SIR के बाद छूटे मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान पर भाकपा-माले महासचिव ने उठाए सवाल, बोले- “गलती आयोग की है तो सुधार भी आयोग को ही करना चाहिए”
पटना। बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। भाकपा-माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने चुनाव आयोग की ओर से SIR के बाद छूटे मतदाताओं और पहली बार मतदान करने वाले युवाओं के नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाने के निर्देश पर सवाल उठाए हैं।
चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को कहा था कि SIR के दौरान या उसके बाद जिन लोगों के नाम मतदाता सूची में छूट गए हैं, साथ ही युवा और पहली बार के मतदाता, निरंतर अद्यतन प्रक्रिया के तहत नाम जुड़वाने के लिए संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) के पास आवेदन कर सकते हैं। आयोग ने मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEOs) को ऐसे मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान शुरू करने का निर्देश भी दिया था।
2 अक्टूबर को सामने आए आयोग के निर्देशों के अनुसार, BLO को पहले की मतदाता सूची और मौजूदा सूची का मिलान कर ऐसे मतदाताओं की पहचान करनी है, जिनके नाम पहले थे लेकिन वर्तमान सूची में नहीं हैं। इसके बाद घर-घर जाकर उनकी स्थिति की पुष्टि और पात्र होने पर Form-6 के जरिए नाम जोड़ने में मदद की जानी है।
इसी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए दीपंकर भट्टाचार्य ने चुनाव आयोग के सामने पांच सवाल रखे हैं।
1. जिनका नाम पहले से था, उनसे Form-6 क्यों?
दीपंकर भट्टाचार्य का पहला सवाल है कि जिन मतदाताओं के नाम पहले की मतदाता सूची में मौजूद थे और SIR के बाद उनका नाम नहीं रहा, उनसे Form-6 क्यों भरवाया जा रहा है?
उनका कहना है कि Form-6 के जरिए मतदाता सूची में नाम शामिल कराने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। ऐसे में यदि किसी व्यक्ति का नाम पहले से मतदाता सूची में था और पुनरीक्षण के दौरान उसका नाम हट गया, तो उसे नए मतदाता की तरह आवेदन करने के लिए क्यों कहा जाना चाहिए?

दीपंकर ने इसे चुनाव आयोग की गलती बताते हुए कहा कि अगर गलती आयोग की है तो उसे स्वीकार कर आयोग को ही सुधारना चाहिए।
हालांकि, चुनाव आयोग का कहना है कि SIR के दौरान या उसके बाद छूटे मतदाता तथा युवा और पहली बार के मतदाता continuous updation प्रक्रिया के तहत नाम जुड़वाने के लिए आवेदन कर सकते हैं।
2. SIR को रद्द कर गलत तरीके से हटाए गए नाम बहाल किए जाएं
दीपंकर भट्टाचार्य ने SIR की पूरी प्रक्रिया पर ही सवाल उठाते हुए इसे तत्काल रद्द करने की मांग की है।
उन्होंने आरोप लगाया कि SIR मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित करने का माध्यम बन गया है। उनका कहना है कि जिन मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं, उनके नाम तत्काल बहाल किए जाने चाहिए।
भाकपा-माले की ओर से किए गए एक सर्वे का हवाला देते हुए दीपंकर ने दावा किया कि बिहार के कुछ चुनिंदा बूथों पर घर-घर सर्वे के दौरान कम से कम 17 प्रतिशत मतदाताओं के नाम गलत तरीके से काटे जाने के मामले मिले।
महत्वपूर्ण: यह 17 प्रतिशत का आंकड़ा भाकपा-माले के सर्वे का दावा है। इसे चुनाव आयोग द्वारा स्वीकार किए गए आंकड़े के रूप में नहीं प्रस्तुत किया जा सकता।
3. अगर नाम कटने से चुनाव प्रभावित हुए तो जिम्मेदारी कैसे तय होगी?
दीपंकर भट्टाचार्य ने तीसरा सवाल चुनाव के परिणामों पर संभावित असर को लेकर उठाया है। उनका तर्क है कि यदि बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए, तो इसका असर केवल उन लोगों के मतदान अधिकार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि चुनावी प्रक्रिया और संभावित रूप से चुनाव परिणामों पर भी पड़ सकता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी चुनाव क्षेत्र में मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर गलतियां हुई हों और उसका चुनाव पर असर पड़ा हो तो केवल बाद में मतदाता का नाम जोड़ देना पर्याप्त कैसे होगा?
उन्होंने पूछा कि ऐसी स्थिति में नुकसान की भरपाई कैसे होगी और क्या दोबारा मतदान ही इसका समाधान हो सकता है?
यह फिलहाल दीपंकर भट्टाचार्य द्वारा उठाया गया राजनीतिक और प्रक्रियात्मक सवाल है। चुनाव आयोग ने अपने 26 सितंबर के बयान में SIR के आदेश और प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा था कि देशभर में SIR से जुड़े फैसले आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी से लिए गए थे और 24 जून 2025 के SIR आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 के आदेश में बरकरार रखा था।
4. मुख्य चुनाव आयुक्त की जवाबदेही और 2023 के कानून पर सवाल

दीपंकर ने चौथे सवाल में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही तय करने और उनके इस्तीफे की मांग की है। उन्होंने 2023 में बने Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act को भी निशाने पर लिया।
इस कानून के तहत CEC और Election Commissioners की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक चयन समिति की सिफारिश पर होती है। चयन समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता/सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता का प्रावधान है।
दीपंकर का आरोप है कि इस व्यवस्था से चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने कानून को रद्द करने और चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव की मांग की है। उन्होंने चुनाव आयुक्तों को कानूनी संरक्षण दिए जाने पर भी सवाल उठाया है।
यहां कानून की वास्तविक स्थिति अलग से समझना जरूरी है। 2023 के कानून की धारा 16 के अनुसार, किसी वर्तमान या पूर्व CEC/EC के खिलाफ उस कार्य, बात या कृत्य को लेकर सिविल या आपराधिक कार्यवाही अदालत में स्वीकार या जारी नहीं की जा सकती, जो उसने अपने आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन के दौरान किया हो।
इसलिए इसे सीधे तौर पर “आजीवन हर तरह की कानूनी कार्रवाई से छूट” कहना कानून की भाषा से अधिक व्यापक दावा होगा।
5. मोदी-शाह की भूमिका को लेकर दीपंकर ने उठाया सवाल
अपने पांचवें सवाल में दीपंकर भट्टाचार्य ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की भूमिका को लेकर सवाल उठाया।
उन्होंने आरोप लगाया कि मतदाता सूची की “सफाई” के नाम पर SIR की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए ज्ञानेश कुमार को जिम्मेदारी दी गई और अब जब उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
दीपंकर ने सवाल किया कि यदि SIR को लेकर लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं, तो क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं?

यह दीपंकर भट्टाचार्य का राजनीतिक आरोप और सवाल है। उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों में प्रधानमंत्री या गृह मंत्री की SIR में किसी कथित “साजिश” या मिलीभगत की पुष्टि नहीं हुई है। चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को स्पष्ट रूप से कहा था कि SIR से संबंधित उसके निर्णय आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी से लिए गए थे।
चुनाव आयोग का अब तक क्या कहना है?
SIR विवाद के बीच चुनाव आयोग ने कहा है कि बिहार समेत 20 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में SIR पूरा हो चुका है। आयोग के मुताबिक, जिन लोगों के नाम SIR के दौरान या उसके बाद छूट गए हैं, वे संबंधित ERO के माध्यम से मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं। युवा और पहली बार के मतदाताओं को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया गया है।
आयोग ने यह भी कहा है कि BLO ऐसे मतदाताओं की पहचान करने के लिए घर-घर जाएंगे और पात्र लोगों को Form-6 भरने में सहायता करेंगे।
यानी विवाद का मुख्य प्रश्न अब यही है कि SIR के बाद छूटे मतदाताओं को “नए आवेदनकर्ता” की तरह Form-6 भरना क्यों पड़े और यदि वे पहले से मतदाता थे तो उनके नाम की बहाली की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए।
दीपंकर भट्टाचार्य ने इन्हीं सवालों को लेकर चुनाव आयोग से जवाब मांगा है।
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