नई दिल्ली। फिल्म ‘काला हिरण- द बैटल फॉर लीगेसी’ का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। काला हिरण फिल्म के निर्माता अमित जानी ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें फिल्म के टीजर और उससे जुड़े प्रमोशनल कंटेंट को हटाने का निर्देश दिया गया था।
दिल्ली हाईकोर्ट के 27 जुलाई के आदेश को दी चुनौती
निर्माता ने दिल्ली हाईकोर्ट के 27 जुलाई 2026 के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। हाईकोर्ट ने अभिनेता सलमान खान की याचिका पर सुनवाई करते हुए फिल्म के टीजर और उससे जुड़े कई ऑनलाइन लिंक हटाने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने निर्माता अमित जानी के इंटरव्यू से जुड़े कंटेंट को हटाने का भी निर्देश दिया था।
अमित जानी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दलील दी गई है कि हाईकोर्ट का आदेश फिल्म निर्माता की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करता है। याचिका में कहा गया है कि किसी सार्वजनिक घटना को फिल्म की कहानी और निर्माता के नजरिये से प्रस्तुत करना अभिव्यक्ति की आजादी के दायरे में आता है।
सलमान खान ने उठाए थे व्यक्तित्व अधिकारों के उल्लंघन के सवाल
दरअसल, सलमान खान ने दिल्ली हाईकोर्ट में फिल्म के खिलाफ याचिका दायर कर अपने व्यक्तित्व अधिकार (Personality Rights) की सुरक्षा की मांग की थी। उनका आरोप था कि फिल्म और उसके प्रचार सामग्री में उनकी पहचान और व्यक्तित्व का बिना सहमति व्यावसायिक इस्तेमाल किया जा रहा है।
सुनवाई के दौरान सलमान खान की ओर से कहा गया था कि फिल्म 1998 के काला हिरण शिकार मामले से जुड़ी घटनाओं से प्रेरित है और इसके प्रदर्शन से उनके व्यक्तित्व अधिकारों तथा प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच सकता है। याचिका में यह भी कहा गया कि फिल्म से जुड़े मामले अभी न्यायिक प्रक्रिया में हैं।
काला हिरण फिल्म टीजर में सलमान खान से जुड़े संदर्भ का आरोप
दिल्ली हाईकोर्ट के 27 जुलाई के आदेश में कहा गया कि फिल्म के टीजर में एक अभिनेता को ‘Ayan Khan’ नाम से दिखाया गया है और उसमें ‘Dabangg’ तथा ‘Sikandar’ जैसे संदर्भों का इस्तेमाल किया गया है, जो सलमान खान की फिल्मों से जुड़े हैं। आदेश के अनुसार टीजर में कांकाणी और काला हिरण मामले से जुड़े अन्य विशिष्ट संदर्भ भी दिखाई देते हैं।
हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना था कि इन संदर्भों से फिल्म और सलमान खान के बीच संबंध स्थापित होता है और फिल्म का प्रमोशनल कंटेंट उनकी व्यक्तित्व पहचान के व्यावसायिक इस्तेमाल का सवाल खड़ा करता है।
निर्माता ने अभिव्यक्ति की आजादी का दिया हवाला
फिल्म निर्माता की ओर से इसके विपरीत यह तर्क दिया गया है कि फिल्म बनाना और सार्वजनिक घटनाओं को रचनात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना संविधान के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आता है। निर्माताओं ने पहले भी कहा है कि फिल्म किसी अभिनेता की बायोपिक नहीं है और वे अपने रचनात्मक अधिकारों की रक्षा करेंगे।
अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद यह स्पष्ट होगा कि दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर क्या रुख अपनाया जाता है और फिल्म के निर्माताओं को राहत मिलती है या नहीं।
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