नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी राजनीतिक दल के छात्र संगठन का सदस्य होना, अपने-आप में दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (DUSU) चुनाव लड़ने से किसी उम्मीदवार को अयोग्य नहीं बनाता। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि छात्र संघ चुनाव की पूरी प्रक्रिया राजनीतिक दलों के प्रभाव और हस्तक्षेप से मुक्त रहनी चाहिए।
चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ ने यह टिप्पणी दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा विजेता की ओर से दाखिल याचिका का निस्तारण करते हुए की। याचिका में 11 सितंबर को मुख्य चुनाव अधिकारी की ओर से जारी DUSU चुनाव के लिए उम्मीदवारों की सूची को चुनौती दी गई थी।
लिंगदोह कमेटी के नियमों को लेकर क्या था विवाद?
याचिका में आरोप लगाया गया था कि DUSU चुनाव में लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का पालन नहीं किया जा रहा है। खास तौर पर क्लॉज 6.3 का हवाला देते हुए कहा गया कि छात्र चुनाव और छात्र प्रतिनिधित्व को राजनीतिक दलों से अलग रखा जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता का दावा था कि कुछ उम्मीदवार राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संगठनों के समर्थन से चुनाव लड़ रहे हैं। याचिका में NSUI, ABVP, AISA, SFI और AAP के छात्र संगठन ASAP से जुड़े उम्मीदवारों और पैनल का भी उल्लेख किया गया था।
कोर्ट ने छात्र संगठन और राजनीतिक दल में अंतर किया
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी राजनीतिक दल के छात्र विंग की सदस्यता को सीधे राजनीतिक दल की सदस्यता या उससे जुड़ाव के बराबर नहीं माना जा सकता। अदालत के मुताबिक, केवल छात्र संगठन का सदस्य होना लिंगदोह कमेटी की संबंधित शर्त का अपने-आप उल्लंघन नहीं है।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि छात्र चुनावों में राजनीतिक दलों की भागीदारी या हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है। चुनाव प्रक्रिया और छात्र प्रतिनिधित्व को राजनीतिक दलों से पूरी तरह अलग रखने की व्यवस्था का पालन किया जाना चाहिए।
विश्वविद्यालय और चुनाव अधिकारी की जिम्मेदारी
कोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी और मुख्य चुनाव अधिकारी को चुनाव प्रक्रिया में राजनीतिक दलों के किसी भी हस्तक्षेप पर नजर रखने को कहा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों, DUSU के नियमों और चुनाव आचार संहिता का पालन सुनिश्चित करना विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी है।
अदालत के सामने एक ऐसा पोस्टर भी रखा गया जिसमें एक उम्मीदवार के साथ राजनीतिक दल का नाम और चुनाव चिह्न दिखाई देने की बात कही गई। कोर्ट ने ऐसे मामलों को चुनाव अधिकारियों द्वारा जांचे जाने की जरूरत पर जोर दिया।
याचिका में क्या मांग की गई थी?
याचिका में आरोप लगाया गया था कि DUSU चुनाव प्रक्रिया में राजनीतिक प्रभाव दिखाई दे रहा है और यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा छात्र चुनावों को राजनीतिक दलों के प्रभाव से मुक्त रखने संबंधी निर्देशों के अनुरूप नहीं है। याचिकाकर्ता ने उम्मीदवारों की सूची को चुनौती देते हुए नए सिरे से सूची तैयार करने और चुनाव प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की थी।
याचिका में लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के क्लॉज 6.3 का भी हवाला दिया गया था, जिसके तहत छात्र चुनाव और छात्र प्रतिनिधित्व को राजनीतिक दलों से अलग रखने की बात कही गई है।
DUSU चुनाव पर क्या असर?
दिल्ली हाईकोर्ट ने DUSU चुनाव पर रोक लगाने या उम्मीदवारों को केवल छात्र संगठनों से जुड़े होने के आधार पर अयोग्य घोषित करने की मांग स्वीकार नहीं की। इसके साथ ही अदालत ने विश्वविद्यालय प्रशासन को यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी कि चुनाव प्रक्रिया में वास्तविक राजनीतिक दलों का हस्तक्षेप न हो।
DUSU चुनाव के लिए मतदान 18 सितंबर 2026 को निर्धारित है और मतगणना 19 सितंबर को होनी है।
क्या है लिंगदोह कमेटी की सिफारिश?
लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें छात्र संघ चुनावों में पारदर्शिता और राजनीतिक प्रभाव से दूरी बनाए रखने के लिए बनाई गई थीं। DUSU से जुड़े नियमों में छात्र चुनाव और छात्र प्रतिनिधित्व को राजनीतिक दलों से अलग रखने की व्यवस्था का उल्लेख है। दिल्ली हाईकोर्ट ने मौजूदा मामले में छात्र संगठन और राजनीतिक दल के बीच अंतर करते हुए कहा कि केवल किसी राजनीतिक दल के छात्र संगठन से जुड़ाव के आधार पर उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता।
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