भारतीय ज्ञान परंपरा और AI की बुनियाद एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। हम जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के साथ काम करते हैं, तो असल में हम उन मूल प्रश्नों को हल करने का प्रयास कर रहे होते हैं जिन्हें इंसान सदियों से ढूंढता आया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बुद्धिमत्ता को समझने की इंसान की अनवरत आकांक्षा की एक लंबी प्रक्रिया का वर्तमान रूप है। हम सदियों से यह सवाल पूछते रहे हैं कि हम गणना कैसे करते हैं, तर्क कैसे करते हैं, ज्ञान को संरक्षित कैसे करते हैं और क्या मशीनें मानव बुद्धि की तरह काम कर सकती हैं? भारतीय ज्ञान परंपरा का इन मूलभूत प्रश्नों से गहरा नाता है।
भारतीय ज्ञान परंपरा और AI : गणित: कंप्यूटर और ब्रह्मांड की भाषा
कंप्यूटर हमारी सामान्य भाषा को नहीं समझता; उसकी अपनी भाषा गणित है। यह कहा गया है कि “गणित वह भाषा है जिसमें ईश्वर ने इस ब्रह्मांड को लिखा है।” कंप्यूटर केवल दो अंकों को समझता है, जिसे हम बाइनरी लैंग्वेज (0 और 1) कहते हैं।
आधुनिक दुनिया में बाइनरी सिस्टम का श्रेय 16वीं शताब्दी के यूरोपीय वैज्ञानिकों को दिया जाता है, किंतु लगभग 2000 वर्ष पहले भारत में आचार्य पिंगल ने छंदशास्त्र के माध्यम से इस तरह की अवधारणा दी थी। उन्होंने संस्कृत श्लोकों में लघु और गुरु (उच्चारण में लगने वाले समय और जोर) को वर्गीकृत करने के लिए जो व्यवस्था बनाई, उसकी कार्यप्रणाली आधुनिक बाइनरी सिस्टम और कंप्यूटर साइंस के सिद्धांतों से अद्भुत समानता रखती है।
भारतीय ज्ञान परंपरा और AI : शून्य और स्थान-मान प्रणाली (Base Value System)
कंप्यूटिंग और गणित के क्षेत्र में भारत का सबसे बड़ा योगदान शून्य (0) और स्थान-मान प्रणाली (Place Value System) है। भारत द्वारा शून्य का आविष्कार किए जाने से पहले दुनिया में मुख्य रूप से रोमन अंकों का प्रयोग होता था, जिनसे जटिल गुणा या गणना करना बेहद कठिन था। भारत द्वारा दिए गए शून्य और स्थान-मान सिद्धांत ने गणनाओं को अत्यंत सरल और सुलभ बना दिया, जो आज के पूरे डिजिटल और कंप्यूटर ढांचे का आधार है।

भारतीय ज्ञान परंपरा और AI : भारतीय इतिहास में ऑटोमेशन और ‘भूत-वाहन यंत्र’
स्वचालन (Automation) और रोबोटिक्स की अवधारणा भारत में केवल काल्पनिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और दस्तावेजी भी रही है। 11वीं शताब्दी में धारा नगरी के राजा भोज ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘समरांगण सूत्रधार’ में ऐसे यांत्रिक पुतलों, यंत्रों और स्वचलित मशीनों (Automata) का वर्णन किया है जो स्वचालित रूप से कार्य कर सकती थीं।
भूत-वाहन यंत्र: बौद्ध परंपराओं और ऐतिहासिक विवरणों (जैसे बर्मी ग्रंथ ‘लोकपन्नत्ति’) के अनुसार, भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके पवित्र अवशेषों (अस्थियों) की सुरक्षा के लिए राजा अजातशत्रु के काल में ऐसे यांत्रिक योद्धा (यंत्र-मानव) बनाए गए थे जो स्वचालित रूप से रक्षा कर सकते थे। आम जनता ने जब बिना इंसान के चलने वाले इन यंत्रों को देखा, तो उन्हें लगा कि इनके भीतर कोई आत्मा या भूत है, जिससे इन्हें ‘भूत-वाहन यंत्र’ कहा गया।
विश्व साहित्य और यूनानी सभ्यता (जैसे अलेक्जेंड्रिया के हीरो द्वारा बनाए गए स्वचलित फव्वारे और स्वचालित मंच) में भी ऐसे यांत्रिक प्रयोग मिलते हैं। प्रसिद्ध माइथोलॉजी विद्वान एड्रियन मेयर ने भी माना है कि प्राचीन सभ्यताओं की अवधारणाएं आधुनिक AI की पूर्वपीठिका रही हैं।
भारतीय ज्ञान परंपरा और AI : पौराणिक परिकल्पनाएं और बौद्धिक परिपक्वता
हमारे पुराणों में पुष्पक विमान, आकाशवाणी और दूरस्थ संवाद जैसी अनेक अवधारणाएं मिलती हैं। यद्यपि ये आज की तकनीक पर सीधे आधारित नहीं थीं, किंतु ये इस बात का प्रमाण हैं कि हमारी बौद्धिकता और कल्पनाशीलता इतनी परिपक्व थी कि वह सदियों पहले ही रोबोटिक्स, स्वचालित वाहनों और एआई जैसी तकनीकों की अवधारणा कर सकती थी।
भारतीय ज्ञान परंपरा और AI : आधुनिक एआई और भारत का वर्तमान परिदृश्य
परंपरा के साथ-साथ आज का भारत आधुनिक एआई के क्षेत्र में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है. इसे इस तरह से समझा जा सकता है.
- भाषिणी (Bhashini): भारतीय भाषाओं और ध्वनियों का उपयोग करके भाषा-अनुवाद और प्रोसेसिंग के लिए एआई मॉडल विकसित किए जा रहे हैं।
- सर्वम (Sarvam AI):भारत केंद्रित बड़े एआई मॉडल्स और एलएलएम (LLM) पर कार्य हो रहा है।
- एआई मिशन और डेटा सेट:नए स्टार्टअप्स और कंपनियों की मदद के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एआई पाठ्यक्रम और डेटासेट उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
- डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर: एआई और क्लाउड इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक अवसंरचना तैयार की जा रही है।
- जिम्मेदार एआई (Responsible AI): वैश्विक स्तर पर एआई को जवाबदेह, पारदर्शी और नैतिक बनाने की दिशा में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

हमें यह अतिशयोक्तिपूर्ण दावा करने की आवश्यकता नहीं है कि हमने प्राचीन काल में लैपटॉप, न्यूरल नेटवर्क या आधुनिक रोबोट बना लिए थे। किंतु हम यह गर्व और तथ्य के साथ कह सकते हैं कि आधुनिक कंप्यूटर विज्ञान जिस शून्य, स्थान-मान प्रणाली, पाणिनि के व्याकरण (कोडिंग के नियम), न्याय दर्शन के लॉजिक और अनंत की अवधारणा पर टिका है, उसकी शुरुआत भारत से ही हुई थी।
नोट : प्रस्तुत विचार सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ और लेखक बालेंदु शर्मा दाधीच के हैं। उन्होंने प्रयागराज स्थित उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय में राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की 144वीं जयंती के अवसर पर ’19वीं राजर्षि टंडन स्मृति व्याख्यानमाला’ के दौरान ‘एआई और भारतीय ज्ञान परंपरा’ विषय पर आयोजित अपने व्याख्यान में ये बातें कहीं। एआई विषय पर बालेंदु शर्मा दाधीच की किताब ‘यंत्रबुद्धि’ इन दिनों काफी चर्चा में है.
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