भगवान राम की मंदिर बनाते-बनाते मोदी जी को खुद भगवान के राम के अवतार में पेश किया जाने लगा है। मोदी की दैवी छवि बन गई या बनाए जा रहे हैं। ऐसे में अहम सवाल यह है कि क्या यह कार्य मोदी के समर्थकों द्वारा किया जा रहा है या उनके विरोधियों द्वारा किया जा रहा है? यदि उनके समर्थकों द्वारा किया जा रहा है तो कहा जा सकता है कि उनके समर्थक ही उनकी कब्र खोद रहे हैं। और यदि उनके विरोधियों द्वारा किया जा रहा है तो स्पष्ट है कि उनके विरोधियों ने उनके खिलाफ गहरी साजिश की है जो सफल होती दिख रही है।
मोदी की दैवी छवि पर सबसे बड़ा सवाल
भगवान राम के रूप में मोदी के रूपांतरण से जो संदेश निकल रहा है वह उनके हक में कतई नहीं है। ईश्वर तो वह बनने से रहे, उनकी सियासी चमक भी फीकी पड़ती चली जा रही है। आफ्टर ऑल, यह तर्क का युग है, विज्ञान का युग है। ढोल- नगाड़ों के साथ शंख फुंककर शोर तो किया जा सकता है बौद्धिकता के हत्या नहीं की जा सकती। सवाल पूछते रहना एक प्रगतिशील इंसान की पहली पहचान है।
2014 के बाद से भले ही भारतीय इतिहास को एक नई मोड़ देने की कोशिश की गई हो लेकिन वैज्ञानिक तौर पर आज भी पूरी दुनिया समेत भारत में चार्ल्स डार्विन के विकासवादी सिद्धांत को ही मानव के वर्तमान स्वरूप को समझने के लिए सटीक माना जाता है। यह सिद्धान्त मूलतः दो बिंदुओं पर चलता है, एक,इंसान क्रमशः विकास का प्रतिफल है और दूसरा, कठिन संघर्ष के बाद सर्वश्रेष्ठ ही सरवाइव करता है।
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चार्ल्स डार्विन का यह सिद्धांत पुराण, कुरान और बाइबल द्वारा इंसान के जन्म के जन्म और स्वरूप के संदर्भ में प्रतिपादित सिद्धांत को चुनौती देता है। यानि इंसान की पैदाइश ईश्वर से नहीं हुई, इंसान क्रमशः विकास का प्रतिफल है। एक कोशिकीय अमीबा से लेकर के अब तक इंसान के विकास का सफर जारी है। जिस तरह से एक ईश्वर के तौर पर नरेंद्र मोदी को देश में स्थापित करने की प्रक्रिया चल रही है वह वैज्ञानिक सोच से इतर है।
प्रधानमंत्री के तौर पर वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी का सत्ता में आना पूरी तरह से एक राजनीतिक परिघटना है। इसके कई कारण है। सबसे बड़ा कारण कांग्रेस और उनके भ्रष्टाचारी नेताओं को लेकर के देश की जनता में आक्रोश की भावना थी। यही भावना मोदी के लिए वोट के रूप में तब्दील हुई। इसके लिए उन्होंने भी एड़ी चोटी का जोड़ लगाया। अपनी इमेज बिल्डिंग की, अपने संगठन को लक्ष्य देकर के वह आगे बढ़े, देश की मीडिया को मैनेज किया, जनता को रिझाने के लिए लोक लुभावन वादे किए,हर वह काम करते गए जो सत्ता हासिल करने के लिए आमतौर पर एक सियासी व्यक्ति और उसकी पार्टी करती है। यह सब कुछ उन्होंने डेमोक्रेटिक सेटअप में किया। सत्ता हासिल करने के लिए लाजमी भी था।
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सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। पूरे देश में उन्होंने समर्थकों की एक पूरी फौज खड़ी कर ली। देश का पूरा नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। एक अधिनायक की तरह पेश आने लगे। चंद लोगों का एक गिरोह बनाया और उन्हें जिम्मेदारियां दी। देश के लोगों को विकास के नए-नए सपने दिखाते रहे। विदेश यात्राओं के दौरान अंतर्राष्ट्रीय नेताओं के पीठ थपथपाते हुए देश के लोगों को यह फीलिंग देते रहें कि भारत विश्व गुरु बन चुका है। अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया सहित दुनिया भर के तमाम देशों में आयोजित कार्यक्रमों के दौरान उठने वाली मोदी मोदी की गूंज भारत के लोगों को यह एहसास कराता था कि दुनिया में भारत का डंका बज रहा है।
समस्या उस वक्त से शुरू हुई जब लगातार मिल रही चुनावी कामयाबी के बाद वह खुद को नॉन बायोलॉजिकल करार देते हुए अवतारी पुरुष के रूप में पेश करने लगे। और लोगों से उम्मीद करने वालों की उन्हें इस रूप में स्वीकार करें। उनके समर्थकों का एक समूह उन्हें इस रूप में स्वीकार भी करने लगा, यदि स्वीकार नहीं भी किया तो स्वीकार करने का ढ़ोग तो करने ही लगा। अयोध्या में राम मंदिर उद्घाटन समारोह के दौरान उन्हें भगवान श्रीरामचंद्र के हाथ को पकड़ कर के मंदिर में लाते हुए पोस्टर भी जारी किया गया। इस पोस्ट में उनका कद श्री राम के कद से कहीं ज्यादा था। हाल में किन्नर समुदाय द्वारा पटना में उनके मंदिर बनाने की भी घोषणा की गई। और अब तो दिल्ली में विधिवत भगवान विष्णु के अवतार में स्थापित करके मोदी चालीसा पढ़ी जा रही है। एक सियासी शख्सियत को ईश्वर के रूप में स्थापित करने की इस प्रवृत्ति को भारतीय समाज स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
जेन जी आंदोलन ने मोदी के तिलस्म पर गहरा प्रहार किया है। वर्षों से गढी गई उनकी चमक फीकी पड़ी है। लोग शिक्षा के साथ-साथ जीवन की मूलभूत सुविधाओं के लिए तर्क वितर्क करने लगे हैं। नुक्ताचीनी की यह मानसिकता कई मिथकों पर प्रहार कर रही है। चाय वाला, सेवक और चौकीदार के रूप में उन्होंने सत्ता की सीढ़ी चढ़ी थी। ईश्वर बनने के चक्कर में वह फिसल भी सकते हैं। और यदि एक बार लुढ़कने की प्रक्रिया शुरू हो गई तो फिर उसको रोक पाना मुश्किल होगा। प्रकृति कई अधिनायकों को उदाहरण बनाकर के छोड़ दी है। विश्व का इतिहास ऐसे अधिनायकों से भरा पड़ा है।
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