भाकपा-माले की जनसुनवाई में जूरी ने SIR रद्द कर पुरानी मतदाता सूची के आधार पर चुनाव कराने की मांग की, चुनाव आयोग के गठन से जुड़े 2023 के कानून को भी रद्द करने की मांग
पटना। 1 अक्टूबर। बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी बिहार SIR को लेकर पटना के आईएमए हॉल में भाकपा-माले की ओर से जनसुनवाई आयोजित की गई। जनसुनवाई में उन मतदाताओं को सामने लाया गया, जिनका दावा है कि वे जीवित हैं, अपने पते पर रह रहे हैं और पहले मतदान भी कर चुके हैं, लेकिन SIR के दौरान मतदाता सूची से उनके नाम हटा दिए गए।
जनसुनवाई में 17 गवाहों ने जूरी के सामने अपनी बात रखी। कई मामलों में गवाहों ने बताया कि रिकॉर्ड में उन्हें मृत बताया गया, जबकि वे जीवित हैं। कुछ मामलों में पूरे परिवार के मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने की शिकायत भी सामने आई।
कार्यक्रम में भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य समेत पार्टी के नेता और अन्य राजनीतिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे। जनसुनवाई में पार्टी की ओर से किए गए मतदाता सत्यापन सर्वे के निष्कर्ष भी प्रस्तुत किए गए।
17 गवाहों ने जूरी के सामने रखी अपनी बात
जनसुनवाई में सामने आए लोगों ने बताया कि मतदाता सूची में नाम नहीं होने की जानकारी उन्हें अलग-अलग मौकों पर मिली। कुछ लोगों ने पुराने वोटर आईडी और मतदान से जुड़े दस्तावेज भी प्रस्तुत किए।

भाकपा माले की जनसुनवाई में शामिल हुए उन लोगों की तस्वीर जो जिंदा हैं लेकिन चुनाव आयोग ने इन्हें मार दिया है
गवाहों का आरोप था कि SIR के दौरान उनके नाम हटाने के लिए उन्हें मृत, स्थानांतरित या अन्य श्रेणियों में दिखाया गया, जबकि वे अपने गांव या पते पर रह रहे हैं।
जनसुनवाई में ऐसे लोगों की गवाही भी दर्ज की गई जिन्हें कथित तौर पर मृत घोषित कर मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया था।
भाकपा-माले ने पेश किया बूथ स्तर का सर्वे
जनसुनवाई में भाकपा-माले ने अपने बूथ स्तर के सर्वे के निष्कर्ष भी रखे। पार्टी के अनुसार, उसने बिहार की 10 विधानसभा सीटों के 102 बूथों पर घर-घर जाकर मतदाता सूची से हटाए गए नामों का सत्यापन किया। पार्टी का दावा है कि SIR के दौरान हटाए गए 9,288 मतदाताओं में से 1,550 लोग सत्यापन के दौरान जीवित और अपने पते पर मौजूद मिले।
पार्टी ने इसके आधार पर कम से कम 17 प्रतिशत गलत डिलीशन का दावा किया है।
पार्टी के सर्वे में SIR से पहले जनवरी 2024 से जून 2025 के बीच हटाए गए मतदाताओं के नामों का भी सत्यापन किया गया। भाकपा-माले के मुताबिक, 24 बूथों पर हटाए गए 1,964 मतदाताओं में से 351 लोग अपने पते पर मौजूद मिले। पार्टी ने इसे करीब 18 प्रतिशत का आंकड़ा बताया है।
नए मतदाताओं के नाम पर भी सवाल
भाकपा-माले ने नए मतदाताओं के रूप में जोड़े गए नामों की जांच को लेकर भी सवाल उठाए हैं। पार्टी की ओर से जनसुनवाई में यह दावा रखा गया कि जांच में करीब 22 प्रतिशत नाम संदिग्ध या गलत पाए गए।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 17%, 18% और 22% के आंकड़े भाकपा-माले के सर्वे के दावे हैं। इन्हें निर्वाचन आयोग द्वारा प्रमाणित आंकड़ों के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है।
भाकपा-माले ने पहले जारी अपनी सर्वे रिपोर्ट में भी बिहार में मतदाता नाम हटाए जाने के मामलों के स्वतंत्र सत्यापन की मांग की थी।
दीपांकर भट्टाचार्य ने चुनाव आयोग पर उठाए सवाल
जनसुनवाई में दीपांकर भट्टाचार्य ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया को लेकर सामने आई रिपोर्टों का भी हवाला दिया।
उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से इस्तीफा देना चाहिए। सुनिए दीपांकर भट्टाचार्य ने क्या-क्या कहा
इस बीच द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयोग के दो आयुक्तों-सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी-ने पिछले 10 महीनों में कई फैसलों पर लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने मतदाता जोड़ने, नाम हटाने और चुनावी डेटा से जुड़े कुछ कदमों पर आपत्ति जताई थी।
हालांकि, चुनाव आयोग की ओर से SIR से जुड़े फैसलों को लेकर पहले यह कहा गया है कि आयोग के तीनों सदस्यों के बीच निर्णयों पर सहमति थी। इसलिए इस मुद्दे पर आयोग के पक्ष और मीडिया रिपोर्टों में सामने आए मतभेद-दोनों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
जूरी में कौन-कौन शामिल था?
जनसुनवाई के लिए गठित जूरी में ये सदस्य शामिल थे:
- उदय नारायण चौधरी — पूर्व अध्यक्ष, बिहार विधानसभा
- प्रो. भारती एस. कुमार — पूर्व विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग, पटना विश्वविद्यालय
- पुष्पेंद्र — पीयूसीएल के राष्ट्रीय अध्यक्ष
- प्रो. रमाशंकर आर्य — पूर्व कुलपति, वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा
- डॉ. शकील अहमद खान — वरिष्ठ कांग्रेस नेता
उपलब्ध रिपोर्टिंग में भी इन सदस्यों के जनसुनवाई में शामिल होने की पुष्टि हुई है।
जनसुनवाई के बाद जूरी का फैसला
जनसुनवाई में गवाहों की बात सुनने और भाकपा-माले के सर्वे के निष्कर्षों पर चर्चा के बाद जूरी ने SIR और चुनावी प्रक्रिया को लेकर कई मांगें रखीं।
1. ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग
जूरी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। जूरी ने SIR की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के लिए उनकी जवाबदेही तय करने की मांग की।
जूरी की ओर से यह भी कहा गया कि यदि जांच में अधिकार के दुरुपयोग की पुष्टि होती है तो कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
2. SIR के आधार पर हुए चुनाव रद्द करने की मांग
जूरी ने मांग की कि SIR के आधार पर हुए चुनावों को रद्द किया जाए और चुनाव से पहले की मतदाता सूची के आधार पर दोबारा चुनाव कराया जाए।
यह जनसुनवाई की जूरी द्वारा रखी गई मांग है, न कि किसी अदालत का आदेश।
3. गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने की मांग
जूरी ने कहा कि जिन मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं, उनके नाम बहाल किए जाएं और उनके मतदान के अधिकार की रक्षा की जाए।
4. चुनाव आयोग के गठन संबंधी 2023 के कानून पर पुनर्विचार की मांग
जूरी ने 2023 में बनाए गए मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून को रद्द करने की मांग भी रखी।
2023 के कानून के तहत CEC और EC की नियुक्ति के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री शामिल होते हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की 2023 की अंतरिम व्यवस्था में चयन समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल थे।
5. प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के इस्तीफे की मांग
जूरी के फैसले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग भी रखी गई।
जूरी की ओर से यह मांग चुनाव आयोग की कथित कार्यप्रणाली में राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी के आरोप के आधार पर रखी गई। यह जूरी की राजनीतिक मांग है, कोई न्यायिक निष्कर्ष नहीं।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर भी जूरी ने उठाए सवाल
जूरी ने SIR विवाद में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर भी सवाल उठाए। जूरी के सदस्यों का कहना था कि अब तक न्यायिक हस्तक्षेप से उन्हें चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों का पर्याप्त समाधान नहीं मिला है।
यह जूरी की टिप्पणी है। इसे सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं माना जा सकता।
जूरी ने बड़े आंदोलन का आह्वान किया
जनसुनवाई के अंत में जूरी ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए बड़ा जन आंदोलन खड़ा किया जाना चाहिए।
जूरी ने जंतर-मंतर पर हुए आंदोलनों का उल्लेख करते हुए लोगों से चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता और मताधिकार के मुद्दे पर आंदोलन में भाग लेने का आह्वान किया।
दीपांकर भट्टाचार्य ने भी SIR और चुनाव आयोग के खिलाफ आगे आंदोलन की बात कही है। भाकपा-माले के मुताबिक, 2 से 8 अक्टूबर के बीच विरोध कार्यक्रम आयोजित किए जाने की योजना है।
चुनाव आयोग की प्रक्रिया और विवाद
SIR को लेकर विवाद के बीच चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में विसंगतियों वाले मामलों के लिए नोटिस, दस्तावेज जमा करने और सुनवाई की प्रक्रिया की बात कही है। वहीं, विपक्षी दल और नागरिक संगठनों का एक वर्ग प्रक्रिया में पारदर्शिता और मतदाता नामों की बहाली की मांग कर रहा है।
इस पूरे विवाद में एक तरफ चुनाव आयोग की आधिकारिक प्रक्रिया और दूसरी तरफ राजनीतिक दलों तथा नागरिक समूहों के आरोप और सर्वे निष्कर्ष हैं। इसलिए मतदाता सूची से जुड़े किसी व्यक्तिगत मामले का अंतिम निष्कर्ष संबंधित निर्वाचन अधिकारी की जांच और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर ही निकलेगा।
जूरी की प्रमुख मांगें एक नजर में
• ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग
• SIR के आधार पर हुए चुनाव रद्द करने की मांग
• SIR से पहले की मतदाता सूची के आधार पर चुनाव कराने की मांग
• गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने की मांग
• CEC की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून को रद्द करने की मांग
• प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग
• चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता के लिए बड़े जन आंदोलन का आह्वान
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