दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को लेकर कांग्रेस ने उठाए सवाल, चुनाव आयोग ने कहा- सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए
पटना, 23 सितंबर 2026। चुनाव आयोग के फैसलों और आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई आपत्तियों को लेकर बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने बुधवार को पटना में प्रदर्शन किया। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने इनकम टैक्स गोलंबर पर आक्रोश मार्च निकाला और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का पुतला दहन कर उनके इस्तीफे की मांग की।
प्रदर्शन का नेतृत्व कांग्रेस की अनुशासन समिति के अध्यक्ष कपिलदेव प्रसाद यादव ने किया। कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची में बदलाव और आयोग के भीतर कथित असहमति को लेकर सवाल उठाए।
कांग्रेस का आरोप- सरकार के दबाव में काम कर रहा चुनाव आयोग
कपिलदेव प्रसाद यादव ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग सरकार और सत्तारूढ़ दल के दबाव में काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के प्रमुख के रूप में होनी चाहिए और चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता तथा मतदाताओं के अधिकारों को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग के भीतर अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों और असहमतियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है। कांग्रेस ने कहा कि अगर मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठते हैं तो इसका सीधा संबंध मतदाताओं के अधिकार से है।
कांग्रेस नेता ने मुख्य चुनाव आयुक्त से पद छोड़ने की मांग करते हुए कहा कि चुनाव आयोग की संवैधानिक विश्वसनीयता और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़े सवालों का स्पष्ट जवाब दिया जाना चाहिए।
बैकग्राउंडर: आखिर चुनाव आयोग के भीतर आपत्तियों का मामला क्या है?
चुनाव आयोग को लेकर मौजूदा विवाद की पृष्ठभूमि में मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) और आयोग के भीतर कथित मतभेद हैं। चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक फिलहाल तीन सदस्यीय आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और चुनाव आयुक्त विवेक जोशी शामिल हैं।
23 सितंबर को The Indian Express की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों या आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार, ये आपत्तियां मतदाता पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने, Form-6 में बदलाव और चुनावी डेटा/सॉफ्टवेयर के संचालन जैसे मुद्दों से जुड़ी थीं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता डेटाबेस के संचालन में दिल्ली में अधिकारों के केंद्रीकरण और राज्यों के निर्वाचन अधिकारियों की प्रणाली तक पहुंच से जुड़े सवाल उठाए थे।
SIR क्या है और विवाद क्यों बढ़ा?
Special Intensive Revision यानी SIR मतदाता सूची की गहन समीक्षा की प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया बिहार में जून 2025 में शुरू हुई थी और बाद में कई राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों तक विस्तारित हुई। The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में नाम ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से हटाए गए हैं, जिससे मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक तथा सार्वजनिक बहस तेज हुई है।
मतदाता सूची में किसी व्यक्ति का नाम होना उसके मतदान के अधिकार के लिए महत्वपूर्ण है। इसलिए नाम हटाने, जोड़ने या सत्यापन की प्रक्रिया में पारदर्शिता और उचित प्रक्रिया को लेकर उठने वाले सवाल सीधे चुनावी प्रक्रिया से जुड़े होते हैं।

दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों में क्या मुद्दे थे?
मीडिया रिपोर्टों में जिन मुद्दों का उल्लेख किया गया है, उनमें मुख्य रूप से:
- नए मतदाताओं के पंजीकरण से संबंधित Form-6 में बदलाव
- मतदाता सूची से नाम हटाने और दोबारा जोड़ने की प्रक्रिया
- चुनावी डेटाबेस और उसके तकनीकी नियंत्रण का संचालन
- राज्यों के निर्वाचन अधिकारियों की डिजिटल सिस्टम तक पहुंच
- पश्चिम बंगाल में मतदाता नाम हटाने से संबंधित अपील
- गोवा में पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने से जुड़े मामले
शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों को लेकर अपनी आपत्तियां रिकॉर्ड पर दर्ज कीं और कुछ मामलों में प्रक्रिया तथा अधिकारों के केंद्रीकरण पर सवाल उठाए।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
इस पूरे विवाद में चुनाव आयोग का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। आयोग के सूत्रों ने रिपोर्ट में उठाए गए मतभेद के दावे को खारिज करते हुए कहा कि SIR समेत आयोग के सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए हैं।
चुनाव आयोग ने यह भी कहा कि बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग टिप्पणियां या मत सामने आना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है और इससे आयोग के कामकाज में किसी टूट का निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए।
इस तरह मौजूदा विवाद में एक तरफ मीडिया रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज आपत्तियों का विवरण सामने आया है, वहीं चुनाव आयोग ने अपने फैसलों को सर्वसम्मति से लिया गया बताया है।
पटना प्रदर्शन में ये नेता रहे मौजूद
कांग्रेस के प्रदर्शन में विधायक दल के पूर्व नेता डॉ. शकील अहमद खान, सेवादल अध्यक्ष डॉ. संजय यादव, अफरोज खान, प्रेमचंद सिंह, शिशिर कौंडिल्य, डॉ. अमन कुमार, मंजीत आनंद साहू, मृणाल अनामय, सत्येंद्र कुमार सिंह, इन्द्रदीप चंद्रवंशी, नदीम अख्तर अंसारी, रुचि सिंह, सतेंद्र कुमार, निशांत करपटने, बिट्टू यादव, विशाल यादव, अरुण पाठक, मिहिर झा, रमाशंकर पान, राज कुमार पूर्वे, बिपिन झा और दिनेश शंकर दास समेत कई कार्यकर्ता मौजूद रहे।
कांग्रेस ने प्रदर्शन के माध्यम से मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग के साथ चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची के पुनरीक्षण और आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों पर सार्वजनिक स्पष्टीकरण की मांग की।
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