यदि ‘व्हिस्की’ की परिभाषा पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वर्षों पहले सवाल उठ चुके थे, तो भारतीय नियामक तब कहाँ थे? आज की कार्रवाई जितनी शराब उद्योग से जवाब मांगती है, उतनी ही FSSAI की नियामकीय जवाबदेही भी तय करती है।
FSSAI की शराब पर कार्रवाई ने भारतीय शराब उद्योग में हलचल मचा दी है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा कुछ शराब उत्पादों की लेबलिंग और संरचना पर की गई हालिया कार्रवाई ने उपभोक्ता अधिकार, उत्पाद पारदर्शिता और नियामकीय जवाबदेही से जुड़े कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि किसी उत्पाद में फ्लेवर मिलाया गया है, तो उसे “Whisky Flavoured Spirit” या “Rum Flavoured Spirit” के रूप में बेचा जाना चाहिए था। सिद्धांततः यह उपभोक्ता के जानने के अधिकार और पारदर्शिता का प्रश्न है। इस सिद्धांत से असहमति का कोई कारण नहीं हो सकता। लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा प्रश्न कहीं और है।
FSSAI की शराब पर कार्रवाई सही, लेकिन सवाल अधूरा है
यदि यही सिद्धांत सही था, तो FSSAI को यह सच 2026 में ही क्यों दिखाई दिया?
भारतीय निर्मित विदेशी मदिरा (IMFL) की उत्पादन प्रणाली कोई नई खोज नहीं है। दशकों से उद्योग, राज्य सरकारें, आबकारी विभाग, केंद्रीय एजेंसियाँ और नियामक संस्थाएँ जानते थे कि भारतीय बाजार में बिकने वाले अनेक उत्पाद पारंपरिक स्कॉच या आयरिश व्हिस्की की निर्माण पद्धति से अलग तरीके से तैयार होते हैं। यदि इसमें कोई नियामकीय कमी थी, तो वह रातों-रात पैदा नहीं हुई। वह वर्षों से मौजूद थी।
यहीं से FSSAI की जवाबदेही शुरू होती है।
FSSAI की शराब पर कार्रवाई का असर केवल संबंधित कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे भारतीय शराब उद्योग में नियामकीय पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी सवाल उठ रहे हैं।
इस संदर्भ में 1990 के दशक का वह अंतरराष्ट्रीय विवाद भी याद आता है, जब भारतीय शराब के निर्यात के दौरान “Whisky” शब्द के उपयोग को लेकर यूरोप और विशेषकर ब्रिटेन में आपत्तियाँ उठी थीं। उस समय उद्योग जगत में यह बहस व्यापक थी कि भारतीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप “Whisky” कहा जा सकता है या नहीं। उस दौर में विभिन्न स्तरों पर भारतीय उत्पादों की परिभाषा और लेबलिंग पर प्रश्न उठे थे।
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यदि उस समय यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय था, तो क्या भारत के नियामकों ने इसकी गंभीर समीक्षा की थी? यदि की थी, तो उसके निष्कर्ष क्या थे? यदि नहीं की थी, तो क्यों नहीं?
यदि उस समय कोई समस्या नहीं थी, तो आज अचानक वही उत्पाद या वही उत्पादन पद्धति संदिग्ध कैसे हो गई?
यदि समस्या थी, तो तीन दशक तक उपभोक्ताओं को बिना स्पष्ट जानकारी दिए उत्पाद बिकने कैसे दिए गए?
इन प्रश्नों का उत्तर केवल शराब कंपनियों से नहीं, बल्कि FSSAI से भी अपेक्षित है। FSSAI की शराब पर कार्रवाई महज संयोग नहीं माना जा सकता। यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब भारतीय सिंगल माल्ट वैश्विक पहचान बना रहे हैं, भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों पर बातचीत कर रहा है और भौगोलिक संकेतकों (GI), खाद्य मानकों तथा वैश्विक नियामकीय सामंजस्य पर अधिक जोर दिया जा रहा है।
ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह केवल उपभोक्ता हित में उठाया गया कदम है, या भारत अपने नियामकीय ढाँचे को वैश्विक मानकों के अनुरूप ढाल रहा है? यदि दूसरा कारण भी है, तो इसमें कोई बुराई नहीं। लेकिन तब FSSAI को यह स्पष्ट रूप से बताना चाहिए। क्योंकि नियामकीय पारदर्शिता उतनी ही आवश्यक है जितनी उत्पाद की पारदर्शिता।
एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है। यदि उद्योग ने दशकों तक वही किया, जो नियामकीय व्यवस्था की जानकारी और स्वीकृत मानकों के भीतर होता रहा, तो पूरी जिम्मेदारी केवल उद्योग पर कैसे डाली जा सकती है?
क्या FSSAI यह बताएगा कि पिछले 25-30 वर्षों में उसने कितनी बार इसी प्रकार की लेबलिंग पर आपत्ति दर्ज की? कितने नोटिस जारी किए? कितनी इकाइयों का निरीक्षण किया? कितने मामलों में कार्रवाई हुई? यदि रिकॉर्ड लगभग शून्य है, तो क्या यह नियामकीय विफलता नहीं है?

नियामक संस्थाओं का दायित्व केवल दंड देना नहीं होता; समय रहते स्पष्ट मानक बनाना, उद्योग को मार्गदर्शन देना और उनका समान रूप से पालन सुनिश्चित करना भी उनकी जिम्मेदारी है। यदि यह जिम्मेदारी वर्षों तक पूरी नहीं हुई, तो उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इस लेख का उद्देश्य उद्योग का बचाव करना नहीं है। यदि किसी कंपनी ने उपभोक्ता को भ्रमित किया है, तो उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन कानून का मूल सिद्धांत यह भी कहता है कि “न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।”
यदि नियमों की व्याख्या अचानक बदलती है, तो नियामक को यह भी बताना होगा कि परिवर्तन का आधार क्या है। क्या नए वैज्ञानिक प्रमाण सामने आए हैं? क्या कानून बदला है? क्या अंतरराष्ट्रीय दायित्व बदले हैं? या केवल व्याख्या बदली है?
देश यह जानने का अधिकार रखता है।
इस पूरे विवाद का सबसे चिंताजनक पक्ष यह है कि चर्चा का केंद्र केवल शराब कंपनियाँ बन गई हैं, जबकि नियामकीय तंत्र लगभग सवालों से बाहर है। जबकि सच्चाई यह है कि यदि तीन दशक तक कोई व्यवस्था चलती रही, तो उसकी जिम्मेदारी केवल उत्पाद बनाने वालों की नहीं, बल्कि उसे नियंत्रित करने वालों की भी है।
आज आवश्यकता किसी सनसनी की नहीं, बल्कि संस्थागत आत्ममंथन की है। यदि FSSAI वास्तव में उपभोक्ता हित का प्रहरी है, तो उसे उद्योग पर कार्रवाई के साथ-साथ अपने निर्णयों की समयरेखा, अपने पूर्व रुख और अपनी नियामकीय विफलताओं पर भी खुलकर प्रकाश डालना चाहिए।
अंततः यह विवाद व्हिस्की की एक बोतल का नहीं, बल्कि नियामकीय विश्वसनीयता का है। यदि 1990 के दशक में “Whisky” शब्द पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रश्न उठ चुके थे, तो भारत का नियामक तंत्र तब क्या कर रहा था? और यदि तब सब कुछ नियमों के अनुरूप था, तो आज क्या बदल गया?
इन प्रश्नों का उत्तर देना केवल FSSAI की प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही भी है।
क्योंकि लोकतंत्र में केवल उद्योग ही नहीं, नियामक भी जनता के प्रति उत्तरदायी होता है। और यदि नियामक तीन दशक बाद जागा है, तो सबसे पहले उसे अपनी ही नींद का हिसाब देना होगा।
डिस्क्लेमर:
यह लेख लेखक के निजी विचार और विश्लेषण पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार FreelancerPost की आधिकारिक संपादकीय स्थिति नहीं हैं। लेख का उद्देश्य FSSAI की हालिया कार्रवाई, शराब उत्पादों की लेबलिंग, उपभोक्ता अधिकार और नियामकीय जवाबदेही से जुड़े प्रश्नों पर सार्वजनिक विमर्श को सामने रखना है। लेख में उल्लिखित तथ्य और संदर्भ उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं। किसी व्यक्ति, कंपनी या संस्था के संबंध में लगाए गए आरोपों को अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।
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