“तीस्ता से उत्तराखंड तक : सुरंगों में मरता मजदूर और जवाबदेही से भागता सिस्टम” “तीस्ता हादसे की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि एक दूसरी सुरंग ने फिर गरीब मजदूरों की जान ले ली। मुआवजा घोषित करना बड़ा आसान होता है, लेकिन यह बताना बहुत मुश्किल कि सुरक्षा में चूक किसकी थी।”
सिक्किम की तीस्ता-स्टेज VI परियोजना की सुरंग हादसा में हुई भयावह त्रासदी का दर्द अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि उत्तराखंड से फिर वही दर्द-भरी खबर आई। सुरंग में हादसा, अभी तक आठ मजदूरों की मौत, उनके परिवारों का उजड़ना और उसके बाद मुआवजे की घोषणा।
13 अगस्त 2026 को विष्णुगाड़–पीपलकोटी जल विद्युत परियोजना (VPHEP) के टेल रेस टनल (TRT) में दुर्घटना हुई। 15 अगस्त को टीएचडीसी इंडिया लिमिटेड ने मृत श्रमिकों के निकटतम परिजनों को 5 लाख रुपए और घायलों को 1 लाख रुपए की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की। इसके अलावा मृतकों के प्रति संवेदना व्यक्त की गई और परिवारों के साथ खड़े रहने का आश्वासन दिया गया।
लेकिन यहां भी सवाल वही है, जो तीस्ता की सुरंग से निकलती हर लाश पूछ रही थी कि मजदूर मरने के बाद ही इतना महत्वपूर्ण क्यों हो जाता है? काम करते समय उसकी सुरक्षा की कीमत क्यों नहीं होती?
सिक्किम के नाम्ची जिले के समरदुंग क्षेत्र में एनएचपीसी की 500 मेगावाट तीस्ता-स्टेज VI परियोजना की निर्माणाधीन सुरंग में, करीब महीना भर पहले, 20 जुलाई को हुए हादसे ने पूरे सुरक्षा तंत्र पर सवाल खड़े किए थे। प्रारंभिक आशंका मीथेन गैस बर्स्ट की थी। बाद में बचाव अभियान के दौरान कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी जहरीली गैस की मौजूदगी के संकेत मिले। सुरंग के भीतर घना धुआं, जहरीली गैस, पानी और बेहद कठिन परिस्थितियों के बीच एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, पुलिस, फायर सर्विस, डीजीएमएस और अन्य एजेंसियां बचाव अभियान में लगी रहीं। और मौत का आंकड़ा बढ़ता गया। 25 में से 20 शव बरामद किए गए। शेष पांच शवों को उनकी अत्यधिक क्षत-विक्षत स्थिति के कारण सुरंग से बाहर निकालना बेहद कठिन हो गया था। हादसे की भयावहता इस बात से समझी जा सकती है कि एन. एच. पी. सी. के एक अधिकारी की सिर्फ एक अंगुली मिली जिसमें अंगूठी थी और उस अंगूठी से उसकी पहचान हुई।

यह केवल एक दुर्घटना नहीं थी, बल्कि एक एक सवाल है कि इतने बड़े प्रोजेक्ट की सुरक्षा व्यवस्था आखिर कहां थी? और इस सवाल के उत्तर की प्रतीक्षा अभी भी देश कर रहा है।
और तभी उत्तराखंड से दूसरी खबर आ गई:
तीस्ता की जांच और जवाबदेही के सवाल अभी सार्वजनिक विमर्श में थे कि विष्णुगाड़–पीपलकोटी परियोजना की सुरंग में हादसा हो गया।
फिर वही पहाड़।
फिर वही सुरंग।
फिर वही जोखिम।
और फिर वही मजदूर।
फिर एक कंपनी का शोक संदेश।
फिर मुआवजा।
फिर संवेदना।
क्या यह महज संयोग है?
बिल्कुल संभव है।
लेकिन, क्या महज संयोग मानकर आगे बढ़ जाना उचित है?
नहीं।
क्योंकि दोनों घटनाएं हमें कम से कम एक साझा सवाल पूछने के लिए मजबूर करती हैं कि,
“क्या देश में सुरंग निर्माण की सुरक्षा व्यवस्था वास्तव में उतनी मजबूत है जितनी हमारी परियोजनाओं की घोषणाएं?”
सुरंग कोई सामान्य कार्यस्थल नहीं है
“सुरंग कोई साधारण कार्यस्थल नहीं होता।”
सुरंग के भीतर काम करना किसी सामान्य निर्माण स्थल पर काम करने जैसा नहीं होता है।
वहां पहाड़ का दबाव है।
भूगर्भीय बदलाव हैं।
अचानक पानी का प्रवेश है।
जहरीली गैसों का जोखिम है।
वेंटिलेशन की चुनौती है।
ऑक्सीजन की कमी हो सकती है।
धंसाव हो सकता है।
ब्लास्टिंग का जोखिम है।
इसलिए वहां सेफ्टी ऑफिसर की तैनाती आवश्यक होती है।

सुरक्षा अधिकारी की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
टनल में सुरक्षा अधिकारी का पद कोई सजावटी पद नहीं होता। इस व्यक्ति की नियुक्ति सिर्फ फाइल पर हस्ताक्षर करने के लिए नहीं होती। सुरक्षा अधिकारी का काम है – खतरे को पहचानना, काम रोकना, चेतावनी देना और जरूरत पड़ने पर यह कहना कि “यह काम अभी सुरक्षित नहीं है।”
अगर किसी परियोजना में सुरक्षा व्यवस्था केवल कागज पर है, तो वह सुरक्षा व्यवस्था नहीं बल्कि एक प्रशासनिक भ्रम है। और यही भ्रम दुर्घटनाओं को आमंत्रित करता है।
तीस्ता ने भी यही सवाल पूछा था।
तीस्ता-6 के संदर्भ में यह सवाल सामने आया था कि एनएचपीसी के तीन सेफ्टी मैनेजर – गौरव राठौर, नीरज कुमार और पीयूष कांत भास्कर – कॉरपोरेट ऑफिस फरीदाबाद में क्यों तैनात थे? जबकि उनकी तैनाती कार्यस्थल पर होनी चाहिए थी।
यह आरोप अपने आप में किसी अधिकारी को दोषी सिद्ध नहीं करता। लेकिन यह पूछना पूरी तरह जायज है कि जब निर्माणाधीन और उच्च जोखिम वाली परियोजनाओं में सुरक्षा विशेषज्ञों की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, तब सुरक्षा मानव संसाधन की तैनाती किस आधार पर की गई थी?
क्या परियोजना स्थल पर पर्याप्त अनुभवी सुरक्षा अधिकारी थे?
क्या सुरक्षा ऑडिट नियमित थे?
क्या जोखिम रिपोर्टों पर कार्रवाई हुई?
क्या किसी चेतावनी को नजरअंदाज किया गया? उम्मीद है कि इन सवालों के जवाब जांच में मिलने चाहिए।
हकीकत यह है कि इन सवालों के जवाब तभी मिल सकते हैं जब वहां कोई सुरक्षा-तंत्र मौजूद होता। सूत्रों का कहना है कि घटना स्थल पर एक भी सुरक्षा अधिकारी तैनात नहीं था।
और यही सवाल अब उत्तराखंड की परियोजनाओं पर भी लागू होते हैं।
मुआवजा जरूरी है, लेकिन जवाबदेही नहीं
मुआवजा जरूरी है, लेकिन मुआवजा जवाबदेही नहीं है। THDCIL ने मृतकों के परिवारों को 5 लाख रुपए देने की घोषणा की है।
अच्छा कदम है।
घायलों को 1 लाख रुपए की सहायता भी जरूरी है।
लेकिन एक बात साफ होनी चाहिए कि,
मुआवजा किसी जिम्मेदारी की रसीद नहीं होती है।
एक मजदूर की जिंदगी की कीमत पांच लाख रुपये नहीं हो सकती।
वह पांच लाख रुपये उसके परिवार को तत्काल सहारा दे सकते हैं, लेकिन उस मजदूर को वापस नहीं ला सकते। फिर वह सिर्फ मजदूर नहीं होता?
वह किसी बच्चे का पिता होता है।
किसी महिला का पति।
एक बेटा जो किसी बूढ़ी मां का सहारा होता है। या,
किसी बहन का भाई।
इसलिए मृत्यु के बाद पांच लाख देना राहत है; लेकिन मृत्यु से पहले उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना जिम्मेदारी है।
सबसे गरीब ही सबसे जोखिम भरा काम क्यों करता है?:
यह सवाल असहज है, लेकिन पूछा जाना चाहिए। जो आदमी सुरंग में उतरता है, वह अक्सर समाज के सबसे कमजोर आर्थिक वर्ग से आता है। वह देश के लिए बिजली बनाने वाली परियोजना में काम करता है।
वह पहाड़ काटता है।
वह सुरंग बनाता है।
वह जोखिम उठाता है।
और बदले में उसे क्या मिलता है?
एक असुरक्षित कार्यस्थल?
एक हेलमेट?
एक सेफ्टी ब्रीफिंग?
और दुर्घटना के बाद एक मुआवजा?
क्या यही “सबका विकास” है?
अगर विकास की सबसे बड़ी परियोजनाओं का सबसे कमजोर हिस्सा वही मजदूर है जो इन परियोजनाओं को बनाता है, तो विकास की हमारी परिभाषा में कुछ गंभीर गड़बड़ है।
सरकारें ‘गरीब’ को भाषण में याद करती हैं, सिस्टम में नहीं।
देश में गरीबों के लिए योजनाओं की लंबी सूची है।
मजदूरों के लिए घोषणाएं हैं।
‘सबका साथ’ है।
‘140 करोड़ परिवार’ की बात है।
लेकिन किसी सरकार की असली परीक्षा मंच पर नहीं होती। असली परीक्षा उस सुरंग के भीतर होती है जहां एक गरीब मजदूर अपनी जान जोखिम में डालकर राष्ट्र की संपत्ति बना रहा होता है। राष्ट्र का नव-निर्माण कर रहा होता है।
यदि वहां सुरक्षा मानक कमजोर हैं, यदि निगरानी अपर्याप्त है, यदि अनुभवी सुरक्षा कर्मियों की कमी है या यदि निर्माण की समयसीमा सुरक्षा पर भारी पड़ रही है, तो फिर सारे नारे खोखले लगने लगते हैं।
मजदूर को भाषण नहीं चाहिए।
उसे यह भरोसा चाहिए कि वह सुबह काम पर जाएगा तो शाम को घर लौटेगा।

अब जांच की दिशा स्पष्ट होनी चाहिए:
तीस्ता-6 और VPHEP जैसी घटनाओं के बाद सरकार को केवल घटना-दर-घटना जांच से आगे बढ़ना होगा। देश को एक व्यापक राष्ट्रीय टनल सेफ्टी ऑडिट की जरूरत है। हर निर्माणाधीन सुरंग की जांच हो। क्या उनमें पर्याप्त और प्रशिक्षित सेफ्टी अधिकारियों की तैनाती है या नहीं?
गैस मॉनिटरिंग सिस्टम काम कर रहे हैं या नहीं?
वेंटिलेशन व्यवस्था मानकों के अनुरूप है या नहीं?
आपातकालीन निकासी योजना वास्तविक परिस्थितियों में लागू हो सकती है या नहीं?
श्रमिकों को नियमित सुरक्षा प्रशिक्षण मिलता है या नहीं?
ठेकेदार और परियोजना प्रबंधन सुरक्षा मानकों का पालन कर रहे हैं या नहीं?
सुरक्षा ऑडिट की रिपोर्टों पर वास्तव में कार्रवाई होती है या नहीं?
और क्या परियोजना की समयसीमा या लागत का दबाव सुरक्षा को पीछे धकेल रहा है।
और सबसे जरूरी – जवाबदेही ऊपर तक जाए।
हर दुर्घटना के बाद अगर केवल साइट पर मौजूद सुपरवाइजर, इंजीनियर या मजदूरों पर सवाल उठेंगे तो असली व्यवस्था कभी नहीं बदलेगी।
पूछना होगा कि,
निर्णय किसने लिया?
सुरक्षा बजट किसने तय किया?
स्टाफ की तैनाती किसने की?
सुरक्षा रिपोर्ट किसने देखी?
चेतावनी पर किसने कार्रवाई नहीं की?
ठेकेदार की निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी?
और यदि आपराधिक लापरवाही सामने आती है, तो कानून के अनुसार जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई क्यों न हो?
पद जितना बड़ा हो, जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए।
तीस्ता से उत्तराखंड तक अब शोक नहीं, सबक चाहिए
तीस्ता से सबक नहीं लिया तो उत्तराखंड अगला अध्याय बन गया। तीस्ता-6 ने चेतावनी दी थी। उत्तराखंड की दुर्घटना उस चेतावनी को और गंभीर बना रही है।
यदि हर हादसे के बाद हम सिर्फ शव गिनेंगे, मुआवजा घोषित करेंगे, शोक संदेश जारी करेंगे और फिर अगली परियोजना की ओर बढ़ जाएंगे, तो अगली बार फिर कोई सुरंग होगी।
फिर कोई मजदूर होगा।
फिर कोई परिवार इंतजार करेगा।
फिर किसी घर का दरवाजा हमेशा के लिए खाली रह जाएगा।
यह नियति नहीं है। इसे रोका जा सकता है।
लेकिन इसके लिए ‘हादसा हो गया’ वाली मानसिकता से बाहर निकलना होगा।
मजदूर को मुआवजा नहीं, पहले सुरक्षा देनी होगी।
5 लाख रुपए की अनुग्रह राशि घोषित करना आसान है।
एक शोक संदेश जारी करना आसान है।
जांच समिति बनाना आसान है।
मुश्किल है –
ऐसी व्यवस्था बनाना जिसमें मजदूर मरने के बाद खबर न बने, बल्कि काम करते समय सुरक्षित रहे।
तीस्ता-6 में हुई मौतें और अब उत्तराखंड की यह दुर्घटना हमें यही बता रही हैं कि भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल में ‘स्पीड’ और ‘कॉस्ट’ के साथ ‘सेफ्टी’ को बराबर की प्राथमिकता देनी होगी। क्योंकि बिजलीघर, बांध और सुरंगें फिर बनाई जा सकती हैं।
इंसान नहीं।
और किसी भी राष्ट्र की असली तरक्की उसकी सुरंगों की लंबाई या मेगावाट की क्षमता से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि उन परियोजनाओं को बनाने वाले मानवसंसाधन कितनी सुरक्षित जिंदगी जीते हैं।
एक मजदूर की मौत को ‘दुर्भाग्यपूर्ण घटना’ कह देना सबसे आसान काम है। परंतु सबसे कठिन काम है यह स्वीकार करना कि कहीं कोई गलती हुई थी। और फिर उस गलती के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को दोषी ठहराया गया था।
तीस्ता से उत्तराखंड तक अब शोक नहीं, सबक चाहिए।
मुआवजा नहीं, सुरक्षा चाहिए।
और सबसे बढ़कर, जवाबदेही चाहिए।
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