Supreme Court Protest Order : नई दिल्ली। Supreme Court Protest Order मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा अंतरिम आदेश जारी करते हुए सभी राज्यों के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगा दी है। अदालत ने छह राज्यों के मुख्य सचिवों को नोटिस जारी किया और नाबालिग प्रदर्शनकारियों को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि कि वे नाबालिगों को तुरंत रिहा करें। हालांकि कोर्ट ने कहा कि उन्हें से सुरक्षा नहीं मिलेगी जिनका आपराधिक रिकॉर्ड रहा है। कोर्ट ने दिल्ली, महाराष्ट्र, बिहार, केरल, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के मुख्य सचिवों को नोटिस जारी किया है।
कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि प्रदर्शन से जुड़े सभी सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन, बॉडी कैमरे, वायरलेस कम्युनिकेशन रिकॉर्ड और पीसीआर कॉल को संरक्षित रखे जाएं। कोर्ट ने सभी राज्यों की पुलिस को निर्देश दिया कि वो प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों के डिजिटल डाटा को संरक्षित करें और उसे सार्वजनिक नहीं करें। कोर्ट ने ये भी आदेश दिया कि प्रदर्शनकारियों के किसी भी निजी जानकारी और सूचना को प्रकाशित नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ कोई निरोधात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार 18 साल से कम के नाबालिगों को तुरंत रिहा किया जाए।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि नीट पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शनाकारियों से निपटने के लिए लाठीचार्ज, पेलेट गन और आंसू गैस छोड़े गए। पेलेट गन से एक लड़के की आंख की रोशनी चली गई। प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए रबड़ के गोले और इलेक्ट्रिक बैटन का इस्तेमाल किया गया। लाठी चार्ज की वजह से कुछ लोग स्थायी रुप से विकलांग हो गए और यहां तक कि मीडियाकर्मियों को नहीं छोड़ा गया। पुलिसकर्मियों की ओर से सिविल ड्रेस में हिंसा की गई।

कोर्ट ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता इस मामले में स्वतंत्र जांच का विरोध नहीं कर रहे हैं। मेहता ने कहा कि इस प्रदर्शन के दौरान कई अपराधी भी मौजूद थे जिन्होंने करीब दो सौ पुलिसकर्मियों को घायल किया। ऐसे में इस मामले की निष्पक्ष जांच जरुरी है। ये जांच पुलिसकर्मियों के परिजनों की चिंता पर भी गौर करेगा। कमेटी गठित करने के पहले केंद्र सरकार अपना जवाब दाखिल करे।
इसके पहले सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हर नागरिक को शांतिपूर्ण और कानून के दायरे में रहकर प्रदर्शन करने का संवैधानिक अधिकार है। सिर्फ इसलिए कि कहीं आंदोलन हो रहा है, पुलिस लाठीचार्ज या जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग नहीं कर सकती।
चीफ जस्टिस ने कहा था कि अगर पुलिस ने कहीं ज्यादती की है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। पूरे देश में प्रदर्शन से निपटने के लिए यूनिफॉर्म गाइडलाइंस बनाई जानी चाहिए। बेंच के दूसरे सदस्य जस्टिस बागची ने कहा कि चाहे घायल छात्र हों या पुलिसकर्मी, हम दोनों के लिए चिंतित है। सरकार से पूछा जा सकता है कि हिंसक हालात से निपटने के लिए पुलिस को हेलमेट और अन्य जरूरी सुरक्षा उपकरण क्यों नहीं दिए गए।
बता दें कि कॉकरोच जनता पार्टी की ओर से पेपर लीक के आरोपों के बाद केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर 20 जून से प्रदर्शन चल रहा है। इस प्रदर्शन में सोनम वांगचुक ने 28 जून से आमरण अनशन शुरु किया था। करीब 20 दिनों के अनशन के बाद उन्हें जंतर-मंतर से उठाकर सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया था। प्रदर्शनकारियों ने 20 जुलाई को संसद मार्च किया था जिस दौरान राजधानी दिल्ली के कई स्थानों प्रदर्शनकारियों और दिल्ली पुलिस के बीच हिंसक झड़पें हुई। याचिका में कहा गया है कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के साथ कई स्थानों पर ज्यादती की। दिल्ली पुलिस ने कई स्थानों पर छात्रों पर लाठीचार्ज किया और आंसू गैस छोड़े। इस मामले में कनॉट प्लेस थाना, संसद मार्ग थाना और दूसरे थानों में एफआईआर दर्ज किया गया है।
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FAQs
Q. सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
A. अदालत ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई पर अंतरिम रोक, नाबालिगों की रिहाई और डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने के निर्देश दिए।
Q. किन राज्यों को नोटिस जारी हुआ?
A. दिल्ली, महाराष्ट्र, बिहार, केरल, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के मुख्य सचिवों को नोटिस जारी किया गया।
Q. अदालत ने पुलिस को क्या निर्देश दिए?
A. अदालत ने CCTV फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, बॉडी कैमरा डेटा और डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने तथा प्रदर्शनकारियों की निजी जानकारी सार्वजनिक नहीं करने का निर्देश दिया।
