं होता। समाज बदलता है। परिस्थितियां बदलती हैं। और जब परिस्थितियां बदलती हैं तो नीतियों की समीक्षा भी होनी चाहिए।
यही लोकतंत्र है।

यदि हम स्पष्ट दृष्टि से देखें तो समस्या आरक्षण नहीं है, बल्कि उसका स्थायी राजनीतिकरण है। संकट यह नहीं है कि आरक्षण मौजूद है। संकट यह है कि आरक्षण धीरे-धीरे सामाजिक न्याय की नीति से फिसलकर, राजनीतिक प्रतिनिधित्व का स्थायी औजार बनता जा रहा है।
हर चुनाव के पहले, हमें नई जातीय गणना, नई मांग, नई प्रतिशत राजनीति और नई राजनीतिक गोलबंदी दिखाई देती है।
यह सिलसिला अंततः समाज को नागरिकों में नहीं, कोटों में बांट देता है।
और यहीं उस विचार पर गंभीरता से लौटने की जरूरत है कि क्या किसी व्यवस्था का अंतिम लक्ष्य स्वयं उस व्यवस्था को स्थायी बनाए रखना होना चाहिए?
अगर आरक्षण का उद्देश्य वंचित को मुख्यधारा में लाना है, तो स्वाभाविक प्रश्न यह होना चाहिए कि –
जो व्यक्ति मुख्यधारा में आ चुका है, उसे पीढ़ी दर पीढ़ी वही लाभ क्यों मिलता रहे, जबकि सामाजिक पायदान पर सबसे नीचे खड़ा व्यक्ति पिछले अस्सी सालों से, आरक्षण के लाभ से वंचित है?
यह प्रश्न किसी जाति के खिलाफ नहीं है। बल्कि नीति की प्रभावशीलता के पक्ष में है।
इसलिए ‘क्रीमी लेयर’ का प्रश्न यहीं आता है।
क्रीमी लेयर और आरक्षण के लाभ की असमान पहुंच
सुप्रीम कोर्ट ने 2024 के State of Punjab v. Davinder Singh मामले में SC के भीतर उप-वर्गीकरण को भी संवैधानिक रूप से स्वीकार किया और कहा कि अलग-अलग समूहों की वास्तविक वंचना और प्रतिनिधित्व के आंकड़ों को देखकर अधिक लाभ जरूरतमंद समूहों तक पहुंचाया जा सकता है। निर्णय में अनुभवजन्य आंकड़ों यानी empirical data के महत्व पर भी जोर दिया गया।
यह फैसला एक बड़े सिद्धांत की ओर संकेत करता है; और वह सिद्धांत है कि समान श्रेणी में शामिल हर व्यक्ति समान रूप से वंचित नहीं होता।
तो फिर नीति का लक्ष्य केवल यह क्यों हो कि वह किसी जाति की पहचान करे? उसे यह भी देखना चाहिए कि उस व्यक्ति की वास्तविक स्थिति क्या है।
यहीं से एक नए सामाजिक न्याय मॉडल की शुरुआत हो सकती है। और इस नए सामाजिक न्याय मॉडल का प्रस्ताव: ‘जाति बनाम गरीबी’ नहीं, बल्कि ‘वंचना का संयुक्त सूचकांक’ होना चाहिए।
मैं आरक्षण समाप्त करने के पक्ष में कतई नहीं हूं, बल्कि आरक्षण को अधिक न्यायपूर्ण बनाने के पक्ष में अवश्य हूं।जरूरतमंद व्यक्ति किसी भी जाति का हो, उसे राज्य की सहायता और अवसर मिलना चाहिए।
लेकिन इसके लिए केवल आय प्रमाणपत्र भी पर्याप्त नहीं होगा। क्योंकि 5 लाख रुपए की आय वाले दो परिवारों की सामाजिक वास्तविकता एक जैसी नहीं हो सकती।
इसलिए भविष्य की आरक्षण नीति को एक ‘बहुआयामी वंचना सूचकांक’ यानी Multidimensional Deprivation Index पर आधारित किया जाना चाहिए।
इसमें कम-से-कम ये कारक शामिल हों –
- पारिवारिक आय और संपत्ति
- माता-पिता की शिक्षा
- ग्रामीण/दुर्गम क्षेत्र से संबंध
- परिवार की पहली पीढ़ी का उच्च शिक्षा में प्रवेश
- विद्यालय की गुणवत्ता
- आवासीय और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति
- पेशागत वंचना
- सामाजिक भेदभाव का प्रमाण
- परिवार में पहले से सरकारी/उच्च पदों पर प्रतिनिधित्व
- पिछली पीढ़ियों द्वारा प्राप्त आरक्षण का लाभ
इससे एक ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है जिसमें जाति सामाजिक वंचना का एक संकेतक तो हो सकती है, लेकिन अकेला निर्धारक नहीं। यही अधिक आधुनिक और अधिक न्यायपूर्ण दृष्टिकोण होगा।
जरूरतमंद ब्राह्मण हो या दलित – गरीबी का दर्द जाति नहीं पूछता।
एक गरीब किसान या मजदूर का बेटा, चाहे वह किसी भी जाति का हो, अगर सरकारी स्कूल से पढ़कर प्रतियोगी परीक्षा में आता है और उसके सामने संसाधनों से संपन्न परिवारों के बच्चे बैठे हैं, तो उसकी कठिनाई वास्तविक है।
- उसके घर में कोचिंग के लिए पैसे नहीं हैं।
- अच्छा इंटरनेट नहीं है।
- पुस्तकों की सुविधा नहीं है।
- माता-पिता उच्च शिक्षित नहीं हैं।
- घर में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो उसे बताए कि UPSC, IIT, NEET या विश्वविद्यालय प्रवेश की तैयारी कैसे की जाती है।
गरीबी और सामाजिक भेदभाव दोनों को देखना होगा
वह केवल इसलिए कम वंचित नहीं हो जाता कि उसका उपनाम किसी तथाकथित ‘सवर्ण’ जाति से जुड़ा है।

इसी तरह किसी SC, ST या OBC परिवार का गरीब बच्चा भी वास्तविक वंचना का सामना कर सकता है। और कई मामलों में उसके सामने आर्थिक कठिनाई के साथ सामाजिक भेदभाव का अतिरिक्त बोझ भी हो सकता है।
इसलिए समाधान यह नहीं है कि एक की वंचना को दूसरे की वंचना के सामने खड़ा कर दिया जाए। बल्कि समाधान यह होना चाहिए कि वंचना को मापा जाए।
आरक्षण की राजनीति और नए सामाजिक आंदोलन की संभावना
आईए अब उस जाल को समझते हैं जो ‘सवर्ण बनाम आरक्षण’ की राजनीति के इर्द-गिर्द बुना जा रहा है। यहीं पर उस सोशल मीडिया तर्क की राजनीतिक उपयोगिता समझ में आती है जिसमें कहा जा रहा है कि कथित ‘सवर्ण समाज’ के असंतोष को कोई नया राजनीतिक संगठन अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सकता है।
इसमें संभावना है।
क्योंकि राजनीति खाली स्थान बर्दाश्त नहीं करती।
जहां कोई स्थापित राजनीतिक दल किसी बड़े सामाजिक असंतोष को प्रतिनिधित्व नहीं देता, वहां कोई नया संगठन उस असंतोष को राजनीतिक पूंजी में बदल सकता है।
लेकिन यहां भी एक बड़ी गलती होगी।
यदि कोई राजनीतिक आंदोलन केवल “आरक्षण हटाओ” के नारे पर खड़ा होता है तो वह आधे भारत को अपने खिलाफ खड़ा कर देगा।
परंतु यदि वही आंदोलन कहता है कि
“आरक्षण रहे, लेकिन लाभ सबसे जरूरतमंद तक पहुंचे; जाति के साथ आर्थिक, शैक्षणिक, सामाजिक और भौगोलिक वंचना भी मापी जाए; एक ही परिवार की पीढ़ियां लगातार लाभ न लेती रहें; और हर वास्तविक रूप से वंचित नागरिक को अवसर मिले”
तो यह बहस अचानक बहुत बड़ी हो जाती है। और फिर यह किसी जाति का आंदोलन नहीं रह जाता। यह नीति-सुधार का आंदोलन बन सकता है।
EWS ने एक दरवाजा खोला है।
भारत पहले ही इस दिशा में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक कदम उठा चुका है।
103वें संविधान संशोधन ने Articles 15(6) और 16(6) जोड़े और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए अधिकतम 10 प्रतिशत आरक्षण का संवैधानिक आधार बनाया। सुप्रीम कोर्ट ने Janhit Abhiyan v. Union of India में 2022 में इस संशोधन को संवैधानिक भी माना।
इसका मतलब स्पष्ट है कि भारतीय संविधान अब आर्थिक वंचना को भी सकारात्मक विभेद या affirmative action के एक वैध आधार के रूप में पहचानता है।
तो फिर बहस को आगे बढ़ाते हुए, क्यों न पूछा जाए, कि भविष्य में affirmative action का अधिक वैज्ञानिक मॉडल क्या हो सकता है?
आरक्षण में डेटा और समय-समय पर समीक्षा क्यों जरूरी है
क्यों न हर दस वर्ष में यह समीक्षा हो कि किस नीति से वास्तव में कितने परिवार ऊपर आए?
क्यों न यह देखा जाए कि आरक्षण का लाभ किन परिवारों और किन समूहों तक लगातार केंद्रित हो रहा है?
क्यों न सबसे वंचित व्यक्ति को सबसे पहले अवसर मिले?
हमें एक बात स्पष्ट करनी होगी।
गरीबी और जातिगत भेदभाव एक ही चीज नहीं हैं।
गरीबी का समाधान केवल आरक्षण नहीं है।
और जातिगत भेदभाव का समाधान केवल आर्थिक सहायता भी नहीं है।
इसलिए एक समझदार नीति को दोनों वास्तविकताओं को स्वीकार करना होगा।
जहां ऐतिहासिक और सामाजिक भेदभाव वास्तविक है, वहां सामुदायिक प्रतिनिधित्व की नीतियां आवश्यक रह सकती हैं।
जहां आर्थिक वंचना प्रमुख है, वहां आर्थिक आधार पर अवसर मिलना चाहिए।
जहां किसी आरक्षित वर्ग के भीतर लाभ कुछ समूहों तक विषमतापूर्वक यानी disproportionately पहुंच गया है, वहां empirical data के आधार पर उप-वर्गीकरण यानी sub-classification और बेहतर targeting पर विचार होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का 2024 का फैसला इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संकेत देता है।
और जहां किसी परिवार की स्थिति इतनी बदल चुकी है कि वह अब उस विशेष सहायता का वास्तविक लक्ष्य नहीं रहा, वहां नीति को उसके पुनर्मूल्यांकन की व्यवस्था रखनी चाहिए।
संविधान में संशोधन क्यों नहीं?
यदि वर्तमान संवैधानिक ढांचा ऐसी अधिक न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाने में बाधा है तो संविधान में संशोधन क्यों नहीं हो सकता?
संविधान कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं है, जिसे समाज बदलने के बाद भी अक्षरशः अपरिवर्तित रखा जाए।
वह राष्ट्र का जीवंत सामाजिक अनुबंध है।
बेशक संविधान संशोधन खिलवाड़ नहीं है। उसे व्यापक बहस, संसदीय सहमति, संवैधानिक सीमाओं और न्यायिक कसौटियों से गुजरना होता है।
लेकिन “संशोधन संभव है” और “संशोधन नहीं होना चाहिए” – इन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है।
भारत ने 103वां संविधान संशोधन करके आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए संवैधानिक रास्ता बनाया ही है। अर्थात दरवाजा खुल चुका है।
अब प्रश्न है कि हम उस दरवाजे से कितनी दूर तक चलना चाहते हैं।
आरक्षण खत्म नहीं, न्यायपूर्ण बनाने की जरूरत
असली लड़ाई आरक्षण बनाम गैर-आरक्षण की नहीं है
असल लड़ाई है –
- वंशानुगत लाभ बनाम वास्तविक जरूरत की।
- राजनीतिक वोट बैंक बनाम नीति-आधारित सामाजिक न्याय की।
- स्थायी पहचान बनाम बदलती सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता की।
और सबसे महत्वपूर्ण –
जातीय गणित बनाम नागरिक न्याय की।
यदि कोई गरीब बच्चा इसलिए अवसर से वंचित रह जाता है कि वह गलत जाति में पैदा हुआ है, तो मानना पड़ेगा कि व्यवस्था में समस्या है।
और,
यदि कोई ऐतिहासिक रूप से पीड़ित समुदाय केवल इसलिए अवसर खो देता है कि हमने आर्थिक समानता का एक नया फार्मूला बना लिया है, तो वहां भी समस्या है।
न्याय दोनों को देखता है।
इसलिए नारा बदलना होगा
हमें यह नहीं कहना चाहिए कि,
“आरक्षण खत्म करो।”
हमें यह कहना चाहिए कि,
“आरक्षण को न्यायपूर्ण बनाओ।”
हमें यह नहीं कहना चाहिए –
“जाति मत देखो।”
क्योंकि भारत की सामाजिक वास्तविकता को अनदेखा करना इतिहास से आंखें मूंदना होगा।
हमें कहना चाहिए –
“जाति देखो, लेकिन केवल जाति मत देखो।”
- आय देखो।
- शिक्षा देखो।
- परिवार की सामाजिक स्थिति देखो।
- क्षेत्र देखो।
- पहली पीढ़ी की शिक्षा देखो।
- वास्तविक प्रतिनिधित्व देखो।
- पिछले लाभ देखो।
और सबसे अंत में पूछो कि,
क्या यह व्यक्ति आज भी उस विशेष सहायता का वास्तविक जरूरतमंद है?
यही प्रश्न आरक्षण की राजनीति को सामाजिक न्याय की नीति में बदल सकता है।
अंततः,
जिस समाज में अवसर जन्म से तय हो जाएं, वह न्यायपूर्ण समाज नहीं है।
लेकिन जिस समाज में जन्म की ऐतिहासिक असमानताओं को सुधारने के नाम पर हर व्यक्ति को हमेशा के लिए एक ही खांचे में बंद कर दिया जाए, वह भी न्यायपूर्ण व्यवस्था नहीं बन सकती।
भारत को तीसरा रास्ता चाहिए।
ऐसा रास्ता जिसमें ऐतिहासिक अन्याय की स्मृति भी बचे और वर्तमान जरूरत की पहचान भी हो।
जिसे सदियों का सामाजिक भेदभाव झेलना पड़ा है, उसे राज्य अकेला न छोड़े।
जिसे आर्थिक विपन्नता ने पीछे धकेल दिया है, उसकी जाति देखकर दरवाजा बंद न किया जाए।
और जिसने पहले ही कई पीढ़ियों में राज्य की सहायता से पर्याप्त सामाजिक-आर्थिक उन्नति हासिल कर ली है, उसके स्थान पर उसी समुदाय के अधिक वंचित व्यक्ति को आगे आने का अवसर मिले।
ऐसा करना आरक्षण-विरोध नहीं होगा।
बल्कि यह आरक्षण का पुनर्जन्म होगा।
क्योंकि अंततः गणराज्य का लक्ष्य यह नहीं हो सकता कि नागरिक जीवन भर अपने प्रमाणपत्रों में अपनी जाति ढोता रहे।
लक्ष्य यह होना चाहिए कि एक दिन ऐसा भारत बने जहां राज्य को यह पूछने की जरूरत ही न पड़े कि तुम किस जाति के हो?
बल्कि यह पूछे कि
“तुम्हारी वंचना क्या है, और हम उसे दूर करने के लिए क्या कर सकते हैं?”
यही सामाजिक न्याय का अगला अध्याय हो सकता है।
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