पाकिस्तान के 14 अगस्त को मनाए जाने वाले स्वतंत्रता दिवस से ठीक तीन दिन पहले बलूच राष्ट्रवादियों ने 11 अगस्त को अपना ‘Balochistan Independence Day’ मनाया। बलूच राष्ट्रवादियों, नागरिक संगठनों और वैश्विक बलूच प्रवासियों द्वारा मनाए गए इस स्वतंत्रता दिवस ने पाकिस्तानी हुकूमत और सैन्य प्रतिष्ठान की नींद उड़ा दी है। इस अवसर पर ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ के बैनर तले बलूच कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर एक ऑनलाइन बयान जारी कर दुनिया से बलूचिस्तान की स्वतंत्रता को औपचारिक मान्यता देने की अपील की है।
इस्लामिक देशों का चौधरी बनने और ईरान युद्ध में सुलह कराने में जुटे पाकिस्तान को अपने ही इस इलाके में सुलग रही आग की तपिश की अनदेखी अब भारी पड़ती नजर आने लगी है। जिस इलाके में उसने बलोचों के साथ दरिंदगी की आज उन्होंने एक बड़ा कदम उठा लिया है। देर-सबेर ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि भारत और इजरायल बलूचिस्तान को अलग देश की मान्यता दे देंगे।
Balochistan Independence Day पर रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान का बयान
11 अगस्त को बलूच नेता और कार्यकर्ता मीर यार बलूच (Mir Yar Baloch) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ की ओर से एक विस्तृत ऑनलाइन बयान जारी किया। इस बयान में अंतरराष्ट्रीय मान्यता की मांग करते हुए कहा गया कि लगभग 6 करोड़ बलूच नागरिक हर साल 11 अगस्त को अपना राष्ट्रीय स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं। अब वह वक्त आ गया है जब दुनिया केवल बलूच संघर्ष को न देखे, बल्कि बलूचिस्तान की आजादी को कानूनी, राजनीतिक, कूटनीतिक और नैतिक रूप से मान्यता प्रदान करे।

इस बयान में पाकिस्तान को ‘कैंसर’ बताते हुए ऑनलाइन बयान में कहा गया कि पाकिस्तान क्षेत्रीय और वैश्विक शांति के लिए खतरा और “कैंसर” है। बयान में कहा गया कि जब तक पाकिस्तान इस क्षेत्र में काबिज है, तब तक दक्षिण एशिया में शांति, समृद्धि और विकास संभव नहीं है। पाकिस्तानी सेना के दमन का पर्दाफाश करते हुए बलोच नेतृत्व ने आरोप लगाया कि 50,000 से अधिक बलोच नागरिक आज भी पाकिस्तान के सीक्रेट टॉर्चर सेलों (यातना गृहों) में अमानवीय यातनाएं झेल रहे हैं।
इंटरनेट ब्लैकआउट के बावजूद फहराया झंडा
‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ के बयान में खुलासा किया गया कि 11 अगस्त के जश्न को रोकने के लिए पाकिस्तानी सेना ने बलूचिस्तान के कई हिस्सों में मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं ठप कर दीं, धारा 144 लगाई और ड्रोनों व हेलीकॉप्टरों से निगरानी की। इसके बावजूद बलूच जनता ने अपने घरों, दुकानों, बाजारों और शैक्षणिक संस्थानों में स्वतंत्र बलूचिस्तान का राष्ट्रीय ध्वज फहराया। रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र (UN), यूरोपीय संघ, आसियान (ASEAN), अफ्रीकी संघ और ओआईसी (OIC) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों से बलूचिस्तान में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों पर अपनी चुप्पी तोड़ने की मांग की। 11 अगस्त को बलूचिस्तान में मोबाइल और इंटरनेट व्यवधान की रिपोर्टें भी सामने आई हैं।
11 अगस्त की तारीख ही क्यों?
बलूचिस्तान के लिए 11 अगस्त की तारीख का गहरा ऐतिहासिक महत्व है। ब्रिटिश राज के अंत के समय 11 अगस्त 1947 को कलात की रियासत (वर्तमान बलूचिस्तान) के स्वतंत्रता के दावे को बलूच राष्ट्रवादी अपने इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। ऑल इंडिया रेडियो पर भी इसकी आधिकारिक घोषणा प्रसारित हुई थी। जिन्ना और ब्रिटिश हुकूमत के बीच 4 अगस्त 1947 को हुए समझौते (Standstill Agreement) के तहत मोहम्मद अली जिन्ना और ब्रिटिश सरकार ने कलात को एक अलग स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्वीकार किया था।
बलूचिस्तान की आजादी महज 7 महीने ही टिक सकी। 27 मार्च 1948 को पाकिस्तानी सेना ने जबरन सैन्य चढ़ाई कर कलात के खान (मीर अहमद यार खान) से विलय पत्र पर हस्ताक्षर करवा लिए। इसी वजह से बलूच राष्ट्रवादी 11 अगस्त को अपनी वास्तविक आजादी का दिन मानते हैं और 27 मार्च को कब्जे का ‘काला दिवस’ कहते हैं।
पाकिस्तान सरकार में बौखलाहट
प्राकृतिक संसाधनों (गैस, खनिज, तटीय क्षेत्र) से समृद्ध होने के बावजूद बलूचिस्तान की जनता लंबे समय से शोषण, जबरन गुमशुदगी (Enforced Disappearances) और सैन्य अत्याचारों का सामना कर रही है। 11 अगस्त को दुनिया भर के बलूच समुदाय द्वारा चलाए गए ऑनलाइन अभियानों और ग्राउंड-लेवल आयोजनों से इस्लामाबाद और रावलपिंडी (पाकिस्तानी सैन्य मुख्यालय) में खलबली मच गई है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के केंद्र गवादर और आसपास के इलाकों में बलूच राष्ट्रवादियों का यह बढ़ता विरोध पाकिस्तान के लिए एक बड़ा रणनीतिक झटका साबित हो रहा है।
क्या इससे सिंध और पीओके में भी आजादी की मांग उठेगी?
बलूच राष्ट्रवादियों द्वारा ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ के जरिए वैश्विक मंचों पर आवाज उठाने से पाकिस्तान के भीतर सिंध और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में भी आजादी और विरोध की लहर को सीधे तौर पर बल मिलता है। सिंध प्रांत में लंबे समय से ‘जीए सिंध मुत्तहिदा महाज’ और अन्य संगठन अलग ‘सिंधुदेश’ की मांग कर रहे हैं। बलूच आंदोलन की तर्ज पर सिंधी राष्ट्रवादी भी पाकिस्तानी हुकूमत पर अपने संसाधनों के दोहन और सिंधी भाषा-संस्कृति को दबाने का आरोप लगाते हैं।
बलूचिस्तान और सिंध भौगोलिक रूप से सटे हुए हैं। दोनों ही क्षेत्रों के आंदोलनकारी संगठन (जैसे बलूच लिबरेशन आर्मी और सिंधी लिबरेशन आर्मी) अक्सर एक-दूसरे के आंदोलनों को नैतिक और रणनीतिक समर्थन देते हैं। बलूच अभियान की सफलता सिंध के राष्ट्रवादियों को भी अपना संघर्ष तेज करने के लिए प्रेरित करती है।
PoK और गिलगित-बल्तिस्तान में पिछले कुछ वर्षों में बिजली दरों में बढ़ोतरी, सब्सिडी खत्म किए जाने, आटा संकट और पाकिस्तानी सेना के दमन के खिलाफ अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शन हुए हैं। PoK की जनता और वहाँ के स्थानीय एक्टिविस्ट अक्सर यह आवाज उठाते रहे हैं कि इस्लामाबाद उन्हें अपने नागरिक नहीं बल्कि ‘गुलाम’ समझता है। जब बलूचिस्तान जैसे बड़े प्रांत में आजादी का झंडा फहराया जाता है, तो PoK के स्थानीय संगठनों में भी अपनी स्वायत्तता और आजादी की मांग को लेकर नए सिरे से हौसला बनता है।

क्या चीन को इससे झटका लगेगा?
बलूचिस्तान, सिंध और PoK में बढ़ते असंतोष व आजादी की मांग से चीन को बहुत बड़ा और सीधा झटका लगेगा। चीन के लिए यह सिर्फ एक राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि उसके अरबों डॉलर के निवेश और ग्लोबल ट्रेड प्लान (Belt and Road Initiative) के अस्तित्व का सवाल है।
चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) का सबसे प्रमुख केंद्र बलूचिस्तान में स्थित गवादर पोर्ट (Gwadar Port) है। चीन गवादर के जरिए सीधे अरब सागर और हिंद महासागर तक पहुंचना चाहता है। बलूच विद्रोही (जैसे Baloch Liberation Army) CPEC को अपने संसाधनों की लूट मानते हैं। वे लगातार चीन के इंफ्रास्ट्रक्चर, चीनी इंजीनियरों और कामगारों पर जानलेवा हमले करते रहे हैं।
बलूचिस्तान में आजादी की मांग जितनी मजबूत होगी, गवादर पोर्ट का संचालन चीन के लिए उतना ही खतरनाक और नामुमकिन होता जाएगा। पिछले कुछ वर्षों में कराची (सिंध), बलूचिस्तान और Khyber Pakhtunkhwa में कई चीनी इंजीनियरों और नागरिकों को निशाना बनाया गया है। चीन ने पाकिस्तान की सरकार और सेना पर अपने नागरिकों को सुरक्षा देने का भारी दबाव बनाया हुआ है। अगर बलूचिस्तान के साथ-साथ सिंध और PoK में भी स्थिति बिगड़ती है, तो चीनी प्रोजेक्ट्स पर काम करने वाले नागरिकों की सुरक्षा करना लगभग असंभव हो जाएगा।
अब भारत की क्या रणनीति होनी चाहिए?
बलूचिस्तान के मसले पर भारत के पास अपनी रणनीतिक और कूटनीतिक स्थिति को मजबूत करने का एक बड़ा अवसर है। भारत को इस पूरे घटनाक्रम में अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और अखंडता को ध्यान में रखते हुए त्रिस्तरीय रणनीति पर काम करना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र (UNHRC), यूरोपीय संघ और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बलूचिस्तान, सिंध और PoK में पाकिस्तानी सेना द्वारा किए जा रहे मानवाधिकार उल्लंघनों को तथ्यों के साथ मजबूती से उठाना चाहिए। साथ ही साथ पश्चिम (अमेरिका, यूके, यूरोप) में रह रहे बलूच और सिंधी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को अपनी आवाज उठाने के लिए एक लोकतांत्रिक और नैतिक मंच प्रदान करने में सहायता करना चाहिए।
भारत की नीति “सख्त कूटनीति, सतर्क निगरानी और रणनीतिक संतुलन” की होनी चाहिए। भारत को पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में सीधे हस्तक्षेप से बचते हुए, वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों, अंतरराष्ट्रीय कानूनों और अपनी क्षेत्रीय अखंडता के सिद्धांतों पर मजबूती से टिके रहना चाहिए। इससे चीन-पाकिस्तान गठजोड़ बैकफुट पर रहेगा और दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति एक ‘सुरक्षा प्रदाता’ और मजबूत वैश्विक शक्ति के रूप में और सुदृढ़ होगी।
बलूचिस्तान में 11 अगस्त का आयोजन और रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान का बढ़ता प्रभाव सिंध और PoK में सीधे तौर पर “आजादी और स्वायत्तता की आग में घी डालने” का काम करता है। हालांकि, इस्लामाबाद और पाकिस्तानी सेना इसे दबाने के लिए सैन्य ताकत का इस्तेमाल करती है, लेकिन बलूच आंदोलन की आक्रामकता ने सिंध और PoK के लोगों को यह मैसेज जरूर दे दिया है कि इस्लामाबाद का केंद्रवादी नियंत्रण अब पहले जैसा अटूट नहीं रहा।
बलूचिस्तान में इजरायल की एंट्री हो चुकी है?
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स और पाकिस्तानी मीडिया में इस बात की जोरदार चर्चा और दावे किए जा रहे हैं कि बलूचिस्तान में इजरायल की एंट्री हो चुकी है। हालांकि, इसे किसी देश द्वारा आधिकारिक पुष्टि के बजाय भू-राजनीतिक दावों और विश्लेषणात्मक रिपोर्टों के रूप में देखा जाता है।
पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हामिद मीर ने अपने शो Capital Talk में दावा किया था कि इजरायल और उसकी खुफिया एजेंसी मोसाद (Mossad) बलूचिस्तान के जरिए इलाके में सक्रिय हो रही हैं। उनका दावा था कि इजरायल बलूचिस्तान की रणनीतिक स्थिति (जो कि ईरान की सीमा से सटा हुआ है) का इस्तेमाल ईरान को अंदर से अस्थिर करने के लिए कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स और लेखों (जैसे पाकिस्तानी अखबार Dawn का एनालिसिस) में यह चर्चा रही है कि इजरायल मध्य पूर्व में ईरान को घेरने के लिए बलूच विद्रोहियों और बलूचिस्तान क्षेत्र का इस्तेमाल एक ‘स्ट्रैटेजिक प्रेशर पॉइंट’ की तरह करना चाहता है।
ऐसा कहा जा रहा है कि ईरान के ‘सिस्तान-बलूचिस्तान’ प्रांत में भी बलूच अलगाववादी समूह सक्रिय हैं। इजरायल-ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष के बाद यह माना जाने लगा कि इजरायल ईरान के पूर्वी बॉर्डर (बलूचिस्तान रीजन) पर अपना खुफिया नेटवर्क मजबूत कर रहा है। पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान और नेता अक्सर यह आरोप लगाते हैं कि बलूचिस्तान में जारी स्वतंत्रता आंदोलन और विद्रोही समूहों को विदेशी ताकतों का समर्थन हासिल है। जब भी वहां हमले तेज होते हैं, इस्लामाबाद इसे विदेशी साजिश या विदेशी खुफिया एजेंसियों (मोसाद सहित) की एंट्री से जोड़कर देखता है।
इजरायल ने कभी भी बलूचिस्तान में किसी भी तरह की अपनी मौजूदगी या अभियानों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इजरायल या मोसाद की बलूचिस्तान में कोई गतिविधि है भी, तो वह मुख्यतः ईरान की खुफिया घेराबंदी और निगरानी तक सीमित हो सकती है, न कि प्रत्यक्ष सैन्य मौजूदगी।
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