प्रयागराज। Balendu Sharma Dadhich। उत्तर प्रदेश के राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय में राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की 144वीं जयंती पर 19वीं राजर्षि टंडन स्मृति व्याख्यानमाला का आयोजन हुआ। जिसका विषय ‘एआई और भारतीय ज्ञान परंपरा’ था। इस व्याख्यानमाला में मुख्य वक्ता सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ और लेखक बालेंदु शर्मा दाधीच थे।
उन्होंने अपने व्याख्यान में कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) केवल आधुनिक तकनीक का परिणाम नहीं है, बल्कि यह मानव द्वारा बुद्धिमत्ता, तर्क और ज्ञान को समझने की सदियों पुरानी खोज का वर्तमान स्वरूप है। तकनीकी विशेषज्ञ बालेंदु शर्मा दाधीच के अनुसार, कंप्यूटर की अपनी भाषा केवल गणित है और आधुनिक बाइनरी सिस्टम (0 और 1) की अवधारणा भारत में लगभग 2,000 वर्ष पूर्व आचार्य पिंगल ने अपने छंदशास्त्र के माध्यम से दे दी थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि कंप्यूटिंग का पूरा ढांचा भारत द्वारा दिए गए शून्य और स्थान-मान प्रणाली (Place Value System) पर टिका है, जिसके बिना जटिल गणनाएं संभव नहीं थीं। इसके अलावा, भारत में स्वचालन (Automation) की समृद्ध ऐतिहासिक परंपरा रही है, जिसका उल्लेख राजा भोज के ‘समरांगण सूत्रधार’ और बौद्ध काल के ‘भूत-वाहन यंत्र’ जैसे ग्रंथों व ऐतिहासिक वृत्तांतों में मिलता है।

बालेंदु शर्मा दाधीच ने कहा कि वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ते भारत के कदम आधुनिक दौर में भारत एआई के क्षेत्र में तेजी से अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। ‘भाषिणी’ परियोजना के जरिए भारतीय भाषाओं और ध्वनियों में एआई मॉडल तैयार किए जा रहे हैं। जबकि ‘सर्वम’ जैसी पहलों से स्वदेशी एआई इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित हो रहा है। इसके साथ ही, भारत राष्ट्रीय स्तर पर एआई पाठ्यक्रम, डेटासेट और क्लाउड स्पेस उपलब्ध कराने के साथ-साथ विश्व मंच पर एक जिम्मेदार और नैतिक एआई (Responsible AI) के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। प्राचीन काल में पाणिनि के व्याकरण के नियमों, न्याय दर्शन के तर्क और शून्य के सिद्धांतों से शुरू हुई यह बौद्धिक यात्रा आज भारत को वैश्विक एआई क्रांति का एक प्रमुख केंद्र बना रही है।

उन्होंने कहा कि AI हमारे लिए सबसे बड़ा खतरा नहीं है, बल्कि आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस यानी एजीआई भविष्य में हमारे लिए सबसे बड़ा खतरा साबित होगा। वर्तमान में एआई मनुष्य के निर्देशों पर काम करने वाला उपकरण है, लेकिन एजीआई में मनुष्य की तरह खुद सीखने, सोचने और फैसले लेने की क्षमता भी होगी इसका हमारे जीवन पर गंभीर प्रभाव हो सकता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रोफेसर सत्यकाम ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से खौफ खाने की जरूरत नहीं है, बजाय इसके उसे समझ कर विवेकपूर्ण ढंग से स्वीकार करने की जरूरत है।
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