नई दिल्ली। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के एक बयान ने देश की राजनीतिक और वैचारिक फिजा में नया बवंडर खड़ा कर दिया, जिसमें उन्होंने शिव को गरीबों का और राम को अमीरों का भगवान बता दिया। कुछ समय पहले हनुमान जी की जाति पर लंबी मगझमारी हुई थी. इस बार भगवान राम और भोले बाबा का बंटवारा कर दिया गया है. आखिर क्यों सियासी रोटियां सेकने के लिए हमारे आराध्यों को भी जातियों, वर्गों और राजनीतिक सीमाओं में बांटने की कोशिश की जाती है? अपनी सियासी जमीन बचाने के लिए इतिहास और संस्कृति को क्यों नुकसान पहुंचाया जाता है? जबकि सच्चाई ये है कि भगवान के दर पर गरीब और अमीर का फर्क मिट जाता है. आइए समझने की कोशिश करते हैं कि भगवान को बांटने का उतावलापन कितना जायज है और इसके पीछे क्या मंशा है। हम ये भी जानने की कोशिश करेंगे कि क्या सच में भारतीय जनता पार्टी ने सिर्फ भगवान राम से वास्ता रखा और भगवान शिव को नजरअंदाज किया। आइए जानने की कोशिश करते हैं कि मोदी सरकार पर रेवंत रेड्डी के आरोपों का सच क्या है।
क्या है विवादित बयान?
नई दिल्ली में आयोजित एक मीडिया कॉन्क्लेव के दौरान दिए गए अपने बयान में तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने उत्तर और दक्षिण भारत की राजनीतिक व सांस्कृतिक भिन्नता का जिक्र करते हुए दावा किया कि हम (दक्षिण वाले) द्रविड़ और भगवान शिव के भक्त हैं, जबकि उत्तर भारत के लोग अपने आप को आर्य और भगवान राम के भक्त मानते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी ने राजनीतिक फायदे के लिए भगवान राम को “चुरा” लिया है। इसी संदर्भ में एक तीखी टिप्पणी करते हुए उन्होंने यह भी कह दिया कि “भगवान शिव गरीबों के भगवान हैं और भगवान राम अमीरों के भगवान हैं”, तथा बीजेपी को अमीरों की पार्टी बताया। साफ है कि रेवंत रेड्डी उत्तर बनाम दक्षिण की राजनीति चमकाते नजर आए। उनके इस बयान पर भारतीय जनता पार्टी ने कहा कि ये वही रेवंत रेड्डी हैं, जो कहते हैं कि मुस्लिम ही कांग्रेस है और कांग्रेस ही मुस्लिम है। अब वही रेवंत रेड्डी हिंदुओं के भगवानों को बांट रहे हैं। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए।
आर्य बनाम द्रविड़ थ्योरी और उत्तर बनाम दक्षिण

रेवंत रेड्डी के इस बयान के पीछे कि “उत्तर वाले खुद को आर्य और दक्षिण वाले द्रविड़ मानते हैं,” पारंपरिक और औपनिवेशिक दौर से चली आ रही ‘आर्य बनाम द्रविड़’ (Aryan vs. Dravidian) की उसी राजनीतिक व वैचारिक बहस की झलक मिलती है। हालांकि उनका यह बयान मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी (BJP) की चुनावी रणनीति पर निशाना साधने के लिए दिया। उनका तर्क था कि बीजेपी उत्तर भारत में भगवान राम के नाम और उनकी भावनाओं का राजनीतिक लाभ उठाती है। दक्षिण भारत (विशेषकर तेलंगाना और तमिलनाडु) में जहाँ स्थानीय संस्कृति, लोक-कथाएँ और शिव-भक्ति या क्षेत्रीय देवी-देवताओं का प्रभाव गहरा है, वहाँ खुद को ‘द्रविड़’ और ‘शिव भक्त’ बताकर उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि दक्षिण की सांस्कृतिक पहचान उत्तर से अलग है।
19वीं सदी में ब्रिटिश इतिहासकारों और कुछ पश्चिमी विद्वानों ने भाषाई अंतर (संस्कृत आधारित उत्तर भारतीय भाषाएँ और तमिल-तेलुगु जैसी दक्षिण भारतीय द्रविड़ भाषाएँ) को नस्लीय और जातीय विभाजन के रूप में पेश किया था, जिसे बाद में दक्षिण भारत की राजनीति (विशेषकर द्रविड़ आंदोलन) ने अपने वैचारिक आधार के रूप में अपनाया। आधुनिक आनुवंशिक (DNA) और ऐतिहासिक शोध इस बात को खारिज करते हैं कि उत्तर और दक्षिण के लोग दो अलग-अलग नस्लों से हैं। इसके बावजूद, राजनीतिक दलों द्वारा इस वैचारिक रेखा का उपयोग क्षेत्रीय अस्मिता को जगाने के लिए समय-समय पर किया जाता रहा है।
मोदी सरकार ने भगवान शिव के लिए क्या किया?

बीजेपी सिर्फ ‘राम-राम’ करती है और शिव या अन्य देवी-देवताओं से उसका कोई सरोकार नहीं है, रेवंत रेड्डी का यह बयान विशुद्ध रूप से उस राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है जिसके जरिए दक्षिण के दल क्षेत्रीय स्वायत्तता और सांस्कृतिक विशिष्टता को आगे रखकर राष्ट्रीय स्तर की पार्टी (बीजेपी) की हिंदुत्व की पिच को चुनौती देना चाहते हैं। अगर जमीनी हकीकत पर नजर डालें, तो वर्तमान सरकार ने केवल राम मंदिर के निर्माण तक खुद को सीमित नहीं रखा है, बल्कि देश के बड़े शिव धामों के पुनरोद्धार और कायाकल्प में भी ऐतिहासिक काम किया है। गुजरात के सोमनाथ मंदिर के विकास कार्यों से लेकर, आपदा के बाद केदारनाथ धाम का भव्य पुनर्निर्माण और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के जरिए बाबा विश्वनाथ के दरबार को उसका अलौकिक व दिव्य स्वरूप लौटाना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि सरकार आस्था के हर केंद्र को समान महत्व दे रही है। ऐसे में, राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए भगवान को वर्गों या दलों में बांटना और यह कहना कि सरकार शिव भक्तों की अनदेखी कर रही है, इतिहास और धरातल पर चल रहे विकास कार्यों से पूरी तरह मुंह मोड़ने जैसा है।
काशी में मोदी सरकार ने कराया था ‘काशी-तमिल संगमम’

एक तरफ जहाँ क्षेत्रीय दल राजनीतिक नफा-नुकसान के लिए उत्तर और दक्षिण के बीच वैचारिक दीवारें खड़े करने की कोशिश करते हैं, वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार द्वारा आयोजित ‘काशी-तमिल संगमम’ जैसे महाअभियान इस बात का पुख्ता प्रमाण हैं कि सांस्कृतिक एकता को संस्थागत रूप कैसे दिया जा रहा है। वाराणसी (काशी) और तमिलनाडु के बीच सदियों पुराने बौद्धिक, भाषाई और आध्यात्मिक संबंधों को फिर से जिंदा करने के लिए शुरू किया गया यह आयोजन इस बात को खारिज करता है कि सरकार या उत्तर भारत दक्षिण की संस्कृति से कटा हुआ है। जब काशी की धरती पर दक्षिण के विद्वान, छात्र और कलाकार तमिल भाषा और साहित्य का उत्सव मनाते हैं, तब यह साफ हो जाता है कि राजनीतिक बयानबाजी से इतर, देश की सांस्कृतिक जड़ें एक ही सूत्र में पिरोई गई हैं।
दक्षिण भारत में भगवान शिव और राम का गहरा कनेक्शन
दक्षिण भारत और भगवान शिव व राम का रिश्ता सदियों पुराने उस सांस्कृतिक ताने-बाने से जुड़ा है जहाँ आस्था कभी उत्तर और दक्षिण की सीमाओं में नहीं बंटी। तमिलनाडु के रामेश्वरम में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने खुद लंका जाने से पहले भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग की स्थापना और पूजा की थी, जिसे ‘रामनाथस्वामी’ मंदिर के रूप में आज भी देश की अखंडता का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। वहीं दूसरी ओर, दक्षिण भारत का हर एक कोना शैव परंपरा के विशाल मंदिरों जैसे तमिलनाडु के पंचभूत स्थल (काशीपुरम, चिदंबरम आदि) और कर्नाटक-केरल के प्राचीन शिव धामों से समृद्ध है, जहां आदियोगी शिव जन-जन के रोम-रोम में रचे-बसे हैं। रावण खुद शिव का परम भक्त था, लेकिन इसके बावजूद दक्षिण की लोक-संस्कृति और रामायण की कथाओं में राम और शिव एक-दूसरे के पूरक के रूप में पूजे जाते हैं, जो यह साबित करते हैं कि दक्षिण भारत की मिट्टी में ‘हरि और हर’ (विष्णु और शिव) का यह समन्वय सदियों से अटूट रहा है।

दक्षिण भारत पर हिंदी थोपने के आरोपों का सच
दक्षिण भारत के राज्यों (विशेषकर तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और तेलंगाना) में केंद्र सरकार या उत्तर भारत की नीतियों पर ‘हिंदी थोपने’ (Hindi Imposition) का विरोध अक्सर सुनाई पड़ता है। दक्षिण भारतीयों और वहाँ के क्षेत्रीय दलों का मुख्य तर्क यह रहता है कि देश की विविधता में हर भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीय अस्मिता का समान सम्मान होना चाहिए। उनका मानना है कि उन पर जबरन हिंदी भाषा या उत्तर भारत की सांस्कृतिक प्रणालियों को थोपने से उनकी अपनी हजारों साल पुरानी भाषाई और द्रविड़ पहचान पर आंच आती है। उनका कहना है कि राष्ट्रीय एकता का मतलब भाषाई या सांस्कृतिक एकरूपता नहीं, बल्कि विविधता का बहुसंस्कृतिवाद है। यही वजह है कि जब भी राष्ट्रीय स्तर से कोई ऐसी नीति या बयान सामने आता है, तो वे इसे अपनी स्वायत्तता और क्षेत्रीय संस्कृति पर हमले के रूप में देखते हैं।
तमिल और संस्कृत भाषा का विवाद
भारतीय सांस्कृतिक और भाषाई परिदृश्य में तमिल और संस्कृत का विवाद सदियों पुराना है, जो भाषा विज्ञान से ज्यादा राजनीतिक और वैचारिक मंचों पर लड़ा जाता रहा है। एक तरफ जहाँ संस्कृत को देश की सबसे प्राचीन और शास्त्रीय भाषाओं में से एक माना जाता है, वहीं तमिल भी दुनिया की सबसे पुरानी जीवित शास्त्रीय (Classical) भाषाओं में शुमार है, जिसका अपना एक समृद्ध संगम साहित्य और स्वतंत्र इतिहास है। दक्षिण भारत (विशेषकर तमिलनाडु) में कई बार यह चिंता जताई जाती है कि राष्ट्रीय स्तर पर संस्कृत या हिंदी को अत्यधिक बढ़ावा देने से तमिल जैसी प्राचीन क्षेत्रीय भाषाओं की महत्ता और पहचान को दबाया जा रहा है। जबकि भाषाविदों का मानना है कि ये दोनों ही भाषाएं भारतीय सभ्यता की अमूल्य धरोहर हैं, लेकिन राजनीतिक और क्षेत्रीय स्वार्थों के चलते इन्हें अक्सर एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी के रूप में पेश कर दिया जाता है।
तमिल और संस्कृत दोनों भाषाओं के उद्गम पर शिव कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, तमिल और संस्कृत दोनों भाषाओं का उद्गम सीधे भगवान शिव के दिव्य स्वरूप से जुड़ा है, जो यह साबित करता है कि ये दोनों भाषाएं आपस में प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक ही divine source की दो धाराएं हैं। कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव ने अपने डमरू के नाद से दो अलग-अलग ध्वनियां निकालीं-डमरू के एक छोर से संस्कृत भाषा की उत्पत्ति हुई, जिसे देवताओं और वेदों की वाणी माना गया, और दूसरे छोर से तमिल भाषा प्रकट हुई, जिसे आदिकालीन ज्ञान और साहित्य का स्रोत कहा जाता है।
जब भगवान शिव ने अपने डमरू से इन दोनों महान भाषाओं का सृजन किया, तो ब्रह्मांड का संतुलन बनाए रखने के लिए उन्होंने अपने परम प्रिय और ज्ञानी ऋषि अगस्त्य को बुलाया। शिवजी ने महर्षि अगस्त्य को यह आदेश दिया कि वे उत्तर भारत से दक्षिण भारत की ओर प्रस्थान करें, ताकि तमिल भाषा का प्रसार दक्षिण की धरती पर हो सके और उत्तर की संस्कृत तथा दक्षिण की तमिल के बीच एक अचूक सांस्कृतिक व आध्यात्मिक संतुलन स्थापित हो सके। यही कारण है कि महर्षि अगस्त्य को दक्षिण भारत में तमिल व्याकरण (अगथियम) और चिकित्सा पद्धति के जनक के रूप में पूजा जाता है। यह पौराणिक प्रसंग इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि शिव की नगरी में उत्तर और दक्षिण, या संस्कृत और तमिल के बीच कभी कोई भेद नहीं था, बल्कि दोनों ही भाषाएं इस देश की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक एकता के दो मजबूत स्तंभ हैं।

जब भगवान राम ने की भगवान शिव की पूजा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंका पर आक्रमण करने से पहले समुद्र तट पर पड़ाव डाला, तो उनके समक्ष सबसे बड़ी चुनौती उस असीम महासमुद्र को पार करने की थी। युद्ध के इस महासंकल्प और अपनी विजय को सुनिश्चित करने के लिए, महर्षि अगस्त्य और अन्य ऋषियों ने श्रीराम को ब्रह्मांड की सर्वोच्च शक्ति—भगवान शिव—की आराधना करने का परामर्श दिया।
शिव ही वह आदि शक्ति हैं, जिनकी कृपा के बिना कोई भी कार्य पूर्ण नहीं हो सकता। श्रीराम ने लंका पर विजय पाने के अचूक संकल्प के साथ समुद्र के दक्षिणी छोर पर रेत से एक शिवलिंग का निर्माण किया। जिस रामेश्वरम में यह स्थापना हुई, वह क्षण केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि यह इस बात का प्रतीक था कि सृष्टि के मर्यादा पुरुष (राम) और संहारक-वैरागी (शिव) एक ही परम चेतना के दो रूप हैं। भगवान राम द्वारा स्थापित यह शिवलिंग इस बात की गवाही देता है कि विजय के अहंकार से दूर, एक सच्चे भक्त के रूप में उन्होंने आदिदेव शिव को समर्पित होकर यह संदेश दिया कि संसार में कोई भी कार्य ईश्वर की अराधना और उनके आशीर्वाद के बिना संभव नहीं है।
जब त्रेतायुग के सबसे बड़े और आदर्श राजा भगवान राम ने शिव के आगे शीश झुकाकर कोई भेद नहीं किया, तो फिर आज के दौर में कुछ राजनेता अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए ‘राम’ और ‘शिव’ के बीच यह नफरत भरी दीवारें क्यों खड़ी कर रहे हैं?
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