कैप्टन स्मित मच्छार से नीरजा भनोट और तुकाराम ओंबले तक… इन लोगों के पास कोई सुपरपावर नहीं थी, सिर्फ दूसरों की जिंदगी बचाने का साहस था
नई दिल्ली। इस दुनिया की सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि इतिहास केवल उन लोगों की उंगलियों से लिखा जाता है जिनके कंधों पर बडे़ तमगे या पद होते हैं। कई बार मामूली आदमी हीरो बनकर सामने आता है और इतिहास रच जाता है. कभी खाकी वर्दी में कोई सिपाही, कभी विमान की कॉकपिट में बैठा कोई साधारण पायलट, या पटरियों पर दौड़ता कोई अदृश्य इंसान आगे आता है। वे लोग कौन थे? क्या उनके पास कोई जादुई शक्तियां थीं? नहीं। वे हम और आप जैसे ही ‘कॉमन मैन’ थे, जो सुबह अपने घरों से साधारण उम्मीदों के साथ निकलते हैं। लेकिन फर्क सिर्फ इतना था कि जब आसमान पर खतरे के बादल मंडराए या मौत ने आंखें दिखाई, तब उन्होंने घुटने टेकने के बजाय अपनी छाती पर वह गोली खाना मंजूर किया जो दूसरों की जिंदगी बचा सकती थी।
जब संकट की वह भयानक घड़ी सामने आती है, तब इंसान का असली चरित्र बाहर आता है। आखिर क्या बात होती है कि एक साधारण सा दिखने वाला इंसान अचानक मौत के सामने दीवार बनकर खड़ा हो जाता है? एक आम इंसान को ‘रियल हीरो’ बन जाता है. यह कहानी है उन्हीं अनसुने और असाधारण नायकों की, जिन्होंने यह साबित कर दिया कि हीरो पैदा नहीं होते, वे अपने फैसलों से गढ़े जाते हैं। आइए, पलटते हैं उन पन्नों को और महसूस करते हैं उस अदम्य साहस की धड़कन को…
कैप्टन स्मित मच्छार की कहानी
35,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ते हुए विमान के कॉकपिट के भीतर जो कुछ हुआ, वह किसी खौफनाक थ्रिलर फिल्म से भी ज्यादा दहला देने वाला था। दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की फ्लाइट FZ1073 जब आसमान में थी, तब विमान के फ्लाइट डेक पर अचानक एक ऐसा भयानक संकट टूट पड़ा जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। कॉकपिट के अंदर को-पायलट ने अचानक कैप्टन स्मित मच्छार पर घातक हमला कर दिया। इस अचानक हुए हिंसक वार से कैप्टन स्मित गंभीर रूप से घायल हो गए और खून से लथपथ होकर जमीन पर गिर पड़े। हमलावर ने विमान के कंट्रोल को अपने कब्जे में लेते हुए विमान को तेजी से नीचे की तरफ धकेलना शुरू कर दिया, जिससे बोइंग 737 मैक्स विमान कुछ ही सेकंड में हजारों फीट नीचे गोता लगाने लगा। विमान के भीतर चीख-पुकार मच गई और हर तरफ मौत का साया मंडराने लगा।

लेकिन उस खून से सने और बेहद खतरनाक माहौल में भी कैप्टन स्मित ने अपने भीतर की हिम्मत नहीं टूटने दी। गंभीर रूप से घायल और दर्द से कराहने के बावजूद उनके मन में बस एक ही बात गूंज रही थी- “मैं बाकी सबको यूं मरने नहीं दे सकता।” खून से लथपथ हालत में जब वे जमीन पर थे, तब उन्होंने खुद से कहा- “एक आखिरी कोशिश और, स्मित! बस कर डालो, दरवाजा वहीं सामने है।” अपनी जिंदगी की आखिरी सांसों और शरीर की परवाह किए बिना, उन्होंने असीम शक्ति बटोरी और किसी तरह घिसटते हुए कॉकपिट के उस बंद दरवाजे तक पहुंचे और उसे अंदर से खोल दिया।
जैसे ही दरवाजा खुला, विमान में मौजूद यात्री और क्रू मेंबर तुरंत अंदर टूट पड़े। यात्रियों ने भारी संघर्ष के बाद उस हमलावर को दबोच लिया और काबू में किया। इसके बाद फ्लाइट में मौजूद अन्य रिजर्व पायलटों ने तुरंत कमान संभाली और विमान को सुरक्षित सऊदी अरब के ताबुक एयरपोर्ट पर उतार लिया। दर्द और मौत को बहुत करीब से देखने वाले कैप्टन स्मित ने बाद में साझा किया कि उस भयानक संकट के बीच जब वे बुरी तरह जख्मी थे, तब वे लगातार हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे। उनकी इस अदम्य इच्छाशक्ति, सूझबूझ और लोहे जैसे हौसले ने 180 से ज्यादा जिंदगियों को मौत के मुंह से खींचकर वापस ले आया।
नीरजा भनोट की कहानी
5 सितंबर 1986 का वह काला दिन, जब कराची एयरपोर्ट पर पैन एम फ्लाइट 73 (Pan Am Flight 73) को आतंकवादियों ने हाईजैक्ड कर लिया था। मौत के साए में घिरे उस विमान के भीतर हर तरफ चीख-पुकार और दहशत का माहौल था। ठीक उसी खौफनाक पल में, 23 साल की एक युवा सीनियर फ्लाइट पर्सर नीरजा भनोट ने अपनी जान बचाने के लिए भागने के बजाय, अपनी आखिरी सांस तक यात्रियों की हिफाजत करने का अटूट संकल्प लिया।
उस भयानक संकट के बीच जब आतंकवादियों ने अमेरिकन यात्रियों को चुनकर मारने का आदेश दिया, तो नीरजा ने अपनी सूझबूझ और अदम्य साहस का परिचय देते हुए तुरंत अमेरिकी पासपोर्ट्स को छिपा दिया। उन्होंने मौत को अपनी आंखों के सामने खड़े देखा, लेकिन एक सेकंड के लिए भी उनका हौसला नहीं डगमगाया। जब विमान के इंजन बंद हो चुके थे और अंदर अंधेरा छाने लगा था, तब उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना आपातकालीन दरवाजों को खोलकर यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकालना शुरू किया।

और फिर जब एक आतंकवादी ने बच्चों की तरफ अपनी बंदूक तानी, तो नीरजा ने बिना एक पल गंवाए उन मासूम बच्चों को अपनी आड़ में ढाल बना लिया और गोलियों की बौछार अपने सीने पर झेल ली। गोलियों से छलनी होने के बावजूद उनके चेहरे पर कोई खौफ नहीं था—बस एक ही जिद थी कि उनका हर एक यात्री सुरक्षित बचना चाहिए। नीरजा भनोट ने अपनी ड्यूटी को अपनी जिंदगी से बड़ा मानकर यह साबित कर दिया कि असली नायक वे नहीं होते जो पर्दे पर चमकते हैं, बल्कि वे होते हैं जो खौफ के समंदर में उतरकर दूसरों की जिंदगी रोशन कर जाते हैं।
तुकाराम ओंबले की कहानी
26 नवंबर 2008 की वह काली रात, जब मुंबई दहल उठी थी। देश की आर्थिक राजधानी पर हुए उस भीषण आतंकी हमले में मौत तांडव कर रही थी। शहर की सड़कों पर खौफ का साया था और हर कोई अपनी जान बचाने की जुगत में था, तभी गिरगांव चौपाटी के पास एक ऐसी घटना घटी जिसने इतिहास को बदल कर रख दिया। मुंबई पुलिस के एक साधारण सहायक पुलिस उपनिरीक्षक (ASI) तुकाराम ओंबले ने अपनी जान की परवाह किए बिना वह कर दिखाया, जिसकी कल्पना शायद उन खूंखार आतंकवादियों ने भी नहीं की थी।

जब अजमल कसाब और उसका साथी अबू इस्माइल एक चुराई हुई कार में सवार होकर गिरगांव चौपाटी पर पुलिस बैरिकेड्स से गुजरने की कोशिश कर रहे थे, तब तुकाराम ओंबले ने बिना एक पल गंवाए निहत्थे ही उस कार पर धावा बोल दिया। गोलियों की बौछार करते उस आतंकवादी कसाब के सामने वे किसी चट्टान की तरह डट गए। जब कसाब ने अपनी असॉल्ट राइफल का रुख सीधे उनकी छाती की तरफ किया, तो तुकाराम ओंबले ने अपनी लाठी या हथियार का इस्तेमाल करने के बजाय सीधे कसाब की बंदूक की नली को दोनों हाथों से मजबूती से दबोच लिया।
कसाब अंधाधुंध गोलियां चला रहा था, जो सीधे तुकाराम ओंबले के शरीर को छलनी कर रही थीं, लेकिन उनके हाथों की पकड़ लोहे की जंजीर जैसी मजबूत हो चुकी थी। उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक कसाब को अपनी गिरफ्त से छूटने नहीं दिया। उनके इस अकल्पनीय और अडिग साहस ने न सिर्फ कसाब को जिंदा पकड़वा दिया, बल्कि 26/11 के उस खौफनाक हमले का सबसे बड़ा सबूत और साजिश का पर्दाफाश भी दुनिया के सामने लाकर रख दिया। तुकाराम ओंबले ने यह साबित कर दिया कि खाकी वर्दी में बैठा एक ‘कॉमन मैन’ जब अपने देश और कर्तव्य के लिए खड़ा होता है, तो वह सदी का सबसे बड़ा रियल हीरो बन जाता है।
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