गणेश चतुर्थी विशेष: भगवान गणेश की कथाएं केवल धार्मिक आस्था का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि इनमें बुद्धि, विवेक, कर्तव्य, विनय और अहंकार त्याग जैसे जीवन-मूल्यों के संदेश भी छिपे हैं।
भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में भगवान श्री गणेश केवल एक देवता नहीं, बल्कि चेतना, बुद्धि, शुभता और विघ्न विनाश के सर्वोपरि प्रतीक हैं। किसी भी मांगलिक कार्य, पूजा-अनुष्ठान या नए संकल्प की शुरुआत अगर किसी नाम से होती है, तो वे केवल और केवल ‘प्रथम पूज्य’ भगवान गजानन ही हैं। गणेश चतुर्थी का पावन पर्व न केवल उनके जन्मोत्सव का उल्लास लेकर आता है, बल्कि हर दिल में ज्ञान, विवेक और सकारात्मकता की एक नई लौ प्रज्वलित करता है। मिट्टी की प्रतिमाओं से लेकर आस्था के उमड़ते जनसैलाब तक, यह पर्व इस बात का साक्षी है कि विघ्नहर्ता आज भी अपने भक्तों के हर संकट को हरने के लिए उनके बीच विराजमान हैं।
लेकिन भगवान गणेश की महिमा केवल अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है; पौराणिक ग्रंथों में वर्णित उनसे जुड़ी कथाएँ मानव जीवन के गहन दर्शन, पारिवारिक मूल्यों और बुद्धिमत्ता का ऐसा भंडार हैं, जो हर युग में प्रासंगिक हैं। चाहे माता पार्वती के उबटन से उनके जन्म लेने का विहंगम प्रसंग हो, माता-पिता की परिक्रमा कर ब्रह्मांड का गूढ़ रहस्य समझाने की उनकी अद्भुत बुद्धिमत्ता हो, या फिर एकदंत बनकर महाभारत जैसा महाकाव्य रचने का उनका समर्पण-उनकी हर कथा इंसान को जीवन जीने का एक नया दृष्टिकोण देती है। आइए, गणेश चतुर्थी के इस पावन अवसर पर विघ्नहर्ता श्री गणेश के दिव्य स्वरूप को नमन करते हुए उनसे जुड़ी उन अमर और अलौकिक कथाओं के प्रवाह में उतरें, जो युगों-युगों से मानवता का मार्ग प्रशस्त करती आ रही हैं।
गणेश जी के जन्म की कथा
पौराणिक मान्यताओं और शिवपुराण के अनुसार, एक बार माता पार्वती कैलाश पर्वत पर स्नान करने की तैयारी कर रही थीं। उस समय द्वार पर पहरा देने के लिए कोई गण उपस्थित नहीं था। माता पार्वती ने सोचा कि उनका कोई ऐसा आज्ञाकारी सेवक होना चाहिए जो केवल उनकी आज्ञा का पालन करे। यह सोचकर माता पार्वती ने स्नान से पूर्व अपने शरीर के चंदन और उबटन (मैल) को एकत्र किया और उससे एक सुंदर बालक की आकृति बनाई। इसके बाद उन्होंने अपनी योगशक्ति और दिव्य चेतना से उस आकृति में प्राण फूँक दिए। इस प्रकार एक अत्यंत तेजस्वी और सुंदर बालक का जन्म हुआ।

माता पार्वती ने उस बालक को अपना पुत्र स्वीकार किया और उसे द्वार पर पहरा देने का काम सौंपा। माता ने बालक को सख्त आदेश दिया, “जब तक मैं स्नान करके बाहर न आ जाऊँ, तब तक मेरी अनुमति के बिना किसी भी व्यक्ति को अंदर मत आने देना।” बालक ने माता के आदेश को शिरोधार्य किया और हाथ में दंड लेकर द्वार पर पहरा देने लगा। कुछ ही देर में भगवान शिव वहाँ पहुँचे और भवन के भीतर जाने लगे। बालक ने भगवान शिव को पहचानता न होने के कारण द्वार पर ही रोक दिया और कहा, “ठहरिए! मेरी माता की आज्ञा के बिना कोई भी अंदर प्रवेश नहीं कर सकता।” भगवान शिव ने बालक को समझाने का प्रयास किया कि यह उनका ही निवास है, परंतु माता की आज्ञा के प्रति निष्ठावान बालक टस से मस न हुआ।
धीरे-धीरे बात बढ़ती गई और शिवगणों व बालक के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। बालक ने अपने अदम्य साहस और पराक्रम से सभी गणाध्यक्षों को परास्त कर दिया। यह देखकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल से बालक का मस्तक धड़ से अलग कर दिया। जब माता पार्वती स्नान के बाद बाहर आईं और अपने पुत्र को रक्तरंजित अवस्था में देखा, तो वे अपार शोक और क्रोध से भर गईं। उनका क्रोध इतना विकराल था कि संपूर्ण सृष्टि में हाहाकार मच गया और प्रलय की स्थिति उत्पन्न होने लगी। देवताओं ने माता पार्वती को शांत करने की प्रार्थना की। तब माता ने कहा कि वे केवल दो शर्तों पर ही शांत हो सकती हैं-पहला, उनके पुत्र को पुनः जीवित किया जाए और दूसरा, उसे समस्त देवों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त हो।
माता पार्वती के क्रोध को शांत करने के लिए भगवान शिव ने देवर्षि नारद और गरुड़ जी को उत्तर दिशा की ओर भेजा और आदेश दिया कि जो भी प्राणी सबसे पहले मिले, और जिसकी माता उसकी तरफ पीठ करके सोई हो, उसका सिर काटकर ले आएँ। खोज के दौरान उन्हें एक हथिनी (गज) और उसका शावक मिला। गरुड़ जी उस गजबालक का शीश लेकर कैलाश पहुँचे। भगवान शिव ने उस हाथी के मस्तक को बालक के धड़ पर स्थापित कर दिया और उसमें प्राणों का संचार किया। इस प्रकार बालक पुनः जीवित हो उठा। भगवान शिव ने उस बालक को अपने सभी गणों का स्वामी घोषित किया, जिससे उनका नाम ‘गणपति’ और ‘गजानन’ पड़ा। साथ ही, सभी देवताओं ने उन्हें वरदान दिया कि पृथ्वी या ब्रह्मांड में किसी भी शुभ कार्य, पूजा या अनुष्ठान में सबसे पहले श्री गणेश की ही पूजा की जाएगी। यह कथा माता-पिता की आज्ञा के प्रति अटूट निष्ठा, कर्तव्यनिष्ठा और अहंकार के त्याग का अमर संदेश देती है।
ज्योतिर्लिंग काशी विश्वनाथ : प्रलय काल में भी जिसका विनाश नहीं होगा पढ़िए पूरी कहानी
प्रथम पूज्य बनने की कथा (माता-पिता की परिक्रमा:
एक बार समस्त देवलोक में यह गंभीर प्रश्न उठा कि देवताओं में सबसे पहले किस देवता की पूजा की जानी चाहिए यानी ‘प्रथम पूज्य’ का स्थान किसे मिलना चाहिए। सभी देव स्वयं को इस पद का श्रेष्ठ अधिकारी मानते थे। जब इस विवाद का कोई हल नहीं निकला, तो सभी देवता निर्णय के लिए सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा और देवर्षि नारद के पास पहुँचे। देवताओं के बीच इस प्रतिस्पर्धा को सुलझाने के लिए एक परीक्षा तय की गई। शर्त यह रखी गई कि जो भी संपूर्ण ब्रह्मांड (पृथ्वी) की सबसे पहले परिक्रमा करके कैलाश पर्वत लौटेगा, उसे ही ‘प्रथम पूज्य’ घोषित किया जाएगा और उसकी पूजा हर शुभ कार्य से पहले अनिवार्य होगी।

शर्त सुनते ही सभी देवता अपने-अपने तीव्रगामी वाहनों पर सवार होकर निकल पड़े। भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय जी अपने वाहन मयूर (मोर) पर सवार होकर अत्यंत तीव्र गति से पृथ्वी की परिक्रमा के लिए उड़ चले। दूसरी ओर, बाल गणेश के सामने एक बड़ी चुनौती थी। उनका शरीर भारी था और उनका वाहन एक छोटा सा मूषक (चूहा) था, जो मयूर की गति का मुकाबला कभी नहीं कर सकता था। लेकिन भगवान श्री गणेश केवल शक्ति के नहीं, बल्कि अगाध बुद्धि और विवेक के भी स्वामी हैं। उन्होंने क्षण भर विचार किया और अपनी तीव्र बुद्धि से इस समस्या का एक अलौकिक समाधान निकाला।
भगवान श्री गणेश ने शांत चित्त से अपने पिता भगवान शिव और माता पार्वती के पास जाकर उन्हें एक साथ बैठने का अनुरोध किया। जब शिव और पार्वती जी आसन पर विराजमान हो गए, तब गणेश जी ने अत्यंत श्रद्धा और भक्ति भाव से उनके चरणों का स्पर्श किया और विधि-विधान से उनकी सात बार परिक्रमा की। परिक्रमा पूर्ण करने के बाद वे हाथ जोड़कर अपने माता-पिता के सामने खड़े हो गए। कुछ ही देर में कार्तिकेय जी पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा करके थक कर वापस लौटे और स्वयं को विजेता मानकर प्रथम पूज्य के पद का दावा करने लगे। तब भगवान शिव और माता पार्वती ने भगवान श्री गणेश से पूछा, “हे पुत्र! तुम तो परिक्रमा के लिए गए ही नहीं, फिर तुम इस पद के अधिकारी कैसे हुए?”
तब बाल गणेश ने अत्यंत विनम्रता और ज्ञान से उत्तर दिया, “हे पूज्य माता-पिता! शास्त्रों और वेदों के अनुसार संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल और समस्त तीर्थ माता-पिता के चरणों में ही निहित हैं। माता-पिता की सेवा और उनके चरणों की परिक्रमा करना, संपूर्ण सृष्टि की करोड़ों बार परिक्रमा करने से भी बढ़कर है। मैंने आप दोनों की परिक्रमा करके समस्त ब्रह्मांड की परिक्रमा पूरी कर ली है।” गणेश जी के इस अद्वितीय तर्क, गहन धर्म-ज्ञान और बुद्धिमत्ता को देखकर भगवान शिव, माता पार्वती, देवर्षि नारद और सभी उपस्थित देवता आश्चर्यचकित और आनंदित हो उठे। भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए गणेश जी की विवेकशीलता की प्रशंसा की और उन्हें विजेता घोषित किया। शिव जी ने वरदान देते हुए कहा कि गणेश की बुद्धिमत्ता ने यह सिद्ध कर दिया है कि बल और गति से बड़ी बुद्धि और माता-पिता के प्रति भक्ति होती है। इसलिए, आज से संपूर्ण ब्रह्मांड में किसी भी मांगलिक कार्य, यज्ञ या पूजा-अनुष्ठान में सबसे पहले भगवान श्री गणेश की ही पूजा की जाएगी और उनके बिना कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होगा।
‘एकदंत’ कहलाने की कथा (महाभारत लेखन और परशुराम जी से युद्ध:-
इतिहास और पौराणिक ग्रंथों में भगवान श्री गणेश के ‘एकदंत’ (एक दाँत वाले) होने के दो अत्यंत प्रसिद्ध और रोचक प्रसंग मिलते हैं। पहला प्रसंग उनके अगाध ज्ञान, समर्पण और महाभारत जैसे महान ग्रंथ के लेखन से जुड़ा है, तो दूसरा प्रसंग उनके पराक्रम और महर्षि परशुराम के प्रति आदर भाव को दर्शाता है।
महाभारत लेखन और त्याग की गाथा:-
जब महर्षि वेदव्यास जी ने महाकाव्य ‘महाभारत’ की रचना का विचार किया, तो उन्हें एक ऐसे विद्वान और तीव्र गति से लिखने वाले लेखक की आवश्यकता हुई जो बिना रुके उनके श्लोकों को लिपिबद्ध कर सके। इस कार्य के लिए केवल भगवान श्री गणेश ही योग्य पाए गए। गणेश जी ने महाभारत लिखने का प्रस्ताव स्वीकार करते हुए एक शर्त रखी: “हे महर्षि! जब आप बोलना शुरू करेंगे, तो मेरी लेखनी (कलम) एक क्षण के लिए भी नहीं रुकनी चाहिए। यदि आप रुक गए, तो मैं लिखना छोड़ दूंगा।”

महर्षि वेदव्यास ने इस शर्त को मानते हुए बदले में अपनी एक शर्त रखी: “मुझे स्वीकार है, परंतु आप भी किसी भी श्लोक को बिना उसका अर्थ समझे नहीं लिखेंगे।” लेखन का महान कार्य प्रारंभ हुआ। वेदव्यास जी श्लोक बोलते जाते और गणेश जी अत्यंत तीव्र गति से उन्हें ताड़पत्रों पर लिखते जाते। बीच-बीच में जब वेदव्यास जी को सोचने के लिए थोड़ा समय चाहिए होता, तो वे एक अत्यंत कठिन और गूढ़ श्लोक (कूट श्लोक) बोल देते। जब तक भगवान श्री गणेश उस श्लोक का गहरा अर्थ समझते, तब तक व्यास जी अगले कई श्लोकों की रचना कर लेते।
इसी निरंतर लेखन के दौरान अचानक गणेश जी की लेखनी (कलम) टूट गई। अपनी शर्त के अनुसार गणेश जी को रुकना नहीं था, क्योंकि रुकने पर लेखन का यह पवित्र संकल्प अधूरा रह जाता। बिना एक पल का विलंब किए, गणेश जी ने अपनी बुद्धिमत्ता और समर्पण का परिचय दिया-उन्होंने स्वयं अपने दाहिने दाँत को तोड़ लिया और उसे स्याही में डुबोकर महाभारत लिखना जारी रखा। ज्ञान और धर्म की रक्षा के लिए अपने ही अंग का त्याग करने की इस अलौकिक घटना के बाद से भगवान श्री गणेश ‘एकदंत’ नाम से संपूर्ण संसार में विख्यात हुए।
परशुराम जी से युद्ध और मर्यादा का पालन
दूसरा प्रसंग भगवान शिव के परम भक्त महर्षि परशुराम जी से जुड़ा हुआ है। एक बार परशुराम जी अपने शत्रु सहस्रबाहु का वध करने के बाद भगवान शिव का धन्यवाद करने और उनके दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पहुँचे। उस समय भगवान शिव ध्यानमग्न थे और माता पार्वती विश्राम कर रही थीं। शिव जी के आदेशानुसार बाल गणेश मुख्य द्वार पर पहरा दे रहे थे। परशुराम जी ने जब भीतर प्रवेश करने का प्रयास किया, तो भगवान श्री गणेश ने अत्यंत नम्रता से उन्हें रोकते हुए कहा कि पिता श्री अभी ध्यान में हैं, इसलिए थोड़ा प्रतीक्षा करें। अपने क्रोधी स्वभाव के लिए जाने जाने वाले परशुराम जी इसे अपना अपमान समझ बैठे और क्रोधित होकर गणेश जी से युद्ध करने लगे। बाल गणेश ने अपने पराक्रम से परशुराम जी के हर वार को विफल कर दिया। जब परशुराम जी ने देखा कि वे बाल गणेश को परास्त नहीं कर पा रहे हैं, तो उन्होंने अंत में भगवान शिव द्वारा दिए गए अपने दिव्य अस्त्र ‘परशु’ (फरसा) का प्रयोग गणेश जी पर कर दिया।

गणेश जी चाहते तो अपनी शक्ति से उस फरसे के प्रहार को भी विफल कर सकते थे, लेकिन वह अस्त्र उनके पिता भगवान शिव का दिया हुआ था। अपने पिता के अस्त्र और महर्षि परशुराम के सम्मान की मर्यादा रखते हुए, भगवान श्री गणेश ने उस फरसे का प्रहार रोकने के बजाय उसे अपने दाँत पर झेल लिया। फरसे के आघात से उनका एक दाँत टूटकर ज़मीन पर गिर गया। जब माता पार्वती वहाँ पहुँचीं और पुत्र को रक्तरंजित देखा, तो वे क्रोधित हो गईं। तब परशुराम जी को अपनी भूल का अहसास हुआ। उन्होंने भगवान श्री गणेश की स्तुति की और उन्हें वरदान दिया कि उनका यह ‘एकदंत’ रूप तीनों लोकों में पूजनीय होगा और जो भी भक्त इस रूप का स्मरण करेगा, उसके सभी विघ्न दूर हो जाएँगे।
यह कथा सिखाती है कि महान लक्ष्यों (जैसे ज्ञान और धर्म की स्थापना) को पाने के लिए यदि स्वयं के सुख या अहंकार का त्याग भी करना पड़े, तो पीछे नहीं हटना चाहिए। इसके साथ ही, यह प्रसंग यह भी संदेश देता है कि शक्ति और सामर्थ्य होने के बावजूद बड़ों के आदर और मर्यादा की रक्षा के लिए सहनशीलता बनाए रखना ही सच्चे ज्ञान का लक्षण है।
चंद्रमा को श्राप और गणेश चतुर्थी का महत्व:-
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार भगवान श्री गणेश को देवलोक और भक्तों द्वारा अत्यधिक मोदक (लड्डू) भेंट में मिले थे। मोदकों का भोग लगाकर और पेट भरकर गणेश जी अपने वाहन मूषक (चूहे) पर सवार होकर कैलाश की ओर लौट रहे थे। रात्रि का समय था और गगन में पूर्णिमा का चंद्रमा अपनी शीतल और सुंदर किरणों से चमक रहा था। मार्ग में अचानक एक विषैला सर्प (साँप) मूषक के सामने आ गया। सर्प को देखकर मूषक भयभीत हो गया और डर के मारे उछल पड़ा। मूषक के इस तरह अचानक हिलने से गणेश जी का संतुलन बिगड़ गया और वे ज़मीन पर गिर पड़े। इस झटके से उनके पेट में रखे कई मोदक बाहर निकल आए। गणेश जी ने शांत भाव से स्वयं को संभाला, मोदकों को वापस एकत्र किया और उदर पर नाग को लपेटकर पुनः संभलकर बैठ गए।
आकाश में उपस्थित चंद्रदेव इस पूरी घटना को देख रहे थे। अपने अति सुंदर रूप और आभा पर अभिमान करने वाले चंद्रमा से बाल गणेश का इस प्रकार गिरना देखा न गया और वे अहंकार में भरकर ज़मीन पर गिरे भगवान श्री गणेश का उपहास उड़ाते हुए ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। चंद्रमा के इस घमंड और अनादर को देखकर श्री गणेश अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने चंद्रमा को अपने अहंकार का दंड देने के लिए तुरंत श्राप दे दिया: “हे चंद्र! तुम्हें अपने रूप और सुंदरता पर अत्यधिक अहंकार हो गया है। इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि तुम्हारी यह कांति और सुंदरता तुरंत समाप्त हो जाएगी। तुम पूरी तरह निष्प्रभ और काले हो जाओगे। जो भी तुम्हें देखेगा, उसे पाप लगेगा।”
गणेश जी के श्राप के प्रभाव से चंद्रदेव की संपूर्ण चमक तुरंत लुप्त हो गई और वे अंधकार में डूब गए। अपनी भूल का अहसास होते ही चंद्रमा का सारा घमंड चूर-चूर हो गया। वे लज्जित होकर क्षमा माँगने लगे और समुद्र के जल में छिप गए। चंद्रमा के बिना संपूर्ण संसार में अंधकार छा गया और प्रकृति का संतुलन बिगड़ने लगा। तब सभी देवता और ऋषि-मुनि चंद्रदेव को साथ लेकर भगवान श्री गणेश की शरण में पहुँचे और उनसे चंद्रमा को क्षमा करने की प्रार्थना की। श्री गणेश दयालु हैं; भक्तों और देवों की स्तुति से उनका क्रोध शांत हुआ।

भगवान श्री गणेश ने कहा, “दिया गया श्राप पूरी तरह वापस तो नहीं लिया जा सकता, लेकिन मैं इसमें संशोधन करता हूँ। तुम अपनी खोई हुई कलाएँ (चमक) धीरे-धीरे पुनः प्राप्त करोगे। महीने के 15 दिन तुम्हारी कलाएँ घटेंगी (कृष्ण पक्ष) और अमवास्या को तुम पूरी तरह दिखाई नहीं दोगे। इसके बाद अगले 15 दिन तुम्हारी कलाएँ बढ़ेंगी (शुक्ल पक्ष) और पूर्णिमा को तुम पुनः पूर्ण रूप में चमकोगे।” इसके साथ ही गणेश जी ने एक विशेष चेतावनी देते हुए कहा, “भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी (गणेश चतुर्थी) के दिन जिस दिन मेरा यह अवतार दिवस मनाया जाएगा, उस दिन जो भी व्यक्ति तुम्हारे इस रूप का दर्शन करेगा, उस पर झूठा कलंक या चोरी का झूठा आरोप लगेगा।”
गणेश चतुर्थी पर चंद्र-दर्शन न करने का महत्व
इसी पौराणिक कथा के कारण ही गणेश चतुर्थी की रात को चंद्रमा के दर्शन करना वर्जित माना गया है। लोक-परंपरा में इस चतुर्थी को ‘कलंक चतुर्थी’ भी कहा जाता है। माना जाता है कि द्वापर युग में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी गणेश चतुर्थी के दिन अनजाने में चंद्रमा के दर्शन कर लिए थे, जिसके कारण उन पर ‘स्यमंतक मणि’ चुराने का झूठा कलंक लगा था। बाद में श्रीकृष्ण ने गणेश चतुर्थी का व्रत रखकर विघ्नहर्ता गणेश जी की पूजा की, तब जाकर वे इस झूठे आरोप से मुक्त हुए थे। यह कथा मनुष्य को यह सीख देती है कि रूप, धन, ज्ञान या पद का अहंकार कभी नहीं करना चाहिए। किसी की लाचारी या विपत्ति पर हँसना पतन का कारण बनता है। गणेश चतुर्थी का यह पर्व हमें अपने भीतर के अहंकार को मिटाकर नम्रता अपनाने की प्रेरणा देता है।
कुबेर का अहंकार भंजन:-
पौराणिक कथाओं के अनुसार, धन के देवता और अलकापुरी के राजा कुबेर को अपनी अपार संपत्ति और वैभव पर अत्यधिक अहंकार हो गया था। वे खुद को तीनों लोकों में सबसे धनी और शक्ति संपन्न मानते थे। अपने इसी धन-दौलत का प्रदर्शन करने के लिए कुबेर ने एक बार एक विशाल और भव्य भोज (महाप्रीतिभोज) का आयोजन किया, जिसमें तीनों लोकों के देवों, ऋषियों और गंधर्वों को आमंत्रित किया गया। कुबेर स्वयं कैलाश पर्वत पहुँचे और भगवान शिव तथा माता पार्वती को इस भोज में आने का निमंत्रण दिया। त्रिकालदर्शी भगवान शिव कुबेर के मन में छिपे अहंकार को तुरंत ताड़ गए। शिव जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “हे धनपति! हम कैलाश छोड़कर कहीं नहीं जाते, लेकिन आपके इस स्नेहपूर्ण निमंत्रण को अस्वीकार भी नहीं किया जा सकता। इसलिए हमारी ओर से हमारा छोटा पुत्र गणेश आपके महाभोज में सम्मिलित होगा।”
कुबेर ने सोचा कि एक छोटा सा बालक ही तो है, उसे तृप्त करना उनके विशाल अन्न भंडार के लिए कौन सी बड़ी बात होगी। वे सहर्ष बाल गणेश को अपने साथ अलकापुरी ले आए। अलकापुरी पहुँचकर कुबेर ने बड़े अभिमान के साथ भगवान श्री गणेश को अपने विशाल महल की भव्यता दिखाई और फिर उन्हें भोजन के लिए बैठाया। भांति-भांति के दिव्य और स्वादिष्ट व्यंजन गणेश जी के समक्ष परोसे गए। बाल गणेश ने भोजन करना प्रारंभ किया, लेकिन देखते ही देखते परोसा गया सारा भोजन समाप्त हो गया। कुबेर के सेवकों ने तुरंत और भोजन परोसा, परंतु गणेश जी की भूख शांत होने का नाम ही नहीं ले रही थी।
कुछ ही देर में कुबेर का विशाल रसोईघर खाली हो गया। कुबेर ने अपने संपूर्ण अन्न भंडार के द्वार खोल दिए, लेकिन गणेश जी सब कुछ मिनटों में चट कर गए। जब अन्न का एक दाना भी नहीं बचा, तो भूखे गणेश जी ने कुबेर के सोने-चांदी के बर्तन, बर्तन में रखे मेवे और यहाँ तक कि महल के कीमती सामान को भी खाना शुरू कर दिया। गणेश जी ने चेतावनी देते हुए कहा, “हे कुबेर! यदि मेरी भूख शांत नहीं हुई, तो मैं तुम्हारी अलकापुरी और तुम्हें भी खा जाऊँगा।”

यह सुनते ही राजा कुबेर के होश उड़ गए। उनका सारा घमंड और अहंकार पल भर में हवा हो गया। वे समझ गए कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं परमात्मा का रूप हैं। भयभीत होकर कुबेर भागते हुए कैलाश पर्वत पहुँचे और भगवान शिव के चरणों में गिरकर अपनी रक्षा और क्षमा की गुहार लगाने लगे। भगवान शिव ने कुबेर से कहा, “हे कुबेर! तुमने भोजन अपने धन के अहंकार को दिखाने के लिए कराया था, निष्काम भक्ति भाव से नहीं। ईश्वर का पेट धन या आडंबर से नहीं, बल्कि प्रेम और श्रद्धा से भरता है।”
इसके बाद माता पार्वती ने मुस्कुराते हुए एक मिट्टी के पात्र में थोड़ा सा भुना हुआ अनाज (खांड) और एक तुलसी का पत्ता बाल गणेश को अत्यंत प्रेम से खाने को दिया। गणेश जी ने माता के हाथ से वह तुलसी युक्त अन्न ग्रहण किया और तुरंत उनकी भूख शांत हो गई। उन्होंने डकार ली और प्रसन्न हो गए। कुबेर को अपनी भूल का अहसास हो चुका था। उन्होंने भगवान श्री गणेश के चरणों में सिर झुकाकर क्षमा माँगी। यह कथा मनुष्य को यह सीख देती है कि धन, पद या संपत्ति का अहंकार क्षणभंगुर है और भक्ति में आडंबर का कोई स्थान नहीं होता। ईश्वर को बाहरी वैभव या दिखावे से प्रसन्न नहीं किया जा सकता; उन्हें तृप्त करने के लिए केवल सच्चे भाव, नम्रता और एक ‘तुलसी पत्र’ (श्रद्धा) की आवश्यकता होती है।
रावण, आत्मलिंग और बालगणेश की चतुराई:-
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, लंकाधिपति रावण भगवान शिव का परम भक्त था, लेकिन साथ ही वह अपने बल और तपस्या के अहंकार से भरा हुआ भी था। रावण अपनी लंका को अजेय और अमर बनाना चाहता था। इसके लिए उसने भगवान शिव की घोर तपस्या की। रावण की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी प्रकट हुए और वरदान माँगने को कहा। रावण ने भगवान शिव से उनका ‘आत्मलिंग’ माँग लिया। भगवान शिव अत्यंत दयालु हैं; उन्होंने रावण को आत्मलिंग सौंप दिया, लेकिन उसके साथ एक अति महत्वपूर्ण शर्त रखी: “हे रावण! तुम इस लिंग को लंका ले जा सकते हो, परंतु ध्यान रहे कि यात्रा के दौरान इसे कहीं भी भूमि (ज़मीन) पर मत रखना। यदि तुमने इसे एक बार भी ज़मीन पर रख दिया, तो यह वहीं स्थापित हो जाएगा और फिर इसे वहाँ से हिलाया नहीं जा सकेगा।”
रावण अत्यंत प्रसन्न होकर आत्मलिंग लेकर लंका की ओर चल पड़ा। जब यह बात देवलोक में देवताओं को पता चली, तो वे भयभीत हो गए। देवताओं को ज्ञात था कि यदि आत्मलिंग लंका में स्थापित हो गया, तो रावण को परास्त करना असंभव हो जाएगा और अधर्म का साम्राज्य फैल जाएगा। सभी देवता अपनी रक्षा के लिए भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे। भगवान विष्णु ने देवताओं की चिंता दूर करने के लिए बाल गणेश को याद किया और एक दिव्य योजना बनाई। जब रावण कर्नाटक के गोकर्ण क्षेत्र से गुज़र रहा था, तब भगवान विष्णु ने अपनी माया से संध्या (शाम) का भ्रम उत्पन्न कर दिया और रावण को तीव्र लघुशंका (नित्यकर्म) की अनुभूति कराई। रावण धर्मसंकट में पड़ गया क्योंकि संध्या वंदन का समय हो चुका था और हाथ में आत्मलिंग होने के कारण वह नित्यकर्म नहीं कर सकता था। उसे आत्मलिंग को किसी के हाथों में सौंपना था, लेकिन ज़मीन पर न रखने की शर्त याद थी।
तभी भगवान विष्णु के संकेत पर भगवान श्री गणेश एक साधारण ग्वाले (गाय चराने वाले बालक) का रूप धारण कर रावण के सामने आए। रावण ने ग्वाले बने भगवान श्री गणेश को देखा और राहत की सांस ली। रावण ने उनसे प्रार्थना की कि वे कुछ समय के लिए इस शिवलिंग को अपने हाथों में संभाल लें। भगवान श्री गणेश ने तुरंत शर्त रखी: “हे लंकेश! यह लिंग अत्यंत भारी लग रहा है। मैं इसे ज़्यादा देर तक नहीं संभाल पाऊँगा। मैं तुम्हें केवल तीन बार पुकारूँगा। यदि तुम तीन आवाज़ें देने के बाद भी वापस नहीं आए, तो मैं इसे ज़मीन पर रख दूंगा।”

विवश होकर रावण ने गणेश जी की शर्त मान ली और संध्या वंदन के लिए नदी के तट पर चला गया। रावण के जाते ही बाल गणेश ने योजना के अनुसार कुछ ही क्षणों में रावण को एक के बाद एक तीन बार ज़ोर-ज़ोर से पुकारा: “रावण! रावण! रावण!” रावण जल में था और तुरंत वापस नहीं आ सका। तीसरी आवाज़ देते ही गणेश जी ने मुस्कुराते हुए आत्मलिंग को वहीं गोकर्ण की भूमि पर स्थापित कर दिया। जब तक रावण दौड़कर वापस आया, आत्मलिंग ज़मीन में धँस चुका था। रावण ने अपनी पूरी ताकत लगाकर उस लिंग को उखाड़ने का प्रयास किया, लेकिन वह तिल भर भी हिल न सका। क्रोध में आकर रावण ने शिवलिंग को खींचने की कोशिश की, जिससे उसका आकार ‘गाय के कान’ जैसा हो गया। इसी कारण यह पवित्र स्थान ‘गोकर्ण महाबलेश्वर’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
जब रावण को समझ आया कि उसके साथ छल हुआ है, तो उसने क्रोध में आकर ग्वाले बने बाल गणेश के मस्तक पर अपना मुक्का मार दिया। लेकिन बाल गणेश अपने असली रूप में प्रकट हुए। रावण को अपनी भूल और देवताओं की इस लीला का अहसास हुआ, और वह हताश होकर खाली हाथ लंका लौट गया। यह कथा संदेश देती है कि अधर्म और अहंकार कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, धर्म और सद्बुद्धि के आगे वह हमेशा परास्त होता है। बाल गणेश की यह चतुराई इस बात का प्रमाण है कि बल से बड़ी बुद्धि होती है और संसार के कल्याण के लिए उठाए गए कदम हमेशा सफल होते हैं।
मूषक के वाहक बनने की कथा
देवलोक में ‘कौंच’ नाम का एक अत्यंत सुंदर और सर्वगुण संपन्न गंधर्व रहता था। लेकिन अपनी सुंदरता और कला के कारण उसके भीतर अहंकार आ गया था। एक बार महर्षि सौभरी के आश्रम में एक धार्मिक सभा का आयोजन हो रहा था। वहाँ कौंच भी उपस्थित था। अनजाने में या अपने अभिमान के वश होकर कौंच का पैर महर्षि सौभरी के पैर पर पड़ गया। महर्षि सौभरी ध्यानमग्न थे, इसलिए कौंच की इस उद्दंडता और अहंकार से अत्यंत क्रोधित हो गए।
महर्षि सौभरी ने कौंच को दंड देते हुए श्राप दिया: “हे कौंच! तुम्हें अपनी सुंदरता और स्वच्छंदता पर अत्यधिक अहंकार है। तुम दूसरों की शांति भंग कर रहे हो, इसलिए तुम एक ऐसा जीव बन जाओ जो हर समय नीचे ज़मीन पर रेंगता रहे और दूसरों का नुकसान करे। तुम तुरंत एक ‘मूषक’ (चूहा) बन जाओ!” श्राप के प्रभाव से गंधर्व कौंच तुरंत एक विशालकाय और भयंकर चूहा बन गया। आकार में पर्वत जितना विशाल यह मूषक सीधे पराशर ऋषि के आश्रम में जा पहुँचा। मूषक ने अपने तीखे दाँतों से पराशर मुनि के आश्रम की जड़ी-बूटियाँ, ग्रंथ, वस्त्र और अनाज का भंडार सब कुछ कुतरकर नष्ट कर दिया। मूषक के इस उपद्रव से पूरे आश्रम और आस-पास के क्षेत्रों में हाहाकार मच गया।
पीडित होकर पराशर मुनि ने उस समय अपने आश्रम में विश्राम कर रहे बाल गणेश की शरण ली और इस विशालकाय मूषक के प्रकोप से बचाने की प्रार्थना की। बाल गणेश ने पराशर मुनि को आश्वस्त किया और उस विशाल मूषक का दमन करने के लिए अपना दिव्य पाश (रस्सी) फेंका। वह चमकता हुआ पाश मूषक की गर्दन में जाकर लिपट गया और उसे खींचता हुआ सीधे गणेश जी के चरणों में ले आया।
पाश में बँधते ही मूषक का सारा अहंकार चूर-चूर हो गया और वह मूर्छित होकर गिर पड़ा। जब उसे होश आया, तो उसने बाल गणेश के अलौकिक स्वरूप को देखा और अपने प्राणों की भीख माँगते हुए उनके चरणों में गिर पड़ा। श्री गणेश तो भक्तवत्सल और दयालु हैं; उन्होंने मूषक की प्रार्थना स्वीकार कर ली और कहा, “मैं तुम्हारे समर्पण से प्रसन्न हूँ। माँगो, तुम्हें क्या वरदान चाहिए?” लेकिन मूषक के भीतर का गंधर्व अहंकार से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ था। उसने अभिमान में आकर कहा, “हे प्रभु! मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए। बल्कि यदि आप चाहें, तो मुझसे कोई वरदान माँग सकते हैं!”

गणेश जी मुस्कुराए और उन्होंने उसके इस अहंकार को भी सहजता से स्वीकार करते हुए कहा, “यदि तुम मुझे वरदान देना ही चाहते हो, तो वरदान दो कि तुम आज से मेरे वाहन (सवारी) बनोगे।” मूषक ने सहर्ष यह स्वीकार कर लिया। लेकिन जैसे ही विशालकाय गणेश जी मूषक की पीठ पर सवार हुए, गणेश जी के अति भारी वजन से मूषक दबने लगा और उसकी सांसें रुकने लगीं। तब मूषक को अपनी भूल का पूर्ण अहसास हुआ और उसने अत्यंत नम्रता से प्रार्थना की, “हे प्रभु! कृपा करके अपना भार कम कर लीजिए, अन्यथा मेरी रीढ़ की हड्डी टूट जाएगी।”
कृपालु गणेश जी ने अपना वजन अत्यंत हल्का कर लिया, जिससे मूषक आसानी से उन्हें अपनी पीठ पर उठा सका। उस दिन से वह विशालकाय मूषक ‘मूषकासुर’ के रूप में गणेश जी का अनन्य भक्त और उनकी अमर सवारी बन गया। चूहा (मूषक) मन का प्रतीक है—जिस प्रकार चूहा हर वस्तु को कुतरता है और एक जगह शांत नहीं बैठता, उसी प्रकार मनुष्य का अनियंत्रित मन भी हर विषय-वासना को कुतरता रहता है। गणेश जी (बुद्धि और विवेक) का मूषक पर सवार होना इस बात का प्रतीक है कि जब बुद्धि मन पर नियंत्रण कर लेती है, तो जीवन संतुलित हो जाता है। यह कथा सिखाती है कि व्यक्ति कितना भी शक्तिशाली या सुंदर क्यों न हो, अहंकार हमेशा उसके पतन और विनाश का कारण बनता है।
गणेश जी हमें क्या शिक्षा देते हैं?
भगवान श्री गणेश का संपूर्ण स्वरूप और जीवन-वृत्त मानव जाति के लिए सद्बुद्धि, विवेक, संयम और आदर्श जीवन-शैली की महान शिक्षा है। उनका विशाल मस्तक गंभीर चिंतन और दूरदर्शिता, बड़े कान धैर्यपूर्वक अधिक सुनने (आत्मसात करने), छोटी आँखें सूक्ष्म निरीक्षण और पैनी दृष्टि, तथा मूषक की सवारी चंचल मन पर विवेक के नियंत्रण का संदेश देती है। वे हमें सिखाते हैं कि जीवन के महान लक्ष्यों की प्राप्ति और धर्म की रक्षा के लिए स्वयं के सुख व अहंकार का त्याग करने से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए, जैसा कि उन्होंने महाभारत लेखन के समय अपना दाँत तोड़कर सिद्ध किया। इसके साथ ही, माता-पिता के चरणों में ही समस्त ब्रह्मांड को देखने का उनका दृष्टिकोण हमें संबंधों के प्रति समर्पण, मातृ-पितृ भक्ति और विनयशील होने की प्रेरणा देता है-अर्थात जहाँ तीव्र बल और गति काम नहीं आती, वहाँ शांत चित्त और अगाध बुद्धि से हर संकट व विघ्न को आसानी से पार किया जा सकता है।
ये भी पढ़ें:-
श्रीकृष्ण: लीला-पुरुषोत्तम से परमेश्वर तक की यात्रा, हमारे पूज्य और सर्वप्रिय कैसे बने श्रीकृष्ण?
ज्योतिर्लिंग ‘बाबा वैद्यनाथ’ धाम-जिनके सामने रावण भी हार गया, आस्था और भक्ति की पूरी कहानी पढ़िए
